Friday, September 11, 2009

वह तेरा नाम ही था जो गिर गया था हाथों से ......

तुम पढना मेरी मौत के बाद मेरी ख़ामोशी को ....के नज्मों ने आखिरी साँस ली है ....तुम रखना अपने लफ़्ज़ों की खुरदरी ज़मीं अपने साथ ....के मोहब्बत ने आखिरी साँस ली है ......कहते हैं....
इश्क़ जिनके खून में बसता है
उनके नसीब खारों से सजे होते हैं .....



आज फ़िर
रात के साये बहुत गहरे हैं
मन की तहों में छिपी
बेपनाह मोहब्बत ....
अपने आप को क़त्ल करती
खामोश हो गई है....

आँखें ....
एक गहरी साँस लेती हैं
इक खामोश आवाज़
कट कर गिरती है
पंखे से.....

रब्बा....!
मैं तुलसी के नीचे
जलते दीये सी पाक़
कितनी खोखली हो गई हूँ आज
कि अब ....
इन बनते- बिगड़ते लफ़्जों में
अपने ही जन्म का पल
बेमानी लगने लगा है ...

आह....!
न जाने क्यों यह परिंदा
रोता है रातों में ....
कहीं यह भी किसी जाइर* रूह से
घायल तो नहीं ....?

सामने कागज़ पर
मेरा कटा बाजू पड़ा है
और हैवानियत क़र्ज़ख्वाह* सी
चिखती रही सीढियों से .......

आज फ़िर शब्दों ने
अपने आप को
क़त्ल किया है ....
कुछ सच्चाइयाँ नग्न खडी थीं
पर लफ़्ज़ों ने यूँ परदा डाला
के बदन ....
हैरत की गठरी बन गया ...

ज़ज्बात ...
भीगते रहे बूंदों में
वजूद मिट्टी के बर्तन सा
तिड़कता गया
बस .....
दर्द मुस्काता रहा आंखों में
तसल्ली देता रहा
देख कलाइयों को
जहाँ लहू का एक कतरा
अपना तवाजुन *
खो बैठा था ....

वह तुम्हीं तो थे
जो दर्द में भी
तहजीब सिखलाते रहे थे जीने की
पर खुदा से दुआ मांगते वक्त
वह तेरा नाम ही था
जो गिर गया था
हाथों से ....!!!

जाइर - अत्याचारी
कर्जख्वाह -ऋण इच्छुक
तवाजुन -संतुलन

72 comments:

Dr. Shreesh K. Pathak said...

वह तुम्हीं तो थे
जो दर्द में भी
तहजीब सिखलाते रहे थे जीने की
पर खुदा से दुआ मांगते वक्त
वह तेरा नाम ही था
जो गिर गया था
हाथों से ....!!!



यकीनन, उम्दा ...भाव-संप्रेषण की आपकी शक्ति को प्रणाम...

Meenu Khare said...

वह तुम्हीं तो थे
जो दर्द में भी
तहजीब सिखलाते रहे थे जीने की
पर खुदा से दुआ मांगते वक्त
वह तेरा नाम ही था
जो गिर गया था
हाथों से ....!!!

निसन्देह उत्कृष्ट. हरकीरत जी आपकी कविताओं से अमृता जी झाँकती सी लगती हैं...

शुभकामनाएँ.

--
मीनू खरे

MANVINDER BHIMBER said...

ज़ज्बात ...
भीगते रहे बूंदों में
वजूद मिट्टी के बर्तन सा
तिड़कने गया
बस .....
दर्द मुस्काता रहा आंखों में
तसल्ली देता रहा
देख कलाइयों को
जहाँ लहू का एक कतरा
अपना तवाजुन
खो बैठा था ....उम्दा

अपूर्व said...

रब्बा....!
मैं तुलसी के नीचे
जलते दीये सी पाक़
कितनी खोखली हो गई हूँ आज
कि अब ....
इन बनते- बिगड़ते लफ़्जों में
अपने ही जन्म का पल
बेमानी लगने लगा है ...

आपकी कलम मे एक दश्त की अनजानी सी बेचैन करती खुशबू सी है हरकीरत जी..अमृता प्रीतम की poetry याद आ गयी..
बधाई

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत ही नायाब रचना, जैसे हीरे मोती जड दिये हों. बहुत शुभकामनाएं.

रामराम.

"अर्श" said...

uffffffffffffffffffffffffffffffffffffffffffffffffffffffffffffffffffffffffffffffffffffffffffffffff

केतन said...

वह तेरा नाम ही था
जो गिर गया था
हाथों से ...


in misron ne jane kya keh diya.. behad badiya ma'am..

अमिताभ मीत said...

ज़ज्बात ...
भीगते रहे बूंदों में
वजूद मिट्टी के बर्तन सा
तिड़कता गया
बस .....
दर्द मुस्काता रहा आंखों में
तसल्ली देता रहा

अच्छा है ....

Mithilesh dubey said...

आह....!
न जाने क्यों यह परिंदा
रोता है रातों में ....
कहीं यह भी किसी वहशतजदा
रूह का कज़्फ़ * तो नहीं ....?

क्या बात है बहुत खुब। गजब की अभिव्यक्ति दिखी आपकी इस रचना में। बधाई.....

अनिल कान्त said...

यह रचना मुझे अनमोल जान पड़ती है...हर शब्द में एहसास, और जिंदगी का सफ़र झलकता है....मेरा आपकी लेखनी को सलाम

दिगम्बर नासवा said...

आज फ़िर शब्दों ने
अपने आप को
क़त्ल किया है ....
कुछ सच्चाइयां नग्न खडी थीं
पर वहशत ने यूँ परदा डाला
के बदन ....
हैरत की गठरी बन गया ...

stabdh hun aapki rachna padh kar .... lagta hai mujhe bhi shbdon ka akaal padh gaya hai .... aapki rachna sedhe dil mein utar gayee....

RAJESHWAR VASHISTHA said...

अत्यंत मर्मस्पर्शी रचना के ज़रिए आपसे मिलना बहुत अच्छा लगा....

Anonymous said...

बढ़िया अंदाज उम्दा रचना . आभार

रश्मि प्रभा... said...

आह....!
न जाने क्यों यह परिंदा
रोता है रातों में ....
कहीं यह भी किसी वहशतजदा
रूह का कज़्फ़ * तो नहीं ....?
.......
kin panktiyon ko rekhankit karun,kise chhod dun,isi udhedbun me rahi....kalam aapki, bhawnayen bahuton ki

राज भाटिय़ा said...

वाह क्या बात है एक एक शव्द आप ने इस तरह पिरोया कि हर शव्द अपना ही मान रखता है इस कविता का.
धन्यवाद

vikram7 said...

आज फ़िर
रात के साये बहुत गहरे हैं
मन की तहों में छिपी
बेपनाह मोहब्बत ....
अपने आप को क़त्ल करती
खामोश हो गई है....

मैं तुलसी के नीचे
जलते दीये सी पाक़
कितनी खोखली हो गई हूँ आज

अति सुन्दर अभिव्यक्ति

Admin said...

हर लफ्ज़ से निकला एक तीर
और सीधे सीने में जा लगा..

बहुत उम्दा रचना...

और हाँ! उम्र इतनी भी कमसिन नहीं है जालिम की

Chandan Kumar Jha said...

बहुत ही सुन्दर रचना ।

आनन्द वर्धन ओझा said...

हरकीरत जी,
एक और उम्दा नज़्म ! आपके लफ्जों में बड़ी नफासत है, बयान ऐसा की तीर की तरह कलेजे तक जा ओअहुचता है :
'आज फ़िर शब्दों ने
अपने आप को
क़त्ल किया है ....
कुछ सच्चाइयां नग्न खडी थीं
पर वहशत ने यूँ परदा डाला
के बदन ....
हैरत की गठरी बन गया ...'
वल्लाह ! बहुत कुछ अनकहा कहा है आपने ! बधाइयाँ !!

neera said...

वह तुम्हीं तो थे
जो दर्द में भी
तहजीब सिखलाते रहे थे जीने की
पर खुदा से दुआ मांगते वक्त
वह तेरा नाम ही था
जो गिर गया था
हाथों से ....!!!

वाह! क्या बात है!कमाल की रचना है!

Yogesh Verma Swapn said...

वह तुम्हीं तो थे
जो दर्द में भी
तहजीब सिखलाते रहे थे जीने की
पर खुदा से दुआ मांगते वक्त
वह तेरा नाम ही था
जो गिर गया था
हाथों से ....!!!

behatareen. umda. badhaai.

वाणी गीत said...

वह तेरा नाम ही था जो गिर गया हाथों से ...बहुत उम्दा ...बहुत बढ़िया ..!!

Udan Tashtari said...

दिल के भीतर कहीं गहरे उतर गई आपकी रचना.

अद्भुत!!!

संजय तिवारी said...

आपकी लेखनशैली का कायल हूँ. बधाई.

सर्वत एम० said...

दर्द और हरकीरत, नज्म और हरकीरत, एहसास और हरकीरत और जाने क्या क्या......अच्छा लिखने वालों की कमी तो है लेकिन एक बेहतर रचनाकार सवा लाख पर भारी होता है. हरकीरत, इस नज्म को खुद १० बार ध्यान से पढना, शायद टर्निंग पॉइंट आ गया है. मुबारकां.

डिम्पल मल्होत्रा said...

वह तुम्हीं तो थे
जो दर्द में भी
तहजीब सिखलाते रहे थे जीने की
पर खुदा से दुआ मांगते वक्त
वह तेरा नाम ही था
जो गिर गया था
हाथों से ....!!!ultimate...

प्रिया said...

ek utkarash lekhan ke or badhte in kadmo ko hamara salaam

vandan gupta said...

आज फ़िर
रात के साये बहुत गहरे हैं
मन की तहों में छिपी
बेपनाह मोहब्बत ....
अपने आप को क़त्ल करती
खामोश हो गई है....

umda.........behtreen,shabd chote pad rahe hon jahan.ek utkrisht rachna.

read my new blog--http://ekprayas-vandana.blogspot.com

Mishra Pankaj said...

आँखें ....
एक गहरी साँस लेती हैं
इक खामोश आवाज़
कट कर गिरती है
पंखे से.

bahoot khoob

ओम आर्य said...

वह तुम्हीं तो थे
जो दर्द में भी
तहजीब सिखलाते रहे थे जीने की
पर खुदा से दुआ मांगते वक्त
वह तेरा नाम ही था
जो गिर गया था
हाथों से ....!!!

WAAH BAHUT HI KHUB .........YAH SACH LAGATA HAI .......WAH TUMAHRA HI NAAM THA JO GIR GAYA THA HATHO SE .........BAHUT KHUB

रंजू भाटिया said...

वह तुम्हीं तो थे
जो दर्द में भी
तहजीब सिखलाते रहे थे जीने की
पर खुदा से दुआ मांगते वक्त
वह तेरा नाम ही था
जो गिर गया था
हाथों से ....!!!

बेहतरीन बहुत ही बढ़िया पसंद आई आपकी यह रचना ...लाजवाब कर दिया इस ने शुक्रिया

हें प्रभु यह तेरापंथ said...

बढ़िया अंदाज उम्दा रचना . आभार
♥♥♥♥♥♥
रामप्यारीजी से एक्सक्लुजीव बातचीत
Mumbai Tiger
हे! प्रभु यह तेरापन्थ

सुभाष नीरव said...

हरकीरत जी, कम्प्यूटर की प्रॉब्लम के चलते काफी दिनों बाद आपके ब्लॉग पर आया। आपकी यह नज्म दिल को छू गई। बहुत उम्दा कहा है आपने।

daanish said...

पर खुदा से दुआ मांगते वक्त
वह तेरा नाम ही था
जो गिर गया था
हाथों से ....!!!

इस एहसास के बाद
अल्फाज़ के कया मा`ने रह जाते हैं भला !?!

---मुफलिस---

सुशील छौक्कर said...

हर शब्द बहुत कुछ कहता हुआ। सच आपकी लेखनी का जवाब नही। हमेशा की तरह एक अनमोल रचना। आपकी रचनाएं पढकर मुझे शब्द नही मिलते। बहुत बहुत बेहतरीन रचना।

Anonymous said...

पढ़कर भावुक हो गया हूँ . धन्यवाद

dhiru singh { धीरेन्द्र वीर सिंह } said...

बेहतरीन बहुत बेहतरीन रचना

Vinay said...

वाह कितनी बेहतरीन रचना है

प्रसन्नवदन चतुर्वेदी 'अनघ' said...

"मन की तहों में छिपी
बेपनाह मोहब्बत ....
अपने आप को क़त्ल करती
खामोश हो गई है"
इन पंक्तियों का जवाब नहीं......
"न जाने क्यों यह परिंदा
रोता है रातों में ....
कहीं यह भी किसी वहशतजदा
रूह का कज़्फ़ तो नहीं"
हरकीरत जी,इस बार भाव-संप्रेषण और रचना दोनों ही कमाल के हैं...बहुत बहुत बधाई...

Anonymous said...

यकीनन... बेहद उम्दा...

M VERMA said...

पर खुदा से दुआ मांगते वक्त
वह तेरा नाम ही था
जो गिर गया था
हाथों से ....!!!
बहुत खूबसूरत -- मन को भिगो देने वाली रचना.

جسوندر سنگھ JASWINDER SINGH said...

ਸਾਰੇ ਟਿੱਪਣੀਕਾਰਾਂ ਨਾਲ਼ ਸਹਿਮਤ ਹਾਂ ਜੀ
ਬੇਹੱਦ ਖੂਬਸੂਰਤ ਰਚਨਾ

गौतम राजऋषि said...

"दर्द मुस्काता रहा आंखों में / तसल्ली देता रहा
देख कलाइयों को / जहाँ लहू का एक कतरा
अपना तवाजुन खो बैठा था ...."

अर्श ने मेरा उफ़्फ़्फ़ चुरा लिया है!!!

निर्मला कपिला said...

ज़ज्बात ...
भीगते रहे बूंदों में
वजूद मिट्टी के बर्तन सा
तिड़कता गया
बस .....
दर्द मुस्काता रहा आंखों में
तसल्ली देता रहा
देख कलाइयों को
जहाँ लहू का एक कतरा
अपना तवाजुन *
खो बैठा था ....
मुझे नहीं लगता कि इसके आगे भी जज़्वातों का कोई और मुकाम होगा आपकी रचना एक बार नहीं बार बार पढती हूँ और डूब जाती हूँ शाय्द खुद जज़्वातों को भी नहीम पता होगा अपनी गहराई काापके रोम रोम मे बस जज़्वात हैं जज़्वात लाजवाब बधाई इस रचना के लिये

सदा said...

वह तुम्हीं तो थे
जो दर्द में भी
तहजीब सिखलाते रहे थे जीने की
पर खुदा से दुआ मांगते वक्त
वह तेरा नाम ही था
जो गिर गया था
हाथों से ..

बहुत ही लाजवाब प्रस्‍तुति, बधाई

ritu raj said...

रब्बा....!
मैं तुलसी के नीचे
जलते दीये सी पाक़
कितनी खोखली हो गई हूँ आज
कि अब ....

Ek kisse ki kahaniyaa hai to kahi ek kahani ek kai kisse hai. "Jalte diye si paq...". uff kitna to kuchh kaha hai aapne. Rabba..Rabaa.

डॉ .अनुराग said...

जब आप इस मूड में होती है .तो ऐसा लगता है दर्द को कागजो में सी देती है ...वाह कहूँ के इस दर्द को महसूस करूँ ..शुरू की कुछ लाइने कातिलाना है .....ओर हाँ पिछले दिनों आपका जन्म दिन खामोशी से गुजर गया ....उसकी देर से मुबारकबाद दे रहा हूँ ....

के सी said...

बहुत दिनों बाद इस दिल को छू लेने वाली नज़्म से बार बार गुजरा हूँ. शब्द हैं जो कुछ पूछते हैं और कुछ रंगीन उदासियां बांटते हैं. बहुत उम्दा...

Betuke Khyal said...

Thanks for your comment on my blog...

you have got such a big fan following... iski wajah ye hai ki umdaa likhna aapki aadat hai...

1 interesting baat ye hai ki aap नग्न jaisi sanskritised hindi aur कज़्फ़ jaise lafzon ka 1 hi poem me itni khoobsoorati se prayog karti hain..

ek aur baat ye ki aapki poem me वहशत lafz kai (3) baar aaya hai. mujhe lagta hai ki kisi poem me ek hi lafz (aur aapki poem me ye lafz bahut mani-khez hai) ka itne baar aana theek nahin, shayad kisi synonymous word ko use karti yahan par aap to behtar hota...

Aur haan is poem me romance, muhabbat ki shiddat bhi hai aur ek Tees bhi... ye bhi aap ka 1 hunar jaan padta hai

Kajal Kumar said...

सुंदर अभिव्यक्ति.

शरद कोकास said...

अच्छी रचना है इसका आनन्द लिया जा सकता है । पीड़ा का सुख ??? लेकिन इसमे लोग अम्रता को क्यों ढूंढ रहे हैं ? यह तो नही होना चाहिये । विस्तार से बात करेंगी कभी इस पर ?

Murari Pareek said...

इतना असर क्यूं छोड़ती है आपकी नज्म की रोम खड़े हो जाते है इतनी ग़ज़ब की लिखाई !! कमाल है आपकी लेखनी में !!

राकेश जैन said...

umda se umda,

प्रकाश पाखी said...

मैं तुलसी के नीचे
जलते दीये सी पाक़
कितनी खोखली हो गई हूँ आज
कि अब ....
इन बनते- बिगड़ते लफ़्जों में
अपने ही जन्म का पल
बेमानी लगने लगा है ...
आपकी रचनाओं में गीता के श्लोको कि तरह गहनता है....मैं आपकी कविताओं को बार बार पढता हूँ और पाता हूँ हर बार एक नया अर्थ शब्दों में कहीं छुपा...

Satish Saxena said...

"आ चल चलें कहीं दिल को बहलाने
जरुरी है हर ज़ख्म को खुला रखना"

आपकी संवेदनशीलता को प्रणाम !!

प्रदीप कांत said...

वह तुम्हीं तो थे
जो दर्द में भी
तहजीब सिखलाते रहे थे जीने की
पर खुदा से दुआ मांगते वक्त
वह तेरा नाम ही था
जो गिर गया था
हाथों से ....!!!

डा0 हेमंत कुमार ♠ Dr Hemant Kumar said...

आज फ़िर शब्दों ने
अपने आप को
क़त्ल किया है ....
कुछ सच्चाइयां नग्न खडी थीं
पर वहशत ने यूँ परदा डाला
के बदन ....
हैरत की गठरी बन गया ...

हरकीरत जी,
आपकी यह यथार्थपरक रचना बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर देती है ।बेहतरीन अभिव्यक्ति।
हेमन्त कुमार

लोकेन्द्र विक्रम सिंह said...

Essssssssssssssssssssssss......
इसके सिवा कुछ निकला ही नही मुह से............

प्रसन्नवदन चतुर्वेदी 'अनघ' said...

मैनें अपने सभी ब्लागों जैसे ‘मेरी ग़ज़ल’,‘मेरे गीत’ और ‘रोमांटिक रचनाएं’ को एक ही ब्लाग "मेरी ग़ज़लें,मेरे गीत/प्रसन्नवदन चतुर्वेदी "में पिरो दिया है।
आप का स्वागत है...

Manav Mehta 'मन' said...

bahut umda likha hai harkirat g....sahbdon ka tana-bana bahut hi badiya tarike se buna hai aapne....
itni sundar rachna k liye bdhaai...

सुशील कुमार जोशी said...

बहुत गहराई है !

Akanksha Yadav said...

Umda bhav...sahaj sampreshan..badhai !!

शारदीय नवरात्र की हार्दिक शुभकामनायें !!

हमारे नए ब्लॉग "उत्सव के रंग" पर आपका स्वागत है. अपनी प्रतिक्रियाओं से हमारा हौसला बढायें तो ख़ुशी होगी.

देवेन्द्र पाण्डेय said...

अनायास आज पहली बार आपके ब्लाग में आ गया
उम्मीद न थी कि इतनी अच्छी नज्म पढ़ने को मिलेगी
हर लफ्ज सुन्दर हर बात गहरी
निगाहें हमारी इसी पर हैं ठहरी
--देवेन्द्र पाण्डेय।

Asha Joglekar said...

BAHUT DINO BAD AAEE AAPKE BLOG PAR. HAMESHA EK PEEDA KA BHAW AAPKE MANME KYUN RAHATA HAI MANA KI JINDAGI BAHUT DUKH DETEE HAI PAR SUKH KE KUCH ANMOL PAL BEE TO HAIN USAME.

शोभना चौरे said...

आँखें ....
एक गहरी साँस लेती हैं
इक खामोश आवाज़
कट कर गिरती है
पंखे
ankho ka san lena jidgi de gya
bahut khoob.
aavaj ki khamoshi juba de gai .
abhar

पूनम श्रीवास्तव said...

रब्बा....!
मैं तुलसी के नीचे
जलते दीये सी पाक़
कितनी खोखली हो गई हूँ आज
कि अब ....
इन बनते- बिगड़ते लफ़्जों में
अपने ही जन्म का पल
बेमानी लगने लगा है ...

हरकीरत जी,
पता नहीं क्यों आपकी रचनायें पढ़ते वक्त मन एक्दम ठहर सा जाता है--दिल की हर धड़कन आपकी कविताओं में खो सी जाती है।-----
पूनम

रंजीत/ Ranjit said...

उत्कृष्ट कविता। कविता-ही-कविता।

Unknown said...

iss umda rachan ki badhayee ho

दर्पण साह said...

बेपनाह मोहब्बत ....
अपने आप को क़त्ल करती
खामोश हो गई है....
ye sucide bahut bhaya !!

न जाने क्यों यह परिंदा
रोता है रातों में ....
कहीं यह भी किसी वहशतजदा
रूह का कज़्फ़ * तो नहीं ....?

wo to niche arth de diya nahi to ise samjhana duruh tha oar jab samjhe to accha laga !!

वह तुम्हीं तो थे
जो दर्द में भी
तहजीब सिखलाते रहे थे जीने की
पर खुदा से दुआ मांगते वक्त
वह तेरा नाम ही था
जो गिर गया था
हाथों से ....!!!
ye patapeksha accha raha !!

kavita bahut bhai !!

abdul hai said...

आज फ़िर
रात के साये बहुत गहरे हैं
मन की तहों में छिपी
बेपनाह मोहब्बत ....
अपने आप को क़त्ल करती
खामोश हो गई है....

Bahut hi umda

You are welcome to my blog

मनोज भारती said...

वह तुम्हीं तो थे
जो दर्द में भी
तहजीब सिखलाते रहे थे जीने की
पर खुदा से दुआ मांगते वक्त
वह तेरा नाम ही था
जो गिर गया था
हाथों से ....!!!

क्या खूब ब्यां किया है
दर्द और रिश्तों को
सच में तहजीब नहीं
दर्द को सांझा कर सके
'गर हम तो
खुदा से दुआ मांगते वक्त
नाम कभी उनका गिरे नहीं
हाथों से... जुबां से ... मन से ...आत्मा से

सुंदर अभिव्यक्ति !!!

Kanushrijoglekar said...

bahut sundar harkirat ji; dil ki gahrai tak utarti hui kavitaye. sach kahun to shabd kam pad jate hai aisi bhavabhivyakti ke liye. sadhuwad........kunda joglekar