Saturday, May 16, 2009

कशमकश......

कई बार ज़िन्दगी.... ऐसे मोड़ पे लाकर खड़ा कर देती है .....जहां हम चाह कर भी .....सही निर्णय नहीं ले पाते.....दिल कुछ कहता है ......दिमाग कुछ ....जानते हुए भी कि इस रास्ते पर मंजिल नहीं ....हम चल पड़ते हैं ....और अचानक सामने रास्ता खत्म हो जाता है...........इन्हीं हालातों में उपजी है ये नज़्म ........." कशमकश "



इक अजीब सी
कशमकश है
अपने ही हाथों से
इक बुत बनाती हूँ

लम्हें दर लम्हें
उसे सजाती हूँ ,
संवारती हूँ ,
तराशती हूँ
और फ़िर ....
तोड़ देती हूँ ...



बड़ा ही
अजीब पहलू है
कैनवस पर खिले
रंगीन चित्रों पर
अचानक
स्याह रंगों का
बिखर जाना....



चलते-चलते
ज़िन्दगी का
अकस्मात
ठहर जाना
और खेल का
इतिश्री
हो जाना ....!!

Sunday, May 10, 2009

हथेली पे उगा सच ......

हथेलियों पर उगे कुछ ऐसे सच ......जो चाह कर भी एक सुकून भरा साँस नहीं लेने देते .......कई बार लगता सहर रात की खिड़की पर खड़ा उजाले का हाथ बढ़ा रहा है ......और मैं हिम शिखरों को फलांगती बहुत दूर ...आसमान छूने का प्रयत्न कर रही हूँ......तभी अचानक सच सामने आ ....गोली सी दाग देता है .....और मैं ....वहीं पत्थर सी जड़ हो जाती........!!



फ़िर एक गीला शब्द
हथेली पे
अकस्मात उग आया है
मुट्ठी में पिघलता यथार्थ
घुसपैठी लहरों से
सीपियों सा
टूटने लगा है
फरेबी बादल
उड़ेल देता है
ढेर सारी स्याही
आकाश में ......


मस्तिष्क
पिशाचनी के
पंजों में सा जकड़ा
कसमसा उठता है
समय की खोह में
कहीं गुम हुआ मन
दरारों भरे आईने से
कई - कई सूरतों में
बंटकर

उड़ाता है हंसीं ......


किसी
सूफियाना कलाम की
करुण आवाज़

गूंजती है कानों में
रात खिड़की पर खड़ी
बढ़ाती है हाथ
मैं चुपचाप शिकारे में
जा बैठती हूँ


बूढ़ा मल्लाह मुखातिब होता है
" कहाँ जाना है बीबी "
मैं हिम शिखरों की ओर
इशारा करती हूँ
शफ्फाफ़ हवाएं
चीड़ की गंध लिए

मुझे हैरानी से
देखती हैं .....


तभी ......
मेरे भीतर का भंवर
छाती पर नली रख
गोली दाग देता है
सामने .....
सच खड़ा है
मुंह चिढ़ता हुआ
और मैं राख़ हुई
पत्थर सी
जड़ हो जाती हूँ .......!!


Sunday, May 3, 2009

रब्बा ! यह कैसा इंसाफ है तेरा......

कई बार हादसे एक के बाद एक यूँ घटित होते हैं कि संभलने का मौका ही नहीं मिलता......इस नज़्म को लिखते वक्त न जाने कितनी बार आँखें नम हुई होंगीं.....अभी कल ही की तो बात थी जब मैं उससे अंधेरों के बाद आने वाले सहर का ज़िक्र करती ......क्या पता था कि अब ये अंधेरे ही हमेशा के लिए उसे रास आने वाले हैं ........आह ! ...रब्बा ! यह कैसा इंसाफ है तेरा......?


रब्बा !
यह कैसा इंसाफ है तेरा
आज जब एक सतायी हुई औरत
मुर्दा आंखों में
अन्तिम सांसें ले रही थी
तब भी तुम वहीँ
खामोश खड़े थे
उसकी देह की निचुड़ी दीवारें
अपने अन्दर
दफ़्न कर ले गयीं थीं
वे सारे सवालात
जो अब मेरे सीने में
धधक रहे हैं

जानती हूँ ;
धीरे-धीरे कैसे टूटी थी वो
कई बार जब हम मिलते
मैं पूछती : "...कैसी हो तुम ? "
वह हंस देती "....जैसी तुम हो ! "
हम दोनों मुस्कुरा जातीं


मुखालिफ़* स्थितियों से लड़ना
परिस्थितियों से समझौता करना
जिसमें न जाने कितनी बार
धराशायी होकर गिरी थी वह
क्रूर झोंका जब भ्रम तोड़ता
उसकी किरचें
संभाले नहीं संभलती
हर क्षण उसके अन्दर
जैसे कुछ दरक जाता


ज़िन्दगी के
कितने ही पैने रूप
देखे थे उसने
नित छलनी कर देने वाली
भाषा के सलीबों पे चढ़ती
बड़ी बड़ी इमारतों सी
ढह जाती


रात भर

करवटें बदलती
पीड़ा से कराहती
आंखों में उगी वितृष्णा
रिक्तता , अकेलापन
उसे भीतर तक
खोखला कर जाता
एक गहरी अकूबत
सीने में भरभरा उठती


और इक दिन
हथियार डाल दिए थे उसने
उसने नहीं देह ने
कभी ज्वर
कभी थकावट
कभी सर दर्द
कभी उल्टी
कभी.......!
वह तिल- तिल कर
मिटने लगी


और फ़िर
एक दिन पता चला
उसे कैंसर है
ब्रेन कैंसर
वह भी अन्तिम स्टेज पर
वह खुश थी
बेहद खुश
उसकी उखड़ी सांसों में
इक सुकून सा घुल गया था


रब्बा !
औरत को दर्द देते वक्त
लोहे सी शक्ति
और फौलाद सा
दिल भी दिया कर
नहीं तो वह यूँ ही मग्लूब* हो
समिधा बन महाकुंड में
धुंआ -धुंआ सी
ज़बह होती रहेगीं ......!!


१) मुखालिफ़ - विरोधी ,२) अकूबत -पीड़ा , ३) मग्लूब-पराजित , ४) ज़बह-वध

Saturday, April 25, 2009

दर्द ......

औरत न जाने कितने रूपों में जीती है ......मैंने जब भी अपने दुपट्टे पे नज़र दौड़ाई मुझे छेद ही छेद नज़र आये.....और हर छेद से रिसता दर्द.....मैं उसी दर्द को पिरो कर फिर लायी हूँ.....जो सिसकते हुए थिरकता है.....और थिरकते हुए लहुलुहान हो जाता है.....वह अपने फटे आँचल को घुंघरुओं से आजाद कर सीना चाहता है.....पर न धागा है न सुई.........!!


(१)

ढोलक की ताल पर
वह मटकी
पावों में घुंघरु
छ्नछ्नाये
उभार
थरथराये
जुबां
होंठों पे फिराई
चुम्बन
उछले
दर्द हाट में
बिकने लगा .....!!

(२)

पूरी दुनियां में
जैसे उस वक्त रात थी
वह अपनी दोनों
खाली कलाइयों को
एकटक देखती है
और फ़िर सामने पड़ी
चूड़ियों को ....

तभी
वक्त आहिस्ता से
दरवाज़ा खोल बाहर आया
कहने लगा ....
नचनिया सिर्फ़ भरे हुए
बटुवे को देखतीं हैं
कलाइयों को नहीं...

दर्द ने करवट बदली
और आंखों के रस्ते
चुपचाप ....
बाहर चला गया ....!!

(३)

लालटेन की
धीमी रौशनी में
उसने वक्त से कहा -
मैं जीवन भर तेरी
सेवा करुँगी
मुझे यहाँ से ले चल
वक्त हंस पड़ा
कहने लगा -
मैं तो पहले से ही
लूला हूँ ....
आधा घर का
आधा हाट का ....!!

Sunday, April 19, 2009

नज़्म

पिछली बार का वादा था नई नज़्म का......बीते कुछ दिनों में जहाँ आप सब के साथ ने हौंसला-अफजाई की वहीँ मित्र प्रकाश बादल जी के ब्लॉग छोड़ने के फैसले ने आहात भी किया....इस बात से कि मेरे ब्लॉग पे टिप्पणी की वजह से उन्हें जाना पड़ रहा है ......मन में एक अपराधबोध सा भी है ....मेरी एक बार उनसे फ़िर गुंजारिश है कि अपने फैंसले पर पुनर्विचार करें ....... इस बीच कुछ प्रशंसकों के फोन कॉलस भी आए जिन्होनें रचनाओं की सराहना के साथ- साथ ये शिकायत भी कि आप एक ही शैली में लिखतीं हैं .....इस बार कुछ अलग लिखने की कोशिश की है ......आपसब की इनायत चाहिए.......!!

नज़्म
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रात जुगनुओं ने इश्क़ का जाम भरा

तारे सेहरा बांधे दुल्हे से सजने लगे

सबा का इक झोंका उड़ा ले गया चुपके से

चाँदनी सपनों की पालकी में जा बैठी !


शब ने मदहोशी का आलम बुना

आसमां नीली चादर बिछाने लगा

मुहब्बत का मींह बरसाया बादलों ने

चाँद आशिकी का गीत गाने लगा !


हुश्न औ' इश्क नशेमंद आँखों में


प्रीत की कब्रों में सजते रहे

कभी चिनवाये गए जिंदा दीवारों में

कभी चनाब के पानी में बहते रहे !

Sunday, April 12, 2009

वक्त की नफ़ासत

आपसब की फरमाइश पर एक पुरानी ही नज़्म पेश कर रही हूँ .....उलझनों के बीच नया कुछ लिख ही नहीं पाई.....यह नज़्म शामिख फ़राज़ जी के ब्लॉग पे भी प्रकाशित हो चुकी है....वादा है अगली बार नया कुछ लेकर आउंगी ....!!


वक्त की नफ़ासत

बरसों पहले
जीवन मर्यादाएं
धूसर धुन्धल चित्र लिए
हस्तरेखाओं की तंग घाटियों में
हिचकोले खाती रहीं.....

उबड़ - खाबड़
बीहडों में भटकती
गहरी निस्सारता लेकर
कैद में छटपटाती
आंखों में कातरता
भय और बेबसी की
आवंछित भीड़ लिए
इक तारीकी पूरे वजूद में
उतरती रही ......

वक्त नफ़ासत पूर्ण तरीके से
सीढियों पर बैठा
तस्वीर बनाता रहा ...

तारों को
छू पाने की कोशिश में
न जाने कितने लंबे समय
और संघर्षों से
गुजर जाना पड़ा .....

आज मैंने
अंधियारों को चीरकर
चाँद से बातें करना
सीख लिया है
रातों को आती है चाँदनी
दूर पुरनूर वादियों की
गहरी तलहटी से
दिखलाती है मुझे
शिलाओं का नृत्य करना
उच्छवासों से पर्वतों का थिरकना
समुंदरी लहरों के बीच
सीपी में बैठी एक बूंद का
मोती बन जाना
उड़ते हुए पन्ने में
किसी नज़्म का
चुपचाप आकर
मेरी गोद में
गिर जाना

आज जब
दूर दरख्तों से
छनकर आती धूप
थपथपाती है पीठ मेरी
धैर्य सहलाता है घाव
हवाएं शंखनाद करतीं हैं
तब मैं ....
वे तमाम तपते हर्फ़
तुम्हारी हथेली पे रख
पूछती हूँ
उन सारे सवालों के
जवाब ...........!!

Tuesday, April 7, 2009

खुले ज़ख्म.....!!

मित्रो,
मैं तहेदिल आपसब की शुक्रगुजार हूँ जो आपने मुझे इतना प्यार दिया ....मैंने उम्मीद भी नहीं की थी कि इन कठिन परिस्थियों में आप सब इस तरह मेरे साथ खड़े हो लेंगे .... मेरे पास लफ्ज नहीं हैं अपनी ख़ुशी जाहिर करने के लिए ....सच कहूँ तो अब मुझे कोई रंज नहीं है नज़्म के चोरी होने का .. अब आपसब का स्नेह भरा हाथ जो है सर पर.......जाइये मुनव्वर सुल्ताना जी सजा लीजिये अपना घर चोरी के फूलों से .....
जा सजा ले अपना घर मेरे आँगन के फूलों से
हमें तो तेरे दिए खार रास आ गए............!!

पेश है एक छोटी सी नज़्म है ...".खुले ज़ख्म...

खुले ज़ख्म.....!!


आज नज्मों ने
टांका छेड़ा
और लगा दी
भूल जाने की .....

मैंने ज़ख्मों की
पट्टी खोल दी
और कहा ....
देख दर्देआशना
मेरा हर रिसता ज़ख्म
तेरी रहमतों का
मेहरबां है ....

नज्मों ने
मुस्कुरा के
मेरे हाथों से
पट्टी छीन ली
और कहा ...
तो फिर इन्हें
खुला रख
तेरी हर टीस पे
मेरे हर्फ़ बोलते हैं.....


अब मैं
ज़ख्मों को
खुला रखती हूँ
और...
मेरी हर टीस
नज़्म बन
पन्नों पे
सिसक उठती है.....!!