Wednesday, June 24, 2009

मैं तेरा दीवाना हूँ......

मीरा ने कहा था ...' हे री मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दर्द न जाने कोय ' ....अगर मैं ये कहूँ ....' हे री मैं तो दर्द दीवानी मेरा प्रेम न जाने कोय ' तो अतिशयोक्ति न होगी ....मुझे दर्द से कोई गिला शिकवा नहीं ....सच कहूँ तो अब इन्हीं से इश्क सा हो गया है और इसे मुझसे ...ये मेरे हमराज , हमसाया ,हमसफ़र ,हमदर्द सब हैं ...कृपया मुझे इनसे अलग होकर लिखने के लिए न कहें .......और एक बात मैंने ब्लॉग बंद करने की बात इसलिए भी की थी कि मुझे समय बहोत कम मिल पाता है ...और काम बहुत पड़ा है ....पर आप सब ने जाने नहीं दिया .... अब मुझे पोस्ट की समय सीमा तो बढाने की इजाजत है ना ....? .... इस नए टैम्पलेट के साथ कुछ क्षणिकाएं पेश हैं .....उम्मीद है इस बार आप निराश नहीं होंगे .......

(1)

तोहफ़ा

रात आसमां कुछ सितारे

झोली में भर कर ले आया

मैंने कहा ......

मेरा सितारा तो मेरे पास है

वह बोला ......

पर वो तुझे रौशनी नहीं देता

ये तुझे रौशनी भी देंगे ,

और रास्ता भी ....

मैंने पूछा कौन हैं ये ....?

तेरी नज्मों के दीवाने

वो मुस्कुराया ......!!

(२)

साथी

कुछ लफ्ज़ कमरे में

इधर-उधर बिखरे पड़े थे

मैंने छूकर देखा ....

सभी दम तोड़ चुके थे

सिर्फ़ एक लफ्ज़ जिंदा था

मैंने उसे पलट कर देखा

वह ' दर्द ' था .....

मैंने उसे उठाया

और सीने से लगा लिया .....!!

(३)

दर्द का शिकवा

वह इक कोने में बैठा

सिसक रहा था ....

मैंने पूछा .....

' क्यों रो रहे हो साथी ....? '

वह बोला ......

वे तुम्हें मुझसे

छीन लेना चाहते हैं .....!!

(४)

दीवाना

वह झुक कर

धीमें से बोला .....

मैं तेरा दीवाना हूँ ' हक़ीर '

और मेरे लबों को चूम लिया

मैंने पलकें खोलीं तो देखा

वह दर्द था .......!!!

Monday, June 22, 2009

इस दर्द को कैसे अलग करूँ ....!!

मन आहत है और कुछ बेचैन भी .....मुझे याद है पिछली किसी पोस्ट में डा। अनुराग ने कहा था , 'कवि मन बहुत ही संवेदनशील होता है ' ....पिछली कुछ टिप्पणियों ने मुझे कई बार ब्लॉग बंद करने के ख्याल की ओर कितनी कितनी कितनी अग्रसर किया .....' दर्द का ब्रांड ', ' शब्दों का हूनर ' , संस्कार' जैसे लफ्ज़ कहीं भीतर तक चोट कर गए .....संस्कार......? हुंह ये संस्कार तो बरसों से मेरे घर की दहलीज़ पर बैठे गुनगुना रहे हैं ....न जाने रोज़ कितनी इन संस्कारों की बलि चढ़ जाती होंगी ........ये संस्कार, ये मर्यादाएं ,ये लक्ष्मन रेखाएं क्या पुरुषों के लिए नहीं होती .....सोचती हूँ और सोचते - सोचते ज़िन्दगी के कई सफर तय कर जाती हूँ .....


नहीं ......
इस बार मैं अपने चेहरे का दर्द
नहीं पिरोऊंगी शब्दों में
मैं आईने के पास आ खड़ी होती हूँ
और फिर जोर से हंस पड़ती हूँ
तुझे तो लोगों से सिर्फ सहानुभूति चाहिए
चेहरा पूछता है .....
क्या यही सच्चाई है ...?
तभी आईने में बचपन का एक
डरा , सहमा चेहरा उभर आता है
वह मासूम सी भयभीत खड़ी है
शायद तब वह बलात्कार जैसे शब्द से
परिचित नहीं थी .......
तभी वह शख्स पास आता है ....
देखो .... तुम किसी से कुछ नहीं कहोगी
नहीं कहोगी न....?

हाँ ...!
मैं किसी से कुछ नहीं कहूँगी
मुझे किसी से सहानुभूति नहीं चाहिए
मष्तिष्क में घटनाएँ तेजी से बदलने लगतीं हैं ....
आतिशबाजी ,शोर,धुआं ,चीख जैसे
एक साथ हजारों मिसाइलें सी चलने लगीं हों ....
आँखें खौफ से फ़ैल जाती हैं
एक कंपकंपी पूरे वजूद में सरसरा जाती है
अन्दर का सच नंगा होकर बाहर आना चाहता है
पर यह सब तो संस्कारों के खिलाफ हो जायेगा
ओह .....! ये संस्कार .....! !

सुनो.....
कमजोर और ज़ज्बाती मत बनो
अपने हक के लिए लड़ना सीखो
पर वह खुद जुल्म सहते - सहते
मौत से न लड़ पाई....
वह ब्रेन कैंसर मर गई ...

तभी वह जोर से चिल्लाई .....
हाँ ...मैं डायन हूँ ....
मैं सब को मार डालूंगी ....
खून पी जाउंगी सब का...
लोग उसे डायन कह कर पीट रहे थे
पर वह डायन नहीं थी
वह सदमें से पागल हो गई थी
उसका पति ...
रोज शराब पीकर उसी के सामने
एक नई औरत के साथ सोता था
विरोध किया तो डायन हो गई

मष्तिष्क में फिर अंधाधुंध
गोलियाँ सी चलने लगीं थीं
आँखों में दर्द नाच उठा
पुतलियाँ फ्रिज सी हो गयीं ....
धुआं-धुआं से दृश्य गुम होने लगे
सामने कुछ शब्द बिखरे पड़े थे
हजारों जालों में लिपटे
मैं साफ करने लगती हूँ ....
दीदी है ....
आग में जलती हुई ....
मैं चीखती हूँ, चिल्लाती हूँ , पूछती हूँ ...
' दीदी ऐसा क्यों किया...? '
पर वह मौन है , कुछ नहीं कहती
बिलकुल मौन ,पथराई आँखों में
मेरे सारे सवालों के जवाब बंद हैं

" शब्दों का हूनर " ,
" दर्द का ब्रांड "," संस्कार "
मुझे वो सारी टिप्पणियाँ
स्मरण हो आती हैं ......
सोचती हूँ ....
इस दर्द को ख़ुद से कैसे अलग करूँ
कैसे अलग करूँ ....!!



Monday, June 15, 2009

वजूद तलाशती औरत ...."

कल नई पोस्ट डालनी थी पर इन दिनों व्यस्तता के कारण नया कुछ लिख ही नहीं पाई ....कुछ पिछली पोस्ट में मेरी लेखनी को लेकर विरोधी टिप्पणियाँ भी आयीं ....मैं कुछ देर के लिए नाहक ही परेशां हो गई थी .....हो सकता है उन टिप्पणियों से मैं और बेहतर लिख पाऊँ ......तो इस बार एक पुरानी ही नज़्म पेश कर रही हूँ जो दिसम्बर की हंस में प्रकाशित हो चुकी है ........" वजूद तलाशती औरत ...."


शीशे की दीवारों में कैद
इक मछली
धीरे-धीरे तलाशती है
अपना वजूद
उसके वजूद के बुलबुले
ऊपर उठते हैं
और ऊपर उठकर
दम तोड़ देते हैं


जानी -पहचानी
ये मछली मुझे
हर औरत के चेहरे में
नजर आती
रेगिस्तान में
मृग -मरीचिका सी
भागती-फिरती
नंगी- गीलीं
परछाइयों के बीच
अपने वजूद को तलाशती
सुनहरी,रुपहली
सुंदर मछली ....


एक्वेरियम में
बिछाई गई बजरी
समुंदरी पेड़ - पौधे
लाल,भूरे रंग के
छोटे-बड़े पत्थरों के बीच
गीले सवालों में खड़ी
अपने अस्तित्व को तलाशती
जूते की गिरफ्त में कराहती
किसी तड़पती कोख में
दम तोड़ती
हवा के बंद टुकड़े सी
कमरे में सिसकती
बाज़ारों में अपना
जिस्म नुचवाती
हँसी की कब्र में
उतर जाती है
किसी बिलबिलाते
चेहरे का
निवाला बनने .....


वह नहीं बन पाती
सीता-सावित्री
वह बनती है
खजुराहो की मैथुन मूर्ति
शीशे की दीवारों में कैद
वह आज भी
कटघरे में खड़ी है
न्याय के लिए ...


आज के कवियों की
कविता की तरह
संभोग की पृष्ठभूमि पर टंगी
वह अपना वजूद तलाशती है
शिखर पर पहुँचने का वजूद
स्त्री होने का वजूद
जी भर .......
साँस ले पाने का वजूद.....!!! ।

Sunday, June 7, 2009

जब मैं पैदा हुई .......

आज मन बहुत ही उदास है .....सोचती हूँ क्या औरतें सिर्फ़ दर्द सहने के लिए ही पैदा होती हैं .....पैदा .....?... ।हाँ कई वर्ष पहले ये 'हकीर' भी पैदा हुई थी ...शायद वो इक भयानक रात थी ....और एक बेटे की चाह में तीसरी बेटी .....और वो भी नसीबों जली .......


धुंध के पल्ले में लिपटी
वो इक जालिम रात थी
जब मैं पैदा हुई
वो इक काली रात थी


चीखों से
तड़प उठी थी निर्जनता
हवा सनसनाती
अर्गला रही थी
अचानक मिट्टी की
कोख जली और
इक नार पैदा हुई ....


रंगों में
इक आग सी फ़ैल गई
बुलबुल कीरने* पाने लगी
कब्र में सोये कंकाल
फडफडा उठे ....
और मेरी माँ की आंखों में
एक निराश सी मुस्कुराहट
कांप गई थी ......


जब मैंने आँखें खोलीं
सपनों की पिटारी
जंजीरों में सजी थी
सामने ज़िन्दगी
मुहँ -फाड़े
अपाहिज सी
खड़ी थी ......


इक हौल
छाती में उठा
चाँद ने भी
हौका भरा
और मैं ....
मिट्टी सी
खामोश हो गई ...


वो इक जालिम रात थी
जब मैं पैदा हुई
वो इक काली रात थी ....!!



कीरने - विलाप









Sunday, May 31, 2009

वह लाल दुपट्टा .....

वह लाल दुपट्टा .....


(१)

बरसों पहले
जो तुम
इक धूप का टुकड़ा
मेरे आँगन में
रोप गए थे
अब उसमें
मुहब्बत के बीज
उगने लगे हैं
शायद अबके
नागफनी खिल उठे .......!!


(२)

आज
न जाने क्या बात हुई
छितरे बादल
आवारा टुकडियों में
चाँद से
अटखेलियाँ करते रहे
मैंने रोशनदान से झाँका
रात भी करवट बदल
सोने का बहाना
कर रही थी ......!!


(३)

आज ये
दोपहर की
लम्बी सांसें
न जाने क्यों
उम्मीद के धागे
बुनने लगीं है
रब्बा....!
वह लाल दुपट्टा आज भी कहीं
मेरे पास पड़ा है ....!!

Monday, May 25, 2009

शिलांग की एक साहित्यिक यात्रा ....

सबसे पहले इस बार की पोस्ट में देरी के लिए क्षमा चाहती हूँ ....यहाँ शिलांग में तीन दिन का एक साहित्यिक कार्यक्रम था जिसमें भाग लेने सुअवसर मुझे इन दिनों मिला ....अपनी पुस्तक ' इक दर्द ' के लिए सम्मान-पत्र , कुछ राशि और शाल से मुझे भी सम्मानित किया गया ....जिसकी कुछ तस्वीरें मैं निचे दे रही हूँ ....इस कार्यक्रम की विस्तृत जानकारी मैं फ़िर दूंगी इस समय कंप्यूटर भी साथ नही दे रहा और कुछ तीन दिनों की थकावट भी है ....हाँ चेरापूंजी की यात्रा हमेशा के लिए स्मरणीय रहेगी जिसमें नमिता राकेश , डाक्टर हरीश अरोड़ा व् 'हम साथ साथ' के संपादक किशोर श्रीवास्तव ने अपने गीतों , चुटकुलों यात्रा को इतना मनोरंजक बना दिया कि ८,९ घंटे की लम्बी यात्रा का जरा भी आभास ही नहीं हुआ .......लीजिये पेश हैं वहीं की कुछ तस्वीरें........


शाल व् सम्मान -पत्र लेते हुए

मेरे साथ बैठे हैं मुंबई के गज़लकार सरदार मुजावर और महिला हैं दिल्ली की 'हम साथ साथ हैं ' पत्रिका की संपादिका शशी श्रीवास्तव साथ में उनके पुत्र हैं .


चेरापूंजी की एक गुफा के बाहर

चेरापूंजी की एक ढलान से ऊपर चढ़ते हुए

Saturday, May 16, 2009

कशमकश......

ई बार ज़िन्दगी.... ऐसे मोड़ पे लाकर खड़ा कर देती है .....जहां हम चाह कर भी .....सही निर्णय नहीं ले पाते.....दिल कुछ कहता है ......दिमाग कुछ ....जानते हुए भी कि इस रास्ते पर मंजिल नहीं ....हम चल पड़ते हैं ....और अचानक सामने रास्ता खत्म हो जाता है...........इन्हीं हालातों में उपजी है ये नज़्म ........." कशमकश "



इक अजीब सी
कशमकश है
अपने ही हाथों से
इक बुत बनाती हूँ

लम्हें दर लम्हें
उसे सजाती हूँ ,
संवारती हूँ ,
तराशती हूँ
और फ़िर ....
तोड़ देती हूँ ...



बड़ा ही
अजीब पहलू है
कैनवस पर खिले
रंगीन चित्रों पर
अचानक
स्याह रंगों का
बिखर जाना....



चलते-चलते
ज़िन्दगी का
अकस्मात
ठहर जाना
और खेल का
इतिश्री
हो जाना ....!!