Wednesday, November 5, 2008

पत्‍थर होता इंसान

दर्द के इस शहर में
जल रहा चिराग बेखबर है
कोहरे सी नज्‍म् है औ,
शब्‍द तार तार है

एक बूंद पीठ सेंककर
धुआं धुआं सी उड चली
वक्‍त की मुरदा उम्‍मीदें
पर चाहतें बेशुमार हैं

प्रेम,स्‍नेह,नीर पत्‍तियाँ
रौंदकर सब बढे जा रहे हैं
लोहे की साँकलों के अंदर
दस्‍तक धडकनों की बेकार है

घर,बाग,ठूंठ से जंगल
सर्द शुष्‍क बियाबान से हैं खडे
संघर्षो की इस आग में
पत्‍थर हुए इंसान हैं

4 comments:

"Arsh" said...

aapka mere blog pe swagat hai ummid karta hun fir aana hoga, aapke blog pe aaya sundar bhav likha hai apne... bahot sundar jari rahe ....

ye word verification hata le achha hoga
...
arsh

अनुपम अग्रवाल said...

एक बूंद पीठ सेंककर कहाँ ,
धुआं धुआं सी उड गयीं
मुरदा उम्‍मीदें वक्‍त की यहाँ ,
बेशुमार, चाहतें भी मुड़ गयीं

अनुपमा त्रिपाठी... said...

हरकीरत जी -आपकी यह पोस्ट आज नयी-पुरानी हलचल पर है |आइये और इस हलचल में शामिल हो जाइए ...!!



सुंदर भाव ..सुंदर अभिव्यक्ति ..!!बधाई ..

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

एक बूंद पीठ सेंककर
धुआं धुआं सी उड चली
वक्‍त की मुरदा उम्‍मीदें
पर चाहतें बेशुमार हैं

यथार्थ का सटीक वर्णन करती सुन्दर रचना