Saturday, April 25, 2009

दर्द ......

रत न जाने कितने रूपों में जीती है ......मैंने जब भी अपने दुपट्टे पे नज़र दौड़ाई मुझे छेद ही छेद नज़र आये.....और हर छेद से रिसता दर्द.....मैं उसी दर्द को पिरो कर फिर लायी हूँ.....जो सिसकते हुए थिरकता है.....और थिरकते हुए लहुलुहान हो जाता है.....वह अपने फटे आँचल को घुंघरुओं से आजाद कर सीना चाहता है.....पर न धागा है न सुई.........!!


(१)

ढोलक की ताल पर
वह मटकी
पावों में घुंघरु
छ्नछ्नाये
उभार
थरथराये
जुबां
होंठों पे फिराई
चुम्बन
उछले
दर्द हाट में
बिकने लगा .....!!

(२)

पूरी दुनियां में
जैसे उस वक्त रात थी
वह अपनी दोनों
खाली कलाइयों को
एकटक देखती है
और फ़िर सामने पड़ी
चूड़ियों को ....

तभी
वक्त आहिस्ता से
दरवाज़ा खोल बाहर आया
कहने लगा ....
नचनिया सिर्फ़ भरे हुए
बटुवे को देखतीं हैं
कलाइयों को नहीं...

दर्द ने करवट बदली
और आंखों के रस्ते
चुपचाप ....
बाहर चला गया ....!!

(३)

लालटेन की
धीमी रौशनी में
उसने वक्त से कहा -
मैं जीवन भर तेरी
सेवा करुँगी
मुझे यहाँ से ले चल
वक्त हंस पड़ा
कहने लगा -
मैं तो पहले से ही
लूला हूँ ....
आधा घर का
आधा हाट का ....!!

69 comments:

अनिल कान्त said...

ek dard bhara hua hai is rachna mein ....koi kya bayan karega ....aapne behtreen rachna prastut ki hai

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

"अर्श" said...

हरकीरत जी आपने इस नज़्म को शुरू करने से पहले जो तखल्लुस में लिखा है वो सबसे पहले दाद के काबिल है और ऊपर से पहली नज़्म तो जैसे जान ले गई... बहोत ही उम्दा नज़्म कही आपने... ढेरो बधाई आपको..


अर्श

Yogesh Verma Swapn said...

wah
वक्त हंस पड़ा
कहने लगा -
मैं तो पहले से ही
लूला हूँ ....
आधा घर का
आधा हाट का ....!!

behtareen,
in panktiyon ne to jaise loot liya, bahut umda.badhai sweekaren.

मोना परसाई said...

औरत न जाने कितने रूपों में जीती है ......sach khahae
बिना धागे सुई के दर्द को कितनी सुगढ़ता से सिला है आपने कि सीवन तक नज़रनहीं आ रही है .ईश्वरआपके इस हुनर और अनुभूतियों से भरे ह्रदय सदा ऐसे ही कायम रखे .

डिम्पल मल्होत्रा said...

dard ne karwat badli or aankho ke raste chupchap bahar chala gya...kaisa rishta hai dard ka or ansuo ka jo kabhi chhutta nahi...kaash har rishta etna hi majbut ho pata...

ओम आर्य said...

आज कल दर्द बेचना फैशन में भी है इसलिए कुछ ऐसे लोग जिनके पास दर्द नहीं हैं, वे दर्द को दिखाने के तमाम साधन अपनाते हैं और उनका दर्द सब तरफ दीखता है और दिखाया जाता है. मगर बिडम्बना ये है कि ये दर्द जिनकी बात आप कर रही हैं, वे दिख नही पाते.

आपने दिखाया, शुक्रिया

mehek said...

मैं तो पहले से ही
लूला हूँ ....
आधा घर का
आधा हाट का
dard ki itani gehri paribhasha,kya kahu har kavita jaise dil mein tis utha gayi,bahut bdhai.

ताऊ रामपुरिया said...

बस नमन करता हूं आपको. बेमिसाल.

रामराम.

डॉ .अनुराग said...

लालटेन की
धीमी रौशनी में
उसने वक्त से कहा -
मैं जीवन भर तेरी
सेवा करुँगी
मुझे यहाँ से ले चल
वक्त हंस पड़ा
कहने लगा -
मैं तो पहले से ही
लूला हूँ ....
आधा घर का
आधा हाट का ...






बेमिसाल .!!!..... ऐसी बात जो शायद आप ही कह सकती है......किसी दर्द को महसूस करना भी ...शायद उसे लफ्ज़ का लिबास पहनाने से पहले जरूरी है....

vijay kumar sappatti said...

harkirat ,

this is your one of the best .

जयंत - समर शेष said...

"दर्द हाट में
बिकने लगा .....!!"

ऐसा विवरण मैंने बिरला ही पाया है..
आप कमाल हो जी.

~जयंत

रविकांत पाण्डेय said...

ओह! दर्द का अद्भुत चित्रण! पढ़ते ही आंखों के सामने कई दृश्य तैरने लगते हैं।

समयचक्र said...

समयचक्र: चिठ्ठी चर्चा : आपकी चिठ्ठा : मेरी चिठ्ठी चर्चा में

संध्या आर्य said...

aise dard ko aap hi prastut kar sakati thi......thanks alot

परमजीत सिहँ बाली said...

बहुत सुन्दर!!

प्रदीप कांत said...

वक्त हंस पड़ा
कहने लगा -
मैं तो पहले से ही
लूला हूँ ....
आधा घर का
आधा हाट का ....!!

अनिल कुमार वर्मा said...

हरकीरत जी...दर्द को जो शब्द आपने दिए हैं...वो वाकई दिल की गहराइयों में उतर गए...सीधे मन के धरातल पर छा गए...काबिले तारीफ है आपका दोनों रचनाएं...जबरदस्त

डा0 हेमंत कुमार ♠ Dr Hemant Kumar said...

तभी
वक्त आहिस्ता से
दरवाज़ा खोल बाहर आया
कहने लगा ....
नचनिया सिर्फ़ भरे हुए
बटुवे को देखतीं हैं
कलाइयों को नहीं.

हरकीरत जी ,
यह भी जीवन की एक सच्चाई है जिसे आपने बहुत सुन्दर ढंग से पेश किया है.
अच्छी कविता...
हेमंत कुमार

गौतम राजऋषि said...

अजीब-सी उलझन घेरे हुय है शब्दों की इन तीन तस्वीरों को पढ़ने के बाद...
उलझन है कि इन अलौकिक और अप्रतिम रचनाओं पर आपको बधाई दूँ या इनमें से रिसते दर्द को सहेजने का प्रयत्‍न करूँ...?
और यदि दर्द को सहेजना हो तो बधाई शब्द ही बेमानी हो जाता है...
दर्द जो सिसकते हुये थिरकता है और थिरकते हुये शब्दों के इन अद्‍भुत रंगों में भीग जाता है

कैसे कर लेती हैं आप?????

Arvind Mishra said...

ओह यह कैसी नियति ?

के सी said...

खूबसूरत नज़्में, दूसरी नज़्म गंभीर और दोशीजा !!

ravishndtv said...

हरकीरत जी

सारे दर्दों को बाहर ले आइये। न जाने कितने शब्द और कलम बेसब्री से इंतज़ार कर रहे होंगे। बहुत अच्छा है। हम पढ़ते रहते हैं और धुलते रहते हैं।

सुशील छौक्कर said...

किसी दर्द को सही शब्दों से कहना जिससे उसके सारे भाव उभर कर आ जाए, बड़ा मुश्किल काम होता है। पर आपकी कलम ये मुश्किल काम ही करती है। लगता है आप चेहरे पर उभर आए दर्द के शब्दों को जल्द ही पढ लेती है।
अद्भुत, दर्द को महसूस कराती रचना।

दिगम्बर नासवा said...

हर रचना............दर्द हा सैलाब समेटे हुवे..............वक्त की बेवफाई को, युग की भीषण यंत्रणा को झेलते हुवे............औरत का दर्द हर शब्द में उतर आया है. तीनों में कोण सी सबसे बेहतर है............समझ नहीं सका, तीनों एक से बढ़ कर एक........

लोकेन्द्र विक्रम सिंह said...

आपने अपनी लेखनी के जरिये जिस दर्द को पर्स्तुत किया है....
उसका माध्यम सराहनीय है....

Ashok Kumar pandey said...

gahri aur marmik abhivyakti!!!

badhai

Alpana Verma said...

नज़्म से पहले परिचय में जो लिखा है वह काबिले तारीफ़ है.
दर्द को पिरो कर इतनी खूबसूरत तीन नज़्म बुन डालीं!वाह!

वक़्त का खुद को 'आधा हाट का आधा घर का बताना ,एक अनूठा ख्याल लगा.
और दर्द का हाट में बिकना और आँखों से बह जाना ...वाह !हरकीरत जी ,सुघड़ता से गढ़ी हुई हैं तीनो नज़्म !

मीनाक्षी said...

पहली बार पाबलाजी ने आपके ब्लॉग से परिचय करवाया था और आज दर्द को इधर आते देख कर आ गए ... दर्द के इस रूप ने मन को छू लिया जो कभी कभी चुपचाप आँखों के रास्ते बाहर भी चला जाता है...

Shamikh Faraz said...

kabhi kabhi aapki taareef k lie lafz nahi milte harkirat ji bahut khub. mere blog par bhi aayen.

amitabhpriyadarshi said...

chunavon ki vystataa se lautane ke baad pahala mauka hai, aapka blog dekha. ek dum se dil ko jhakjhorane wali rachana padha di aapne

ਤਨਦੀਪ 'ਤਮੰਨਾ' said...

Harkirat ji..eh teeno nazmein aapke blog par lagi behatreen posts mein shamil ho gayee hain. Bahut saal pehley maine issi subject par ikk nazam likhi thi...kabhi Aarsi pe share karoongi. Aap inn ke liye meri taraf se special mubarakbaad kabool karein.

Tandeep Tamanna
Vancouver, Canada
punjabiaarsi.blogspot.com

anurag said...

सच है , वक्त कितना बेबस है.

Prem Farukhabadi said...

हरकीरत जी ,

पूरी दुनियां में
जैसे उस वक्त रात थी
वह अपनी दोनों
खाली कलाइयों को
एकटक देखती है
और फ़िर सामने पड़ी
चूड़ियों को ....

बधाई आपको..

manu said...

आज आप ये कौन सा नया दर्द ले आयीं,,,,,,?
पर जिस किसी का भी है आपने खूबसूरती से उतारा है,,,,,कोई शक नहीं,,,
बहुत दर्द भरी पेशकश है,,,,,,
चोरी होगा कभी न कभी,,,,,,
मैं तो पहले से ही
लूला हूँ ....
आधा घर का
आधा हाट का ....!!
तीनों रचनाएँ शानदार और उन पर ये पंक्तियाँ.............
००००००००फ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़
लो हमें तो ये उफ्फ लिखना भी गौतम जी से सीखना पडेगा,,,,

मुकेश कुमार तिवारी said...

हरकीरत जी,

दर्द को एक नई परिभाषा देती हुई कविताएं मार्मिक हैं और पाठक को जीवन की कटु सच्चाईयों से रू-ब-रू करवाती हैं।

निम्न पंक्तियाँ तो जैसे एक फलसफा ही कह देती हैं :-

पूरी दुनियां में
जैसे उस वक्त रात थी
वह अपनी दोनों
खाली कलाइयों को
एकटक देखती है
और फ़िर सामने पड़ी
चूड़ियों को ....

तभी
वक्त आहिस्ता से
दरवाज़ा खोल बाहर आया
कहने लगा ....
नचनिया सिर्फ़ भरे हुए
बटुवे को देखतीं हैं
कलाइयों को नहीं...


बधाईयाँ, सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

roushan said...

हाटों में दर्द ही बिकते हैं

Udan Tashtari said...

अद्भुत!!

न जाने कितने रुप उकेरे हैं-एक के भीतर भी अनेक!!

वाह!!

Anonymous said...

दर्द ने करवट बदली और आंखो के रास्‍ते चुपचाप बाहर चला गया--सार्थक रचनाओं के लिए बधाई।

Mumukshh Ki Rachanain said...

ओह! बेबसी की ऐसी ही है नियति
सिसकते दर्द को भी पीकर मुस्करा कर थिरकना ही पड़ता है.

शब्दों का सुन्दर संयोजन नज्म को चार चाँद लगा गया.
बेबसी की नियति को भरपूर शिद्दत से महसूस करा गया.

बधाई.

चन्द्र मोहन गुप्त

अमिताभ श्रीवास्तव said...

"दर्द हाट में
बिकने लगा .....!!"

oh vakai behtreen pankti..
dard biktaa bhi he..vo bhi haat me..sachmuch is tarah ki panktiyaa adbhut kalpnashkti ki baat he..
aour kuchh nahi likhungaa, kyuki taarif se bhi vo baat nahi banti jo me chahtaa hu, lihaaja sirf yahi ki ......
B_E_H_T_R_E_E_N

PBCHATURVEDI प्रसन्नवदन चतुर्वेदी said...

हरकीरत जी,
इस रचना की तारीफ़ के लिये मेरे पास शब्द नहीं है।

हरकीरत ' हीर' said...

मित्रो ,

एक दुखांत सुचना है कि फिरोज़ खान अब हमारे बीच नहीं रहे......कुछेक महीने पहले मेरे पसंदीदा कलाकार राजकुमार का भी निधन हो गया....पर दुःख की baat ..... न किसी ब्लोगर ने उनके लिए संवेदना के दो शब्द कहे ....न कोई पोस्ट लिखी......!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बेमिसाल चित्र-गीत।
बधाई।
फिरोज खान जी के दिवंगत होने पर श्रद्धांजलि।
उनके परिवारीजनों सम्वेदना।

संजय तिवारी said...

अद्भुत!!

पूरी दुनियां में
जैसे उस वक्त रात थी
वह अपनी दोनों
खाली कलाइयों को
एकटक देखती है
और फ़िर सामने पड़ी
चूड़ियों को ....


वाह

तेजेन्द्र शर्मा said...

हरकीरत जी

एक ही विषय को तीन अलग अलग दृष्टिकोणों से देखना और ऐसे ख़ूबसूरत शब्दों में पिरोना किसी बड़े कवि या शायर का ही कमाल हो सकता है। आज जबकि कविता दुरूह होती जा रही है ऐसी रचनाएं बहुत कम दिखाई देती हैं जो पाठक के साथ एक रिश्ता क़ायम कर लेती हैं। आपकी हर रचना आपकी अपनी ही रचनाओं से मुक़ाबला करती है। उसे बाहरी स्पर्धा की आवश्यक्ता नहीं होती।
बधाई

तेजेन्द्र शर्मा
कथा यू.के. (लन्दन)

admin said...

ओह, एक साथ दर्द के तीन तीन दरिया। रब खैर करे।

----------
S.B.A.
TSALIIM.

kavi kulwant said...

bahut khoob..

बादल१०२ said...

bemishal bahut khoob harkirat ji

रावेंद्रकुमार रवि said...

दर्द तो दर्द ही होता है,
चाहे किसी का भी हो!

Rinku said...

aapka blog bahut popular hai
aap is par google ki ads kyon nahin activate karti
paisa bhi kamaiye or naam to hai hi.

Anil Pusadkar said...

क्या कहूं?सच कहूं तो तारीफ़ के लिये शब्द ही नही मिल रहे है मुझे।

Rinku said...

google ek company hai jo aapki webv site par add run karengi.jisse ki aapko kamai hoti rahegi.agar aap aisa karna chahti hai to mujhe batay main aapki help kar doonga.

प्रिया said...

first time visit kiya aapka blog..... aur sochne par majboor ho gai...samajh nahi pa rahi kya likhoo.

kabhi waqt mile to nazar daal ligiyega hamare blog par...... aap jaisa acchey to nahi hain, par sachchey to hain hum bhi :-)

निर्झर'नीर said...

ati sanvedansheel,marmsparshi

अभिन्न said...

हरकीरत जी सबसे पहले तो आपने जो कमेंट्स मेरे ब्लॉग पर दिए उनके लिए बहुत बहुत धन्यवाद आपने जिस कविता का जिक्र किया ...फूलों से नित हंसना सीखो,
मुझे याद आया कहीं बचपन में किसी प्राईमरी की क्लास में पढ़ी थी
मन दूर बहुत दूर बचपन के लम्हों में पल भर के लिए चला गया -और बहुत अच्छा लगा
..................
दूसरा आपने लिखा की ज़नाब फिरोज़ खान और राजकुमार जी की जुदाई पर किसी ने नहीं लिखा --सच है हरकीरत जी ब्लोग्गेर्स का भी ये फ़र्ज़ है की इस तरह के कालजयी कलाकारों को उनके हिस्से का मान सम्मान मिलना चाहिए आज हम लोग slumdog मिल्लिओंनेर जैसी फिल्मों पर तो ब्लोगेर्स के विचार पढ़ लेते है परन्तु हमारी धरोहर रहे ये कलाकार वाकई ignore किये गए है बरसों पहले दयावान और धर्मात्मा जैसी स्तरीय फिल्मों की याद ताज़ा हो गई ......अनेकों श्रद्धा सुमन इन महान कलाकारों को
..............
दर्द पर आपकी कविता हमेशा की तरह उच्स्तरिय है
क्या खूब लिखा है
"दर्द हाट में बिकता है"
"दर्द ने करवट बदली
और आंखों के रस्ते
चुपचाप ....
बाहर चला गया ....!"
कमाल का चित्रण किया है आपने
..........
with regards

mark rai said...

पूरी दुनियां में
जैसे उस वक्त रात थी
वह अपनी दोनों
खाली कलाइयों को
एकटक देखती.............
ek dard jo dard nahi raha....chudiyon me kho gaya...
nice work..

Sanjay Grover said...

वक्त आहिस्ता से
दरवाज़ा खोल बाहर आया
कहने लगा ....
नचनिया सिर्फ़ भरे हुए
बटुवे को देखतीं हैं
कलाइयों को नहीं...

दर्द ने करवट बदली
और आंखों के रस्ते
चुपचाप ....
बाहर चला गया ....!!

(३)


वक्त हंस पड़ा
कहने लगा -
मैं तो पहले से ही
लूला हूँ ....
आधा घर का
आधा हाट का ....!!

AB KYA KAHUn ?! YAHI HARKIRAT HAI JO MERE BLOG PAR KAISE BEBAK BINDAS MAZAK KARTI HAI.

Sanjay Grover said...

Harkirat Haqeer said...
मित्रो ,

एक दुखांत सुचना है कि फिरोज़ खान अब हमारे बीच नहीं रहे......कुछेक महीने पहले मेरे पसंदीदा कलाकार राजकुमार का भी निधन हो गया....पर दुःख की baat ..... न किसी ब्लोगर ने उनके लिए संवेदना के दो शब्द कहे ....न कोई पोस्ट लिखी......!!

VAISE AAPKE SABSE FAVOURITE TO GULSHAN GROVER HAIn. KYA VE BHI...?

गर्दूं-गाफिल said...

किस किस को जीने निकलती हो हरकीरत
किस किस के आंसू अपनी आँखों से बहाती हो
अच्छा हो आंसू को तेजाब बना लो
व्यस्था के गलीज राक्छ्सों के इरादों पर डालो
हर बंद के अंत में च्म्त्कार पैदा करने का सामर्थ्थ्य है

नचनिया सिर्फ़ भरे हुए
बटुवे को देखतीं हैं
कलाइयों को नहीं

चुम्बन
उछले
दर्द हाट में
बिकने लगा .....!!

शोभना चौरे said...

दर्द हाट में
बिकने लगा ....
bhut hi marmsprshi anubhuti .
jo dard ka utpadn bhutayat se krte hai kya ham kbhi jagruk ho payege? ki us dard ko na khride .
sundar abhivykti kiye badhai

डॉ. महफूज़ अली (Dr. Mahfooz Ali) said...

mam.......I am very thankful to u for ur nice and wonderful comments....... plz do follow my blog also...... I shall be thankful to u if u plz.......



Regards.........

मनोज गुप्ता said...

बहुत दर्द है आपकी रचनाओं में.
"दर्द हाट में
बिकने लगा .....!!"
बहुत ही मार्मिक पंक्तियाँ हैं.
आपकी रचनाओं को पढ़ कर किसी कवि की एक पंक्ति याद आ गई - हैं सबसे मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते है.
आपकी रचनाओं का इंतजार रहेगा.

BrijmohanShrivastava said...

""दर्द आँखों के रस्ते से बाहर चला गया ''सत्य किन्तु पीडा दायक /सामाजिक कुरीतियाँ ,क्या यही संस्कृति है जिसकी हम रात दिन दुहाई देते हैं

विक्रांत बेशर्मा said...

हरकीरत जी,
बहुत ही अच्छी नज्में लिखी हैं आपने,दर्द की परिभाषा ही बदल गई !!!!!!!!

kumar Dheeraj said...

लालटेन की
धीमी रौशनी में
उसने वक्त से कहा -
मैं जीवन भर तेरी
सेवा करुँगी
मुझे यहाँ से ले चल
वक्त हंस पड़ा
कहने लगा -
मैं तो पहले से ही
लूला हूँ ....
आधा घर का
आधा हाट का ....!!
बाकई बहुत अच्छी रचना लगी मुझे आभार

Sajal Ehsaas said...

ek aurat ki mukammal shakhsiyat ko samajhne ki har koshish apne aap mein khaas hai...aur ye to behad sateek aur sahityik baatein hai

جسوندر سنگھ JASWINDER SINGH said...

SAAGAR SI GEHRAYEE HAI AAPKE KHYAAL MEIN
AASMAN SI UNCHAYEE HAI AAPKE KHYAAL MEIN

'शफक़' said...

behad behad khoonsurat .. badhai

Prakash Badal said...

ये ही तो है हरकीरत हकीर वाह वाह वाह !:) आपकी कविताओँ की लाईने कोड इसलिए नहीं कर रहा कि पूरी कविताएँ ही पठनीय है।