Thursday, July 18, 2013

कुछ सेदोका ....


यही सेदोका २६ - ७ -१३ के दैनिक भास्कर समाचार- पत्र में भी ……



कुछ सेदोका ....


(सेदोका हाइकु की ही तरह काव्य की एक विधा है जो कि ५ + ७ +७ + ५ + ७+७  के क्रम में लिखे जाते हैं ....)


(१)
खूंटी पे  टंगा
हंसता है विश्वास
चौंक जाती धरा भी
देख खुदाया !
 तेरे किये हक़ औ'
नसीबों के हिसाब ...!

(२)

स्याह से लफ़्ज
दुआएं मांगते हैं
जर्द सी ख़ामोशी में
लिपटी रात
उतरी है छाती में
आज दर्द के साथ ....!

(३ )

आग का रंग
मेरे लिबास पर
लहू सेक रहा है
कैद सांसों में
रात मुस्काई  है
कब्र उठा लाई  है ....

(४)

दागा जाता है
इज्जत के नेजे पे
बेजायका सी देह
चखी जाती है
झूठी मुस्कान संग
दर्द के बिस्तर पे .....

(५)

कैसी आवाजें
बदन को छू गईं
अँधेरे की पीठ पे
नज़्म उतरी
तड़पकर आया
आज ख़याल तेरा ...!

(६)
कुछ चीखते
 जिस्मों की कहानियाँ
उतरी है पन्नो में
हर घर में
मरती  है औरत
आज भी पिंजरों में

(७ )

उधड़ा दर्द
बुनती है औरत
उलझे फंदे सारे
पंजे समेट
आया है चुपके से
टूटे धागे हैं सारे .

45 comments:

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

बहुत प्यारी लघु रचनाएं/सेदोके ...

yashoda agrawal said...

आपने लिखा....हमने पढ़ा....
और लोग भी पढ़ें; ...इसलिए शनिवार 20/07/2013 को
http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
पर लिंक की जाएगी.... आप भी देख लीजिएगा एक नज़र
लिंक में आपका स्वागत है ..........धन्यवाद!

अनुपमा पाठक said...

गहन सेदोके!

Reena Maurya said...

बेहतरीन सेदोका..
सुन्दर और भावपूर्ण ...
:-)

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत ही गहरे भाव, शुभकामनाएं.

रामराम.

expression said...

वाह हीर जी.....
कमाल के सेदोका लिखे हैं..
कैसी आवाजें
बदन को छू गईं
अँधेरे की पीठ पे
नज़्म उतरी
तड़पकर आया
आज ख़याल तेरा ...!

लाजवाब!!!
सादर
अनु

प्रवीण पाण्डेय said...

प्रवाहपूर्ण प्रयोगधर्मिता...

Maheshwari kaneri said...

बहुत खुबसूरत सी प्यारी प्रस्तुति....

Ashok Saluja said...

हीर जी ....बधाई और शुभकामनायें !
अन्यथा न ले ..अनपढ़ हूँ ..सिर्फ अपनी जानकारी के लिए ..वरना आप तो बेहतरीन हैं ..
मुझे पहले ही सेदोको की पहली ही लाइन में छे शब्द नज़र आ रहे हैं ....??? क्षमा सहित !

हरकीरत ' हीर' said...

शुक्रिया आदरणीय सलूजा जी ...गलती सुधार दी है ......:))

आशा जोगळेकर said...

दर्द से भरे
सेदोके सुंदर से
टूटे हुए सपने
और किरचें
चुभतीं सी दिल में
हर एक कदम ।

Anju (Anu) Chaudhary said...

वाह बहुत खूब ...हर बार कुछ नया सिखने और पढ़ने को मिलता है ....आभार

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

वाह... एक नै विधा में उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

गहन दर्द भरे सेडोका ....


दर्द ही दर्द
सेदोका में नीहित
चौंकता है पाठक
महसूसता
इंसानी पीड़ा को
जो है केवल नारी ।

Anita (अनिता) said...

दर्द किसी भी विधा में बयाँ हो... छलक ही जाता है...
बहुत-बहुत सुंदर अभिव्यक्ति...

~सादर!!

vandana gupta said...

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(20-7-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
सूचनार्थ!

आशा बिष्ट said...

उफ़ दर्द ही दर्द...

कविता रावत said...

सेदोका हाइकु से परिचय और सुन्दर सार्थक लघु रचना प्रस्तुति के लिए धन्यवाद ...

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

बहुत सुंदर
सभी सेदोके एक से बढ़कर एक


मेरी कोशिश होती है कि टीवी की दुनिया की असल तस्वीर आपके सामने रहे। मेरे ब्लाग TV स्टेशन पर जरूर पढिए।
MEDIA : अब तो हद हो गई !
http://tvstationlive.blogspot.in/2013/07/media.html#comment-form

संजय भास्‍कर said...



बदन को छू गईं
अँधेरे की पीठ पे
नज़्म उतरी
तड़पकर आया
आज ख़याल तेरा ...!

वाह हीर जी.....लाजवाब!!!

Ramakant Singh said...

बेहतरीन सेदोका *****

कौशलेन्द्र said...

सदके या सेदोके जो भी हैं दर्द से लबरेज़ लगे। गणित में कमज़ोर रहा हूँ इसलिये हम किसी 5-7-के चक्कर में नहीं फसते। हम ठहरे आज़ाद पंछी अक्षर 6 हों या 4 क्या फ़र्क पड़ता है दिल को जमना चाहिये बस हो गया। अब मुझे "सोणिये" कहना हो तो मैं 5-7 कहाँ से लाऊँ? 5 के चक्कर में बोलना पड़ेगा "सुनो सोणिये" मगर इसमें वह मजा कहाँ जो सिर्फ़ सोणिये में है।

हरकीरत ' हीर' said...

हा .... हा .....हा ......कौशलेन्द्र जी आप सोणिए ही कहिये ...ये विधा भी वैसी ही है जैसे गज़ल को बह्र में लिखना जो पारंगत हैं वो तो गज़ब की लिख लेते हैं हम जैसे नौसिखिये बह्र के चक्कर में ग़ज़ल बर्बाद कर लेते हैं .....

कौशलेन्द्र said...

कविता उसी तरह झरती है जैसे चाँदनी। चाँद को पता नहीं होता कि कोई उसकी रौशनी का कितना दीवाना है ..और यह कि कब ज़्यादा झरना है और कब कम। कविता तो तब भी झरती है जब चाँद को बादल छेड़ने लगते हैं। कविता तब भी झरती है जब चाँद दिन के उजाले में कहीं घूमने निकल जाता है और हम उसे अपनी नासमझी में इधर उधर तलाशते रहते हैं। कविता बिना गणित के भी झरती है और गणित के साथ भी। हम बिना गणित वाले हैं। ...और हाँ ...अब मैंने भी एक सेदोका लिख दिया है बिना गणित वाला - "सोणिये! / तुम कहाँ छिप जाती हो/ अक्सर / मैं तलाशता हूँ तुम्हें / ताकि लिख सकूँ एक सेदोका/ झरती चाँदनी में / सेदोका तो मैं तब भी लिखता हूँ / जब नहीं होती हो तुम / किंतु तब कविता / सहम-सहम कर झरती है / अच्छा बताओ / कल तो आओगी ना!

हरकीरत ' हीर' said...

क्या बात है ...:))
आपकी कलम से तो कवितायेँ फूल सी झरती हैं .....
पुस्तक निकालिए अब ....
किसी प्रकाशक से बात करूँ ....?

कौशलेन्द्र said...

बुज़ुर्गों ने कहा है कि बेबी साहित्यकारों को प्रकाशकों से डरना चाहिये। जब मैं भी आपकी तरह बड़ा हो जाऊँगा तब बात कीजियेगा प्रकाशक से। अभी तो मैं ख़ुद शर्माता हूँ ....

कालीपद प्रसाद said...


बहुत सुन्दर अर्थपूर्ण रचना !
latest post क्या अर्पण करूँ !
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sushma 'आहुति' said...

भावों से नाजुक शब्‍द.

Ashok Khachar said...

बहुत बहुत सुंदर

दिगम्बर नासवा said...

प्रभावी हैं सभी सेदोका ... अपनी बात को स्पष्ट कह जाते हैं ... लाजवाब ...

jyoti khare said...

नया प्रयोग किया है "सेदोका" लिखकर
बहुत सुंदर
उत्कृष्ट प्रस्तुति
सादर

आग्रह है---
केक्ट्स में तभी तो खिलेंगे--------

amar said...

I liked your poem

amar said...

Shall I share your poem with your reference with your due permission if you please permit me to I shall mention your name with reference to this excellent poem :)

amar said...

Harkeerat ji ! Shall I share you poem on my facebook post with your reference ? :)

ताऊ रामपुरिया said...

आपकी यह रचना आज दैनिक भास्कर में छपी है, बधाई.

मैने इसकी इमेज आपको मेल की थी पर यह वापस (failed) आ गई है.

रामराम.

ताऊ रामपुरिया said...

आपकी यह रचना आज दैनिक भास्कर में छपी है, बधाई.

मैने इसकी इमेज आपको मेल की थी पर यह वापस (failed) आ गई है.

रामराम.

हरकीरत ' हीर' said...

shukriyaa tau ji ...mujhe kisi aur ne bhi btaataa tha ...aap kripyaa mujhe fir se e mail kar dein ....harkirathaqeer@gmail.com par .....

हरकीरत ' हीर' said...

Amar ji aap ise facebook par share kar sakte hain mere naam ke saath .....thanks ...!!

ajay yadav said...

सुंदर लेखन ,
पहली बार सेदोका पढ़ा |
अच्छा लगा ,इसके बारे में व्याकरण सम्बन्धी जानकारी कहाँ मिलेंगी ?
कृपया ब्तायियेंगा |
http://drakyadav.blogspot.in/

सदा said...

कैसी आवाजें
बदन को छू गईं
अँधेरे की पीठ पे
नज़्म उतरी
तड़पकर आया
आज ख़याल तेरा ...!
ये ख्‍याल तड़पकर हर बार आ ही जाता है
कितना कुछ अनकहा सा कहने के लिए
नि:शब्‍द करती आपकी लेखनी ... प्रकाशन के लिए बधाई भी !!!

राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी' said...

बहुत सुन्दर सेदोके बहुत बहुत बधाई

Neeraj Kumar said...

बहुत सुन्दर और मर्मस्पर्शी रचनाएँ । देखन में छोटन लगे घाव करे गंभीर ।

शिवनाथ कुमार said...

नारी मन की संवेदना को लिए सुन्दर सेदोका
साभार !

Onkar said...

निःशब्द

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

aan ek nayee bidha kee jaankaare hui ..aaur hamne iska lutf bheee uthaya ..maine aapka blog join kar liya hai .ab aapko satat padhne ka mauka milta rahega ..aapko bhee main apne blog se judne ke liye amantrit kar raha hoon /..saadar