पिछले दो महीने पत्र-पत्रिकाओं में खूब नज्में छपीं ....बहुत से फोन काल्स ...ख़त ...पत्रिकाएँ ....नज्मों की मांग ....
इनमें से दो खतों (मेल) ने ज्यादा खुशी दी ...एक तो 'सिल्ली सिल्ली आंदी है हव़ा ' गीत लिखने वाले अमरदीप जी का ख़त और दुसरे निर्मेश ठक्कर जी का जिनका गिनीज बुक में नाम है ....
सबसे ज्यादा नज्में पसंद की गई दृष्टिकोण में छपी नज्में ....पहचान, तूफ़ान ,कॉल गर्ल ,साज़िश व हवस ...'दृष्टिकोण' के संपादक नरेंद्र जी का बहुत -बहुत आभार...शुक्रिया जिन्होंने मुझे रचनाओं के लिए दो बार ख़त लिख आग्रह किया ..... इसके अलावा ...अविराम , अभिनव-प्रयास ,पुष्पगंधा ,समकालीन भारतीय -साहित्य ,कथासागर आदि में भी रचनायें छपी ....
अब पेश है इक नज़्म ....' इक औरत ''
इक औरत
सुप्त सी ...
अनसिये ज़ख्मों तले
लिपटा ली जाती है देह मेरी
जहाँ ज़िस्म की गंध उतरती है
कभी दूसरी,कभी तीसरी .....
तो कभी चौथी बन ....
रात गला काटती है
कई ज़ज्बात मरते हैं
इक ज़हरीली सी कड़वाहट
उतर जाती है हलक में .....
तुम नहीं खड़ी हो सकती
अपने हक़ की खातिर
मेरी बराबरी पर .....
तुम्हारा वजूद .....
ज़ुल्म सहने ,तिरस्कार झेलने
और बुर्के की ओट में कैद है
तुम्हारी नस्ल को....
तालीम हासिल करने का हक नहीं
तुम्हारा गुनाह है ...
तुम लड़की होकर में पैदा हुई ....
तुम जिन्दा रहोगी
तो मेरे रहमोकरम पर .....
उफ्फ़ ....
इन शब्दों का खौफ
डराता है मुझे .....
ये किसकी अर्थी है ...
पत्ते सी झूलती हुई .....
ये कौन लिए जा रहा है
मेरे मन की लाशें ......
''औरत तुम्हारी खेती है
इसे जैसे चाहो इस्तेमाल करो''
ओह ....!
ये कैसा धर्म है ...?
ये कैसा ईमान है ....?
ये कैसी जहालतें हैं ...?
ये कैसा कानून है ...?
मेरे ज़िस्म पर मेरे खाविंद का
मालिकाना हक़ है ...
मेरे विचारों पर फतवे हैं ...
मेरी सोच पर लगाम है ...
यकसां....
ये 'तलाक' का
तीन बार कहा गया शब्द
मेरे सामने चीखने लगा है ......
मेरे अन्दर कोई पौधा कैक्टस बन
उग आया है
ये पत्थर हुई औरतें
क्यूँ रोशनदानों की ओर झाँकने लगी हैं ?
चुप्पी की चादर ताने ये सुरमई अँधेरा
किस उडीक में है ......?
अधिकार के सारे शब्द तुम्हारे हाथों में .....
और मेरे हाथों में सारे कर्तव्य ?
अय खुदा ...!
बता मैं कटघरे में क्यों हूँ ?
मैं औरत क्यों हूँ ...?
मुझे औरत होने से गुरेज है ...
मुझे औरत होने से गुरेज है ......!!
इनमें से दो खतों (मेल) ने ज्यादा खुशी दी ...एक तो 'सिल्ली सिल्ली आंदी है हव़ा ' गीत लिखने वाले अमरदीप जी का ख़त और दुसरे निर्मेश ठक्कर जी का जिनका गिनीज बुक में नाम है ....
सबसे ज्यादा नज्में पसंद की गई दृष्टिकोण में छपी नज्में ....पहचान, तूफ़ान ,कॉल गर्ल ,साज़िश व हवस ...'दृष्टिकोण' के संपादक नरेंद्र जी का बहुत -बहुत आभार...शुक्रिया जिन्होंने मुझे रचनाओं के लिए दो बार ख़त लिख आग्रह किया ..... इसके अलावा ...अविराम , अभिनव-प्रयास ,पुष्पगंधा ,समकालीन भारतीय -साहित्य ,कथासागर आदि में भी रचनायें छपी ....
अब पेश है इक नज़्म ....' इक औरत ''
इक औरत
सुप्त सी ...
अनसिये ज़ख्मों तले
लिपटा ली जाती है देह मेरी
जहाँ ज़िस्म की गंध उतरती है
कभी दूसरी,कभी तीसरी .....
तो कभी चौथी बन ....
रात गला काटती है
कई ज़ज्बात मरते हैं
इक ज़हरीली सी कड़वाहट
उतर जाती है हलक में .....
तुम नहीं खड़ी हो सकती
अपने हक़ की खातिर
मेरी बराबरी पर .....
तुम्हारा वजूद .....
ज़ुल्म सहने ,तिरस्कार झेलने
और बुर्के की ओट में कैद है
तुम्हारी नस्ल को....
तालीम हासिल करने का हक नहीं
तुम्हारा गुनाह है ...
तुम लड़की होकर में पैदा हुई ....
तुम जिन्दा रहोगी
तो मेरे रहमोकरम पर .....
उफ्फ़ ....
इन शब्दों का खौफ
डराता है मुझे .....
ये किसकी अर्थी है ...
पत्ते सी झूलती हुई .....
ये कौन लिए जा रहा है
मेरे मन की लाशें ......
''औरत तुम्हारी खेती है
इसे जैसे चाहो इस्तेमाल करो''
ओह ....!
ये कैसा धर्म है ...?
ये कैसा ईमान है ....?
ये कैसी जहालतें हैं ...?
ये कैसा कानून है ...?
मेरे ज़िस्म पर मेरे खाविंद का
मालिकाना हक़ है ...
मेरे विचारों पर फतवे हैं ...
मेरी सोच पर लगाम है ...
यकसां....
ये 'तलाक' का
तीन बार कहा गया शब्द
मेरे सामने चीखने लगा है ......
मेरे अन्दर कोई पौधा कैक्टस बन
उग आया है
ये पत्थर हुई औरतें
क्यूँ रोशनदानों की ओर झाँकने लगी हैं ?
चुप्पी की चादर ताने ये सुरमई अँधेरा
किस उडीक में है ......?
अधिकार के सारे शब्द तुम्हारे हाथों में .....
और मेरे हाथों में सारे कर्तव्य ?
अय खुदा ...!
बता मैं कटघरे में क्यों हूँ ?
मैं औरत क्यों हूँ ...?
मुझे औरत होने से गुरेज है ...
मुझे औरत होने से गुरेज है ......!!
