Friday, May 24, 2013

इक कोशिश ....

इक कोशिश ....

ज़ख़्मी जुबान 
मिटटी में नाम लिखती है
कोई जंजीरों की कड़ियाँ तोड़ता  है
दर्द की नज़्म लौट आती है समंदर से
दरख्त फूल छिड़क कर
मुहब्बत का ऐलान करते हैं
मैं रेत से एक बुत तैयार करती  हूँ
और हवाओं से कुछ सुर्ख रंग चुराकर
रख देती हूँ उसकी हथेली पे
मुझे उम्मीद है
इस बार उसकी आँखों  से
आंसू जरुर बहेंगे ....!!

हरकीरत हीर ..

43 comments:

yashoda agrawal said...

आपने लिखा....
हमने पढ़ा....
और लोग भी पढ़ें;
इसलिए शनिवार 25/05/2013 को
http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
पर लिंक की जाएगी.
आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
लिंक में आपका स्वागत है .
धन्यवाद!

Prakash Jain said...

मैं रेत से एक बुत तैयार करती हूँ और हवाओं से कुछ सुर्ख रंग चुराकर रख देती हूँ ....

bahut khoob...

India Darpan said...

बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


इंडिया दर्पण
की ओर से आभार।

expression said...

वाह........
आँख से आँसू बहेंगे और लब मुस्कुराएंगे.

सादर
अनु

Anupama Tripathi said...

हृदयस्पर्शी ....बहुत सुन्दर ...

Ashok Saluja said...

जख्मी जुबां और दर्द में डूबा दिल ....
सिर्फ अपने ही आंसुओं का मोहताज़ होता है ???
शुभकामनायें!

हरकीरत ' हीर' said...

आंसू बहेंगे तो बुत पिघलेगा ....और मुहब्बत जाग उठेगी ...आदरणीय अशोक जी .....

Maheshwari kaneri said...

बहुत खुबसूरत अहसास.....आंसू बहेंगे तो बुत पिघलेगा ....और मुहब्बत जाग उठेगी ...्क्या बात है हीर जी..एक पिघलता है दूसरा जागृत होता है..

डॉ टी एस दराल said...

इन आंसुओं से बुत तो क्या, पत्थर भी पिघल जायेगा ।

shikha kaushik said...

सार्थक भावनात्मक अभिव्यक्ति .आभार . हम हिंदी चिट्ठाकार हैं.
BHARTIY NARI .

jyoti khare said...

मैं रेत से एक बुत तैयार करती हूँ
और हवाओं से कुछ सुर्ख रंग चुराकर
रख देती हूँ उसकी हथेली पे-----

प्रेम का अदभुत अहसास
बहुत सुंदर नज्म
बधाई

आग्रह हैं पढ़े
ओ मेरी सुबह--

शालिनी कौशिक said...

बहुत सुन्दर भावनात्मक अभिव्यक्ति .मन को छू गयी .आभार . कुपोषण और आमिर खान -बाँट रहे अधूरा ज्ञान
साथ ही जानिए संपत्ति के अधिकार का इतिहास संपत्ति का अधिकार -3महिलाओं के लिए अनोखी शुरुआत आज ही जुड़ेंWOMAN ABOUT MAN

RAHUL- DIL SE........ said...

मैं रेत से एक बुत तैयार करती हूँ
और हवाओं से कुछ सुर्ख रंग चुराकर
रख देती हूँ उसकी हथेली पे....
--------------
पत्थर भी पिघल जाएगा.......

कालीपद प्रसाद said...

बहुत ही बहतरीन रचना !
अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
latest post: बादल तू जल्दी आना रे!
latest postअनुभूति : विविधा

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

रेट से बूट बनाने की कोशिश ही सारगर्भित है .... मर्मस्पर्शी ।

Anju (Anu) Chaudhary said...

जिंदगी की एक सच्चाई

ताऊ रामपुरिया said...

मैं रेत से एक बुत तैयार करती हूँ
और हवाओं से कुछ सुर्ख रंग चुराकर
रख देती हूँ उसकी हथेली पे
मुझे उम्मीद है
इस बार उसकी आँखें से
आंसू जरुर बहेंगे ....!!

बहुत ही रूहानी कल्पना, शुभकामनाएं.

रामराम.

Prashant Suhano said...

सुन्दर कविता....

आशा बिष्ट said...

ना जाने कितनी कोशिश करते हैं हम उन्हें अपने रंग में रगने के लिए
बहुत सुन्दर ।।

आशा बिष्ट said...

ना जाने कितनी कोशिश करते हैं हम उन्हें अपने रंग में रगने के लिए
बहुत सुन्दर ।।

Ashok Khachar said...

बहुत ही बेहतरीन

Parul kanani said...

kya likhti hai aap...main to bas yahi sochti rah jati hoon..sahi mein!

Onkar said...

बहुत सुन्दर

सतीश सक्सेना said...

तड़प मजबूर कर देगी...
शुभकामनायें आपको !

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

बहुत सुंदर रचना
क्या बात

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

वाह... उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...
plz visit and listen-
मेरी बेटी शाम्भवी का कविता पाठ

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

वाह... उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...

@मेरी बेटी शाम्भवी का कविता-पाठ

सुमन कपूर 'मीत' said...

बहुत बढ़िया हीर जी

vandana said...

दरख्त फूल छिड़क कर
मुहब्बत का ऐलान करते हैं

बहुत सुन्दर

Ramakant Singh said...

दिल को छू गई सुप्रभात
निःशब्द करती

आनंद कुमार द्विवेदी said...

उसकी आँखों में तो समंदर बस्ता है हीर जी , ये रेत ये प्रतिमा सब वही तो है बस कसीदाकारी आपकी है बहुत सुन्दर नज़्म !

दिगम्बर नासवा said...

मैं रेत से एक बुत तैयार करती हूँ
और हवाओं से कुछ सुर्ख रंग चुराकर
रख देती हूँ उसकी हथेली पे
मुझे उम्मीद है
इस बार उसकी आँखें से
आंसू जरुर बहेंगे ....!!

कुछ कहने लायक नहीं छोड़ती ये रचना ...
निःशब्द ...

प्रवीण पाण्डेय said...

शब्द कहेंगे, भाव बहेंगे।

रचना दीक्षित said...

मुहब्बत मुकम्मल हो. सुंदर नज़्म.

सदा said...

मैं रेत से एक बुत तैयार करती हूँ
और हवाओं से कुछ सुर्ख रंग चुराकर
रख देती हूँ उसकी हथेली पे
रेत का बुत ... हवाओं के सुर्ख रंग
और उसकी हथेली
वाह !!! कैसा ये मंज़र है बस नमी ही नमी है हर तरफ ...
सादर

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

अच्छी प्रस्तुति....बहुत बहुत बधाई...

@मेरी बेटी शाम्भवी का कविता-पाठ

कविता रावत said...

मुझे उम्मीद है
इस बार उसकी आँखें से
आंसू जरुर बहेंगे ....!!
,,सच उम्मीद कभी नहीं छोडनी चाहिए ..
इस बार उसकी आँखें से...इस पंक्ति में ऑंखें की जगह "आँखों" या 'आँख' कर लीजिये ..

हरकीरत ' हीर' said...

शुक्रिया कविता जी 'आँख' नहीं 'आँखों' होगा .... ध्यान नहीं गया ....

M VERMA said...

बुतों की बुतपरस्ती कब तक
कोशिश कामयाब हो

आशा जोगळेकर said...

आँसूओं से भी सुख की अभिव्यक्ति होती ही है ।

Anjana kumar said...

दर्द की नज़्म लौट आती है समंदर से....
वाह बहुत खूब.

सु..मन(Suman Kapoor) said...

वाह हीर जी ... बहुत सुंदर

Manav Mehta 'मन' said...

ये आँखे तो भीग गयी हैं।