Thursday, August 27, 2015

आज़ राखी के कुछ हाइकु  …सभी भाइयों को राखी की हार्दिक शुभकामनाएँ  ....
***********
1-
रिश्तों का प्यार
लिए आया है द्वार
राखी त्यौहार।
2-
राखी है भाई
लिए बहना आई
बाँधे कलाई।
3-
छूटे न कभी
तेरा मेरा ये प्यार
भैया हमार
4-
राखी की मौली
लिए आई बहना
अक्षत - रोली।
5-
रक्षा बंधन
इक पाक त्यौहार
जैसे चंदन। 
6-
राखी त्यौहार
देती तुझे बहना
दुआ अपार। 
7-
हिस्सा न पैसा
सुख दुःख में रहें
साथ हो ऐसा ।
8-
है अनमोल
रिश्ता पैसों से भैया
इसे न तोल ।
9-
राखी बंधाने
आसमां से उतरे
चाँद सितारे ।
10-
चली चिरैया
लिए राखी की डोर
भैया की ओर ।

हीर  …

Wednesday, June 3, 2015

मुरझाये फूल .....
******************

भी चाहतों के धागे से
लिखा था मुहब्बत का पहला गीत
इक हर्फ़ बदन से झड़ता
और इश्क़ की महक फ़ैल जाती हवाओं में
देह की इक-इक सतर गाने लगती
रंगों के मेले लगते
बादलों की दुनियाँ बारिशों के संग गुनगुनाने लगती
आस्मां दोनों हाथों से
आलिंगन में भर लेता धरती को …


कभी उम्र के महल में
हुस्नों के दीये जलते थे
रात भर जागती रहती आँखों की मुस्कराहट
शहद सा भर जाता होठों में
इक नाजुक सा दिल
छुपा लेता हजारों इश्क़ के किस्से करवटों में
रात घूँट -घूँट पीती रहती
इश्क़ का जाम ....

आज बरसों बाद
दर्द का एक कटोरा उठाकर पीती हूँ
रूह के पानी से आटा गूँधती हूँ
ग़म की आँच पर सेंकने लगती हूँ
अनचाहे रिश्तों की रोटियाँ
और उम्र के आसमान पर उगते सफेद बादलों में
ढूंढने लगती हूँ टूटे अक्षरों की कोई मज़ार
जहाँ रख सकूँ बरसों पहले मर गए
देह के खुशनुमा अक्षरों के
मुरझाये फूल …

हीर ……

Sunday, November 30, 2014

इश्क़ इक खूबसूरत अहसास  ....

तुमने ही तो कहा था
मुहब्बत ज़िन्दगी होती है
और मैंने  ज़िन्दगी की तलाश में
मुहब्बत के सारे फूल तेरे दरवाजे पर टाँक दिए थे
 तुमने भी खुली बाहों से उन फूलों की महक को
अपने भीतर समेट लिया था
उन दिनों पेड़ों की छाती से
फूल झरते थे
हवाएं नदी में नहाने जातीं
अक्षर कानों में गुनगुनाते
छुईमुई सी ख़ामोशी
आसमां की छाती से लिपट जाती
लगता कायनात का कोना -कोना
मुहब्बत के रंग में रंगा
चनाब  को घूंट घूंट पीये जा रहा हो
छत पर चिड़ियाँ मुहब्बत के गीत लिखतीं
रस्सी पर टंगे कपड़े
ख़ुशी से झुम -झूम मुस्कुराने  लगते
सीढियों की हवा शर्माकर हथेलियों में
चेहरा छिपा लेती .......

तुमने ही तो कहा था
मुहब्बत ज़िन्दगी होती है
और मैं मुहब्बत की तलाश में
कई छतें कई मुंडेरें लांघ जाती
न आँधियों की परवाह की
न तूफ़ानों की  ...
सूरज की तपती आँखों की
न मुझे परवाह थी न तुझे
हम इश्क़ की दरगाह से
सारे फूल चुन लाते
और सारी-सारी रात उन फूलों से
मुहब्बत की नज़्में लिखते ....

उन्हीं नज़्मों में मैंने
ज़िन्दगी को पोर पोर जीया था
ख़ामोश जुबां दीवारों पे तेरा नाम लिखती
मदहोश से हर्फ़ इश्क़ की आग में तपकर
सीने से दुपट्टा गिरा देते ...
न तुम कुछ कहते न मैं कुछ कहती
हवाएं बदन पर उग आये
मुहब्बत के अक्षरों को
सफ़हा-दर सफ़हा पढने लगतीं ...

तुमने ही तो कहा था
मुहब्बत ज़िन्दगी होती है
और मैंने कई -कई जन्म जी लिए थे
तुम्हारी उस ज़रा सी मुहब्बत के बदले 
आज भी छत की वो मुंडेर मुस्कुराने लगती है
जहां से होकर मैं तेरी खिड़की में उतर जाया करती थी
और वो सीढियों की ओट से लगा खम्बा
जहां पहली बार तुमने मुझे छुआ था
साँसों का वो उठना वो गिरना
सच्च ! कितना हसीं था वो
इश्क़ के दरिया में
मुहब्बत की नाव का उतरना
और रफ़्ता -रफ़्ता डूबते जाना ....डूबते  जाना  .....!!

हीर  .....


Wednesday, August 13, 2014

आज़ादी से पहले कुछ सवाल ....

आज़ादी से पहले कुछ सवाल  ....

जब मैं यहाँ लिख रही थी
आज़ादी की कविता
तुम वहाँ बुन रहे थे साज़िशों जाल
किस तरह रचा जाये शब्दों का चक्रव्यूह
जिसमें कैद होकर
मेरी कविता ख़ुद -ब ख़ुद दम तोड़ दे
शायद तुम भाँप गए थे
कमजोर होती मेरी
शब्दों की जमीं …

सहसा गिर कर
टूटने लगे थे मेरे शब्द
काले लिबास में कसमसाती भावनाएं
आँखों से बह निकली थीं
एक गुलमोहर जिसे बरसों से पानी डाल -डाल
मैंने हरा किया था अपनी देह में
सहसा कट गयी थी उसकी शाखें
मैं रोकना चाहती थी उसे
आत्महत्या करने से
एक पूरी किताब लिख देना चाहती थी
उसकी देह पर
पर मौन हो चुके थे
उसके शब्द …

ऐ स्त्री !आज भी हैं
तुम्हारे पास ऐसे कई सवाल
जो अभी तक हरे हैं तुम्हारी देह में
अब से नहीं , तब से , जब से
आज़ादी का ज़श्न मनाया जाता रहा है
जो लिखे जाते रहे हैं ज़ख़्मों के साथ तुम्हारी रूह पर
कभी तुम गुलामी की अँधेरी सुरंगों में दफ़्न रही
कभी नैतिकता ,अनैतिकता के सारे शब्द
टिका दिए गए तुम्हारी देह पर
पता नहीं स्त्री तुम अपनी देह में
ऐसा क्या लेकर जन्म लेती हो
जो तुम्हारी देह के सामने
संवेदना और उसकी आत्मा से जुड़े
सारे सवाल बौने जाते हैं ....

बदल दिए जाते हैं
तुम्हारे लिए आज़ादी के अर्थ
सज़ायाफ़्ता क़ैदी की तरह
स्वछंदता और स्वतंत्रता में कर दिया जाता है फ़र्क
सामाजिक बंधनों, मान्यताओं और सोच पर
लगा दी जाती हैं बंदिशें
तुम आज भी कभी अपने गर्भ में लिए जगह ढूंढती हो
तो कभी अपने अस्तित्व के लिए
साहित्य के बाज़ार में स्त्री विमर्श का
एक झुनझुना बजा दिया जाता है हर वर्ष
जिसपर स्त्री यौनिकता के नाम पर
एक निरंकुश देहवादी विमर्श चलता है
पुरुष मानसिकता में रचा बसा
एक दूसरे दर्जे का स्त्री विमर्श …

आज न जाने क्यों
अट्हास कर उठी है मेरी कविता
डरी, सहमी हुई वह कातर नज़रों से
खींचती है तिरंगे की डोर
और पूछती है उससे
आज़ादी के सही मायने …!!

Saturday, July 5, 2014

मुहब्बत की तक़दीर .......

मुहब्बत की तक़दीर .......


इक अनलिखी तक़दीर
जिसे दर्द ने बार -बार लिखना चाहा
अपने अनसुलझे सवालों को लेकर
आज भी ज़िंदा खड़ी है  ....
नहीं है उसके पास मुस्कानों का कोई पैबंद
जीने योग्य रात की हँसी
उगते सूरज की उजास भरी किरणें
फड़फड़ाते सफ़्हों पर वह लिखती है
अधलिखि नज़्मों की दास्तान  ....

कबूल है उसे हर इल्ज़ाम
चुप्पियों में उग आये शब्दों से वह
 सीती है सपने
तक़दीर के अनलिखे सपने
जहाँ हथेलियों की रेखाएं
घर बनाकर ठहर गई हैं
एक घुटन , एक टीस , एक चीख
खुली हवा में साँस लेने को
तरसती है उसकी नज़्म ……
इक दिन वक़्त ने उससे पूछा
तू कौन है ? तेरी तो तक़दीर भी नहीं
मनचाही ज़िन्दगी क्या
तेरा तो कोई मनचाहा सपना भी नहीं ?
वह मुस्काई ,बोली -
ज़ख्म अनचाहा हो सकता है
दर्द भी अनचाहा हो सकता है
पर मुहब्बत अनचाही नहीं होती
मुहब्बत मनचाही होती है
मेरी रूह में मुहब्बत की मनचाही लकीर है
जिसे तक़दीर भी नहीं मिटा सकती
 और जिसने मुहब्बत को जी लिया
उससे बड़ा सुखी कोई नहीं होता
मैं मुहब्बत भी हूँ और
 मुहब्बत की तक़दीर भी
कोई मेरे हिस्से में बेशक़ ख़ामोशियाँ लिख दे
पर रूह पर लिखी मुहब्बत की नज़्म पर
ख़ामोशी नहीं लिख़ सकता  …


हीर  …

Thursday, May 15, 2014

काला गुलाब ....

काला गुलाब  ....

औरत ने जब भी
मुहब्बत के गीत लिखे
काले गुलाब खिल उठे हैं उसकी देह पर
रात ज़िस्म के सफ़हों पर लिख देती है
उसके कदमों की दहलीज़
बेशक़ वह किसी ईमारत पर खड़ी होकर
लिखती रहे दर्द भरे नग़में 
पर उसके ख़त कभी तर्जुमा नहीं होते
इससे पहले कि होंठों पर क़ोई शोख़ हर्फ़ उतरे
फतवे पढ़ दिये जाते हैं उसकी ज़ुबाँ के
कभी किसी काले गुलाब को
 हाथों में लेकर गौर से देखना
रूहानी धागों से बँधी होंगी कोई उसके संग
 मुहब्बत की डोर  …



हीर   ……

Wednesday, May 7, 2014

मुहब्बत का लफ़्ज ……

मुहब्बत का लफ़्ज़ ……

कभी -कभी सोचती हूँ
रिश्तों के फूल काटें क्योँ बन जाते हैं
औरत को दान देते वक़्त
रब्ब क्यों क़त्ल कर देता है उसके ख़्वाब
कुछ उदास आवाजें
मुर्दा पेड़ों के पत्तों दम तोड़ देती हैँ
एक गुमनाम रात झूठ के ज़ुल्म पर
चुपचाप ख़ामोश बैठी है
और ज़ेहन में उठते सवाल
विधवा के लिबास में मौन खड़े हैँ …

मातमी परिंदे फड़फड़ा रहे हैं
सफ़ेद चादरों में क़हक़हा लगा रही है ज़िंदगी
कुछ आधा मुर्दा ख़्वाब
रस्सियाँ तोड़ते हैं
आंसू ज़मीन पर गिरकर
खोदने लगते हैं
क़ब्र …

धीरे -धीरे दर्द मुस्कुराता है
अगर कुछ बदलना चाहती हो तो
अपनी इबादत का अंदाज बदल
तू रात की स्याही से चाँद नहीँ लिख सकती
अँधेरे की दास्तान सुब्ह की किरण लिखती है
तुम अपनी आँगन की मिटटी को बुहार कर
बो देना फिर कोई सुर्ख़ गुलाब
इन अक्षरों में मुहब्बत का लफ़्ज
अभी मरा नहीं है …

हरकीरत 'हीर '