Friday, October 2, 2009

इमरोज़....मोहब्बत की एक अदीम मिसाल .......

मरोज़ ......इक ऐसा नाम....जो आने वाली पीढी के लिए ......मोहब्बत की अदीम मिसाल होगा .....उनके साथ कई बार नज्मों के उत्तर-प्रत्युत्तर का सिलसिला चला .....वो हर नज़्म का जवाब नज़्म से देते .....पिछले दिनों अमृता के जन्मदिन पर भेजी गई नज़्म का जवाब उन्होंने एक लम्बी नज़्म से दिया .....ये नज़्म महज़ एक जवाब नहीं थी .....उन तमाम मोहब्बत करने वालों के लिए एक पैगाम भी थी ......वो पैगाम जिसे हम समाज के सामने कबूलने से कतराते हैं ....हम ज़िन्दगी को ढो तो लेते हैं पर जीने की हिमाकत नहीं कर पाते....इमरोज़ जी ने उसे कबूला भी और जिया भी ......पेश है इमरोज़ जी वही नज़्म ...." आदर "........

आदर........

किताबें पढने से लिखना पढ़ना आ जाता है
ज़िन्दगी पढ़ने से जीना
और प्यार करने से प्यार करना ......

सिगलीगरों ने पढ़ाई तो कोई नहीं की
पर ज़िन्दगी से पढ़ लिया लगता है
सिगलीगरों की लड़की जवान होकर
जिसके साथ जी चाहे चल फ़िर सकती है
दोस्ती कर सकती है
और जब वह अपना मर्द चुन लेती है
एक दावत करती है अपना मर्द चुनने की खुशी में
अपने सारे दोस्तों को बुलाती है
और सबसे कहती है कि आज अपनी दोस्ती पूरी हो गई
और उसका मन चाहा सबसे हाथ मिलाता है
फ़िर सब मिलके दावत का जश्न करते हैं ......

कुछ दिनों से ये दावत और ये दिलेरी जीने की
मुझे बार बार याद आती रही है
जो पढ़े लिखों की ज़िन्दगी में अभी तक नहीं आई
मेरे एक दोस्त को ज़िन्दगी के आखिरी पहर में
मोहब्बत हो गई ...
एक सयानी और खूबसूरत औरत से
दोस्त आप भी बहुत सयाना है- अच्छा है
मोहब्बत होने के बाद वो अपने घर में अपना नहीं रहा
घर में होते हुए भी घर में नहीं हो पाता
अब वो घरवाला ही नहीं रहा
पत्नी के पास पति भी नहीं रहा
पत्नी तो एक तरह से छूट चुकी थी
पर संस्कार नहीं छूट रहे थे .....

पता नहीं वो
आप नहीं जा पा रहा था
या जाना नहीं चाह रहा था
या संस्कार नहीं छोड़े जा रहे थे
मोहब्बत दूर खड़ी रास्ता देख रही थी
उसका जो अभी जाने के लिए तैयार नहीं था ......

जब पत्नी को पति की मोहब्बत का पता चला
पत्नी पत्नी नहीं रही न ही कोई रिश्ता रिश्ता रहा

मोहब्बत ये इल्जाम कबूल नहीं करती
पूछा सिर्फ़ हाज़र को जा सकता है
गैर हाज़र पति को क्या पूछना ....?
वह चुपचाप हालात को देख रही है
और अपने अकेले हो जाने को मान कर
अपने आप के साथ जीना सोच रही है ......

मोहब्बत ये इल्जाम कबूल नहीं करती
कि वो घर तोड़ती है
वह तो घर बनाती है
ख्यालों से भी खूबसूरत घर .......

सच तो ये है मोहब्बत बगैर
घर बनता ही नहीं ......

पत्नी अब एक औरत है
अपने आप की आप जिम्मेदार और ख़ुदमुख्तियार
चुपचाप चारों तरफ़ देखती है
घर में बड़ा कुछ बिखरा हुआ नज़र आता है
कल के रिश्ते की बिखरी हुई मौजूदगी
और एक अजीब सी खामोशी भी
वह सब बिखरा हुआ बहा देती है
और चीजों को संवारती है सजाती है
और सिगलीगरों की तरह एक दावत देने की
तैयारी करती है .......

इस तैयारी में बीते दोस्त दिन भी जैसे
उसमें आ मिले हों
मर्द को विदा करने के लिए .....

वह जा रहे मर्द की मर्ज़ी का खाना बनाती है
उसके सामने बैठकर उसे खाना खिलाती है
वो आँखें होते हुए भी आँखें नहीं मिलाता
सयानप होते हुए भी कुछ नहीं बोलता
वो चुपचाप खाना खाता है ....

उसकी सारी हौंद चुप रह कर भी बोल रही है
कि वो मोहब्बत में है
यहाँ चुप रहना ही सयानप है
कोई सफाई देने की जरुरत ही नहीं
कारण की भी नहीं
मोहब्बत का कोई कारण नहीं होता ....

जाते वक्त औरत
पैरों को हाथ लगाने की बजाये
मर्द से पहली बार हाथ मिलाती है
और कहती है- पीछे मुड़कर न देखना
आपकी ज़िन्दगी आपके सामने है
और 'आज ' में है
अपने आज का ख्याल रखना
मेरे फ़िक्र अब मेरे हैं
और मैं अपना ख्याल रख सकती हूँ .....

जो कभी नहीं हुआ वह आज हो रहा है
पर आज ने रोज़ आना है
ज़िन्दगी को आदर के साथ जीने के लिए भी
आदर के साथ विदा करने के लिए भी
और आदर से विदा होने के लिए भी .......!!

..... इमरोज़....

अदीम - अप्राप्य

Tuesday, September 22, 2009

जब दर्द पास आ मुस्कुराने लगता है ...

सुना है तेरे यहाँ कलम कभी घुटती नहीं .....बड़ी ही रंगीन नज्में हैं तेरे सफ़्हों में .....कभी मुझे भी अपने घर बुलाना ज़िन्दगी ......

सितारों के
टूटने के बाद
रात के अंधेरे में
जब र्द पास आ
मुस्कुराने लगता है
तब दिल के किसी गोशे में
खिल उठते हैं
कई सुर्ख गुलाब ....
एक हलकी सी सुगंध
महक उठती है
हम दोनों के बीच .....

वह मेरा हाथ ...
अपने हाथों में लेकर
तकता है आंखों में
और आँखें ...
खामोशी में भी
कर डालतीं हैं उससे
कई सारे सवालात ....

तभी ....
कोरों में उभर आई
कुछ शबनम की बूंदों पर
वह झुककर ...
रख देता है
अपने तप्त होंठ
और धीमें से कहता है
मैं हूँ न तेरे पास ...

मोहब्बत जैसे .....
कुछ पल के लिए ही सही
साँस लेने लगती है
दर्द के आगोश में .....!!

Friday, September 11, 2009

वह तेरा नाम ही था जो गिर गया था हाथों से ......

तुम पढना मेरी मौत के बाद मेरी ख़ामोशी को ....के नज्मों ने आखिरी साँस ली है ....तुम रखना अपने लफ़्ज़ों की खुरदरी ज़मीं अपने साथ ....के मोहब्बत ने आखिरी साँस ली है ......कहते हैं....
इश्क़ जिनके खून में बसता है
उनके नसीब खारों से सजे होते हैं .....



आज फ़िर
रात के साये बहुत गहरे हैं
मन की तहों में छिपी
बेपनाह मोहब्बत ....
अपने आप को क़त्ल करती
खामोश हो गई है....

आँखें ....
एक गहरी साँस लेती हैं
इक खामोश आवाज़
कट कर गिरती है
पंखे से.....

रब्बा....!
मैं तुलसी के नीचे
जलते दीये सी पाक़
कितनी खोखली हो गई हूँ आज
कि अब ....
इन बनते- बिगड़ते लफ़्जों में
अपने ही जन्म का पल
बेमानी लगने लगा है ...

आह....!
न जाने क्यों यह परिंदा
रोता है रातों में ....
कहीं यह भी किसी जाइर* रूह से
घायल तो नहीं ....?

सामने कागज़ पर
मेरा कटा बाजू पड़ा है
और हैवानियत क़र्ज़ख्वाह* सी
चिखती रही सीढियों से .......

आज फ़िर शब्दों ने
अपने आप को
क़त्ल किया है ....
कुछ सच्चाइयाँ नग्न खडी थीं
पर लफ़्ज़ों ने यूँ परदा डाला
के बदन ....
हैरत की गठरी बन गया ...

ज़ज्बात ...
भीगते रहे बूंदों में
वजूद मिट्टी के बर्तन सा
तिड़कता गया
बस .....
दर्द मुस्काता रहा आंखों में
तसल्ली देता रहा
देख कलाइयों को
जहाँ लहू का एक कतरा
अपना तवाजुन *
खो बैठा था ....

वह तुम्हीं तो थे
जो दर्द में भी
तहजीब सिखलाते रहे थे जीने की
पर खुदा से दुआ मांगते वक्त
वह तेरा नाम ही था
जो गिर गया था
हाथों से ....!!!

जाइर - अत्याचारी
कर्जख्वाह -ऋण इच्छुक
तवाजुन -संतुलन

Wednesday, August 26, 2009

उसने कहा है अगले जन्म में तू फ़िर आएगी मोहब्बत का फूल लिए .....(जन्मदिन मुबारक हो अमृता)

उसने कहा है अगले जन्म में तू फ़िर आएगी मोहब्बत का फूल लिए .....(जन्मदिन मुबारक हो अमृता)

कांटेदार झाड़ियों में उगा दर्द का फूल थी ....जो ताउम्र गैरों के टूटे परों को अपने आँचल में समेटती रही .....चूड़ियाँ टूटतीं ...तो वह दर्द की गवाही बन खड़ी हो जाती ....दर्द की शिद्दत कोई तभी समझ सकता है जब वह अपने बदन पर उसे झेलता है ....वह तो दर्द की ही मिट्टी से पैदा हुई थी ....रूह, ज़िस्म से हक़ मांगती तो वह चल पड़ती कलम लेकर ....और तमाम दर्द एक कागज़ के पुलिंदे में लपेट कर सिगरेट सा पी जाती ....और जब राख़ झाड़ती तो दर्द की कई सतरें कब्रों में उग आतीं ....उन्हीं कब्रों से कुछ सतरें उठाकर लाई हूँ आज के दिन ......


रा ....
बहुत
गहरी बीत चुकी है
मैं हाथों में कलम लिए
मग्मूम सी बैठी हूँ ....
जाने क्यूँ ....
हर साल ...
यह तारीख़
यूँ ही ...
सालती है मुझे.....


पर तू तो ...
खुदा की इक इबारत थी
जिसे पढ़ना ...
अपने आपको
एक सुकून देना है ...


अँधेरे मन में ...
बहुत कुछ तिड़कता है
मन की दीवारें
नाखून कुरेदती हैं तो...
बहुत सा गर्म लावा
रिसने लगता है ...

सामने देखती हूँ
तेरे दर्द की ...
बहुत सी कब्रें...
खुली पड़ी हैं...
मैं हाथ में शमा लिए
हर कब्र की ...
परिक्रमा करने लगती हूँ ....

अचानक
सारा के खतों पर
निगाह पड़ती है....
वही सारा ....
जो कैद की कड़ियाँ खोलते-खोलते
कई बार मरी थी .....
जिसकी झाँझरें कई बार
तेरी गोद में टूटी थीं ......
और हर बार तू
उन्हें जोड़ने की...
नाकाम कोशिश करती.....
पर एक दिन
टूट कर...
बिखर गयी वो ....

मैं एक ख़त उठा लेती हूँ
और पढने लगती हूँ .......
"मेरे बदन पे कभी परिंदे नहीं चहचहाये
मेरी सांसों का सूरज डूब रहा है
मैं आँखों में चिन दी गई हूँ ...."

आह.....!!
कैसे जंजीरों ने चिरागों तले
मुजरा किया होगा भला ....??
एक ठहरी हुई
गर्द आलूदा साँस से तो
अच्छा था .....
वो टूट गयी .......

पर उसके टूटने से
किस्से यहीं
खत्म नहीं हो जाते अमृता ...
जाने और कितनी सारायें हैं
जिनके खिलौने टूट कर
उनके ही पैरों में चुभते रहे हैं ...

मन भारी सा हो गया है
मैं उठ कर खिड़की पर जा खड़ी हुई हूँ
कुछ फांसले पर कोई खड़ा है ....
शायद साहिर है .. .....
नहीं ... नहीं ...... .
यह तो इमरोज़ है .....
हाँ इमरोज़ ही तो है .....
कितने रंग लिए बैठा है . ...
स्याह रात को ...
मोहब्बत के रंग में रंगता
आज तेरे जन्मदिन पर
एक कतरन सुख की
तेरी झोली डाल रहा है .....

कुछ कतरने और भी हैं
जिन्हें सी कर तू
अपनी नज्मों में पिरो लेती है
अपने तमाम दर्द .... ...

जब मरघट की राख़
प्रेम की गवाही मांगती है
तो तू...
रख देती है
अपने तमाम दर्द
उसके कंधे पर ...
हमेशा-हमेशा के लिए ....
कई जन्मों के लिए .....

तभी तो इमरोज़ कहते हैं ....
तू मरी ही कहाँ है ....
तू तो जिंदा है .....
उसके सीने में....
उसकी यादों में .....
उसकी साँसों में .....
और अब तो ....
उसकी नज्मों में भी...
तू आने लगी है ....

उसने कहा है ....
अगले जन्म में
तू फ़िर आएगी ....
मोहब्बत का फूल लिए ....
जरुर आना अमृता
इमरोज़ जैसा दीवाना
कोई हुआ है भला ......!!

"जन्मदिन मुबारक हो अमृता"

Friday, August 21, 2009

तलाश ......

क्सर सोचती हूँ
खुद को बहलाती हूँ
कि शायद....
छुटे हुए कुछ पल
दोबारा जन्म ले लें ....

दुःख, अपमान,क्षोभ और हार
एहसासों भरे निष्कासन का द्वंद
नाउम्मीदी के बाद भी
आहिस्ता-आहिस्ता बनाते हैं
संभावनाओं के मंजर .....

पिघलते दिल के दरिया में
इक अक्स उभरता है
किसी अदृश्य और अनंत स्रोत से बंधा
इक जुगनुआयी आस का
टिमटिमाता दिया ......

बेचैन उलझनों की गिरफ्त
प्रतिपल भीतर तक धंसी
उम्मीदों को
बचाने की नाकाम कोशिश में
टकरा-टकरा जातीं हैं
एक बिन्दु से दुसरे बिन्दु तक ......

तभी.....
वादियों से आती है इक अरदास
सहेज जाती है
मेरे पैरों के निशानात
बाँहों में लेकर रखती है
ज़ख्मों पर फाहे
सहलाती है खुरंड
आहात मन की कुरेदन
तलाशने लगती है
श्मशानी रख में
दबी मुस्कान.......!!

Friday, August 14, 2009

धुआं - धुआं है आसमां ........

न तीर चाहिए ,न तमंचे चाहिए ,न तलवारें चाहिए

न मन्दिर चाहिए ,न मस्जिद चाहिए ,न गुरुद्वारे चाहिए

खिल सकें जहाँ हर मज़हब के फूल

हमें तो ऐसा अपना ये गुलज़ार - ऐ - वतन चाहिए


...........जय हिंद ............


आप सब को स्वतंत्रता दिवस की बहुत- बहुत बधाई .....आज यहाँ गुवाहाटी दूरदर्शन में स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष में एक काव्य -गोष्ठी का आयोजन किया गया ....जिसमें गुवाहाटी के ही ग्यारह जाने -माने कवियों ने भाग लिया .....और इसका संचालन किया एफ. एम. रेडियो के एंकर कबीर जी ने .....जिनके शब्दों की जादूगरी ने इस गोष्ठी को चार चाँद लगा दिए ....इस नाचीज़ को भी मौका मिला इस काव्य - गोष्ठी में भाग लेने का ....प्रस्तुत है वो नज़्म ......"धुआं - धुआं है आसमां ....."


धुआं - धुआं है आसमां .....


लुटी-लुटी हैं सरहदें

धुआं - धुआं है आसमां

डरी - डरी हैं बस्तियां

डरा-डरा सा है समां


फूल दीखते नहीं किसी शजर पे

ज़ख्म उगे हैं हर शाख़ पे

ये कैसी जमीं है जहां

उगती हैं फसल के बदले गोलियाँ

डरी-डरी है .............


सहमी-सहमी सी है सबा

चाँद का भी रंग उड़ा

ये कौन लिए जा रहा है

मेरे शहर की रौशनियाँ

डरी- डरी हैं...........


धमकी , धमाके , लूट ,कत्ल ,अपहरण

है चारो ओर अम्नो-चैन की बर्बादियाँ

बेखौफ फिरते हैं आतताई लिए हाथों में खंजर

है मेरे हाथों में खूं से सनी रोटियाँ

डरी-डरी हैं.............


ज़र , ज़मीं , मज़हब, सिहासत , मस्लहत

इन मजहबों के झगड़े में

खुदा भी हुआ है लहू-लुहाँ

बता मैं कैसे मनाऊँ

ज़श्ने-आज़ादी ऐ 'हक़ीर '

रोता है दिल देख ...

उन लुटे घरों की तन्हाईयाँ

डरी- डरी हैं ............

लुटी-लुटी हैं ............!!!

Thursday, August 6, 2009

ये नज्में ........

" ये नज्में " .....लुढ़कते पत्थरों को मौसम देतीं ये नज्में ....जैसे खामोशी का लफ्ज़ बन जातीं हैं .....ठहरे हुए पानी में फेंका गया एक पत्थर अपने दायरे में उठी लहरों में अपनी किस्मत की कहानी कहता है ...और वो पत्थर जुबां बन जाता है ......पत्थरों की जुबां ....खामोशी की जुबां .....लाशों की जुबां ...कुछ ऐसे शब्द जो हमारे भीतर बरसों से मुर्दा पड़े हैं .......इन नज्मों के रूप में जन्म लेते हैं ......इसी नज़्म को मैंने परिभाषित करने की कोशिस की है इन क्षणिकाओं में ......

ये नज्में ...........

(१)

ज़िन्दगी इक ज़हर थी

जिसमें खुद को घोलकर

इन नज्मों ने

हर रोज़ पिया है

जिसका रंग

जिसका स्वाद

इसके अक्षरों में

सुलगता है

(२)

ज़ख्मों पर

उभर आए थे कुछ खुरंड

जिन्हें ये हर रोज़

एक-एक कर

उतारती हैं

(३)

इक हँसी

जो बरसों से कैद थी

ताबूत के अन्दर

उसका ये मांगती हैं

मुआवजा

(४)

कटघरे में खड़ी हैं

कई सवालों के साथ

के बरसों से सीने में दबी

मोहब्बत ने

खुदकशी क्यों की ....??

(५)

कुछ फूल थे गजरे के

जो आँधियों से बिखर गए थे

उन्हें ये हर रोज़

एक-एक कर चुनती हैं

(६)

शाख़ से झड़े हुए पत्तों का

शदीद दर्द है

जो वक्त- बे -वक्त

मुस्कुरा उठता है

चोट खाकर

( शदीद -तेज )

(७)

उन कहकहों का उबाल हैं

जो चीखें नंगे पाँव दौड़ी हैं

कब्रों की ओर

(८)

इक वहशत जो

बर्दाश्त से परे थी

इन लफ्ज़ों में

घूंघट काढे बैठी है

(९)

खामोशी का लफ्ज़ हैं

जो चुपके-चुपके

बहाते हैं आंसू

ख्वाहिशों का

कफ़न ओढे

१०)

जब-जब कैद में

कुछ लफ्ज़ फड़फड़ाते हैं

कुछ कतरे लहू के

सफहों पर

टपक उठते हैं

(११)

ये नज्में .....

उम्मीद हैं ....

दास्तां हैं ....

दर्द हैं .....

हँसी हैं ....

सज़दा हैं .....

दीन हैं .....

मज़हब हैं ....

ईमान हैं ....

खुदा .....

और ....

मोहब्बत का जाम भी हैं ....!!