Tuesday, March 13, 2012

सफ़र की एक घटना ......

सफ़र की एक घटना ......



हैलो.....हे...हाय.....:))
उठ गयीं.....?
हूँ....हूँ....तुम तो मुझे उठाने वाली थी ......?
ह ...ह ss....ह sss....चलो कोई बात नहीं .....नींद तो ठीक से आई न .....?
कितने बजे सोयी थी .....?
ओ के ....!
नेट पे तो नहीं बैठी ज्यादा देर ....?
अच्छी बात बात है ....
देखो अब कोई टेंशन नहीं ओ के ....!
नाश्ता किया ...?
मैं तो कर रहा हूँ राजधानी में ...
यू नो ...राजधानी इज गुड ट्रेन .....सर्विसिंग भी बहुत अच्छी है ...टोयलेट्स आर क्लीन एंड ब्रेक फास्ट इज टू गुड ...ब्रेड बटर ऑमलेट टी .....
ऐसा करो तुम भी अपना नाश्ता रूम में मंगवा लो ....
छोड़ो यार ...अपने दिमाग से ये सारी बातें निकाल दो ...मैं हूँ न तुम्हारे साथ .....अब दो दिन मेरे साथ रहोगी तो बिलकुल नार्मल हो जाओगी .....
हाँ ...हाँ...बाबा ....
ठीक है डार्लिंग ...पहले तुम चलाना तो सीख लो ....लेने से पहले चलानी आनी चाहिए कि नहीं ....?
पहले सीखना जरुरी है ...समझ रही हो न ...फस्ट यू लर्न ...कम से कम साल छ : महीने चलाना सीख लो ...ऍम आई राईट ओर रोंग ....?
द बेस्ट इज पहले चलाना सीखो फिर लो ....क्यों ....?
सीखना जरुरी है ....ये मत सोचो कि अपनी कार होगी तो ही सीखूंगी ...पहले तुम चलाना तो सीखो .....
यूँ करो पास में कहीं कोई ड्राइविंग ट्रेनिंग सेंटर है तो उसे ज्योन कर लो ...साल छ : महीने ......
नहीं स्वीट हार्ट ऐसा क्यों सोचती हो ....?
नो...नो...बेबी ...ऐसा सोचना भी मत .....
तुम्हें लगता है मैं ऐसा हूँ ....?
मैं झूठ नहीं बोलता तुम जानती हो .....
मुझ पर विश्वास है कि नहीं ....?
ओ के ऐसा करो ...डिसाइड करो कौन सी लेनी है ....बुकिंग का पता करो , ...कितने दिन पहले बुकिंग होती है ...कब तक मिलेगी ....गेटिंग ईट ....
और हाँ ....अपने दिमाग से ये सारी फिजूल की बातें निकाल दो ....समझी .........
अब कोई टेंशन नहीं ....कोई तनाव नहीं ...ओ के ....माई डार्लिंग ....लव यू ....
देखो जब मैं तुम्हें दिल्ली में मिलूं तो बिलकुल मुस्कुराती हुई मिलनी चाहिए ...खिली हुई ....ओ के ...
( बीच बीच में उसके दुसरे फोन की घंटी भी बजती जाती है जिसे वह बार बार काटता जा रहा है .....बात चित लगातार जारी है...सुबह से दोपहर ...दोपहर से शाम ....शाम से रात ..... )
अब आपका मौसम कैसा है ....?
बहुत जल्द मौसम बदलता है आपका ....
इतना गुस्सा सेहत के लिए ठीक नहीं .....
हाँ ...ये हुई न बात .....पर एक के साथ एक फ्री मिलना चाहिए .....ह...ह...ह......
मुझे आने दो फिर ......:
लो डिनर आ गया मेरा .....
चलो अब तुम भी जल्दी से डिनर मागवा लो अपना ...ओ के बाय ....

दूसरा फोन फिर बजता है ....कुछ सोच कर उठा लेता है .....
हाय ....कैसी हो ...?
नहीं मैं सुबह से ही काम में बहुत बीजी था .....
अगले महीने पूना आ रहा हूँ न .....अगले महीने उधर ही सूटिंग है.... पूना , , मुम्बई बैंगलोर ....फिर हम सैटरडे सनडे साथ होंगे ....
क्यों नहीं ...? मैं कभी झूठ नहीं बोलता डार्लिंग ......


मैंने देखा उस अधेड़ के चेहरे पर पड़े चेचक के निशानों बीच उग आई हलकी -हलकी सफ़ेद काँटों की सी दाढ़ी में उसके चेहरे की मुस्कराहट और भी विकृत हो गई थी .....
मेरा मन वितृष्णा से भर उठा .....



( यह किस्सा है जब मैं विमोचन के लिए राजधानी से दिल्ली जा रही थी ...लड़की पंजाबी थी नाम यहाँ नहीं लूंगी ...मुझे लगता था कि वो कोई एयर होसट्रेस थी )

Saturday, March 10, 2012

जितेन्द्र ‘जौहर’ का समीक्षात्मक अभिमत.....

हाल ही में विमोचित मेरी पुस्तक ‘दर्द की महक’ के फ़्लैप (Blurb) पर प्रकाशित प्रसिद्ध समीक्षक श्री जितेन्द्र ‘जौहर’ का समीक्षात्मक अभिमत कुछ यूँ रखे हैं ....


दर्द की एक दौलतमंद कवयित्री....


प्रेम की तृष्‍णा, उपेक्षा, एकाकीपन-जनित नैराश्य, संघर्ष का सातत्य, टूटन, बिखराव, दर्द, आँसू, आहें, कराहें- ये सब ब्लॉग-जगत की सुपरिचित कवयित्री हरकीरत ‘हीर’ के काव्योत्पाद के आधारभूत अवयव हैं। वस्तुतः वे ‘दर्द’ की एक दौलतमंद कवयित्री हैं; दर्द जैसे बरस पड़ा हो, काग़ज़ पर! उनके दर्द की यह बरसात शब्द-देह धारणकर कभी नज़्म, तो कभी क्षणिका बन जाती है...जिनसे गुज़रना आँसुओं के काव्यानुवाद से गुज़रना है। साथ ही, सिसकियों के समूचे समुच्चय का श्रवण-साक्षी बनना भी। रचनान्त में पाठक के मुँह से पीड़ा की सघनानुभूति से सनी एक गहरी ‘आह’ निकल पड़ती है! तदनन्तर वह महसूस करने लगता है- ‘कोई शीशा कहीं गहरे में टूटा है...!’


यहाँ प्रसंगतः पी.बी. शेली याद आ जाते हैं- ‘...अवर स्वीटेस्ट सॉन्ग्‌ज़ आर दोज़, दैट टेल ऑफ़ सैडेस्ट थॉट।’ कवयित्री के पीराक्रान्त हृदय की यह अभिव्यक्ति किसी को मिठास-युक्त लगेगी, तो किसी को नैराश्य-युक्त! बहरहाल हरकीरत के लिए तो यह पीर-पगी काव्याभिव्यक्ति कुछ पल की राहत का साधन है...‘पीर का निकासमार्ग’ है। दूसरे शब्दों में कहें... तो कविता, कवयित्री के अश्रुस्नात ‘दर्द’ की एकल ग्राहक है, जिसकी सन्निधि में वह स्वयं को हल्का कर लेती है। बक़ौल हरकीरत, ‘इस बदलते वक़्त में हर चीज़ बिकती है...बस दर्द नहीं बिकता!’ ऐसे में कविता अपने ममतामयी आँचल में कवयित्री की आँख से झरते अश्रुकणों को थाम लेती है। स्त्री-विमर्श के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने पर उसके अश्रुकण नारी-वर्ग की प्रतिनिधिक व्यथा-कथा भी लिखते नज़र आने लगते हैं, जिसमें शोषण-उत्पीड़न, आकांक्षाओं का दमन और इतस्ततः विद्रोही तेवर भी साफ़ झलकते हैं।


सारतः अगर जीवन में ‘दर्द’ है, तो फिर कितना भी ‘दमन’ किया जाय... उसे कितना भी छिपाया जाय, अन्ततः उसकी ‘महक’ फ़िज़ाओं में आ ही जाती है। हरकीरत हीर के पुर-अश्क ‘दर्द की महक’ नज़्मों के एक ख़ूबसूरत गुलदस्ते के रूप में संग्रहीत होकर पाठकों के बीच यथोचित समादर पायेगी, इसी आदमक़द शुभकामना के साथ....




-जितेन्द्र ‘जौहर’
(समीक्षक/स्तम्भकार: ‘तीसरी आँख’)
पत्राचार : आई आर- 13/6, रेणुसागर, सोनभद्र-18 (उप्र)
कार्यस्थल : अंग्रेज़ी विभाग, ए.बी.आई. कॉलेज
मोबाइल : +91 9450320472

समीक्षक एवं स्तम्भकार: ‘तीसरी आँख’
(त्रैमा. अभिनव प्रयास’, अलीगढ़, उप्र)
(संपा. सलाहकार: त्रैमा. ‘प्रेरणा’, शाहजहाँपुर, उप्र)
(संपा. सलाहकार: ‘साहित्य-ऋचा’, ग़ाज़ियाबाद, उप्र)
(अतिथि संपा: त्रैमा. ‘सरस्वती सुमन’/मुक्तक विशेषांक, देहरादून)
(अतिथि संपादक: ‘आकार’/मुक्तक विशेषांक, मुरादाबाद, उप्र)

Saturday, March 3, 2012

प्रगति मैदान की कुछ यादगार तस्वीरें .....

प्रगति मैदान की कुछ यादगार तस्वीरें .....


२७ फरवरी प्रगति मैदान दिल्ली में मेरे काव्य संग्रह ''दर्द की महक'' का लोकार्पण चित्रकार व कवि इन्द्रजीत इमरोज़ जी , हिंदी साहित्य जगत के सशक्त हस्ताक्षर
कवि-गीतकार-नवगीतकार, ग़ज़लगो, कथाकार, समीक्षक, संपादक, अनुवादक एवं बाल साहित्यकार रमाकांत शर्मा उद्भ्रांत जी , राम कुमार कृषक जी(संपा.अलाव ) , यशवंत सिंह और विजय शंकर जी के हाथों हुआ .....प्रकाशक 'हिंद-युग्म' के शैलेश भारतवासी जी का आभार ....पहली बार अपने प्रसंशक ब्लोगर मित्रों से भी रूबरू हुई ..ये मेरे लिए रोमांच से भरे हुए सुखद पल थे ....मनु जी गेट पर ही मुझे लेने आ गए थे ...अन्दर पहुँचते ही अंजू अनु चौधरी , मुकेश तिवारी, अविनाश वाचस्पति, अनुपमा त्रिपाठी ,सुनीता सानू ,गुंजन अग्रवाल,महफूज़, राजीव तनेजा ,श्रीमती तनेजा , आनंद द्रिवेदी, इमरोज़ जी , विकेश निझावन जी , आनंद सुमन जी , मुकेश कुमार सिंहा, डॉ. वेद व्यथित, हरी शर्मा , काजल कुमार, प्रमोद कुमार तिवारी,शैलेश भारतवासी , संगीता मनराल, विजेंद विज , शिवम् मिश्रा, केवल राम , ललित शर्मा ललित, वंदना गुप्ता यशवंत जी आदि...आदि....आदि ....(मुझे तो नाम भी ठीक से याद नहीं ) से एक साथ मुलाकात ....एतिहासिक और यादगार पल थे वे ....

बहुत ही रोमांचक और सुखद दिन था मेरे लिए ...जाते ही एक के बाद एक सभी ब्लोगर सामने आते गए ...लेकिन तस्वीरों से कुछ हट के पहचानना जरा कठिन हो रहा था पर मुश्किल नहीं .....
बहुत सी तस्वीरें छूट गयीं हैं ...अगर किसी मित्र के पास हों तो भेज दें .....

शुक्रिया मनु जी का जो हर वक़्त मुझे सहयोग देते रहे .....

जिनका इंतजार था ......डॉ दराल जी , पंकज सुबीर जी , मुफलिस जी , खुशदीप जी , आशीष जी पर नहीं आये .......

शिकायत रही वंदना गुप्ता , अनु चौधरी , सुनीता शानू , अनुपमा त्रिपाठी, गुंजन जी से जो अंत में एक साथ स्टाल में चलने का वादा कर पहले ही चली गयीं .....:))


()


'' दर्द की महक '' का विमोचन .....
(२)

हीर , कहानीकार पत्रिका 'पुष्प-गंधा' के संपादक विकेश निझावन , उनके पुत्र , इनका नाम भूल रही हूँ ....

(३)
() हीर , सरस्वती- सुमन के संपादक डॉ आनंद सुमन .....


इमरोज़ जी के साथ .....

(५)



अंजू अनु चौधरी की ''क्षितिजा'' का विमोचन.....






(६)

इमरोज़ जी ''दर्द की महक '' पर अपने विचार रखते हुए .....
(७)


'' दर्द की महक ''पुस्तक पर अपने विचार और नज़्म सुनाते हुए .....
(८)


(९)