Saturday, December 15, 2012

असम का ऐतिहासिक गुरुद्वारा 'श्री गुरु तेग बहादुर साहिबजी ' (धुबड़ी)

 असम का ऐतिहासिक गुरुद्वारा 'श्री गुरु तेग बहादुर साहिबजी ' (धुबड़ी)  :
Dhubri Gurdwara Lji 2.jpg
धुबड़ी (असम )में स्थित गुरुद्वारा ' गुरुद्वारा श्री गुरु तेग बहादुर साहिबजी ''


सिख पंथ के नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर, श्री गुरु नानक देव जी महाराज के बाद पहले ऐसे गुरु थे जिन्होंने पंजाब के बाहर धर्म प्रचार के लिए यात्रा की। पूर्व की यात्रा के समय गुरु नानक मिशन का प्रचार करते हुए 1666ई. में वे पटना साहिब आए। इनके साथ गुरु जी की माता नानकीजी, पत्नी माता गुजरी जी, उनके भाई कृपाल चंद जी व दरबारी भी आए। गुरु जी कुछ समय बडी संगत, गायघाटठहरने के बाद परिवार सहित सालिस राय जौहरी की संगत मंजी साहिब में आए। उस समय इस संगत का संचालन अधरकाके परपोते घनश्याम करते थे। गुरु तेग बहादुर जी कुछ दिन रुकने बाद परिवार को यहां छोड कर बंगाल व आसाम (असम) चले गए।गुरु जी का पड़ाव हमेशा किसी नदी या गाँव के किनारे होता। इस प्रकार गुरु किरतपुर , सैफाबाद , कैथल , पाहवा, बरना, करनखेड़ा , कुरुक्षेत्र , दिल्ली इटावा, थानपुर, फतेहपुर , प्रयाग , मिर्जापुर, जौनपुर, पटना  होते हुए ढाका पहुंचे। दिसम्बर 1667 में औरंगजेब को असम से खबर  मिली कि जिले का राजा बागी हो गया है और मुग़ल फौजों को जबर्दस्त शिकस्त दी है और गुवाहाटी पर कब्जा कर लिया है . असम ही एक ऐसा राज्य था जहां मुग़ल शासकों को अब तक सफलता  नहीं मिली थी . जो भी मुग़ल शासक आगे बढ़ता या तो उसे हार मिलती या मौत के घाट उतार दिया जाता। इसकी वजह वे असम में उस समय प्रचलित तांत्रिक शक्तियों के प्रयोग को मानते हैं . औरंगजेब ने  गुवाहाटी पर कब्जा  करने के   लिए राम सिंग को सेना देकर असम भेजने का फैसला किया। राजा राम सिंह उस समय उसकी हिरासत में था . औरंगजेब ने सोचा अगर यह मर गया तो एक काफिर खत्म हो जाएगा और कहीं जीत गया ती लाभ ही लाभ है। राजा राम सिंह अपनी फ़ौज लेकर पटना पहुंचा। पटना उसे पता चला कि गुरु तेग बहादुर जी अपने परिवार को पटना छोड़ कर यात्रा के लिए ढाका  गए  हैं . इन्हीं दिनों पटना में गुरु तेग बहादुर जी के एक  पुत्र गोविन्द सिंह का जन्म हुआ। इधर राजा राम सिंह और उसके शैनिक असम में प्रचलित  जादू- टोने और तांत्रिक शक्तियों  से अति भयभीत थे और वे गुरु जी के तेज और प्रताप से भी परिचित थे। अत: राम सिंह ने सोचा कि अगर वह गुरु जी को अपने साथ असम ली जाने के लिए मना लेता है तो वह इन तांत्रिक शक्तियों सेबच  सकता है . वह पटना से  गुरु जी के पास ढाका पहुँच गया और गुरु जी से अपने साथ असम चलने की बिनती की। गुरु जी तो असम  यात्रा का पहले ही मन बना  चुके थे क्योंकि वे गुरु नानक के उस स्थान को देखना चाहते थे जहां (धुबड़ी) उनहोंने आसन ग्रहण किया था। असम पहुंच कर गुरु जी ने धुबड़ी साहिब मेंब ही डेरा डाला। फौजें 15 मिल दूर रंगमाटी में ठहरी।
ऐसा माना जाता है कि उस समय असम में तांत्रिक शक्तियों का उपयोग बहुत ज्यादा होता था। खुद मुसलमान लेखकों ने भी अपनी लेखनी में इन शक्तियों का आँखों देखा वर्णन प्रस्तुत किया है। गुवाहाटी का कामख्या मंदिर तो इस तांत्रिक विद्या का केंद्र था। दुश्मन को हराने के लिए तथा और शक्तियां प्राप्त करने के लिए यहाँ मनुष्यों की बलि दी जाती।
कहते हैं मुग़ल फ़ौज जब रंगामाटी पहुंची तब तांत्रिक शक्तियों में निर्लिप्त स्त्रियाँ कामाख्या में पुजा अर्चना करने के बाद धुबड़ी के सम्मुख ब्रम्हपुत्र नदी नदी के पार अपने तम्बू गाड़ बैठ गई। उन्हें ज्ञात हुआ कि मुग़ल सेना के साथ सिखों के गुरु तेग बहादुर भी हैं जो तेज प्रताप वाले महापुरुष हैं।  उन्होंने  नदी के पार से अपनी तांत्रिक शक्तियों का प्रयोग करना शुरू कर दिया। मन्त्र चलाये , शक्तियाँ दिखीं पर गुरु जी विचलित न हुए और सबको आदेश दिया कि इस्वर का नाम स्मरण करें और भजन बंदगी में लीन रहे क्योंकि हमें  करामत या बल नहीं दिखाना है। जब इस जादूगरनियों के तन्त्र-मन्त्र काम न आये तब इन्होंने अपनी तंत्र शक्ति द्वारा एक भरी पत्थर गुरु जी की ओर चलाया। जो गुरु जी के इशारे पर कुछ दूरी  पर ही गिर गया . यह पत्थर 13 फुट धरती के अन्दर और 13 फुट धरती के ऊपर है।

यह पत्थर 26 फुट लम्बा और इसका घेरा 26 x 28 फुट तथा 33 फुट करीबन चुकास है . यह पत्थर धुबड़ी साहिब गुरुद्वारे में आज भी अवस्थित है। इसके बाद उन क्रोधित  जादूगरनियों ने एक पेड़ भी उठा कर गुरु जी की ओर मरा पर गुरु जी ने उसे भी रोक दिया। उसके बाद उनहोंने तीर चलाये , जौहर दिखये पर गुरु जी पर कोई असर न हुआ . गुरु जी के तेज प्रताप के आगे उनकी समस्त शक्तियाँ नष्ट हो गईं।

तांत्रिक मत के अनुसार जिनकी शक्तियों के ऊपर कोई दुसरा हावी हो जाता है उनकी समस्त शक्तियाँ नष्ट हो जाती हैं और उसकी मौत हो जाती है . अब जादूगरनियाँ घबरा गईं उन्हें ज्ञात हो गया कि गुरु तेग बहादुर एक पहुंचे हुए संत हैं जो साक्षात् इश्वर का प्त्रिरूप हैं। वे गुरु जी के चरणों पर गिर पड़ीं और क्षमा याचना करने लगीं गुरु जी ने उन्हें मुस्कुराते हुए क्षमा कर दिया और तंत्र -मन्त्र का कुमार्ग त्याग देने का वचन लिया।

इधर असम के राजा चक्रध्वज ने जब सारा वृत्तांत सुना तो उसने गुरु जी को अपने निवास पर दर्शन देने का किया। गुरु जी स्वयं चल कर राजा चक्रध्वज के निवास पर गए और उनके आग्रह पर गुरु जी ने राजा राम सिंह को गुवाहाटी पर आक्रमण न करने के लिए मना  लिया और दोनों की संधि करवा दी।

इस  अमन शान्ति  के लिए गुरु जी की दोनों शासको ने शुक्र गुजारी की और दोनों के सैनिकों ने रंगमाटी से लाल मिटटी लाकर गुरु जी के स्थान पर एक ऊँचा टीला  बनवाया। आज भी यह टीला धुबड़ी साहिब में मौजूद है जिसे घेर कर रखा गया है और जिसकी मिटटी लोग श्रद्धावश लाकर अपने घर के पवित्र स्थानों पर रखते हैं।

इस प्रकार धुबड़ी साहिब असम का एक ऐतिहासिक धर्म-स्थल बन गया। प्रतिवर्ष गुरु तेग बहादुर के शहीदी दिवस पर यहाँ तीन दिनों तक भारी  मेला लगता है। तीनों दिन यहाँ  कडाह प्रसाद , लंगर व दूध  की सेवा मुफ्त होती है। रहने और नहाने की विशाल व्यवस्था की जाती है। यहाँ देश भर से संगत एकत्रित है। गुवाहाटी गुरुद्वारे से भी स्पेशल बसें चलायी जातीं हैं . इस ऐतिहासिक गुरुद्वारे में इन तीन दिनों तक शब्द कीर्तन , कथा-वाचन , और नगर कीर्तन होता है। देश केअन्य  धार्मिक गुरुद्वारों से महापुरुषों को शब्द-कीर्तन व प्रवचन के लिए बुलाया जाता है



धुबड़ी साहिब गुरुद्वारे में लगी एतिहासिक पट्टी जिस गुरु आगमन का सारी  घटना की जानकारी लिखी हुई है 


गुरु जी के प्रताप को देख तभी बहुत से असमिया सिख बन गए थे , वे आज भी पगड़ी बांधते हैं और सिख धर्म की पालना करते हैं . एक बार असम सिख एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष एस.के. सिंह ने अपने कथन में कहा था कि हमें यहाँ  'डुप्लिकेट सिख' या 'पंजाब में अपने समकक्षों से द्वितीय श्रेणी के सिखों में रखा जाता है," आज मैं यहाँ कहना चाहूंगी ऐसा बिलकुल नहीं है .कहीं न कहीं उनके भीतर ही ऐसी भावना पनप रही है क्योंकि आज भी उनकी  मातृ -भाषा असमिया ही है . गुरुद्वारों में भी उनकी उपस्थिति न के बराबर रहती है जबकि सिखों के गुरुद्वारों में सभी धर्मों के लोगों को आदर दिया जाता है। 


विश्व इतिहास में धर्म एवं मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धांत की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वालों में गुरु तेग बहादुर साहब का स्थान अद्वितीय है।
"धरम हेत साका जिनि कीआ
सीस दीआ पर सिरड न दीआ।"

इस महावाक्य अनुसार गुरुजी का बलिदान न केवल धर्म पालन के लिए नहीं अपितु समस्त मानवीय सांस्कृतिक विरासत की खातिर बलिदान था। धर्म उनके लिए सांस्कृतिक मूल्यों और जीवन विधान का नाम था। इसलिए धर्म के सत्य शाश्वत मूल्यों के लिए उनका बलि चढ़ जाना वस्तुतः सांस्कृतिक विरासत और इच्छित जीवन विधान के पक्ष में एक परम साहसिक अभियान था।
धर्म स्वतंत्रता की नींव श्री गुरुनानकदेवजी ने रखी और शहीदी की रस्म शहीदों के सरताज श्री गुरु अरजनदेवजी द्वारा शुरू की गई। परंतु श्री गुरु तेगबहादुरजी की शहादत के समान कोई मिसाल नहीं मिलती, क्योंकि कातिल तो मकतूल के पास आता है, परंतु मकतूल कातिल के पास नहीं जाता।गुरु साहिबजी की शहादत संसार के इतिहास में एक विलक्षण शहादत है, जो उन मान्यताओं के लिए दी गई कुर्बानी है जिनके ऊपर गुरु साहिब का अपना विश्वास नहीं था।पंजाबी के कवि सोहन सिंह मीसा ने गुरु जी के बारे सही कहा है -
गुरु ने दसिया सानुं ,है बन के हिन्द दी चादर
धरम सारे पवित्र ने ,करो हर धरम डा आदर 

बनी हुन्दी अजेही भीड़ जे सुन्नत नमाज उत्ते
जां लगदी रोक किदरे वी अजानां दी आवाज़ उत्ते
गुरु ने तद वी एदां ही दुखी दी पीड़  हरनी सी
सी देना शीश एदां ही , ना मुख तों  सी उचारनी सी

गुरु तेगबहादुर सिंह में ईश्वरीय निष्ठा के साथ समता, करुणा, प्रेम, सहानुभूति, त्याग और बलिदान जैसे मानवीय गुण विद्यमान थे। शस्त्र और शास्त्र, संघर्ष और वैराग्य, लौकिक और अलौकिक, रणनीति और आचार-नीति, राजनीति और कूटनीति, संग्रह और त्याग आदि का ऐसा संयोग मध्ययुगीन साहित्य व इतिहास में बिरला है।
गुरु तेगबहादरसिंह ने धर्म की रक्षा और धार्मिक स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया और सही अर्थों में 'हिन्द की चादर' कहलाए।

Tuesday, November 27, 2012

लोकार्पण की कुछ तसवीरें ......





आज देखिये शनिवार 24 नवम्बर 2012  को हुए मेरे संपादन में निकली पत्रिका 'सरस्वति-सुमन' और मेरे काव्य संग्रह 'दर्द की 'महक  के लोकार्पण की कुछ तसवीरें ......








Monday, November 12, 2012

अय अंधेरों !जरा संभलना आज की रात

अय अंधेरों !जरा संभलना आज की रात
मैंने डाला है दीयों में उसके नाम का तेल 

दीपावली की शुभकामनाओं सहित पेश हैं कुछ हाइकू ......
इन्हें आप यहाँ भी देख सकते हैं ......http://hindihaiku.wordpress.com/2012/11/12/%E0%A4%A4%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%87-%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%AE-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%A6%E0%A5%80%E0%A4%AF%E0%A4%BE/#comment-3419

 तेरे नाम का दीया ........
1
बाती प्रेम की
डाल,दीप जलाया
अब  न जाना ।
2
कैसे जलाऊँ
दीपक, तुझ बिन
सूनी  दिवाली  ।
3
अन्धकार है
मन के दीपक में
करो उजाला  ।
4
जलूँ  बाती -सी
हर दिवाली, प्रिय
यादों में तेरी  ।
5
जलाऊँ प्रिय
तेरे नाम का दीया
हर  दिवाली  ।
6
दूर दिखे जो
कोई बुझता दीप
करना याद  ।
7
दिखे दीप में
बस तेरा चेहरा
 प्रीतम मेरे  ।
8
डाला दीप में
तेरे नाम का तेल
जलते जाना। ।
9
दीपक रोया
जले है बाती ही क्यों
प्रेम में मेरे  ।
10
लौट के आ जा
बुझ न जाए कहीं
उम्र का दीया !
11
बुझा पड़ा है
मुहब्बत का दीया
जलाऊँ कैसे  ?
12
इस बार जो
आओ तो जला जाना
प्रेम का दीप ।

Sunday, October 21, 2012

'सरस्वती सुमन' पर आई समीक्षाएं और प्रतिक्रियाएँ

'सरस्वती सुमन' पर आई समीक्षाएं और प्रतिक्रियाएँ  कुछ इस प्रकार  रहीं   .....
(1)डॉ. उमेश महादोषी

जन्म : लगभग पचास वर्ष पूर्व उत्तर प्रदेश के जनपद एटा के एक छोटे से गावं दौलपुरा में।


शिक्षा : कृषि अर्थशास्त्र में पी-एच० डी० एवं सी ऐ आई आई बी


कार्यक्षेत्र-

लगभग तेईस वर्षों तक एक राष्ट्रीयकृत बैंक में सेवा के बाद ज

नवरी २००९ में प्रबंधक पद से स्वैच्छिक सेवानिवृति ली। संप्रति प्रबंधकीय शिक्षा में संलग्न एक कालेज में प्राध्यापक एवं निदेशक के रूप में कार्यरत तथा साहित्यिक त्रैमासिक लघु पत्रिका "अविराम" का संपादन। मुख्यतः नई कविता एवं क्षणिकाओं के साथ साथ अन्य विधाओं में यदा-कदा लेखन।

प्रकाशित कृतियाँ-

-साहित्यिक गतिविधियाँ- १९९२-१९९३ तक निरंतर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन, उसी दौरान "नई कविता" एवं "क्षणिका" पर कुछ प्रकाशनों का सम्पादन। आगरा की तत्कालीन बहुचर्चित संस्था "शारदा साहित्य एवं ललित कला मंच" से जुड़कर साहित्यिक कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी निभाई। वर्ष १९९२-९३ के बाद से लम्बे साहित्यिक विश्राम के बाद २००९ में फिर से साहित्यिक दुनिया में लौटने की कोशिश के साथ वर्ष २०१० में समग्र साहित्य की लघु पत्रिका के रूप में "अविराम" का पुनर्प्रकाशन एवं संपादन प्रारंभ किया।

ईमेल- umeshmahadoshi@gmail.कॉम



समीक्षक - डॉ उमेश महादोषी

'सरस्वती-सुमन' का प्रतीक्षित क्षणिका विशेषांक मिला। निःसन्देह उम्मीदों के अनुरूप एक सार्थक अंक है। मुझे लगता है कि सृजन और संपादन/प्रकाशन के कुछ उद्देश्यों व सरोकारों के सामान्य होने के बावजूद कुछ उद्देश्य व सरोकार भिन्न भी होते हैं। मसलन सृजन के विविध पहलुओं/आयामों को सामने लाना प्रकाशन/संपादन का एक भिन्न उद्देश्य होता है। ऐसे में किसी भी पत्रिका, विशेषतः विशेषांक के संपादन/प्रकाशन को उसकी व्यापक उद्देश्यपरकता के सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए। इसलिए इस अंक में शामिल सृजन में यदि समालोचनात्मक दृष्टि से किसी के लिए कुछ है तो उसे भी सकारात्मक दृष्टि से देखा जाना जरूरी है। ‘क्षणिका’ को विधागत कसौटी पर परखने की जो घोर उपेक्षा हुई है, उसके संदर्भ में आपने जो सोचा, संकल्प लिया और सामर्थ्यवान एवं क्षणिका के शिल्प को अपने लेखन में पहचान देने वाली कवयित्री हरकीरत हीर एवं संतुलित समालोचनात्मक दृष्टि के धनी युवा रचनाकार-समालोचक जितेन्द्र जौहर की क्षमताओं का भरपूर उपयोग करते हुए उस संकल्प को पूरा किया, यह अत्यंत महवपूर्ण है। विश्वासपूर्वक कह सकता हूँ कि आपकी प्रणम्य दृष्टि और यह आहुति क्षणिका के यज्ञ के प्रभावों को दूर तक ले जायेगी और अनेकानेक सुफलों की प्रेरणा बनेगी। इस अंक की रचनाओं को क्षणिका के सन्दर्भ में परखने के लिए समालोचकों को समय मिलेगा, लेकिन एक बात तय है कि क्षणिका के अनेकानेक पक्ष उभरकर सामने आयेंगे। जैसे-जैसे क्षणिका पर चर्चा आगे बढ़ेगी, इस अंक की महत्ता वैसे-वैसे अधिक, और अधिक उभरकर सामने आयेगी। इसलिए यह अंक आज के लिए होने से ज्यादा भविष्य का दस्तावेज है। हीर जी परिश्रमी और सामर्थ्यवान तो हैं ही, पर वह दूसरों के दृष्टिकोंण और भविष्य की चीजों को भी समझने का माद्दा रखती हैं। रचनाओं के चयन और संकलन से यह बात स्पष्ट है। अनुवाद के माध्यम से उन्होंने हिन्दीतर भारतीय भाषाओं- असमी एवं पंजाबी के कई सशक्त क्षणिकाकारों को प्रस्तुत किया है। जितेन्द्र जी, कथूरिया जी और बलराम अग्रवाल जी के आलेख क्षणिका के प्रति समझ विकसित करने में सहायक होंगे। जितेन्द्र जी ने अपने आलेख में अपनी शोधवृत्ति के सहारे कई दृष्टियों से क्षणिका का विवेचन प्रस्तुत किया है। यद्यपि उन्होंने मेरे छुटपुट कार्य की कुछ ज्यादा चर्चा कर दी है, पर उसको छोड़कर भी आलेख को देखा जाये, तो उन्होंने कई अच्छी चीजें रखी हैं। श्रद्धेय विष्णु प्रभाकर जी की क्षणिका को लेकर क्षणिका के रूप-स्वरूप को स्पष्ट करने से क्षणिका के रूपाकार को एक प्रामाणिकता मिली है। एक विधा के साथ लेखन करते हुए कई बार दूसरी विधाओं के साथ हम कैसे जुड़ जाते हैं, इसे उन्होंने वरिष्ठ कवयित्री आदरणीया डॉ. मिथिलेश दीक्षित जी की क्षणिका का उदाहरण देकर स्पष्ट किया है। दरअसल यह ऐसी प्रक्रिया है, जो बेहद स्वाभाविक होती है और अपने स्वभाववश बहुत बार तो दूसरी विधाओं के प्रस्फुटन का कारण बनती है (और समरूप विधाओं के मध्य अन्तर को रेखांकित करने का सूत्र भी उपलब्ध करवाती है)। स्वयं क्षणिका का प्रस्फुटन इसी प्रक्रिया का एक उदाहरण है। मिथिलेश दीदी अच्छी-समर्पित क्षणिकाकार हैं और खोजने पर उनकी रचनाओं में शोध की दृष्टि से काफी कुछ मिलेगा, जो अन्ततः क्षणिका की पंखुड़ियों को खोलने में मदद करेगा। ऐसे कुछ उदाहरण इस विशेषांक में अन्य रचनाकारों की क्षणिकाओं के मध्य भी उपस्थित हैं। अध्ययनशील रचनाकारों के लिए इस आलेख में कई संपर्क सूत्र भी दिए हैं जितेन्द्र जी ने। कई युवा रचनाकारों में सम्भावनाओं को टटोलते हुए उन्हें भविष्य में अच्छी क्षणिकाएं देने के लिए प्रेरित किया है। आदरणीय डॉ. कथूरिया जी के आलेख की कुछेक बातों पर भले मेरी दृष्टि में विस्तार से चर्चा की गुंजाइश हो, पर उन्होंने जिन सशक्त उदाहरणों के माध्यम से अपनी बात को सामने रखा है, वे क्षणिका की वास्तविक सामर्थ्य को रेखांकित करते हैं। उम्मीद है उनका मार्गदर्शन भविष्य में भी क्षणिकाकारों को उपकृत करता रहेगा। डॉ. बलराम अग्रवाल जी मूलतः लघुकथा से जुड़े होने और अपनी तत्संबंधी अत्यधिक व्यस्तताओं के बावजूद पिछली सदी के आठवें दशक के मध्य से ही क्षणिका को सृजन और चिन्तन- दोनों स्तरों पर अपना प्रभावशाली समर्थन देते रहे हैं। दुर्भाग्यवश क्षणिका से जुड़े लोग उनका लाभ नहीं उठा पाये। भविष्य में क्षणिका पर काम होगा तो उनका मार्गदर्शन और समर्थन भी मिलेगा ही।
सरस्वती सुमन का यह अंक क्षणिका के मैदान में छाए सन्नाटे को तोड़ेगा, हर हाल में तोड़ेगा। मेरी ओर से संपादन-परिवार, हीर जी, जितेन्द्र जी- सभी को हार्दिक बधाई, बार-बार बधाई!

उमेश महादोषी, एफ-488/2, गली संख्या-11, राजेन्द्रनगर, रुड़की-247667, जिला-हरिद्वार (उत्तराखण्ड) मोबाइल : 9412842467
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 (2) रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी की समीक्षा 
रस्वती सुमन’ त्रैमासिक का क्षणिका विशेषांक मिला । लघुकथा, मुक्तक और अब क्षणिका विशेषांक तथा अगला अंक ‘ हाइकु’ के रूप में प्रस्तावित है । कोई विधा अपने आकार -प्रकार से नही वरन् प्रभावापन्न होने   से ही महत्त्वपूर्ण होती है ।श्री आनन्द  सुमन सिंह  जी  ने  विशेषांकों के माध्यम से हिन्दी -जगत् का ध्यान आकृष्ट किया है । मुक्तक और क्षणिका के क्षेत्र में यह पहला बड़ा प्रयास है । इसके अतिथि सम्पादकों के लिए भी यह कार्य चुनौतीपूर्ण रहा है । हरकीरत’हीर’ जी ने असमिया और पंजाबी भाषा की क्षणिकाएँ देकर भाषायी  सेतु का निर्माण किया है जो आज के भारत की सबसे  बड़ी ज़रूरत है । सबसे बड़ी आश्वस्ति की बात यह है कि आपने रचना का चयन किया है , रचनाकार का नहीं । किसी बड़े साहित्यकार की सन्तान होने से ही किसी को  साहित्यकार नहीं माना जा सकता । यह तो वही बात हुई कि हमारे दादा ने घी खाया था ,हमारे हाथ सूँघ लो । हरकीरत जी स्वय भी संवेदन्शील कवयिती हैं , इसका प्रभाव इनके चयन में भी नज़र आता है । इमरोज़ की ‘प्यार’, प्रतिभा कटियार की  ‘तुमसे मिलकर’, सीरियाई कवयित्री मरम अली मासरी की दूसरी और तीसरी क्षणिकाएँ( उसने पुरुष  से कहा -नमक के कणों की मानिन्द), मीरा ठाकुर की  दूसरी क्षणिका ‘ मैं/ सुख में रहूँ / या दु:ख में’ मंजु मिश्रा की ‘रिश्ते’ ,  एक ही विषय पर रचना श्रीवास्तव की दसों क्षणिकाएँ , डॉ (सुश्री ) शरद सिंह की सभी क्षणिकाएँ एक अलग संवेदना लिये हुए हैं, जो क्षणिका को  गहन और गम्भीर काव्य -रचना के रूप में प्रतिष्ठित करती हैं ।  डॉ गोपाल बाबू शर्मा की ‘मीठे सपने’, सर्वजीत ‘सवी’ की पंजाब, डॉ मिथिलेश दीक्षित की क्षणिकाएँ अलग तेवर लिये हुए हैं। इस अंक में और भी ढेर सारी क्षणिकाएँ प्रभावित करती हैं , जिनका उल्लेख यहां सम्भव नहीं। यदि  डॉ दीक्षित के अनुसार कहूँ -‘नहीं फ़र्क होता  है/ वय से / कविता उपजी/ अन्तर्लय से’। इस अंक की क्षणिकाओं में जो अन्तर्लय है , वह इसे उन हल्की और भद्दी  रचनाओं से अलग करेगी  ,जो  क्षणिकाओं के नाम पर मंचों पर परोसी जाती हैं । जितेन्द्र ‘जौहर’ ,डॉ उमेश महादोषी और डॉ सुन्दर  लाल कथूरिया के लेख क्षणिका  के भाव-रूप की सूक्ष्म जानकारी देते  हैं । अपनी पारिवारिक कठिनाइयों के बावज़ूद हरकीरत जी ने इस अंक को बेहतर बनाने में जो बेहतर प्रयास किया है , वह श्लाघ्य है ।
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
फ्लैट न-76,( दिल्ली सरकार आवासीय परिसर)
रोहिणी सैक्टर -11 , नई दिल्ली-110085
(3)सुखदर्शन सेखों जी की प्रतिक्रिया .....
 
संक्षिप्त परिचय .....
नाम- सुखदर्शन सेखों
शिक्षा - स्नातक , डिप्लोमा इन नैचुरोपैथी
कृतित्व- टी.वी धारावाहिक दाने अनार के ( लेखक व निर्देशक ),ए.डी फिल्म(हिंदुस्तान कम्बाइन,गुरु रिपेयर ,डिस्कवरी जींस , राजा नस्बर, बिसलेरी, ओक्सेम्बेर्ग, डोकोमेन्ट्री फिल्म (चौपाल गिद्दा

, नगर कीर्तन , एक अकेली लड़की, यू आर इन अ क्यू ) टेली फिल्म (एक मसीहा होर, सितारों से आगे , बचपन डा प्यार , है मीरा रानिये, धोखा , झूठे साजना, सोनिका तेरे बिन , बरसात आदि )
संवाद लेखन , धारावाहिकों के शीर्षक गीतों का लेखन , गीत, नज्में , कहानियाँ ,उपन्यास ,फीचर फिल्म
सम्प्रति - फिल्म निर्माता निर्देशक और लेखक
संपर्क - sukhdrshnsekhon@in.com


क्षणिका विशेषांक मिला , पढ़कर बहुत ही ख़ुशी हुई . इतनी मेहनत की है आपने कि कभी भी भुलाई नहीं जा सकती . उम्र भर संभाल कर रखने वाला अंक बन गया है . हरकीरत हीर जी ने मेरी क्षणिकाएं अनुदित कर
मेरी खुशियों में और भी इजाफ़ा किया है . और ऊपर से क्षणिका के महत्व का भी गंभीरता से पता चल गया है कि एक क्षणिका कैसे अपने भीतर एक पूरी कहानी छुपाये रहती है . बहुत सारे लेखकों की क्षणिकाएं पसंद आईं जिनमें अमृता प्रीतम , अनिता कपूर , अशोक दर्द , हरकीरत हीर , अदेले ग्राफ , इमरोज़, चित्रा सिंह, जितेन्द्र जौहर , आशा रावत , पल्लवी दीक्षित , रमा द्रिवेदी , रनवीर कलसी , सुदर्शन गासो , धर्मेन्द्र सिखों , प्रियंका गुप्ता आदि का ज़िक्र किये बगैर नहीं रह सकता . अब तो जब भी समय मिलेगा इसको बार-बार पढूंगा . एक बार फिर आपको ऐसा अंक परोसने के लिए धन्यवाद .....!!

दर्शन दरवेश
अजीतगढ़ (मोहाली) पंजाब
+919041411198
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(4)  त्रिपुरारी कुमार शर्मा की प्रतिक्रिया 

आज डेढ़ साल की प्रतीक्षा के बाद त्रैमासिक पत्रिका ‘सरस्वती सुमन’ प्राप्त हुई। क्षणिका विशेषांक (अतिथि सम्पादक : Harkirat Haqeer) का यह अंक सराहणीय और पर्सनल लाइब्रेरी में संजोने योग्य है। इस अंक में विष्णु प्रभाकर, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, अमृता प्रीतम, अज्ञेय सहित 179 रचनाकारों को शामिल किया गया है, जिसमें एक छोटा-सा नाम मेरा, त्रिपुरारि कुमार शर्मा भी है।

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(5)  संगीता स्वरूप जी की प्रतिक्रिया .....

हरकीरत  जी ,

आपके सौजन्य  से मुझे सरस्वती सुमन पत्रिका प्राप्त हुई ... सरस्वती सुमन का यह क्षणिका विशेषांक  बहुत पसंद आया । 
क्षणिका विधा पर जितेंद्र जौहर जी का विस्तृत लेख  जिससे इस विधा के बारे में  काफी कुछ जानने और समझने का अवसर मिला ।
शुभड़ा पांडे जी द्वारा क्षणिका  को परिभाषा में बांधने का प्रयास भी सराहनीय लगा । क्षणिका को जानने और समझने के लिए इसमे दिये चारों लेख महत्त्वपूर्ण  स्थान रखते हैं । 
संपादक के रूप में निश्चय ही दुरूह कार्य  रहा होगा .... लेकिन आपने जिस योग्यता से इसे किया है उसके लिए साधुवाद ।  इतने सारे रचनाकारों से संपर्क करना , उनसे रचनाएँ आमंत्रित करना और फिर स्तरीय  रचनाओं का चयन करना अपने आप में किला फतह करने जैसा है । भिन्न भाषाओं के रचनाकारों की क्षणिकाओं के अनुवाद  भी शामिल किए हैं और कुछ के अनुवाद तो आपने स्वयं ही किए हैं .... इस तरह पाठकों को अन्य भाषाओं के रचनाकारों की कृतियाँ पढ़ने का भी सहज अवसर प्रदान किया है ।
जाने माने  साहित्यकारों की  रचनाएँ पढ़ने का भी  सौभाग्य इस पत्रिका के माध्यम से  आपने प्रदान किया ..... आपके माध्यम से मैं आनंद सुमन जी  को हार्दिक बधाई देती हूँ जो यह श्रमसाध्य  काम कर रहे हैं ..... यह पत्रिका निश्चय ही हिन्दी साहित्य  के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित होगी .... जाने माने रचनाकारों के बीच स्वयं को पा कर गौरवान्वित हूँ ...इसके लिए मैं हृदय  से आपकी आभारी हूँ ...


  संगीता स्वरूप,
333  बहावलपुर   सोसाइटी  CGHS , प्लाट  नो - 1 , सेक्टर  - 4 / द्वारका  / न्यू  डेल्ही  - 75 

मो . -- 9868769021
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(6) वंदना गुप्ता की प्रतिक्रिया .....

आदरणीय हरकीरत जी,जितेन्द्र जौहर जी
सादर नमस्कार

मुझे क्षणिका विशेषांक मिल गया जिसके लिये हार्दिक आभार । उसे पढकर जो भाव उभरे भेज रही हूँ  और कल इसे ब्लोग व फ़ेसबुक पर भी लगाऊँग़ी।


क्षणिका………एक दृष्टिकोण


क्षण क्षण भावों का रेला

कैसे रूप बदलता है

तभी तो प्रतिपल

क्षणिका का ढांचा बनता है





क्षणिक अभिव्यक्ति

क्षणिक आवेग

क्षणिक संवेग

क्षणिक है जीवन की प्रतिछाया

तभी तो क्षणिका के क्षण क्षण मे
जीवन का हर रंग समाया





क्षण क्षण मे क्षण घट रहा

नया रूप ले रहा

वंचित भावों का उदगम स्थल

त्वरित विचारों का जाल

क्षणिका का रूप बन रहा





दोस्तों ,



क्षणों का हमारे जीवन मे कितना महत्त्व है ये उस वक्त पता लगा जब सरस्वती सुमन पत्रिका का त्रैमासिक क्षणिका विशेषांक (अक्टूबर - दिसम्बर 2012)  मिला तो ख़ुशी का पारावार न रहा . इतनी बड़ी पत्रिका में एक नाम हमारा भी जुड़ गया . ह्रदय से आभारी हूँ हरकीरत हीर जी की और जीतेन्द्र जौहर जी की जो उन्होंने हमें इस लायक समझा और इतने वरिष्ठ कवियो और  रचनाकारों के बीच एक स्थान हमें भी दिया .

क्षणिका विशेषांक पढना अपने आप में एक सुखद अनुभूति है . सबसे जरूरी होता है उस विशेषांक का महत्त्व दर्शाना और उसकी विशेषता बताना , उसकी बारीकियों पर रौशनी डालना और ये काम आदरणीय जीतेन्द्र जौहर जी ने बखूबी किया है .पहले तो सबकी क्षणिकाएं आमंत्रित करना उसके बाद 179 रचनाकारों को छांटकर उन की क्षणिकाओं को स्थान देना कोई आसान कार्य नहीं था जिसे हरकीरत जी ने बखूबी निभाया . तक़रीबन एक साल से वो इसके संपादन में जुडी थीं ....नमन है उनकी उर्जा और कटिबद्धता को .

सरस्वती सुमन का क्षणिका विशेषांक यूं लगता है जैसे किसी माली ने  उपवन के एक- एक फूल पर अपना प्यार लुटाया हो . कुछ भी व्यर्थ या अनपेक्षित नहीं ........सब क्रमवार . संयोजित और संतुलित ढंग से सहेजना ही कुशल संपादन का प्रतीक है . शुभदा पाण्डेय जी द्वारा " क्षणिका क्या है " की व्याख्या करना क्षणिका के महत्त्व को द्विगुणित करता है . क्षणिका के शिल्प और संवेदना पर प्रोफेसर सुन्दर लाल कथूरिया जी का आलेख क्षणिका के प्रति गंभीरता का दर्शन कराता है तो दूसरी तरफ डॉक्टर उमेश महादोषी ने क्षणिका के सामर्थ्य पर एक बेहद सारगर्भित आलेख प्रस्तुत किया है जो क्षणिका की बारीकियों के साथ कैसे क्षणिकाएं लिखी जाएँ उस पर रौशनी डालता है और कम से कम नवोदितों को एक बार इस विशेषांक को जरूर पढना चाहिए क्योंकि ये विशेषांक अपने आप में क्षणिकाओं का एक महासागर है जिसमे वो सब कुछ है जो किसी को भी लिखने से पहले पढना जरूरी है . बलराम अग्रवाल जी द्वारा क्षणिका के रचना विधान को समझाया गया है कि  काव्य से क्षणिका किस तरह भिन्न है और उसे कैसे प्रयोग करना चाहिए , कैसे लिखना चाहिए हर विधा को बेहद सरलता और सूक्ष्मता  से समझाया गया है .

पूरा विशेषांक एक उम्दा , बेजोड़ , पठनीय और संग्रहनीय संस्करण है और यदि ये संस्करण किसी के पास नहीं है तो वो एक अनमोल धरोहर से वंचित है . सब रचनाकारों के विषय में कहना तो कठिन है क्योंकि सभी बेजोड़ हैं . हर क्षणिका अपने में एक कहानी समेटे हुए हैं . सोच के दायरे को विस्तार देती अपने होने का अहसास कराती है जो किसी भी पत्रिका का अहम् अंग होता है . क्षणिका विशेषांक निकलना अपने आप में पहला और अनूठा प्रयास है जो पूरी तरह सफल है जिसकी सफलता में सभी संयोजकों और संपादकों की निष्ठा और लगन का हाथ है जिसके लिए सभी रचनाकार कृतज्ञ हैं।

अंत में आनंद सिंह सुमन जी का हार्दिक आभार जो अपनी पत्नी की याद में ये पत्रिका निकालते हैं अगर कोई संपर्क करना चाहे तो इस मेल या पते पर कर सकता है

सारस्वतम
1---छिब्बर मार्ग (आर्यनगर) देहरादून --- 248001

mail id ...... saraswatisuman@rediffmail.com

Tuesday, October 9, 2012

फैसला,अक्स,तलाश,नज़्म का जन्म और दर्द की नौकाएं....

मित्रो मेरी कुछ नज्में ज्ञानपीठ से निकलने वाली देश  की सर्वश्रेष्ठ पत्रिका 'नया ज्ञानोदय' के अक्टूबर- १२ के अंक  में प्रकाशित हुई हैं ...उन्हें आप सब के लिए यहाँ पुन: प्रेषित  कर रही हूँ ...साथ ही पत्रिका का वह अंश भी संलग्न है जिसमें रचनायें प्रकाशित हैं .... आप सब के साथ एक और खुशखबरी सांझा करना चाहती हूँ जैसा कि मैं पहले भी सूचित कर चुकी हूँ  कि बोधी प्रकाशन पूर्वोत्तर के रचनाकारों को लेकर  ( पूर्वोत्तर से तात्पर्य - असम, मणिपुर , नागालैंड , मेघालय ,अरुणाचल , सिक्किम ,इम्फाल से है )एक काव्य-संग्रह निकालने जा  रहा है ...जिसके संपादन का दायित्व  उन्होंने मुझे सौंपा है ...अत: पूर्वोत्तर के सभी रचनाकारों से अनुरोध है कि अपनी दो-तीन रचनायें (स्त्री विमर्श पर आधारित ), संक्षिप्त परिचय और तस्वीर ३० अक्टूबर तक  मुझे इस पते पर मेल कर  दें  harkirathaqeer@gmail.com या बोधी प्रकाशन के इस मेल पर मेल करें ....bodhiprakashan@gmail.com
(१)

फैसला ....


तूने ....
सिर्फ उन परिंदों की बात की
जो अपनी उडारियों से
 छूना चाहते थे आसमां
कभी जो ...
उनके प्रेम से
चोंच से चोंच मिलाकर
दानों के लिए ...
जद्दोजहद की बात करते
तो मैं.....
साथ चल पड़ती .....!!

(२)
अक्स.....

अभी-अभी हुई बारिश में
सड़क पर तैरते बुलबुलों के बीच
तलाशना चाहती थी तेरा अक्स
कि गुजरती इक कार ने
सब कुछ तहस -नहस कर दिया
उतरती इक नज़्म
फिर वहीँ ...
खामोश हो गई .....!

(३)

तलाश ....

न जाने कितने  रिश्ते
बिखरे पड़े हैं मेरी देह में
फिर भी तलाश है जारी है
इक ऐसे रिश्ते की
जो लापता है उस दिन से
बाँध दी गई थी गाँठ
जिस दिन ...
सात फेरों साथ
चूल्हे की आग संग ....

(४)

नज़्म का जन्म .....

इस नज़्म के
जन्म से पहले
ढूंढ लाई थी अपने आस-पास से
कई सारे दर्द के टुकड़े
कुछ कब्रों की मिट्टी
कुछ दरख्तों के ज़िस्म से
सूखकर झड़ चुके पत्ते
फिर इक बुत तैयार किया
ख़ामोशी का बुत ...
और लिख दिए इसके सीने पर
तेरे नाम के अक्षर
नज़्म ज़िंदा हो गई .....

(५)

दर्द की नौकाएं  ....

बरसों से ...
बाँध रखी थी दिल में
दर्द की नौकाएं
आज तुम्हारी छाती पर
खोल देना चाहती हूँ इन्हें ...
पर तुम्हें ...
इक वादा करना होगा
तुम बनोगे इक दरिया
और मोहब्बत की पतवार से
बहा ले जाओगे इन्हें
वहां .....
जहाँ प्रेम का घर है ....!!

Monday, October 1, 2012

' सरस्वती-सुमन 'का क्षणिका विशेषांक़

आप सब के लिए एक खुशखबरी .......

' सरस्वती-सुमन ' पत्रिका के जिस  अंक ( क्षणिका विशेषांक़ )अतिथि संपादन का कार्य  भार मैंने लिया था , वो पूरा हुआ और अब ये अंक छप कर तैयार है ...कुछ वक़्त जरुर लगा संपादन में ...वजह  प्रधान संपादक की सम्पादकीय में आप सब  जान ही जायेंगे ...इसमें ब्लॉग और फेस बुक से जुड़े बहुत से रचनाकारों की क्षणिकाएं  हैं ...करीब दो सौ रचनाकार इसमें शामिल हैं...सभी तो नहीं  कुछ नाम मैं यहाँ देने की कोशिश कर  रही हूँ ....क्योंकि मुझसे बार बार पूछा जाता हर है ..''अंक कब तक आयेगा '' .....तो आप सब की प्रतीक्षा समाप्त हुई ..अंक जल्द ही आपके पते पर पहुँच जाएगा .....मिठाई तैयार रखियेगा ......प्रतिक्रिया का भी इंतजार रहेगा  .....:))

विशेष आभार -- प्रधान  संपादक डॉ आनंद सुमन जी एवं जितेन्द्र जौहर जी का जो पग-पग पर मेरा सहयोग करते रहे .....

१. अपूर्व शुक्ल
२. अमिया कुंवर
३. अश्विनी कुमार
४. अनीता कपूर
५. अनवर सुहैल
६ अविनाश चन्द्र
७. अमिताभ श्रीवास्तव
८. अश्विनी राय प्रखर
९.अशोक ' दर्द '
१०. अशोक 'अंजुम'
११. ओम प्रकाश 'अडिग'
१२ अवधेश शुक्ल
१३. अरविन्द कुमार
१४ अशोक विश्नोई
१५ . अशोक 'अकेला'
१६ अमित कुमार 'लाडी'
१७ अदेले ग्राफ
१८. ओम प्रकाश सोनी
१९ अनंत आलोक
२० आनंद वर्धन ओझा
२१ . आलोक तिवारी
२२. आनंद द्रिवेदी
२३. इन्द्रनील भट्टाचार्जी
२४ इमरोज़
२५ उपेन्द्र नाथ
२६. ऍम.एल. वर्मा
२७. एस ऍम . हबीब
२८ ओमिश परूथी
२९ कैलाश चन्द्र शर्मा
३० किशोर कुमार जैन
३१. कमल कुमार जैन
३२ . केवल कृष्ण
३३. कुंवर प्रेमिल
३४ कन्हैया लाल अग्रवाल
 ३५. गौरी शंकर वैश्य
३६ गोपाल कृष्ण भट्ट 'आकुल'
३७. घमंडी लाल
३८. चित्रा सिंह
३९ चक्रधर शुक्ल
४० चेतन दुबे अनिल
४१ जितेन्द्र जौहर
४२. डॉ अनुराग आर्य
४३. डॉ अमरजीत कौंके
४३ . डॉ अरुण द्रिवेदी
४४. डॉ उमेश महादोषी
४५. डॉ कौशलेन्द्र मिश्र
४६.  डॉ केवल कृष्ण पाठक
४७.डॉ  कमलेश द्रिवेदी
४८. डॉ चरनजीत मान
४९ डॉ टी एस . दराल
५० डॉ सुमन शर्मा
५१. डॉ रमा द्रिवेदी
५२.डॉ  रमेश कटारिया 'पारस'
५३. डॉ स्याम शखा स्याम
५४. डॉ सुरेश 'उजाला'
५५. डॉ सुश्री शरद सिंह
५६. डॉ सोंरुपा
५७ डॉ सुशिल रहेजा
५८. दी के सचदेवा 'दानिश'
५९. दी ऍम मिश्र
६० दर्शन  दरवेश
६१ . देवेन्द्र शर्मा
६२. देवेन्द्र कुमार पांडे
६३. दिगंबर नासवा
६४. धर्मेन्द्र गोयल
६५. धर्मेन्द्र सिंह सेखों
६६. निलेश माथुर
६७. प्रियंका गुप्ता
६७. प्रेम चंद 'प्रेमी'
६८. बलराम अग्रवाल
६९. ममता किरण
 ७० मोहिन्दर कुमार
७१. महेंद्र वर्मा
७२. मीनू खरे
७३. मंजू मिश्रा
७४. महावीर रवांल्टा
७५. रश्मि प्रभा
७६. रामेश्वर कंबोज 'हिमांशु'
७७. रचना श्रीवास्तव
७८. रचना दीक्षित
७८. राजेन्द्र स्वर्णकार
७९ . रंजना रंजू भाटिया
८०. राजेन्द्र परदेशी
८१. राजवंत राज
८२. लखमी शंकर बाजपेयी
८३. वंदना गुप्ता
८४. विकेश निझावन
८५. विवेक रस्तोगी
८६. विजय तन्हा
८७. शोभा रस्तोगी
८८ . समीर लाल 'समीर '
८९. सुरजीत कौर
९०. स्वर्णजीत 'सवी'
९१. सुमन पाटिल
९२. स्वप्निल कुमार 'आतिश'
९३. सुनील गज्जाणी
९४.संगीता स्वरूप
९५. सीमा सिंघल
९६.सरस दरबारी
९७. सुधा ओम ढींगरा
९८. संदीप 'सरस'
९९. त्रिपुरारी शर्मा
१००. ज्ञानचंद मर्मज्ञ
एक अंतिम महत्वपूर्ण नाम जो छूट गया  था कीनिया की कवयित्री डॉ रनवीर कलसी का जो कि फेस बुक से जुडी हुई हैं .....
आप सभी को बहुत -बहुत बधाई .....!!

बाकी के नाम मिठाई खाने के बाद .....:)

Sunday, September 9, 2012

इमरोज़ जी का ख़त और हीर का जवाब .....

ठीक जन्मदिन वाले दिन इमरोज़ जी का ख़त मिलता है ...
जिसका हिंदी तर्जुमा
आप सबके लिए .....

खास दिन .....३१/८/१२


किसी खास के साथ
कोई भी दिन ख़ास हो जाता है
जिस दिन हीर जन्मी थी
वह दिन भी खास था
और खुद वह इतनी खास थी और ख़ास है भी ...
कि हम आज भी उसे गा-गा कर कभी थके ही नहीं ...

जिस दिन कोई हीर हुई थी -अपनी मुहब्बत से
वह दिन भी ख़ास है और ख़ास है भी
और जिस दिन किसी की तलाश हीर होगी
वह दिन भी खास बन जाएगा ....

इक ख़ास के साथ
आम दिन भी , आम महीना भी
आम साल भी , आम सदी भी
ख़ास हो जाती है , ख़ास हो भी रही है ....

इक ख़ास का
आज जन्म हुआ था
वह दिन भी ख़ास था -३१ अगस्त का दिन
वह खुद कल भी ख़ास थी
और आज भी ख़ास है ......

मूल  : इमरोज़
अनु;हरकीरत हीर

मेरा जवाब इमरोज़ जी के लिए ... ......

अय रांझे .....
इक बार ही सही
आ अपनी कब्र से
 कि मैंने तेरे साथ
फिर उस आग में
जलना है .....



         हीर ..............

Thursday, August 30, 2012

३१ अगस्त ....

३१ अगस्त ....

 नींव हिली ....
देह थरथराई ....
नीले पड़े होंठों पर
इक फीकी सी मुस्कराहट थी ....
''इक नज़्म का जन्म हुआ है ''


आज उम्र की कंघी का
इक और टांका टूट गया .......!!

Tuesday, August 21, 2012

तेरी और मेरी ईद .....



अव्वल अल्ला नूर उपाया ,कुदरत के सब बंदे.
एक नूर ते सब जग उपज्या ,कौन भले कौन मंदे ...


जी हाँ सारे बन्दे उसी रब्ब की  ,उसी खुदा की ,  उसी एक ईश्वर की देन  हैं . ईश्वर को तो हमने  बाँट दिया है अलग अलग धर्मों में .पर सन्देश सभी का एक ही है 'प्रेम का' ...आज के शुभ अवसर पर हमारा मकसद भी एक ही होना चाहिए ....''प्रेम बाँटना ...और प्रेम से रहना ''
     ईद का मतलब ही 
होता है खुशी, हर्ष, उल्लास। फितर या फितरा एक तरह के दान को कहते हैं। इस तरह ईद-उल-फितर का मतलब है दान से मिलने वाली खुशी।
ईद सही माने में एक प्रकार का इनाम है, पुरस्कार है जो अल्लाह की ओर से उन सभी लोगों के लिए है जो एक महीने का व्रत रखते हैं और प्रात: से संध्या तक बगैर अन्न और पानी ग्रहण किए अल्लाह की इबादत में लगे रहते हैं। इस महीने की इबादत भी कुछ अलग और कठिन होती है, जैसे कि खूब सुबह यानी पौ फटने से भी काफी पहले उठकर समय पूर्व सेहरी खाना और अपनी प्रात: की नींद की आहुति देना। रात्रि में विशेष रूप से नमाज तरावी पढ़ना। कुरान का अतिरिक्त पठन और पाठन करना। अन्त के दिनों में शब-ए-कदर को विशेष नमाज पढ़ना। इतनी कठिन इबादत के पश्चात जो खुशी मनाने का एक दिन दिया जाता है- वह ईद है।
ईद या ईद-उल-फितर मीठी ईद को कहते हैं। इस दिन त्योहार की खुशी दूध और सूखे मेवों से बनी मीठी सेवइयों के साथ मनाते हैं।  ईद-उल-फितर पूरी तरह से निरामिष त्यौहार  है

  यह ईद जो ईद-उल-फितर के नाम से जानी जाती है- इसे मनाने से पहले फितरा और जकात का निकालना अनिवार्य होता है।
फितरा अनाथ, मालूम और गरीबों के लिए होती है, जिससे वे लोग भी अपनी खुशियों का आनन्द ले सकें तथा अपना जीवन सुखी बना सकें। फितरे और जकात की अदायगी के बगैर रमजान अधूरा माना जाता है।

इस्लाम में कहा गया है कि सबसे पहले अपने पड़ोस में देखो कि कौन जरूरतमंद है, फिर मोहल्ले में, फिर रिश्तेदारों में, फिर अपने शहर में, उसके बाद किसी और की जरूरतों को पूरा करने की कोशिश करो। फितरा प्रत्येक उन रोजेदारों पर अनिवार्य है
.

जकात दान करना होता है, बशर्ते दानकर्ता कर्जदार न हो, अर्थात सम्पन्न हो। इस्लाम में दान पर बल दिया गया है। दान की राशि निर्धन, अपंग, विकलांग अथवा शारीरिक रूप से चैलेंजों को देना अधिक अच्छा माना जाता है। सर्वप्रथम अपने ऐसे पड़ोस व सगे संबंधियों को देना अच्छा और उचित माना गया है, जो जरूरतमंद और मजबूर हैं।
ईद के दिन लोग सुबह-सुबह उठकर स्नानादि करके नमाज पढ़ने जाते हैं. जाते समय सफेद कपड़े पहनना और इत्र लगाना शुभ माना जाता है. सफेद रंग सादगी और पवित्रता की निशानी माना जाता है. नमाज पढ़ने से पहले खजूर खाने का भी रिवाज है. नमाज पढ़ने से पहले गरीबों में दान या जकात बांटा जाता है.


नमाज अदा करने के बाद सभी एक-दूसरे से गले मिलते हैं और ईद की बधाई देते हैं. ईद पर मीठी सेवइयां बनाई जाती हैं जिसे खिलाकर लोग अपने रिश्तों की कड़वाहट को खत्म करते हैं. इस दिन “ईदी” देने का भी रिवाज है. हर बड़ा अपने से छोटे को अपनी हैसियत के हिसाब से कुछ रुपए देता है, इसी रकम को ईदी कहते हैं. जब दोस्तों और रिश्तेदारों के घर जाते हैं तो वहां भी बच्चों को ईदी दी जाती है।
ईद खुशियां और भाईचारे का पैग़ाम लेकर आती है, इस दिन दुश्मनों को भी सलाम किया जाता है यानि सलामती की दुआ दी जाती है और प्यार से गले मिलकर गिले-शिकवे दूर किए जाते हैं।
तो आइये आज के दिन हम सब गले मिल के एक हो जायें,  अपने गिले शिकवे दुश्मनियाँ भुला मोहब्बत का धर्म अपनाएं औए एक वतन हो जायें ...........


तेरी मेरी ईद .....

जब ....
तेरी
मुहब्बत का
चाँद चढ़ा .....
कई सारी नज्में 

उतर आईं झोली में
तेरे  ख्यालों की  भी
और मेरे ख्यालों की भी
ईद हो गई .....


(ये पोस्ट मैं ईद से पहले ही लिख चुकी थी ...ईद पर यहाँ के समाचार पत्रों में प्रकाशित भी हुई पर व्यस्तता के कारण मैं पोस्ट को ब्लॉग पर डाल ही न पाई .....तो देर से ही सही ईद मुबारक ......)
 

Wednesday, August 15, 2012

आज़ादी से कुछ सवाल ......

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ज़ादी पर कुछ लिखना चाहा तो जेहन में पिछले महीने की घटी घटनाएं अभी ताजा थीं ....घटा तो यहाँ बहुत कुछ कोकराझार और धुबड़ी  में जो  हजारों लोग बेघर बैठे हैं उनके लिए क्या आज़ादी ....? 9 जुलाई को  जी.एस.रोड में  घटी घटना जहां इक लड़की की  इज्ज़त 20 लड़कों द्वारा तार-तार कर दी जाती है......२२ जुलाई २०१२ राजस्थान के उदयपुर जिले में   एक शर्मसार कर देने वाले घटनाक्रम में युवती को  प्रेम करने के जुर्म में उसके प्रेमी के साथ उसे पूरे गांव के सामने निर्वस्त कर पीटा  जाता है और नंगा कर पेड़ से बांधा दिया  जाता है .....१६ जुलाई २०१२ इंदौर में  एक महिला पिछले चार सालों से पति द्वारा किये गए असहनीय कृत्य को अपने सीने में छुपाये ख़ुदकुशी कर  लेती है.... शंकालु पति ने अमानवीयता की सारी हदें पार करते हुए पत्नी के गुप्तांग पर ताला लगा  रखा  था । इसका खुलासा  तब हुआ जब अस्पताल में डॉक्टरों ने जांच की .....ऐसी घटनाओं को देखते हुए  सोचती हूँ  कि हम कितने स्वतंत्र हुए हैं ......? या महिलाओं की स्वतंत्रता को लेकर क्या स्तिथि है ......? क्या आज़ादी का गरीब तबके में कोई महत्त्व है ...? क्या आज़ादी सिर्फ बड़े लोगों का ज़श्न बन कर नहीं रह गई है .....? इस बार सोचा यही सवाल आज़ादी से क्यों न किये जायें .....

आज़ादी पर मेरे कुछ हाइकू देखें  यहाँ .......

आज़ादी से कुछ सवाल ......


रुको ....!
जरा ठहरो अय आज़ादी .....
तुम्हें केवल ज़श्न मनाने के लिए
हमने नहीं दिया था तिरंगा
इसे फहराने से पहले तुम्हें
देने होंगे मेरे कुछ सवालों के जवाब ....

उस दिन तुम कहाँ थी
जिस दिन यहाँ बीस लोग बीच सड़क पर
उतार रहे थे मेरे कपड़े ....?
या फिर उस दिन ....
जिस दिन प्रेम करने के जुर्म में
मुझे नंगा कर लटका दिया गया था
दरख़्त से ....?
या उस दिन ....
जब मेरी खुदकशी के बाद तुमने
खोला था ताला मेरे गुप्तांग से ...?
या फिर उस दिन ...
जिस दिन नन्हीं सी मेरी लाश
तुम्हें मिली थी कूड़ेदान में ...?

मौन क्यों हो ...?
लगा लो झूठ का कितना ही आवरण भले
पर यह सच है ....
तुम  छिपी बैठी हो सिर्फ और सिर्फ
अमीरजादों और नेताओं की टोपियों तले
कभी किसी गरीब  की झोंपड़ी में झांकना
तुम  टंगी मिलोगी किसी
सड़े हुए खाली थैले में
या किसी टूटी खाट  पर
 ज़िन्दगी की आखिरी साँसे गिनती
फुटपाथों पर कूड़े के ढेर में देखना
कटे अंगों की चीखों में
जहां तुम्हें जन्म देने का भी मुझे
अधिकार नहीं ....

आज़ादी ...
जाओ लौट जाओ ,पहले
पाक और साफ कर लो अपनी आन
 खोल दो मेरे बंधन
जोड़ दो मेरे कटे पंख ...
कर दो मुझे भी स्वतंत्र
फिर हम और तुम मिल कर गायेंगे
आसमां में ....
जन ,गण  मन का
पावन गान ....!!

Thursday, July 26, 2012

तेरी होंद , रिश्ता दर्द और उडारी ......



Photo: Mum's Interview...........................!! 
 









               टी.वी.पर साक्षात्कार देती आपकी 'हीर'                                                     





'हिंदी जन चेतना' में प्रकाशित यही रचनायें                                                                  
(जुलाई- सितम्बर अंक 2012 )

 (1)

तेरी होंद.....                                                       
आज ...
न जाने क्यों
अंधे ज़ख्मों की हँसी
तेरी  होंद से
मुकरने लगी है ...
चलो यूँ करें मन
पास के गुरुद्वारे में                                                       
कुछ धूप-बत्ती जला दें                                              
और आँखें बंद कर
उसकी होंद को महसूस करें
अपने भीतर .....
                                                                   
(२)
रिश्ता दर्द ...

इक शज़र है
ज़ख्मों का कहीं भीतर
वक़्त बे वक़्त
उग आते हैं कुछ स्याह से पत्ते
रुत आये जब यादों की इस पर
हर्फ़ -हर्फ़ रिश्ता है
दर्द .....

(३)

उडारी.....

तेरे घर से
विदा होते वक़्त
छोड़े जा रही हूँ मैं अपने पंख
बाबुला.....
जो कभी बुलाओ तो याद रखना
अब नहीं होगी मेरे पास
पंखों की उडारी .....

(४)

पैरहन ...

वक़्त की....
 किलियों पे टंगा है
तकदीरों का पैरहन
नामुराद कोई उतारे
तो पहनूं .....

(५)

जली नज्में ....

रात चाँद ने
मुस्कुरा  के पूछा
कहाँ थी तुम इतने दिनों ...?
न कोई गीत न नज़्म ...?
मैंने कहा ..
मेरी हजारों नज्में
रोटी के साथ
तवे पे जल गईं .....

Sunday, July 15, 2012

मौसमी उतर आओ अब सड़कों पर .......

सरेआम नाबालिग लड़की से बदसलूकी मामले का मुख्य आरोपी अमर ज्योति कलिता जिसपर असम पुलिस ने सुराग देने वाले को एक लाख रुपये का इनाम देने की घोषणा की थी और जिसका आज 15 दिन बाद 24 जुलाई को वाराणसी (उत्तर प्रदेश) में होने का पता चला .है  ...अमरज्योति राज्य सरकार की आईटी एजेंसी एमट्रॉन में काम करता था । घटना के बाद कंपनी ने इसे  नौकरी से निकाल दिया. इस घटना को शूट करने वाले टीवी चैनल के पत्रकार गौरव ज्योति नियोग ने  अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दियाहै ......
16 जुलाई यहाँ के हिंदी समाचार-पत्र 'दैनिक पूर्वोदय' में छपी यही रचनायें ......

http://www.youtube.com/watch?v=LP0rO-BdCQM&feature=player_detailpage
यहाँ  देखें इस घटना से जुड़ा विडिओ ......

 गुवाहाटी ने लगाई  अपने  चेहरे पर  एक और कालिख .....9 जुलाई हमारे घर से करीब एक किलोमीटर दूर जी.एस.रोड में ....बीच  सड़क पर .... इक लड़की जी इज्ज़त 20 लड़कों द्वारा तार-तार कर दी जाती है (देखिये ऊपर दिए गए लिंक में ) और लोग किनारे खड़े तमाशा देखते रहे ...कहाँ हैं वो लड़कियों को हक़ दिलाने की बातें करने वाले ..? .कहाँ हैं ..''लड़कियों को बचाव'' की दुहाई देने वाले .....? इतने अधिकारों के बाद भी कितनी सुरक्षित हो पायीं हैं लडकियां ....? है कोई जवाब आपके पास .....? यह  तस्वीर देख मैं तो शर्म  से पानी-पानी हूँ .....आपका क्या कहना है ......

अय औरत अब उतर आओ  सड़कों पर .......

(१)

अय औरत  ....
वक़्त आ गया है
उतार दो ये शर्मो-ह्या का लिबास
और उतर आओ सड़कों पर
अकेली नहीं हो तुम
देखो संग हैं तुम्हारे
आज हजारों हाथ ...
बस एक बार....
एक बार  तुम ऊँची तो करो
हक़ की खातिर
अपनी आवाज़ ......!

(२)

लो नोच लो
मेरा ज़िस्म
उतार दो मेरे कपड़े ...
कर दो नंगा सरे- बाज़ार
मैं वही औरत  हूँ
जिसने तुझे जन्म दिया ......!!

(३)

इज्जत के नेजे पर
दाग दिया  जाता है कभी ....
कभी किसी  कोठे से
निकलती है चीख मेरी
कभी बीच सड़क पर
मसल दिए जाते हैं मेरे अरमान
तुम पुरुष हो ...?
या हो हैवान ....?

(४)

देख लिया ...
नोचकर मेरा ज़िस्म ....?
अब तुम देखना
मेरे ज़िस्म से निकलती आग
जो भस्म कर देगी
तुम्हारी अँगुलियों से
उठती हर इक भूख  को
और भूखे रह जाओगे तुम
किसी बंद कोठरी में
बरसों तलक
सलाखों के पीछे ....


(५)

आज़ादी ....
कहाँ हो तुम ....?
बस एक दिन फहराने
आ जाती हो तिरंगा ...?
देख.यहाँ तेरी जननी को
कैसे बीच चौराहे पर
कर दिया जाता है नंगा ....!!

(६)

मैं फिर ..
तारीख नहीं बनना चाहती
जो ज़िन्दगी की दास्ताँ लिखती रहूँ उम्र भर
या जन्म होते ही
फिर कोई माँ दबा दे मेरा गला
बेटी..बेटी..बेटी....
अय बेटी की मांग रखने वालो
मुझे  न्याय दो  ....!

(७)
नहीं ...नहीं ....
अब नहीं डालूंगी मैं गले में फंदा ...
और न रोऊंगी अब  जार-जार
अब तो दिखलानी होगी तुझको
इस ज़िस्म से उठती धार .....


(8)


बेटियाँ बचाओ  ...
मत मारो  इन्हें कोख  में
बेटी लक्ष्मी है
बेटी देवी है ...
बेटी दुर्गा है ...
बेटी माँ  है ....
अय  दरिंदो ...!
आज तुमने ..
ये साबित के दिया ....!!

(9)

आँखों में ...
 आँसू नहीं अब अंगार हैं ....
  होंठों में गिड़गिड़ाहट नहीं
अब सवाल हैं ....
दुःख की भट्टी में
जलती-बुझती ये औरत
मुआवजा चाहती  है
सदियों से कैद रही
अपनी जुबान  का ......!!

(10)

कल इक और देवी के
उतार दिए गए कपड़े
बीच सड़क पर किया गया
उसका   उपहास ....
क्योंकि वह ....
मिटटी-गारे की नहीं
हाड़-मांस की जीती-जागती
औरत  थी .....
'देवी' तो मिटटी की होती है ....
 
(11)

लो मैंने....
 उतार दिया  है अपना लिबास
खड़ी हूँ  बिलकुल निर्वस्त्र ..
चखना चाहते हो इस जिस्म का स्वाद ..?
तो चख लो.....
मगर ठहरो.....!
मेरा जिस्म चाटने से
अगर मिट सकती है
तुम्हारे पेट की भी आग
तो चाट लो मेरा जिस्म ....
क्योंकि ...
फिर ये तुम्हारे हाथ
नहीं  रह पायेंगे इस काबिल
कि  बुझा सकें
अपने पेट की आग .....!!



 

Monday, July 9, 2012

बस इक हत्या....

ज फिर ख्यालों की रात बहुत गहरी है ...सांकल खोलती हूँ तो  पिता की बूढी आँखों का दर्द ..भईया  की डूबती  सुर्ख आँखें ...और औरत होने का मुआवजा मांगती भतीजी सिम्मी की अंदरूनी चीखें.... मष्तिष्क को हथौड़ों  की सी चोट से  पीटने लगती हैं ..इक और दर्द.... दो वर्ष से लिए अतिथि संपादन के कार्य में असफलता का हाथ  ....नसें कसमसाने लगतीं हैं तो कलम खोलकर बैठ जाती हूँ ...

 
(१)


बस इक हत्या....

अच्छा होता
मैं ये  आवाज़ भी दबा लेती
दातों तले .....
फिर लील ली गई है
इक ज़िन्दगी ...
वह सबकुछ भूल चुकी है
अपना वजूद ..अपनी पहचान ...
अपनी हँसी ....
शब्द कहीं दूर खंडहरों से उभर कर आते हैं .....
मुझे हत्या करनी है ...
बस इक हत्या .......!!

( सिम्मी के लिए ..)

(२)


मौत....

वह रोज़ पीता
है
डूबती जा रही ज़िन्दगी का जाम

और मौत धीरे-धीरे
उसके ज़िस्म के
हर अंग को छूकर देखती है
अपने पैर कहाँ से फैलाऊँ ......!!

(भईया के लिए   )

(३)


खंडहर....
 
बेबस देख रहा है
घर को खंडहर में बदलते हुए
कभी इस ईंट को तो कभी उस ईंट को
बचाने की कोशिश में
खुद खंडहर हुआ जा रहा है .....

(पिता के लिए )

(४)
 

अब कोई गिला नहीं....

जले पैरों से ...
अंगुलियाँ टूटकर गिर पड़ी हैं
जब दर्द के धागे लम्बे होते गए
मैंने ज़ज्बातों की रस्सियाँ खोल दीं
सारी पत्तियाँ  बिखर गई हैं
मैं  उन
बिखरी पत्तियों को  समेट
 मसलकर  माथे से लगा लेती हूँ 

  अब मुझे किसी से कोई
 गिला नहीं .......!!

(आनंद जी और जितेन्द् जौहर जी के लिए )

(५)


 तुम्हारे और मेरे पास ....

तुम्हारे पास
उसके साथ बिताये
उम्रभर के सुनहरे पल थे
और मेरे पास ...
तुम्हारे संग बिताये
चंद लम्हें ...
मेरी नज्में मुड़-मुड़ परत आती हैं
उन बुतों की ओर
जो मुहब्बत की उडीक में
पत्थर हो गए थे ......

(इमरोज़ के लिए )

Thursday, June 14, 2012

शिलांग का एक यादगार दिन ......


दिनांक २५ मई से २७ मई २०१२ को शिलांग (मेघालय ) में भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् एवं पूर्वोत्तार हिंदी अकादमी के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विकास सम्मलेन एवं अखिल भारतीय लेखक सम्मान समारोह  आयोजित किया गया . जिसमें लेखकों , रचनाकारों को उनके उत्कृष्ट लेखन के लिए   सम्मान प्रदान किये गए ....
  इसी समारोह में  हरकीरत 'हीर'  को उनके विशिष्ट लेखन व उनके काव्य -संग्रह ''दर्द की महक'' के लिए मेघालय के उप-मुख्य मंत्री श्री बी. ऍम . लानोंग के हाथों सम्मानित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ .........

   पर्यटन के लिए गए चेरापूंजी की कुछ और खुबसूरत तस्वीरें  .....