Monday, July 4, 2011

लापता शब्द ....

चपन में कई बार अपनी ही परछाई देख डर जाती ....आज जब ज़िन्दगी की परछाइयाँ अँधेरे में खड़ी होती हैं ...तो फटे हुए कागचों पर अक्षर बिलख उठते हैं ....और कलम बाँझ हो जाती है ....सच है ये वक़्त बड़ा ही नामुराद होता है ....जब हम उसका साथ मांगते हैं ...तब वह हमसे भागने लगता है ...और जब थक जाता है ज़िन्दगी की दौड़ से .... तो लौट कर सामने आ खड़ा होता है ...पर तब न उसे कुछ मिल पाता है न हमें ....और ज़िन्दगी खत्म हो जाती है .....आज अस्पताल में बैठी यूँ ही ज़िन्दगी के कुछ पन्ने पलटती रही ......

अस्पताल से .....

रा फिर उतरी है
करवटों में .....
वार्ड की ठंडक
बाहरी तापमान की
भट्ठी से लड़ती है .....
ज़िन्दगी की धड़कने
जर्जर देह में लड़खड़ाती हैं
साँसें रह-रह कर मौत से लड़ती हैं
और दर्द .....
मेरी आँखों में उतर कर
बीस साल पुराने पन्ने
पलटने लगता है .......
जब सूरज ....
तीखे शब्दों के साथ उतरता
हवाएं खौफ़ से सहम जातीं
बादल चुपके से हथेली पे
बूंदें लिए उतर आते ...
चाँद थाली में पड़ी
सूखी रोटियाँ छुपा लेता ....
मैं घबराकर दुपट्टे की इक कतरन फाड़
बादल की आँखों पे पट्टी बाँध देती
और दुआ के लिए हाथ उठा देती ....
कई बरस मेरी दुआएं
खाली हाथ लौटती रहीं ....
वक़्त बदलता रहा और उम्र की
दहलीजें भी
मैं ख़ामोशी के अक्षर चुनती
और वक़्त के पेड़ पर बाँध देती
मन्नतें जिस्म के हर कतरे से
अक्षर गढ़ती  ...
नज्में कागचों पर उतर
सूली पर चढती रहीं ...

आज ख़ामोशी ने अक्षर तोड़े हैं
और मैं झड़े हुए पत्तों से
अपने हिस्से के अक्षर चुनती
सोच रही हूँ शायद
स्वर्ग और नर्क यहीं है .....


(2)


तस्वीरें .....

र की दरारों पर
मैंने टाँक दी है कुछ तस्वीरें
देखने वाले अक्सर मुझे
कला की शौकीन
समझ लेते हैं .....!!


()

लापता शब्द .....

लापता हैं शब्द
कई दिनों से ...
ठीक उसी वक़्त से जब
दूर कहीं रौशनियों का नगर
नज़र आने लगा था ....
ख़ामोशी अपने कंधे पर
लिए जा रही थी
मेरे शब्द ......!!

()

कैक्टस .....

धीरे-धीरे ....
मैं बहुत दूर निकल आई थी
वहाँ .....
जहाँ.....
बुत बने पड़े थे पत्थर ....
जब मैं पहली बार यहाँ आई थी
तब ये बुत नहीं थे ...
कुछ नीली सी रौशनियाँ झाँकती थी
इनकी आँखों में ....
मोहब्बत थिरकती थी इनके ज़िस्म में
उठती साँसों में ज़िन्दगी हँसती थी
उसी हँसी में मैंने देखा था
रात को सुब्ह में
सुब्ह को रात में
इक पल में ही बदलते हुए ...
हाँ .....
तब इनके बीच
ये कैक्टस नहीं था ......!!

()

तुम्हारे शब्द ...

ह.....
तुम ही तो थी
जिसकी तलाश थी मुझे
जन्मों-जन्मांतरों से ....
ये तुम्हारे ही कहे शब्द थे
जो आज कन्धा देने खड़े हैं
सूली पर चढ़ी ...
मोहब्बत को .....!!

()

ख़त .....

बीच मैंने
तुम्हें कई ख़त लिखे
कुछ पूरे सफ़्हों के ...
कुछ अधूरे ....
और कुछ अनकहे भी ....
हाँ ; ये और बात है कि
उनमें शब्द नहीं थे ...
प्रेम ,शब्दों का मोहताज
कभी रहा ही नहीं .....!!

()

यादें .....


ह फिर आया था
बादलों की छाती चीर
सावन की कश्ती पे सवार
उसकी आँखों में मोहब्बत की तलाश थी
उस रात यादें बहुत देर तक
पैरों के तलवों से
काँटे निकालती रहीं .....!!

()

कशमकश .....

ज़िन्दगी ....
नज़्म सी तड़पी है
किसी लाश के पास का कोई पत्ता
थर्राकर कांपा है ....
मरे हुए साजों ने फिर
सुर छेड़ा है .....
आज की रात आग
पत्थर उबालेगी .....!!

(१०)

दर्द ....

रात ....
जब ज़ख्मों ने छाती पीटी
कुछ अक्षर चाँद से गिरे थे
मैंने वो सारे अक्षर
कोख में बो दिए ...
आज नज़्म ने ....
दर्द को ज़न्म दिया है .... !!



83 comments:

संध्या आर्य said...

kya kahe samajh nahi aa raha ....aabhar

संजय कुमार चौरसिया said...

bahut dino baad , ek baar fir behtreen rachnayen padne ko mili,
bahut sundar

सञ्जय झा said...

ek-se-badhkar ek.......

a n a n d u m..........


pranam.

संजय भास्कर said...
This comment has been removed by the author.
संजय भास्कर said...

कम शब्दों में मगर कई भावों को अभिव्यक्ति करती सुन्दर नज्‍में।

संजय भास्कर said...

आदरणीय हरकीरत जी
नमस्कार !
रात फिर उतरी है
करवटों में .....
वार्ड की ठंडक
बाहरी तापमान की
भट्ठी से लड़ती है .....
ज़िन्दगी की धड़कने
जर्जर देह में लड़खड़ाती हैं
साँसें रह-रह कर मौत से लड़ती हैं
और दर्द .....
एक एक शब्द दर्द से भीगा हुआ ,बधाई......

संजय भास्कर said...

करीब 20 दिनों से अस्वस्थता के कारण ब्लॉगजगत से दूर हूँ
आप तक बहुत दिनों के बाद आ सका हूँ,

वन्दना said...

हर बार की तरह निशब्द कर दिया…………सिर्फ़ और सिर्फ़ दर्द का दरिया ही दिखा।

रश्मि प्रभा... said...

घर की दरारों पर
मैंने टाँक दी है कुछ तस्वीरें
देखने वाले अक्सर मुझे
कला की शौकीन
समझ लेते हैं .....!!
prayah khud hi ek nazariya bana lete hain sab

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

हर नज़्म पढ़ कर ऐसा लगता रहा कि शब्द दर शब्द कुछ रिस रहा है .... मन पर हावी होने की सामर्थ्य रखती हुई क्षणिकाएँ ..

daanish said...

और दर्द .....
मेरी आँखों में उतर कर
बीस साल पुराने पन्ने
पलटने लगता है ... !?!

डॉ टी एस दराल said...

उफ़ ! अस्पताल का दर्द , और बीस साल पुरानी किताब के पन्नों से टपकता दर्द --दोनों ही मार्मिक ।
जिंदगी फिर एक बार इम्तिहान ले रही है ।

Anand Dwivedi said...

हीर जी हमेशा की तरह ही लाजबाब ! शब्द नही नूर !!

नीरज गोस्वामी said...

इस बीच मैंने
तुम्हें कई ख़त लिखे
कुछ पूरे सफ़्हों के ...
कुछ अधूरे ....
और कुछ अनकहे भी ....
हाँ ; ये और बात है कि
उनमें शब्द नहीं थे ...
प्रेम ,शब्दों का मोहताज
कभी रहा ही नहीं .....!!

वाह...कमाल किया है इस बार भी आपने हरकीरत जी...आपकी नज़्म की प्रशंशा करते वक्त शब्द हमेशा लापता हो जाते हैं...बिचारे अपनी सीमा समझते हैं, शर्मिंदा हो जाते हैं क्यूँ की उन्हें मालूम है के आप की नज़्म पढ़ कर, दिल में उठे एहसास को वो सही ढंग से व्यक्त नहीं कर पायेंगे...

नीरज

manu said...

घर की दरारों पर मैंने टाँक दी है कुछ तस्वीरें ...देखने वाले अक्सर मुझे
कला की शौकीन समझ लेते हैं ...


:)

बहुत अच्छा लगा..ये जानकर कि आपको भी हमारी ही तरह पेंटिंग्स से दीवारों की खस्ता हालत ढांपने की बीमारी है जी...


बाकी कि नज्में भी बहुत सुन्दर हैं....
मगर इसमें विशेष आनंद आया...

कविता रावत said...

ishwar hosital aur court ke chhkar kisi se na katwaye, main to yahi kahti hun...
jakhm bolte hai yahi aapki rachna se parilakshit ho raha hai..
sach ye pankiyan dard ko kitna kuch kahti hain!
जब ज़ख्मों ने छाती पीटी
कुछ अक्षर चाँद से गिरे थे
मैंने वो सारे अक्षर
कोख में बो दिए ...
आज नज़्म ने ....
दर्द को ज़न्म दिया है .... !!

अनामिका की सदायें ...... said...

hamesha ki tarah dard ki har parat khol khol kar dikha di har kshanika me.

हरकीरत ' हीर' said...

आद मनु जी ,
इक अरसे बाद आपको देख अच्छा लगा ....
:))
यहाँ दरारों से मतलब दिल की दरारों से है .....

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

घर की दरारों पर
मैंने टाँक दी है कुछ तस्वीरें
देखने वाले अक्सर मुझे
कला की शौकीन
समझ लेते हैं .....!!


गहन अभिव्यक्ति.... बहुत सुंदर

Ravi Shankar said...

इस बीच मैंने
तुम्हें कई ख़त लिखे
कुछ पूरे सफ़्हों के ...
कुछ अधूरे ....
और कुछ अनकहे भी ....
हाँ ; ये और बात है कि
उनमें शब्द नहीं थे ...
प्रेम ,शब्दों का मोहताज
कभी रहा ही नहीं .....!!

बेहद उम्दा और पैनी नज़्में ! हर एक हर्फ़ ख़ास !

नमन !

सुभाष नीरव said...

आपके ब्लॉग की पोस्टिंग रूकी होने पर जब आपसे पता चला था तो समझ में आ गया था कि आप इन दिनों कितनी परेशानियों और तकलीफों में हैं… अपने जब अस्पतालों में भर्ती हों और यह सिलसिला लम्बा चले तो इस तकलीफ़ को मरीज ही नहीं, उसके करीबी भी भोगते हैं… बस, ईश्वर से प्रार्थना ही तो कर सकते हैं हम… आपकी ये नज्में दुख और दर्द की जो जिन्दा तस्वीर खींच रही हैं, वह हर संवेदनशील व्यक्ति को भीतर तक हिलाकर रख देनी की शक्ति रखती हैं… एक एक कविता दर्द की संवेदना में भीगी हुई…एक एक लफ़्ज भीतर तक खरोंच देने वाला… दर्द को भीतर तक खामोश रहकर जीने वाला कवि ही ऐसी कविताएं लिख सकता है… या खुदा ! हीर को शक्ति दे… इस दर्द को सहने की और उसे कलमबद्ध करने की… दर्द का यूँ ही सुन्दर सा अनुवाद आप शब्दों के माध्यम से करती रहे…

shikha varshney said...

किस किस क्षणिका की तारीफ़ करें सब एक से बढ़ कर एक. पर तस्वीर बहुत कुछ कहती सी लगी.

devendra gautam said...

ख़ामोशी अपने कंधे पर
लिए जा रही थी
मेरे शब्द ......!!

क्या बात कह दी आपने. शब्द और ख़ामोशी के कंधे पर?.....गज़ब!....सभी नज्मों में नए और अनूठे बिम्बों के साथ संवेदनाओं का स्वाभाविक सफ़र कहीं गहरे उतर गया. बहुत खूब!

: केवल राम : said...

रात ....
जब ज़ख्मों ने छाती पीटी
कुछ अक्षर चाँद से गिरे थे
मैंने वो सारे अक्षर
कोख में बो दिए ...
आज नज़्म ने ....
दर्द को ज़न्म दिया है .... !!

बहुत कुछ अपने साथ बीता हुआ सा लगा ....ऐसे लगा जैसे खुद ही गुजर चुका हूँ इन परिस्थितियों से ....एक एक शब्द ने अंतर्मन को प्रभावित कर दिया ...!

हरकीरत ' हीर' said...

दानिश जी ,
जब यही हवाएं खिलाफ बहा करती थी ...
और मौसम बिलकुल खामोश था .....
कौन क्या ले जाता है अंत समय .....?

परमजीत सिँह बाली said...

बेहद उम्दा और पैनी नज़्में !बधाई..

दर्शन कौर धनोए said...

बहुत दिनों बाद तुम्हारी याद आई...
जैसे सीप में से मोती निकला ..
जैसे कांटो पे बहार आई ..वाह !वाह !!

यार बड़ी कन्फुज हूँ नम्बर एक को यस कहूँ ..नहीं -नहीं दो ठीक हैं ..न -न तीन ..चार तो एकदम ठीक हैं ...
लगता हैं इस बार रुलाने का ठेका ले लिया हैं हीर तुमने ..बेहद दर्दीली और बेहद दर्दीली ..बस कुछ नही कहूँगी ...तुम्हारी लेखनी को सदके जाऊ ....

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

आशा है आप स्वस्थ व सानंद हॊगी। पर अस्पताल का ज़िक्र करने से मन में शंका हुई॥

निवेदिता said...

हरकीरत जी ,आज आपको पढ़ते हुए पता नहीं क्यों अमॄता प्रीतम जी की याद आ रही है .... उनकी सोच के परिपक्वता की और दर्द की भी .......

rashmi ravija said...

जब ज़ख्मों ने छाती पीटी
कुछ अक्षर चाँद से गिरे थे
मैंने वो सारे अक्षर
कोख में बो दिए ...
आज नज़्म ने ....
दर्द को ज़न्म दिया है

सारी क्षणिकाएं एक से बढ़कर एक हैं...

यादें said...

’हीर’ जी मै तो नीशब्द हुं!
एक दो जख्म नही, पूरा बदन ज़ख्मी है
दर्द बेचारा परेशानं है,कि कहां से उठें ॥
अच्छे के लिये !
शुभकामनायें!

देवेन्द्र पाण्डेय said...

घर की दरारों पर
मैंने टाँक दी है कुछ तस्वीरें
देखने वाले अक्सर मुझे
कला की शौकीन
समझ लेते हैं .....!!

...बेहतरीन।

ashish said...

वेदना को शब्द देना कोई आपसे सीखे , इन्सान के दुःख दर्द कब है रीते?. हर शब्द जीवन को सच्चाई का आइना दिखाते.. पीड़ा के समुद्र में डूबते उतराते.

इमरान अंसारी said...

घर की दरारों पर
मैंने टाँक दी है कुछ तस्वीरें
देखने वाले अक्सर मुझे
कला की शौकीन
समझ लेते हैं .....!!

इस बीच मैंने
तुम्हें कई ख़त लिखे
कुछ पूरे सफ़्हों के ...
कुछ अधूरे ....
और कुछ अनकहे भी ....
हाँ ; ये और बात है कि
उनमें शब्द नहीं थे ...
प्रेम ,शब्दों का मोहताज
कभी रहा ही नहीं .....!!

वाह.....सुभानाल्लाह.......सारे बेहतरीन हैं.......पर इनकी बात कुछ अलग है......लफ्जों पर आपकी पकड़ की दाद है.......

Khushdeep Sehgal said...

चूल्हा है ठंडा पड़ा
और पेट में आग़ है
गर्मागर्म रोटियां
कितना हसीं ख्वाब है
सूरज ज़रा, आ पास आ
आज सपनों की रोटी पकाएंगे हम
ए आसमां तू बड़ा मेहरबां
आज तुझको भी दावत खिलाएंगे हम
सूरज ज़रा, आ पास आ

आलू टमाटर का साग
इमली की चटनी बने
रोटी करारी सिके
घी उसमें असली लगे
सूरज ज़रा, आ पास आ
आज सपनों की रोटी पकाएंगे हम
ए आसमां तू बड़ा मेहरबां
आज तुझको भी दावत खिलाएंगे हम
सूरज ज़रा, आ पास आ

जय हिंद...

सदा said...

रात ....
जब ज़ख्मों ने छाती पीटी
कुछ अक्षर चाँद से गिरे थे
मैंने वो सारे अक्षर
कोख में बो दिए ...
आज नज़्म ने ....
दर्द को ज़न्म दिया है .... !!

नि:शब्‍द कर दिया इन पंक्तियों ने ...।

S.M.HABIB said...

“आपकी नज़्म के कोख से
जन्मा दर्द...
मचलता रहा
मेरी बाँहों में देर तक...
मैं सुनाता रहा उसे
बार बार
पढ़ कर आपकी ही नज़्म...
अब खामोश है वह..
शायद आँख लगी है उसकी...
दुआ है,
बड़ी लंबी हो उसकी नींद...
और आप
निश्चिंत होकर
कुछ पौधे लगा सकें- खुशियों के.”

सादर....

Vivek Jain said...

बहुत सुंदर नज्में,
आभार,
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

प्रवीण पाण्डेय said...

आपकी हर क्षणिका चिन्तन तरंग छेड़ जाती है।

Anand Dwivedi said...

ख़त .....

इस बीच मैंने
तुम्हें कई ख़त लिखे
कुछ पूरे सफ़्हों के ...
कुछ अधूरे ....
और कुछ अनकहे भी ....
हाँ ; ये और बात है कि
उनमें शब्द नहीं थे ...
प्रेम ,शब्दों का मोहताज
कभी रहा ही नहीं .....!!
हर बार कुछ ना कुछ रोशनी लेकर जाता हूँ हीर जी आपकी चौखट से ...इस बार बेपनाह दर्द लेकर जा रहा हूँ ....शायद ये मेरे भीतर का ही हो जो मुझे हर जगह प्रतिबिम्बित हो रहा है.

रजनीश तिवारी said...

ना मोहब्बत न दोस्ती के लिए
वक्त रुकता नहीं किसी के लिए
वक्त के साथ साथ चलता चले
यही बेहतर है आदमी के लिए

दर्द भरी और दिल को छूने वाली सुंदर क्षणिकाओं के लिए आभार

अमित श्रीवास्तव said...

आप कभी आँसुओं से ज़ख्म धोती हैं ,कभी दर्द से यादें कुरेद देती हैं और कभी बस रूह को सुकून दिला जाती हैं । बहुत ही प्रभावी रचनाएं ।

ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...

हर क्षणिका जैसे दर्द का सैलाब है ! पढ़कर लगता है हम सब जीवन में ऐसे ही दर्द जीते हैं, सब कुछ अपना सा लगा !
आपकी अभिव्यक्ति कमाल की है !
आभार !

Avinash Chandra said...

इस पर तो अच्छा और बहुत खूब भी नहीं कहा जाता।
चुप हूँ, और मौन सचमुच बोलता है।

सुमन'मीत' said...

bahut dino baad padhne ko mila ..par vahi kabile tarif

minoo bhagia said...

kamaal hai harkeerat , doosri amrita lagti ho tum mujhe

Mrs. Asha Joglekar said...

कितनी खूबसूरत नज्में उसकी कलम से उतरती हैं,
आज नींद को भी जागना पडेगा ।
एक एक नज्म दिल का कोई ना कोई तार छेडने वाली । दरारों पर चित्र टांगने की बात तो ना जाने कितनों की
अनुभव की हुई होगी । और ये तो

उसकी आँखों में मोहब्बत की तलाश थी
उस रात यादें बहुत देर तक
पैरों के तलवों से
काँटे निकालती रहीं .....!!
बस कमाल ।

bhawana said...

मैं घबराकर दुपट्टे की इक कतरन फाड़
बादल की आँखों में बाँध देती
और दुआ के लिए हाथ उठा देती ....
पर शायद....
मेरे दर से कोई फकीर
खाली हाथ लौटा था .....!!.....


bhut hi sunder...

sabhi sher bahut achhe hai ...jaise dard ki syaahi se likhe gaye ho ...

bhawana said...
This comment has been removed by the author.
Kailash C Sharma said...

लाज़वाब ! सभी क्षणिकायें एक से बढ़ कर एक, मुश्किल है कहना कि कौन सी सबसे अच्छी है.. उत्कृष्ट प्रस्तुति..आभार

k.joglekar said...

harkiratji,
bahut dino baad aapaki rachaye padhi.aapki kshanika.....mera sara shabdkosh khali ho jata hai ...

Rag said...

Harkeerat ji,
Aapki kavitaaon mein ek nayi gahraayi dekh rahaa hoon... ek kavi ke taur par badhaai dena chaahta hoon par ek insaan ke taur par fiqrmand bhi hoon...

haal mein kai masoom duaaon ki haar dekhi hai... par phir bhi duaa hai ki jo ho achchhe ke liye ho...

नई कलम - उभरते हस्ताक्षर said...

कहने को कुछ बचा ही नहीं.. यकीनन.

SAJAN.AAWARA said...

ghar ki diwaro par kuch tasweere tang di mene, dekhne wale mujhe kala ki sokin samajh lete hai.....bahut hi jabardast likha hai apne....
jiai hind jai bharat

SAJAN.AAWARA said...

mam exam ke karan wayast tha.

SAJAN.AAWARA said...

ab tak chappan.......
jai hind jai bharat

mahendra srivastava said...

क्या बात है।
सच में आपकी लेखनी का अनूठा अंदाज है। आसान शब्दों में जो आप कहना चाहती हैं, वो कह देती हैं। बहुत बहुत बधाई

Akanksha~आकांक्षा said...

कम शब्दों में बड़ी गूढ़ बातें..बधाई.



____________________
शब्द-शिखर : 250 पोस्ट, 200 फालोवर्स

दिगम्बर नासवा said...

इस बीच मैंने
तुम्हें कई ख़त लिखे
कुछ पूरे सफ़्हों के ...
कुछ अधूरे ....
और कुछ अनकहे भी ....
हाँ ; ये और बात है कि
उनमें शब्द नहीं थे ...
प्रेम ,शब्दों का मोहताज
कभी रहा ही नहीं .....

बहुत खूब ... हर बार की तरह आपकी रचनाओं और क्षणिकाओं में खो गया आज भी ... किसी दूसरी दुनिया मिएँ ले जाती हैं सभी रचनाएं ...

Sunil Kumar said...

aaj koi tippani nahi kyonki badhai ki pridhi se bbahar hai yah rachnayen

रंजना said...

आपकी कृतियाँ पढ़कर बस उसमे गुम हो महसूसा जा सकता है उक्त भाव को ...उसपर टिपण्णी करने को न तो मन स्थिर हो पाता है और न ही ढूँढने पर भी अनुकूल शब्द मिल पाते हैं...

सुधीर said...

और दर्द .....
मेरी आँखों में उतर कर
बीस साल पुराने पन्ने
पलटने लगता है ... !?!
सुन्दर नज्‍म।

Manish said...

आपका मार्गदर्शन मिला और काव्यमय पंक्तियों में पिरोने का हुनर भी.. मैं भी कोशिश करूँगा.. :)

Anil Avtaar said...

इक और दर्द.. अस्पताल से .. बीस साल पुराने पन्ने .. दर्द .. तुम्हारे शब्द .. लापता शब्द ... ख़त ... कशमकश ... ख़ामोशी चीरते सवाल .. तस्वीरें .. मुहब्बत के पत्ते... यादें .. .मौत ..........

गहन अभिव्यक्ति.... बहुत सुंदर.. लाजबाब !

नूतन .. said...

घर की दरारों पर
मैंने टाँक दी है कुछ तस्वीरें
देखने वाले अक्सर मुझे
कला की शौकीन
समझ लेते हैं .....!!
बहुत ही अच्‍छा लिखती हैं आप .. आभार ।

kumar said...

res. Mam, aapki sabhi rachnaon ne bhav vibhor kar diya...tasveeren,laapta shabd,raaten...mere antarman ko chhu gaye...

surendrshuklabhramar5 said...

हरकीरत हीर जी बहुत सुन्दर क्षणिकाएं और प्यारी रचनाएँ किस किस का बखान किया जाये
आनंददायी
चाँद अपनी थाली में पड़ी
सूखी रोटियाँ छुपा लेता ....
मैं घबराकर दुपट्टे की इक कतरन फाड़
बादल की आँखों में बाँध देती
और दुआ के लिए हाथ उठा देती ....

शुक्ल भ्रमर ५

Manish Kr. Khedawat said...

बहुत खूब |
पढ़कर अच्छा लगा !

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

प्रेम शब्दों का मोहताज़
कभी रहा ही नहीं.......'
.............सभी नज्में वेदना की गहराई से निकले मोतियों की तरह

Hadi Javed said...

घर की दरारों पर
मैंने टाँक दी है कुछ तस्वीरें
देखने वाले अक्सर मुझे
कला की शौकीन
समझ लेते हैं ....
खूबसूरत नज्में खूबसूरत अलफ़ाज़

Dorothy said...

खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
सादर,
डोरोथी. .

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

हीर जी

आपकी नज़्मों पर अपनी बात तो हो ही चुकी …

फिर आया हूं …

कई एहसासात के साथ उदासी से भर गया हूं …

उस दिन मैंने ख़त की बात की … ,
आज कैक्टस ..... हावी है ।

परमात्मा आपको सुख दे , सुकून दे , आपकी तपस्या का प्रतिदान दे , इंसाफ़ दे … आमीन !

Ravi Rajbhar said...

Der se ane ke liye mafi chaunga,,
Bahut dino bad .... apke hastakshar mile hain ..!

aur ham har bar ki tarah is bar bhi..
mugdha rah gaye padhkar.

Abhar.

Blog Administrator said...

खूबसूरत प्रस्तुति.. हार्दिक बधाई.

nilesh mathur said...

बेहतरीन नज़्में हैं , शायद इन दिनों कुछ व्यस्त हैं आप।

Vaneet Nagpal said...

हरकीरत हीर जी,
नमस्कार,
आपके ब्लॉग को "सिटी जलालाबाद डाट ब्लॉगपोस्ट डाट काम"के "हिंदी ब्लॉग लिस्ट पेज" पर लिंक किया जा रहा है|

वन्दना महतो ! (Bandana Mahto) said...

बस आपको पढ़ती हूँ और बार बार पढ़ती हूँ......कुछ कहना मेरे बस की बात नहीं....

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 04- 08 - 2011 को यहाँ भी है

नयी पुरानी हल चल में आज- अपना अपना आनन्द -

Vijay Kumar Sappatti said...

हरकीरत
ये कब लिखा और मेरी नज़र से कैसे छूट गया .. बहुत देर से एक नज़्म पर रुका हुआ हूँ ..

ख़त .....

इस बीच मैंने
तुम्हें कई ख़त लिखे
कुछ पूरे सफ़्हों के ...
कुछ अधूरे ....
और कुछ अनकहे भी ....
हाँ ; ये और बात है कि
उनमें शब्द नहीं थे ...
प्रेम ,शब्दों का मोहताज
कभी रहा ही नहीं .....!!

सोच रहा हूँ , कि वो कौन से लम्हे होंगे , जब ये लिखा होंगा आपने ...
हरकीरत , आपकी इस एक नज़्म पर मैं अपनी नज्मो को कुर्बान करता हूँ ...
क्या इसे मुझे भेजोंगी मेरे collection के लिये ....
धन्यवाद.
विजय

हरकीरत ' हीर' said...

जनाब विजय जी ,

हमने कब ताले लगाये हैं ....??
ले जाइये न ...
भला भेजने की क्या जरुरत .....

प्रदीप कांत said...

घर की दरारों पर
मैंने टाँक दी है कुछ तस्वीरें
देखने वाले अक्सर मुझे
कला की शौकीन
समझ लेते हैं .....!!

_____________

बढिया

Ashwini Kumar said...

यकीनन प्रेम कभी शब्दों का मोहताज नहीं रहा है... आप की लेखनी पर माँ सरस्वती का आशीर्वाद ऐसे ही बना रहे

KAAALL said...

bahut khuub "heer" ji.....