कुछ दीये ऐसे भी होते हैं ...चाहे लाख आँधियाँ आये ...आसमां फटे ....उनकी रौशनी कभी कम नहीं होती ...'मोहब्बत' कुछ ऐसे ही दीये जलाती है दिलों में ......इसलिए .....
दो सांसों की बीच की ख़ामोशी में है ग़र , बुझता दीया
लिख दो ढाई अक्षर प्रेम के, जी जायेगा दिल का दीया ....
(१)
अमावस की रात .....
इक कंपकंपाती ..
सूत के धागे की लौ
इक लम्बी दर्द भरी साँस के बाद
सो जाना चाहती है
आँखें भींचकर
उफ्फ.......
कितनी खौफजदा है यह
कोहरे भरी लम्बी रात ......!
(अस्पताल से )
(२)
उम्र का दीया .....
उम्र का दीया छूती हूँ तो
सिर्फ कुछ काली सी लकीरें
उभर आती हैं ...
रब्बा...!
धुआँ उठने के लिए ही सही
कुछ बूंदें ज़िस्म में
बची रहने दे
अभी फर्ज को
कुछ दिन और जीना है ......!!
(३)
आखिरी बूंद तक.......
वह....
नहीं थकती
दौड़े चले आते हैं उसके पास
दुःख, दर्द, ज़ख्म ,
अपमान , अपशब्द, तिरस्कार
अवहेलना , आँसू, गम, खौफ़ , ख़ामोशी जैसे
अनगिनत शब्द .....
वह नहीं थकती .....
ताउम्र उन्हें संभाले रखती है
थपथपाकर रुमाल में
दीये की बाती सी जलती रहती है
तेल की आखिरी बूंद तक.......
(४)
रौशनी का रंग .....
ज़िन्दगी के .....
कितने ही दीये
वक़्त की कोख में बुझे हैं
टटोलती हूँ तो पत्थरों का
कोई हिस्सा नहीं पिघलता
इन आँखों में अब नहीं है कोई
हँसी तसव्वुर ....
फिर तू ही बता ...
इस रक्त-मांस की देह में मैं
रौशनी का रंग कैसे भरूं ....?
(५)
आस की लौ....
कई बार ....
दरवाज़ा खटखटाया है
ज़िन्दगी के कुछ हिस्से
कभी मेरी पकड़ में नहीं आये
जब-जब मुट्ठी खोली
दर्द तर्जुमा करने लगा
आज मैंने फिर छाती की आग को जलाया है
देखना है इन जलती-बुझती आँखों में
आस की लौ टिमटिमाती है या नहीं .....!
(६)
मोहब्बत का दीया ....
टूटती उम्मीदों के साथ
न जाने दिल के कितने दीये बुझे हैं
ऐसे में एक बार फिर तुम्हारा ख़त
ठहरी ख़ामोशी को
रुला गया है .....
मेरे लहू में अब
नहीं बचा कोई इश्क का कतरा
बता ! मैं मोहब्बत का दीया
कैसे जलाऊँ .....?
(७)
मन्नतों के चिराग ....
अय खुदा !
अब पेड़ पर से
मेरी बाँधी वह कतरन खोल दे
मेरी मन्नतों के चिराग
बुझने लगे हैं .....
(८)
तेरा नाम .....
इस घुप्प ...
अँधेरी रात में
तेरा नाम लेकर
रक्खा जो हाथ
दिल की कब्र पर
चिराग जल उठा .....
(९)
बाती ....
बाती हूँ
जलती हूँ
तड़पती हूँ
मेरा पैगाम है
मोहब्बत फैलाना
कुछ चीखती आवाजें
टूटे शीशे , रस्सियाँ ,
रक्त के कतरे ...
नहीं रोक सकते
मेरी मोहब्बत को .....
(१०)
इस बार आओ तो ....
इस बार आओ तो
जला जाना मन का वह दीप भी
जो बरसों पहले
जाते वक़्त
प्रेम.....
बुझा गया था .....
(११)
दीया .....
कहते हैं मोहब्बत
देह को ....
आखिरी बूंद तक
जिलाए रखती है
रांझेया...!
आज हीर फिर
अपने ज़िस्म की रुई से
तेरी मजार पर
मोहब्बत का .....
दीया जलाने आई है .....!!
( आप सब को दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएं ....और एक बार फिर राजेन्द्र स्वर्णकार जी का शुक्रिया जिन्होंने मुझे दूरदर्शन पर हुए कवि सम्मलेन की तस्वीरें लगाने का आग्रह किया उन्हीं तस्वीरों की बदौलत मुझे दिल्ली आकाशवाणी ने अपनी नज्मों की सी डी भेजने का आग्रह किया .....जिसका प्रसारण ३१ अक्तू. रात ९:३० पर होगा ....)
Saturday, October 22, 2011
Tuesday, September 13, 2011
दूरदर्शन पर हुए कवि सम्मलेन की कुछ तस्वीरें .....
Posted by
हरकीरत ' हीर'
at
11:52 AM
आज सिर्फ कुछ तस्वीरें .....
पिछली बार आद. राजेन्द्र जी की शिकायत थी कि मैंने झूठे इंद्रजाल में उलझा दिया .....
देखिये उनकी टिपण्णी .....:))
आदरणीय दराल साहब !
आपको हीरजी की पिछली पोस्ट पर मुझसे पूछे गए 'ऐंद्रजालिक' शब्द का अर्थ अब मिल गया न ?
आपको याद ही होगा - हीर जी ने कहा था -
शायद अगली बार कुछ तस्वीरें पेश करूँ .......
आप-हमको बहला दिया , हमें भ्रम में डाल दिया , सम्मोहित कर दिया , हम पर ज़ादू-इंद्रजाल कर दिया ,
… और इनकी नई पोस्ट में आपको तस्वीरें नज़र आईं ?
और इतने सारे - सौभाग्य से दिल ख़ुश करने के बहाने दे दिए कि किसी को पिछली पोस्ट में ख़ुद इनके अपनेआप किए वादे के बारे में पूछना तक याद नहीं रहा … :))
हीर जी ने उलझा दिया न सबको इंद्रजाल में ......!!
तो लीजिये राजेन्द्र जी हमने तोड़ दिया ये इंद्रजाल .....:))
पर इसके लिए हमें काफी मेहनत करनी पड़ी ...दूरदर्शन वालों ने काफी अनुरोध के बाद यह सी डी दी और हमने सी डी से ये कुछ तस्वीरें निकाली ....
एंकर कबीर और प्रीति तिवारी 
सामने मंच पर सभी कवि विराजमान हैं और कुर्सियों पर ऑडियंस ......
इन्हें तो आप जानते ही होंगे .....:))
कवि सम्मलेन के पहले वंदना गीत पेश करती एक गायिका ......
और इन्हें भी .....??
यहाँ मेरी बगल में हैं कबीर , उनकी बगल में असमिया के युवा गायक भुइयां इन्होने कवि सम्मलेन के अंत में एक हिंदी गीत पेश किया था ,मेरी दूसरी और कवि चन्द्रप्रकाश पोद्दार , केन्द्रीय हिंदी निदेशालय के पूर्वोत्तर के प्रभारी उमाकांत खुबालकर और कवि किशोर जैन .....

:))
ये हैं ज़ीना बरुआ , उमाकांत खुबलकर ,डॉ सुधा श्रीवास्तव ,हरकीरत 'हीर'और चन्द्रप्रकाश पोद्दार
कैसी लगी .....:))
पिछली बार आद. राजेन्द्र जी की शिकायत थी कि मैंने झूठे इंद्रजाल में उलझा दिया .....
देखिये उनकी टिपण्णी .....:))
आदरणीय दराल साहब !
आपको हीरजी की पिछली पोस्ट पर मुझसे पूछे गए 'ऐंद्रजालिक' शब्द का अर्थ अब मिल गया न ?
आपको याद ही होगा - हीर जी ने कहा था -
शायद अगली बार कुछ तस्वीरें पेश करूँ .......
आप-हमको बहला दिया , हमें भ्रम में डाल दिया , सम्मोहित कर दिया , हम पर ज़ादू-इंद्रजाल कर दिया ,
… और इनकी नई पोस्ट में आपको तस्वीरें नज़र आईं ?
और इतने सारे - सौभाग्य से दिल ख़ुश करने के बहाने दे दिए कि किसी को पिछली पोस्ट में ख़ुद इनके अपनेआप किए वादे के बारे में पूछना तक याद नहीं रहा … :))
हीर जी ने उलझा दिया न सबको इंद्रजाल में ......!!
तो लीजिये राजेन्द्र जी हमने तोड़ दिया ये इंद्रजाल .....:))
पर इसके लिए हमें काफी मेहनत करनी पड़ी ...दूरदर्शन वालों ने काफी अनुरोध के बाद यह सी डी दी और हमने सी डी से ये कुछ तस्वीरें निकाली ....
सामने मंच पर सभी कवि विराजमान हैं और कुर्सियों पर ऑडियंस ......
यहाँ मेरी बगल में हैं कबीर , उनकी बगल में असमिया के युवा गायक भुइयां इन्होने कवि सम्मलेन के अंत में एक हिंदी गीत पेश किया था ,मेरी दूसरी और कवि चन्द्रप्रकाश पोद्दार , केन्द्रीय हिंदी निदेशालय के पूर्वोत्तर के प्रभारी उमाकांत खुबालकर और कवि किशोर जैन .....:))
ये हैं ज़ीना बरुआ , उमाकांत खुबलकर ,डॉ सुधा श्रीवास्तव ,हरकीरत 'हीर'और चन्द्रप्रकाश पोद्दार Wednesday, August 31, 2011
अमृता के जन्म दिन पर .......
Posted by
हरकीरत ' हीर'
at
12:08 AM
आज अमृता का जन्मदिन है ...वह अमृता जिसकी आत्मा का इक-इक अक्षर हीर के ज़िस्म में मुस्कुराता है ...जिसकी इक-इक सतर हीर की तन्हा रातों में संग रही है ... ये नज़्म मेरी उसी अमृता को समर्पित है ....
पर उससे पहले आपसे दो खुशखबरियाँ सांझा करना चाहूंगी ....
एक तो 'द सन्डे- इन्डियन ' विकली ( संपा. अरविन्द्र चौधरी ) में वर्ष २०११ की सर्वश्रेष्ठ महिला लेखिकाओं (लगभग ५०० प्रतिभागियों में )में हमारा नाम भी शुमार है ....
दुसरे आज के ही दिन 'हिंद-युग्म' ऑन लाइन मेरे काव्य-संकलन 'दर्द की महक' का विमोचन भी कर रहा है .....


यहाँ क्लिक कर आप हिंद-युग्म के विमोचन समारोह में भी पहुँच सकते हैं ....
अमृता के जन्म दिन पर .......
आज ...
ये कब्र कैसे खुल गई ...?
ये किसने मिट्टी का लेप कर
मुझे ज़िंदा कर दिया ....?
ये किस समुन्दर की प्यास थी
जो मिट्टी में दरार पड़ी ...?
दर्द और आंसुओं की इक आवाज़
उतर आई आज की तारीख में
इश्क की कोख में ज़ुहूर हुआ
रौशनी का इक कण
आकार ले उठा
आग की शक्ल में ...
खुदा की इक इबादत
अक्षरों की धड़कन बन गई
आज ये कब्र कैसे खुल गई .....?
ज़ुहूर- उत्पन्न
(इस बीच इस खुशखबरी के साथ एक दुखद समाचार भी मिला
हमारे ब्लोगर मित्र डॉ अमर कुमार जी अब नहीं रहे ... उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि .....)
(
पर उससे पहले आपसे दो खुशखबरियाँ सांझा करना चाहूंगी ....
एक तो 'द सन्डे- इन्डियन ' विकली ( संपा. अरविन्द्र चौधरी ) में वर्ष २०११ की सर्वश्रेष्ठ महिला लेखिकाओं (लगभग ५०० प्रतिभागियों में )में हमारा नाम भी शुमार है ....
दुसरे आज के ही दिन 'हिंद-युग्म' ऑन लाइन मेरे काव्य-संकलन 'दर्द की महक' का विमोचन भी कर रहा है .....

यहाँ क्लिक कर आप हिंद-युग्म के विमोचन समारोह में भी पहुँच सकते हैं ....
अमृता के जन्म दिन पर .......
आज ...
ये कब्र कैसे खुल गई ...?
ये किसने मिट्टी का लेप कर
मुझे ज़िंदा कर दिया ....?
ये किस समुन्दर की प्यास थी
जो मिट्टी में दरार पड़ी ...?
दर्द और आंसुओं की इक आवाज़
उतर आई आज की तारीख में
इश्क की कोख में ज़ुहूर हुआ
रौशनी का इक कण
आकार ले उठा
आग की शक्ल में ...
खुदा की इक इबादत
अक्षरों की धड़कन बन गई
आज ये कब्र कैसे खुल गई .....?
ज़ुहूर- उत्पन्न
(इस बीच इस खुशखबरी के साथ एक दुखद समाचार भी मिला
हमारे ब्लोगर मित्र डॉ अमर कुमार जी अब नहीं रहे ... उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि .....)
(
Friday, August 19, 2011
कुछ क्षणिकाएं .....
Posted by
हरकीरत ' हीर'
at
10:19 PM
आज फिर कुछ क्षणिकाएं .....
शायद अगली बार कुछ तस्वीरें पेश करूँ , अभी मुझे मिली नहीं ...हाल ही में दूरदर्शन पे 'सदभावना' विषय पर काव्यगोष्ठी हुई ...विस्तार से अगली बार .....
कुछ क्षणिकाएं .....
(१)
इक कोठरी में लगे हैं जाले
इक कोठरी में खामोशी रहती है
इक कोठरी दर्द ने ले रखी है
इक कोठरी बरसों से बंद पड़ी है
कभी रहा करता था यहाँ प्रेम
सोचती हूँ तुम्हें दिल की
किस कोठरी में रखूं .....?
(२)
वो कभी-कभी ...
छिप-छिप कर मुस्कुराया करता
जब भी गुज़रती उसकी खिड़की के सामने से
गहरी नज़रों से तकता मुझे
इक दिन जा खड़ी हुई उसके सामने
पूछा- कौन हो तुम ....?
वह बोला - तुम्हारा प्रेम नहीं हूँ मैं
मैं थके क़दमों से
लौट आई ......!!
(३)
झील ...
कभी सोती नहीं
अक्सर तारे उतर आते हैं
उसकी छाती पर ...
अटखेलियाँ करते
केले के पेड़ों की नाव पर सवार
चूम लेते उसके बंद कमल
पर झील को उस तारे से प्रेम था
जो आसमां में अकेला ही चमकता था
धूमकेतु सा .....!!
(४)
वह .....
बहुत ऊंचे पर्वत पे
मौन साधे बैठा था ...
मुझे वहां पहुँचने में बहुत देर हो गई
जब मैं वहां पहुंची बहुत भीड़ थी
लोग हाथों में फूल लिए
उसे अर्पित कर रहे थे
और वह ....
पत्थर हो चुका था .....!!
(५)
बहुत ढूंढा ....
कई बंद दरवाजे खटखटाए
झाड़ियों के पीछे ...
बाज़ारों में , दुकानों में ...
मेले में ....
उस मोंल में भी
जो अभी-अभी .....
चिड़िया घर के सामने खुला है
पर तुम कहीं नहीं मिले ...
तुम कहीं बिकते क्यों नहीं प्रेम .....?
शायद अगली बार कुछ तस्वीरें पेश करूँ , अभी मुझे मिली नहीं ...हाल ही में दूरदर्शन पे 'सदभावना' विषय पर काव्यगोष्ठी हुई ...विस्तार से अगली बार .....
कुछ क्षणिकाएं .....
(१)
इक कोठरी में लगे हैं जाले
इक कोठरी में खामोशी रहती है
इक कोठरी दर्द ने ले रखी है
इक कोठरी बरसों से बंद पड़ी है
कभी रहा करता था यहाँ प्रेम
सोचती हूँ तुम्हें दिल की
किस कोठरी में रखूं .....?
(२)
वो कभी-कभी ...
छिप-छिप कर मुस्कुराया करता
जब भी गुज़रती उसकी खिड़की के सामने से
गहरी नज़रों से तकता मुझे
इक दिन जा खड़ी हुई उसके सामने
पूछा- कौन हो तुम ....?
वह बोला - तुम्हारा प्रेम नहीं हूँ मैं
मैं थके क़दमों से
लौट आई ......!!
(३)
झील ...
कभी सोती नहीं
अक्सर तारे उतर आते हैं
उसकी छाती पर ...
अटखेलियाँ करते
केले के पेड़ों की नाव पर सवार
चूम लेते उसके बंद कमल
पर झील को उस तारे से प्रेम था
जो आसमां में अकेला ही चमकता था
धूमकेतु सा .....!!
(४)
वह .....
बहुत ऊंचे पर्वत पे
मौन साधे बैठा था ...
मुझे वहां पहुँचने में बहुत देर हो गई
जब मैं वहां पहुंची बहुत भीड़ थी
लोग हाथों में फूल लिए
उसे अर्पित कर रहे थे
और वह ....
पत्थर हो चुका था .....!!
(५)
बहुत ढूंढा ....
कई बंद दरवाजे खटखटाए
झाड़ियों के पीछे ...
बाज़ारों में , दुकानों में ...
मेले में ....
उस मोंल में भी
जो अभी-अभी .....
चिड़िया घर के सामने खुला है
पर तुम कहीं नहीं मिले ...
तुम कहीं बिकते क्यों नहीं प्रेम .....?
Sunday, August 14, 2011
आज़ादी का गीत ......
Posted by
हरकीरत ' हीर'
at
9:55 PM
उर्दू के मशहूर शायर जोश मलीहाबादी की नज़्म ‘लम्हा-ए-आज़ादी’ का एक बड़ा लोकप्रिय शेर है:
कि आज़ादी का इक लम्हा है बेहतर
ग़ुलामी की हयाते-जाविदाँ से
आइये हम इस आज़ादी को 'जश्ने आज़ादी' बनाएं और इसका लुफ्त उठाएं ......
मनायेंगे ज़मीने -हिंद पर हम ज़श्ने आज़ादी
वतन के इश्क में हम सरों का ताज रखेंगे
बहा दो दिलों की रंजिशें
अमन की करो कुछ बात
सजी है ज़मीं तिरंगों से
आज़ादी का ज़श्न लिए आज
कुछ ख्वाहिशें हों कुछ ख्वाब हों
साथ चलने की आवाज़ हो
कुछ रस्में - ईद दस्तूर हों
कुछ होली,दिवाली का सरूर हो
कोई प्यार हो, इकरार हो
खफ़ा-रुसवा न कोई यार हो
टूटे घरौंदे , तुम जोड़ लो
गांठें दिलों की , तोड़ दो
न खंज़र हो न तलवार हो
मीठी प्यार की बयार हो
तेरे दर्द से होऊँ मैं दुखी
मेरा दर्द तेरे दिल के पार हो
मेरी साँसें माँ के नाम हो
तेरी जां वतन के काम हो
मैं जिऊँ तो देश की शान में
तू मरे तो देश की आन में
आज़ाद हैं हम, आज़ाद वतन
मत छिटको जहरीले बीज तुम
कोई चुरा न ले जाये हँसी इसकी
मत फेंको ऐसी चिंगारियाँ तुम
ज़ख़्मी हैं अभी भी रूहें इसकी
है धुंएँ में लिपटी यादें इसकी
अब और न करो लाशों की बात
कुछ तो करो अमन की बात
सजी है ज़मीं तिरंगों से
आज़ादी का जश्न लिए आज
बहा दो दिलों की रंजिशें
अमन की करो कुछ बात .
जय- हिंद ,जय भारत
Thursday, August 4, 2011
अपनी एक मित्र सर्जना के नाम ......
Posted by
हरकीरत ' हीर'
at
4:16 PM
कब्र की दीवारों से
हँसी छूटी कि...
हँसी के एवज में
फिर इक रात मर गई .....
बेतरतीब से पड़े सफ़्हों पर नज़्म तड़प-तड़प के साँसे ले रही थी कि अचानक फोन की घंटी बज उठी .....
हैलो ....आप हरकीरत 'हीर' जी बोल रही हैं ...?
जी ... ...
आप वही हैं न जो पहले हरकीरत 'हक़ीर' के नाम से लिखती थीं ....?
जी ... :) ...वही हूँ .... !
पहचाना ....?
नहीं ...
याद कीजिये ...बरसों पहले हम अज़ीज़ मित्र हुआ करती थीं .....एक साथ कवि गोष्ठियों में जाना ...सम्मेलनों में जाना, मुशायरों में जाना .....हम काफी अन्तरंग मित्र रह चुकी हैं ......
स्मृतियों में कुछ धुंधलके से चित्र उभरने लगे ....कुछ कब्रे जिन पर कई वर्षों से मिट्टी डाल चुकी थी आज बदन से मिट्टी झाड़ने लगीं थीं .....
कुछ याद आया ....?
नहीं .....
मैं कुछ और याद दिलाऊँ ...?
................
जय हिंद ...!
आपको याद है हमारी मुलाकात हमेशा 'जय-हिंद' से हुआ करती थी ....
.................
कुछ और ......?
जब पुस्तकालय में पहली बार आपकी नज्मों की समीक्षा हुई थी ...पत्रकारों के सवालों के बीच आप बेहद घबरा गई थीं तब मैंने ही तो संभाली थी सारी स्थिति .....वरना आपकी ऐसी-तैसी हो जाती ....उसने चुहलबाजी की ....और फिर घर आकर हम खूब हँसे थे ...... :)
कुछ याद आया .....?
हाँ ....कुछ- कुछ .....तुम रविकांत के काफी करीब थी ....कुछ याद करते हुए मैंने कहा ....और मैना थापा के भी ....
वह मुस्कुरा पड़ी .....
'हाँ ....मैं वही रीता सिंह हूँ.....
रीता सिंह ......?
नहीं तब शायद तुम किसी और नाम से लिखती थी ....
हाँ ....'सर्जना' .....सर्जना के नाम से .....
धुंधलके से छंट कर एक दुबली पतली नाटी सी खूबसूरत नेपाली लड़की सामने आ खड़ी हुई थी ....
हैरानी से पूछा , '' इतने सालों बाद ....?''
हाँ ....मेरे एक मित्र ने तुम्हारा न. दिया और बताया कि तुम किसी 'सरस्वती-सुमन' नामक पत्रिका का सम्पादन कर रही हो .....
हाँ ....एक अंक की अतिथि संपादिका हूँ .....
पर मैं हैरान थी इस सम्पादन ने मुझे बरसों बिछड़ी सखी से मिलवा दिया ...
पर तुम्हारे ये मित्र हैं कौन ....जानूँ तो ....?
मैं यकदम से अपनत्व पर आ गई थी .....
लखनऊ के हैं ..'राजेन्द्र परदेसी जी ' ....वह मुस्कुरा कर बोली ....
अरे हाँ ...! ....मुझे याद आया अभी पिछले ही दिनों वे सिलचर आये हुए थे ...मुझे फोन भी किया , पर मैं मिल नहीं पाई ....उनकी तो क्षणिकाएं भी आ चुकी हैं ..
उनका साक्षात्कार मैंने ही लिया था वह बोली ....सेंटिनल में छपा था तुमने देखा होगा ....?
नहीं मैं सेंटिनल नहीं लेती .....
फिर लम्बी बातचीत चलती रही .वह मुस्कुरा रही थी ....हँस रही थी ...खिलखिला रही थी ......उसने बताया वह कहीं फारेस्ट डिपार्टमेंट में जाब कर रही है ...शौहर आर्मी में हैं ...दो बेटियाँ हैं .....और ....और ....कि उसे कैंसर है ....युट्रेस में सिस्ट है ... गाल ब्लैडर में स्टोन है .....
मुझे लगा कि किसी ने मुझे बहुत ऊँची ईमारत से नीचे धकेल दिया हो ...मेरी साँसे तेज होती जा रही थीं ...डर रही थी कि कहीं वह कह न दे कि तुम किस दर्द का छलावा लिए बैठी हो ...जीना तो मुझ से सीख .....
अचानक तूफ़ान के साथ तेज बारिश होने लगी ...मैंने अपनी आवाज़ बिजली की कड़कड़ाहट में गुम कर ली .... .मेरे सारे प्रश्न उसकी मुस्कराहट के आगे शर्मिंदा थे .....रात कई चेहरों में गुजरती रही ...रविकांत , दिनकर , सौमित्रम , शमीम , प्रेमलता ...सर्जना ....यादें स्मृतियों के बाहुपाश में मुस्कुराती , आँसू भरती रहीं ....उन दिनों खूब कविगोष्ठियाँ हुआ करती थीं ..लिखने का भी जूनून था ..सर्जना कविताओं के साथ कहानियाँ भी लिखा करती ...बहुत ही मिलनसार ...पलभर में ही किसी के यूँ नजदीक आ जाती जैसे बरसों से जान - पहचान हो ...वर्ना मुझ जैसी ख़ामोशी पसंद तो सिर्फ धुआं ही तलाशती रहती .... न जाने कब , कैसे इतनी गहरी दोस्ती हो गई थी हमारी ...
सुब्ह सोकर उठी तो लगा कुछ गलत हो गया ...उन दिनों सर्जना की एक नज़्म मुझे बेहद पसंद थी सोचा क्यों न आज उसी के बहाने उसे फोन करूँ और आग्रह करूँ सुनाने का ....फोन किया तो पता चला कि वह अस्पताल में है ...पर उसकी मुस्कराहट फिर मेरी हँसी उड़ा रही थी .....
तुम्हें याद है सर्जना ...तुम्हारी एक कविता मुझे बेहद पसंद थी 'कफ़न' शीर्षक' की ...मैं अक्सर तुम्हें सुनाने का आग्रह करती .....?
अरे ...! छोड़ न उसे ...सुन मैंने अभी-अभी अस्पताल में एक कविता लिखी है ...उसे सुन .....
ज़िन्दगी की है
चाहत मुझे
फिर क्यों डरूँ...?
मैं कष्टों से
जीवन की तकलीफों से
संकट से , बाधाओं से
जो करतीं हैं ...
निराश मन को
बन जाता है निर्बल भाव
और टूटने लगता है विश्वास
मुझे ज़िन्दगी से प्यार है
जीना चाहती हूँ मैं
साहस से ...
दुःख-कष्टों को लघु करके
धीरज को बढाती हूँ मैं
तो .....
स्वयं बौने हो जाते हैं दुख
मेरी सहनशक्ति के सामने
और फिर एक बार
जीत जाती है
ज़िन्दगी ......!!
मैंने धीमें से फोन रखा और सारी कब्रें खोल दीं और अपने दर्द तलाशने लगी .....
हँसी छूटी कि...
हँसी के एवज में
फिर इक रात मर गई .....
बेतरतीब से पड़े सफ़्हों पर नज़्म तड़प-तड़प के साँसे ले रही थी कि अचानक फोन की घंटी बज उठी .....
हैलो ....आप हरकीरत 'हीर' जी बोल रही हैं ...?
जी ... ...
आप वही हैं न जो पहले हरकीरत 'हक़ीर' के नाम से लिखती थीं ....?
जी ... :) ...वही हूँ .... !
पहचाना ....?
नहीं ...
याद कीजिये ...बरसों पहले हम अज़ीज़ मित्र हुआ करती थीं .....एक साथ कवि गोष्ठियों में जाना ...सम्मेलनों में जाना, मुशायरों में जाना .....हम काफी अन्तरंग मित्र रह चुकी हैं ......
स्मृतियों में कुछ धुंधलके से चित्र उभरने लगे ....कुछ कब्रे जिन पर कई वर्षों से मिट्टी डाल चुकी थी आज बदन से मिट्टी झाड़ने लगीं थीं .....
कुछ याद आया ....?
नहीं .....
मैं कुछ और याद दिलाऊँ ...?
................
जय हिंद ...!
आपको याद है हमारी मुलाकात हमेशा 'जय-हिंद' से हुआ करती थी ....
.................
कुछ और ......?
जब पुस्तकालय में पहली बार आपकी नज्मों की समीक्षा हुई थी ...पत्रकारों के सवालों के बीच आप बेहद घबरा गई थीं तब मैंने ही तो संभाली थी सारी स्थिति .....वरना आपकी ऐसी-तैसी हो जाती ....उसने चुहलबाजी की ....और फिर घर आकर हम खूब हँसे थे ...... :)
कुछ याद आया .....?
हाँ ....कुछ- कुछ .....तुम रविकांत के काफी करीब थी ....कुछ याद करते हुए मैंने कहा ....और मैना थापा के भी ....
वह मुस्कुरा पड़ी .....
'हाँ ....मैं वही रीता सिंह हूँ.....
रीता सिंह ......?
नहीं तब शायद तुम किसी और नाम से लिखती थी ....
हाँ ....'सर्जना' .....सर्जना के नाम से .....
धुंधलके से छंट कर एक दुबली पतली नाटी सी खूबसूरत नेपाली लड़की सामने आ खड़ी हुई थी ....
हैरानी से पूछा , '' इतने सालों बाद ....?''
हाँ ....मेरे एक मित्र ने तुम्हारा न. दिया और बताया कि तुम किसी 'सरस्वती-सुमन' नामक पत्रिका का सम्पादन कर रही हो .....
हाँ ....एक अंक की अतिथि संपादिका हूँ .....
पर मैं हैरान थी इस सम्पादन ने मुझे बरसों बिछड़ी सखी से मिलवा दिया ...
पर तुम्हारे ये मित्र हैं कौन ....जानूँ तो ....?
मैं यकदम से अपनत्व पर आ गई थी .....
लखनऊ के हैं ..'राजेन्द्र परदेसी जी ' ....वह मुस्कुरा कर बोली ....
अरे हाँ ...! ....मुझे याद आया अभी पिछले ही दिनों वे सिलचर आये हुए थे ...मुझे फोन भी किया , पर मैं मिल नहीं पाई ....उनकी तो क्षणिकाएं भी आ चुकी हैं ..
उनका साक्षात्कार मैंने ही लिया था वह बोली ....सेंटिनल में छपा था तुमने देखा होगा ....?
नहीं मैं सेंटिनल नहीं लेती .....
फिर लम्बी बातचीत चलती रही .वह मुस्कुरा रही थी ....हँस रही थी ...खिलखिला रही थी ......उसने बताया वह कहीं फारेस्ट डिपार्टमेंट में जाब कर रही है ...शौहर आर्मी में हैं ...दो बेटियाँ हैं .....और ....और ....कि उसे कैंसर है ....युट्रेस में सिस्ट है ... गाल ब्लैडर में स्टोन है .....
मुझे लगा कि किसी ने मुझे बहुत ऊँची ईमारत से नीचे धकेल दिया हो ...मेरी साँसे तेज होती जा रही थीं ...डर रही थी कि कहीं वह कह न दे कि तुम किस दर्द का छलावा लिए बैठी हो ...जीना तो मुझ से सीख .....
अचानक तूफ़ान के साथ तेज बारिश होने लगी ...मैंने अपनी आवाज़ बिजली की कड़कड़ाहट में गुम कर ली .... .मेरे सारे प्रश्न उसकी मुस्कराहट के आगे शर्मिंदा थे .....रात कई चेहरों में गुजरती रही ...रविकांत , दिनकर , सौमित्रम , शमीम , प्रेमलता ...सर्जना ....यादें स्मृतियों के बाहुपाश में मुस्कुराती , आँसू भरती रहीं ....उन दिनों खूब कविगोष्ठियाँ हुआ करती थीं ..लिखने का भी जूनून था ..सर्जना कविताओं के साथ कहानियाँ भी लिखा करती ...बहुत ही मिलनसार ...पलभर में ही किसी के यूँ नजदीक आ जाती जैसे बरसों से जान - पहचान हो ...वर्ना मुझ जैसी ख़ामोशी पसंद तो सिर्फ धुआं ही तलाशती रहती .... न जाने कब , कैसे इतनी गहरी दोस्ती हो गई थी हमारी ...
सुब्ह सोकर उठी तो लगा कुछ गलत हो गया ...उन दिनों सर्जना की एक नज़्म मुझे बेहद पसंद थी सोचा क्यों न आज उसी के बहाने उसे फोन करूँ और आग्रह करूँ सुनाने का ....फोन किया तो पता चला कि वह अस्पताल में है ...पर उसकी मुस्कराहट फिर मेरी हँसी उड़ा रही थी .....
तुम्हें याद है सर्जना ...तुम्हारी एक कविता मुझे बेहद पसंद थी 'कफ़न' शीर्षक' की ...मैं अक्सर तुम्हें सुनाने का आग्रह करती .....?
अरे ...! छोड़ न उसे ...सुन मैंने अभी-अभी अस्पताल में एक कविता लिखी है ...उसे सुन .....
ज़िन्दगी की है
चाहत मुझे
फिर क्यों डरूँ...?
मैं कष्टों से
जीवन की तकलीफों से
संकट से , बाधाओं से
जो करतीं हैं ...
निराश मन को
बन जाता है निर्बल भाव
और टूटने लगता है विश्वास
मुझे ज़िन्दगी से प्यार है
जीना चाहती हूँ मैं
साहस से ...
दुःख-कष्टों को लघु करके
धीरज को बढाती हूँ मैं
तो .....
स्वयं बौने हो जाते हैं दुख
मेरी सहनशक्ति के सामने
और फिर एक बार
जीत जाती है
ज़िन्दगी ......!!
मैंने धीमें से फोन रखा और सारी कब्रें खोल दीं और अपने दर्द तलाशने लगी .....
……….
Monday, July 4, 2011
लापता शब्द ....
Posted by
हरकीरत ' हीर'
at
4:28 PM
बचपन में कई बार अपनी ही परछाई देख डर जाती ....आज जब ज़िन्दगी की परछाइयाँ अँधेरे में आ खड़ी होती हैं ...तो फटे हुए कागचों पर अक्षर बिलख उठते हैं ....और कलम बाँझ हो जाती है ....सच है ये वक़्त बड़ा ही नामुराद होता है ....जब हम उसका साथ मांगते हैं ...तब वह हमसे भागने लगता है ...और जब थक जाता है ज़िन्दगी की दौड़ से .... तो लौट कर सामने आ खड़ा होता है ...पर तब न उसे कुछ मिल पाता है न हमें ....और ज़िन्दगी खत्म हो जाती है .....आज अस्पताल में बैठी यूँ ही ज़िन्दगी के कुछ पन्ने पलटती रही ......
अस्पताल से .....
रात फिर उतरी है
करवटों में .....
वार्ड की ठंडक
बाहरी तापमान की
भट्ठी से लड़ती है .....
ज़िन्दगी की धड़कने
जर्जर देह में लड़खड़ाती हैं
साँसें रह-रह कर मौत से लड़ती हैं
और दर्द .....
मेरी आँखों में उतर कर
बीस साल पुराने पन्ने
पलटने लगता है .......
जब सूरज ....
तीखे शब्दों के साथ उतरता
हवाएं खौफ़ से सहम जातीं
बादल चुपके से हथेली पे
बूंदें लिए उतर आते ...
चाँद थाली में पड़ी
सूखी रोटियाँ छुपा लेता ....
मैं घबराकर दुपट्टे की इक कतरन फाड़
बादल की आँखों पे पट्टी बाँध देती
और दुआ के लिए हाथ उठा देती ....
कई बरस मेरी दुआएं
खाली हाथ लौटती रहीं ....
वक़्त बदलता रहा और उम्र की दहलीजें भी
मैं ख़ामोशी के अक्षर चुनती
और वक़्त के पेड़ पर बाँध देती
मन्नतें जिस्म के हर कतरे से
अक्षर गढ़ती ...
नज्में कागचों पर उतर
सूली पर चढती रहीं ...
आज ख़ामोशी ने अक्षर तोड़े हैं
और मैं झड़े हुए पत्तों से
अपने हिस्से के अक्षर चुनती
सोच रही हूँ शायद
स्वर्ग और नर्क यहीं है .....
(2)
तस्वीरें .....
घर की दरारों पर
मैंने टाँक दी है कुछ तस्वीरें
देखने वाले अक्सर मुझे
कला की शौकीन
समझ लेते हैं .....!!
(४)
लापता शब्द .....
लापता हैं शब्द
कई दिनों से ...
ठीक उसी वक़्त से जब
दूर कहीं रौशनियों का नगर
नज़र आने लगा था ....
ख़ामोशी अपने कंधे पर
लिए जा रही थी
मेरे शब्द ......!!
(५)
कैक्टस .....
धीरे-धीरे ....
मैं बहुत दूर निकल आई थी
वहाँ .....
जहाँ.....
बुत बने पड़े थे पत्थर ....
जब मैं पहली बार यहाँ आई थी
तब ये बुत नहीं थे ...
कुछ नीली सी रौशनियाँ झाँकती थी
इनकी आँखों में ....
मोहब्बत थिरकती थी इनके ज़िस्म में
उठती साँसों में ज़िन्दगी हँसती थी
उसी हँसी में मैंने देखा था
रात को सुब्ह में
सुब्ह को रात में
इक पल में ही बदलते हुए ...
हाँ .....
तब इनके बीच
ये कैक्टस नहीं था ......!!
(६)
तुम्हारे शब्द ...
वह.....
तुम ही तो थी
जिसकी तलाश थी मुझे
जन्मों-जन्मांतरों से ....
ये तुम्हारे ही कहे शब्द थे
जो आज कन्धा देने खड़े हैं
सूली पर चढ़ी ...
मोहब्बत को .....!!
(७)
ख़त .....
इस बीच मैंने
तुम्हें कई ख़त लिखे
कुछ पूरे सफ़्हों के ...
कुछ अधूरे ....
और कुछ अनकहे भी ....
हाँ ; ये और बात है कि
उनमें शब्द नहीं थे ...
प्रेम ,शब्दों का मोहताज
कभी रहा ही नहीं .....!!
(८)
यादें .....
वह फिर आया था
बादलों की छाती चीर
सावन की कश्ती पे सवार
उसकी आँखों में मोहब्बत की तलाश थी
उस रात यादें बहुत देर तक
पैरों के तलवों से
काँटे निकालती रहीं .....!!
(९)
कशमकश .....
ज़िन्दगी ....
नज़्म सी तड़पी है
किसी लाश के पास का कोई पत्ता
थर्राकर कांपा है ....
मरे हुए साजों ने फिर
सुर छेड़ा है .....
आज की रात आग
पत्थर उबालेगी .....!!
(१०)
दर्द ....
रात ....
जब ज़ख्मों ने छाती पीटी
कुछ अक्षर चाँद से गिरे थे
मैंने वो सारे अक्षर
कोख में बो दिए ...
आज नज़्म ने ....
दर्द को ज़न्म दिया है .... !!
अस्पताल से .....
रात फिर उतरी है
करवटों में .....
वार्ड की ठंडक
बाहरी तापमान की
भट्ठी से लड़ती है .....
ज़िन्दगी की धड़कने
जर्जर देह में लड़खड़ाती हैं
साँसें रह-रह कर मौत से लड़ती हैं
और दर्द .....
मेरी आँखों में उतर कर
बीस साल पुराने पन्ने
पलटने लगता है .......
जब सूरज ....
तीखे शब्दों के साथ उतरता
हवाएं खौफ़ से सहम जातीं
बादल चुपके से हथेली पे
बूंदें लिए उतर आते ...
चाँद थाली में पड़ी
सूखी रोटियाँ छुपा लेता ....
मैं घबराकर दुपट्टे की इक कतरन फाड़
बादल की आँखों पे पट्टी बाँध देती
और दुआ के लिए हाथ उठा देती ....
कई बरस मेरी दुआएं
खाली हाथ लौटती रहीं ....
वक़्त बदलता रहा और उम्र की दहलीजें भी
मैं ख़ामोशी के अक्षर चुनती
और वक़्त के पेड़ पर बाँध देती
मन्नतें जिस्म के हर कतरे से
अक्षर गढ़ती ...
नज्में कागचों पर उतर
सूली पर चढती रहीं ...
आज ख़ामोशी ने अक्षर तोड़े हैं
और मैं झड़े हुए पत्तों से
अपने हिस्से के अक्षर चुनती
सोच रही हूँ शायद
स्वर्ग और नर्क यहीं है .....
(2)
तस्वीरें .....
घर की दरारों पर
मैंने टाँक दी है कुछ तस्वीरें
देखने वाले अक्सर मुझे
कला की शौकीन
समझ लेते हैं .....!!
(४)
लापता शब्द .....
लापता हैं शब्द
कई दिनों से ...
ठीक उसी वक़्त से जब
दूर कहीं रौशनियों का नगर
नज़र आने लगा था ....
ख़ामोशी अपने कंधे पर
लिए जा रही थी
मेरे शब्द ......!!
(५)
कैक्टस .....
धीरे-धीरे ....
मैं बहुत दूर निकल आई थी
वहाँ .....
जहाँ.....
बुत बने पड़े थे पत्थर ....
जब मैं पहली बार यहाँ आई थी
तब ये बुत नहीं थे ...
कुछ नीली सी रौशनियाँ झाँकती थी
इनकी आँखों में ....
मोहब्बत थिरकती थी इनके ज़िस्म में
उठती साँसों में ज़िन्दगी हँसती थी
उसी हँसी में मैंने देखा था
रात को सुब्ह में
सुब्ह को रात में
इक पल में ही बदलते हुए ...
हाँ .....
तब इनके बीच
ये कैक्टस नहीं था ......!!
(६)
तुम्हारे शब्द ...
वह.....
तुम ही तो थी
जिसकी तलाश थी मुझे
जन्मों-जन्मांतरों से ....
ये तुम्हारे ही कहे शब्द थे
जो आज कन्धा देने खड़े हैं
सूली पर चढ़ी ...
मोहब्बत को .....!!
(७)
ख़त .....
इस बीच मैंने
तुम्हें कई ख़त लिखे
कुछ पूरे सफ़्हों के ...
कुछ अधूरे ....
और कुछ अनकहे भी ....
हाँ ; ये और बात है कि
उनमें शब्द नहीं थे ...
प्रेम ,शब्दों का मोहताज
कभी रहा ही नहीं .....!!
(८)
यादें .....
वह फिर आया था
बादलों की छाती चीर
सावन की कश्ती पे सवार
उसकी आँखों में मोहब्बत की तलाश थी
उस रात यादें बहुत देर तक
पैरों के तलवों से
काँटे निकालती रहीं .....!!
(९)
कशमकश .....
ज़िन्दगी ....
नज़्म सी तड़पी है
किसी लाश के पास का कोई पत्ता
थर्राकर कांपा है ....
मरे हुए साजों ने फिर
सुर छेड़ा है .....
आज की रात आग
पत्थर उबालेगी .....!!
(१०)
दर्द ....
रात ....
जब ज़ख्मों ने छाती पीटी
कुछ अक्षर चाँद से गिरे थे
मैंने वो सारे अक्षर
कोख में बो दिए ...
आज नज़्म ने ....
दर्द को ज़न्म दिया है .... !!
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