Friday, October 2, 2009

इमरोज़....मोहब्बत की एक अदीम मिसाल .......

मरोज़ ......इक ऐसा नाम....जो आने वाली पीढी के लिए ......मोहब्बत की अदीम मिसाल होगा .....उनके साथ कई बार नज्मों के उत्तर-प्रत्युत्तर का सिलसिला चला .....वो हर नज़्म का जवाब नज़्म से देते .....पिछले दिनों अमृता के जन्मदिन पर भेजी गई नज़्म का जवाब उन्होंने एक लम्बी नज़्म से दिया .....ये नज़्म महज़ एक जवाब नहीं थी .....उन तमाम मोहब्बत करने वालों के लिए एक पैगाम भी थी ......वो पैगाम जिसे हम समाज के सामने कबूलने से कतराते हैं ....हम ज़िन्दगी को ढो तो लेते हैं पर जीने की हिमाकत नहीं कर पाते....इमरोज़ जी ने उसे कबूला भी और जिया भी ......पेश है इमरोज़ जी वही नज़्म ...." आदर "........

आदर........

किताबें पढने से लिखना पढ़ना आ जाता है
ज़िन्दगी पढ़ने से जीना
और प्यार करने से प्यार करना ......

सिगलीगरों ने पढ़ाई तो कोई नहीं की
पर ज़िन्दगी से पढ़ लिया लगता है
सिगलीगरों की लड़की जवान होकर
जिसके साथ जी चाहे चल फ़िर सकती है
दोस्ती कर सकती है
और जब वह अपना मर्द चुन लेती है
एक दावत करती है अपना मर्द चुनने की खुशी में
अपने सारे दोस्तों को बुलाती है
और सबसे कहती है कि आज अपनी दोस्ती पूरी हो गई
और उसका मन चाहा सबसे हाथ मिलाता है
फ़िर सब मिलके दावत का जश्न करते हैं ......

कुछ दिनों से ये दावत और ये दिलेरी जीने की
मुझे बार बार याद आती रही है
जो पढ़े लिखों की ज़िन्दगी में अभी तक नहीं आई
मेरे एक दोस्त को ज़िन्दगी के आखिरी पहर में
मोहब्बत हो गई ...
एक सयानी और खूबसूरत औरत से
दोस्त आप भी बहुत सयाना है- अच्छा है
मोहब्बत होने के बाद वो अपने घर में अपना नहीं रहा
घर में होते हुए भी घर में नहीं हो पाता
अब वो घरवाला ही नहीं रहा
पत्नी के पास पति भी नहीं रहा
पत्नी तो एक तरह से छूट चुकी थी
पर संस्कार नहीं छूट रहे थे .....

पता नहीं वो
आप नहीं जा पा रहा था
या जाना नहीं चाह रहा था
या संस्कार नहीं छोड़े जा रहे थे
मोहब्बत दूर खड़ी रास्ता देख रही थी
उसका जो अभी जाने के लिए तैयार नहीं था ......

जब पत्नी को पति की मोहब्बत का पता चला
पत्नी पत्नी नहीं रही न ही कोई रिश्ता रिश्ता रहा

मोहब्बत ये इल्जाम कबूल नहीं करती
पूछा सिर्फ़ हाज़र को जा सकता है
गैर हाज़र पति को क्या पूछना ....?
वह चुपचाप हालात को देख रही है
और अपने अकेले हो जाने को मान कर
अपने आप के साथ जीना सोच रही है ......

मोहब्बत ये इल्जाम कबूल नहीं करती
कि वो घर तोड़ती है
वह तो घर बनाती है
ख्यालों से भी खूबसूरत घर .......

सच तो ये है मोहब्बत बगैर
घर बनता ही नहीं ......

पत्नी अब एक औरत है
अपने आप की आप जिम्मेदार और ख़ुदमुख्तियार
चुपचाप चारों तरफ़ देखती है
घर में बड़ा कुछ बिखरा हुआ नज़र आता है
कल के रिश्ते की बिखरी हुई मौजूदगी
और एक अजीब सी खामोशी भी
वह सब बिखरा हुआ बहा देती है
और चीजों को संवारती है सजाती है
और सिगलीगरों की तरह एक दावत देने की
तैयारी करती है .......

इस तैयारी में बीते दोस्त दिन भी जैसे
उसमें आ मिले हों
मर्द को विदा करने के लिए .....

वह जा रहे मर्द की मर्ज़ी का खाना बनाती है
उसके सामने बैठकर उसे खाना खिलाती है
वो आँखें होते हुए भी आँखें नहीं मिलाता
सयानप होते हुए भी कुछ नहीं बोलता
वो चुपचाप खाना खाता है ....

उसकी सारी हौंद चुप रह कर भी बोल रही है
कि वो मोहब्बत में है
यहाँ चुप रहना ही सयानप है
कोई सफाई देने की जरुरत ही नहीं
कारण की भी नहीं
मोहब्बत का कोई कारण नहीं होता ....

जाते वक्त औरत
पैरों को हाथ लगाने की बजाये
मर्द से पहली बार हाथ मिलाती है
और कहती है- पीछे मुड़कर न देखना
आपकी ज़िन्दगी आपके सामने है
और 'आज ' में है
अपने आज का ख्याल रखना
मेरे फ़िक्र अब मेरे हैं
और मैं अपना ख्याल रख सकती हूँ .....

जो कभी नहीं हुआ वह आज हो रहा है
पर आज ने रोज़ आना है
ज़िन्दगी को आदर के साथ जीने के लिए भी
आदर के साथ विदा करने के लिए भी
और आदर से विदा होने के लिए भी .......!!

..... इमरोज़....

अदीम - अप्राप्य

76 comments:

विपिन बिहारी गोयल said...

कितनी सरहदें तोड़ता है ये प्यार ....मुझे तो कभी समझ नहीं आया ...पर जरूर कोई खुबसूरत अहसास होता होगा.सुंदर प्रस्तुति के लिए शुक्रिया

Mithilesh dubey said...

जो कभी नहीं हुआ वह आज हो रहा है
पर आज ने रोज़ आना है
ज़िन्दगी को आदर के साथ जीने के लिए भी
आदर के साथ विदा करने के लिए भी
और आदर से विदा होने के लिए भी .......!!

वाह जी क्या बात है। बेहतरिन

महफूज़ अली said...

किताबें पढने से लिखना पढ़ना आ जाता है
ज़िन्दगी पढ़ने से जीना
और प्यार करने से प्यार करना ......


yeh line bahut achchi lagin.........

Dr Ankur Rastogi said...

yahaan chup rehna hi sayanapan hai...........

कुमार आशीष said...

वो आँखें होते हुए भी आँखें नहीं मिलाता
सयानप होते हुए भी कुछ नहीं बोलता
वो चुपचाप खाना खाता है ....
कितनी खुदगर्ज मुहब्‍बत है मगर है तो है्...

Udan Tashtari said...

कोई सफाई देने की जरुरत ही नहीं
कारण की भी नहीं
मोहब्बत का कोई कारण नहीं होता ....

--आनन्द आ गया-बहुत आभार आपका इसे प्रस्तुत करने का.

चंदन कुमार झा said...

बहुत अच्छा लगा पढ़कर । आभार

अरविन्द श्रीवास्तव said...

जी, आभार...इमरोज जी की हृदयस्पर्शी नज्म के लिये...फिलहाल भॊड़ में खोने का डर नहीं लग रहा...!

अजित वडनेरकर said...

सच तो ये है मोहब्बत बगैर
घर बनता ही नहीं ......

बहुत बड़ी हकीक़त है। इमरोजजी बड़े और गहरे इनसान हैं। बचपन से मैं उनके बारे में पढ़ता रहा हूं और उनके लिए मेरे दिल में बहुत इज्ज़त है।

योगेश स्वप्न said...

bahut achchi nazm, aabhar.

neera said...

नज़्म भी और फलसफा भी..

JHAROKHA said...

हरकीरत जी इमरोज जी की इतनी बढ़िया नज्म पढ़वाने के लिये आभार्।
पूनम

sada said...

किताबें पढने से लिखना पढ़ना आ जाता है
ज़िन्दगी पढ़ने से जीना
और प्यार करने से प्यार करना ......

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों से सजी दिल को छूती पंक्तियां ।

सुशील कुमार छौक्कर said...

सुबह सुबह इतनी प्यारी खूबसूरत और जिदंगी का एक बेहतरीन फलसफा लिये रचना पढने को मिल गई। सच कहा है कि "हम ज़िन्दगी को ढो तो लेते हैं पर जीने की हिमाकत नहीं कर पाते"

किताबें पढने से लिखना पढ़ना आ जाता है
ज़िन्दगी पढ़ने से जीना
और प्यार करने से प्यार करना

सच्ची बात। इस रचना को पढते पढते ख्यालो में गुम बहता चला गया। सच उनकी बातों में भी ऐसा ही होता है। उनसे पुरानी दो मुलाकातें याद आ गई। जब उनसे मिला था। उनके बारें में बस यही कहूँगा कि ऐसे इंसान मिलते नही इस दुनिया में।

वन्दना अवस्थी दुबे said...

इमरोज़ जी की नज़्म पढवाने के लिये शुक्रिया. अमृता जी ने अनेक बार इमरोज़ की शख्सियत को खूबसूरती के साथ बयां किया है.

शरद कोकास said...

इस नज़्म को पढ़्ने के बाद इमरोज़ का एक अलग व्यक्तित्व नज़र आता है ।

पारूल said...

आभार आपका…

रश्मि प्रभा... said...

maun sukun mila imroz ko padhkar....

काजल कुमार Kajal Kumar said...

जिंदगी बराबरी का नाम है.

वन्दना said...

mohabbat ko naya aayam de diya ........jo na socha ho wo rang de diya .........ek behtreen jazbe ke sath likhigayi ..........padhwane ke liye shukriya.

अर्शिया said...

लाजवाब करती रचना।
Think Scientific Act Scientific

अमिताभ मीत said...

बेहतरीन ! शुक्रिया इसे पढ़वाने का.

mark rai said...

पता नहीं वो
आप नहीं जा पा रहा था
या जाना नहीं चाह रहा था
या संस्कार नहीं छोड़े जा रहे थे
मोहब्बत दूर खड़ी रास्ता देख रही थी
उसका जो अभी जाने के लिए तैयार नहीं था ......
सुंदर प्रस्तुति के लिए शुक्रिया.....

ANAAM. JASWINDER (001-514-447-1562) said...

Harkirat ji,
shabad nahi mil rahe aapkey dhanyavaad ke liye

creativekona said...

इमरोज जी की इतनी खूबसूरत रचन पढ़वाने के लिये आपको हार्दिक आभार्।
हेमन्त कुमार

Priya said...

Imroz Jee hamhein to kisi chamatkaar se kam nahi lagte.......unke vyaktitva ki tarah nazm bhi achchi hai

Nirmla Kapila said...

इमरोज़ की कलम किसी भी प्रतिक्रिया की मोहताज़ नहीं है मगर आपका बहुत बहुत धन्यवाद कि आपने हमे ये नज़्म पढवाई आभार्

Rakesh said...

जाते वक्त औरत
पैरों को हाथ लगाने की बजाये
मर्द से पहली बार हाथ मिलाती है
और कहती है- पीछे मुड़कर न देखना
आपकी ज़िन्दगी आपके सामने है
और 'आज ' में है
अपने आज का ख्याल रखना
मेरे फ़िक्र अब मेरे हैं
और मैं अपना ख्याल रख सकती हूँ .....

जो कभी नहीं हुआ वह आज हो रहा है
पर आज ने रोज़ आना है
ज़िन्दगी को आदर के साथ जीने के लिए भी
आदर के साथ विदा करने के लिए भी
और आदर से विदा होने के लिए भी .......!!
wah
imroz to imroz hai
amrita janti thi janti hai janeti rehegi wo kya hai...wah wah
aapko bahut dhanyawad ki aapne iimroz ko padhne ka mouka diya

केतन कनौजिया 'शाइर' said...

Amrita-Imroz wakai mohabbat ki ek anokhi misal hain.. nazm behtareen hai

sarwatindia said...

नज़्म मानवीय सम्बन्धों, रिवाजों, बन्धनों के साथ मानव मनोविज्ञान की पूरी पड़ताल है.

RAJESHWAR VASHISTHA said...
This comment has been removed by the author.
RAJESHWAR VASHISTHA said...

इमरोज़ लाजवाब पेंटर और शायर हैं.... उनसे पहली बार 1982-83 में मिला था, अमृताजी को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने घोषणा के अगले ही दिन मैंने राजस्थान पत्रिका के लिए उनका साक्षात्कार लिया था...... अमृताजी इमरोज़ पर मेहरबान थीं और इमरोज़ उनके प्रेमी होकर भी उनके साथ रहते हुए भी अपनी कला के लिए समर्पित थे..... उनका साथ एक सुखद संयोग था....... यह नज़्म उसी कहानी को एक अछूते तरीक़े से बयाँ करती है....

Harkirat Haqeer said...

विपिन जी आपको क्यों समझ नहीं आया ....जबकि आपकी इस बार की नज़्म भी कुछ इसी तरह की है .....

राह के हर पत्ते पर तेरा नाम लिख कर
स्याह रातों में अक्सर चिल्लाया तेरा नाम लेकर

ये मोहब्बत नहीं तो और क्या है ....?

डाक्टर रस्तोगी जी ....ये चुप्पी क्यों ....?

यूँ इमरोज़ जी की मेरे पास और भी नजमें थीं पर इस नज़्म को पेश करने का खास मकसद था ...एक तो आप सब की प्रतिक्रिया जानना चाहती थी .....दूसरे एक मित्र की दुविधा भी थी ....और एक बात इमरोज़ जी को आप सब की प्रतिक्रियाओं से परिचित भी कराना है ...!!

सुशील जी आप yakinan khusnseeb hain jo इमरोज़ जी से मिल चुके हैं ....!!

Shrad ji koun sa alag vyaktitav...Imroz to ek khuli ki kitaab hain ....!!

Rakesh ji aapki santushti sukun de gayi......shukariya .....!!

SACCHAI said...

" bahad hi khubsurat rachana ...sunder ati sunder ...aapko bahut bahut badhai "


----- eksacchai { AAWAZ }

http://eksacchai.blogspot.com

Manoj Bharti said...

जो कभी नहीं हुआ वह आज हो रहा है
पर आज ने रोज़ आना है
ज़िन्दगी को आदर के साथ जीने के लिए भी
आदर के साथ विदा करने के लिए भी
और आदर से विदा होने के लिए भी .......!!

जिन्दगी को आदर के साथ जी लेना ही और
फिर इसे आदर के साथ विदा कर देना ही
हौंद को बचाए रखने का रहस्य है

जिसे अमृता जी बहुत गहराई से समझती थी,
और इसीलिए हौंद (अस्तित्व) के परम रहस्य को भी जान सकी ।

अमृता और इमरोज को याद दिलाने के लिए और उनकी रचनाओं से परिचित करवाने के लिए आभार ।

raj said...

मोहब्बत ये इल्जाम कबूल नहीं करती
कि वो घर तोड़ती है
वह तो घर बनाती है
ख्यालों से भी खूबसूरत घर .......ek khoobsurat ahsaas hua padh ke...

Murari Pareek said...

मोहब्बत खुदाकी इबादत है, भगवान् की भक्ति है बशर्ते मोहब्बत पाक हो ! मोहब्बत दिल तोड़ती नहीं जोड़ती है ! जिसने आगे की जिंदगी जीने के लिए आज़ाद किया वो भी मोहब्बत में थी !! बोर धुनिया अपुनार लेखा टु लेखा टु धुनिया होबोई लागिबो ! बारू ईद आरू पूजा र शुभोकमाना !!

"अर्श" said...

शुक्रिया नहीं कहूँगा इस नायब नज़्म को हम तलक पहुंचाने के लिए बल्कि मैं तो कर्जदार हो गया इस मोहब्बत के फ़रिश्ते को पढ़ कर .. आभार आपका जी

अर्श

मीनू खरे said...

हरकीरत जी इतनी बढ़िया नज्म के लिये आभार्।

दिगम्बर नासवा said...

ITNI KHOOBSOORAT NAJM .....AAPKA BAHOOT BAHOOT SHUKRIY..... PYAAR KI KOI SEMA NHI HOTI, PYAAR BAS PYAAR KI BHASHAA SAMAJH JATA HAI .... BINA ABHIVYAKT KIYE ...

अल्पना वर्मा said...

'सच तो ये है मोहब्बत बगैर
घर बनता ही नहीं ......'

सुंदर प्रस्तुति !
नायब नज़्म!!
आभार

समयचक्र - महेंद्र मिश्र said...

इमरोज जी की इतनी खूबसूरत रचना प्रस्तुति के लिए आभार.

गर्दूं-गाफिल said...
This comment has been removed by the author.
गर्दूं-गाफिल said...

हरकीरत जी
नजर ए इनायत के लिए शुक्रिया

इमरोज़ की नज़्म ने आँख नम कर दी
और जेहन सवालों से भर दिया
एक ही जिंदगी अपने काबू में है
वक़्त है कीमती जाया क्यूँ कर दिया
जो घरोंदे गए ,बे पसीना न थे,,,
मिला था लहू भी जिगर जान का
आँख roye न roye मगर dilka क्या
zakhm bahta है jhar jhar katee aan का
shauke bijlee ने foonka nasheman को
है andaz किसको दिल के toofan का
niradar की saree haden langh कर
ये dava ?bachaya है samman को
uf katil muqaddar को क्या अब kahen
til til jalata है ये jan को

bahut sundar nazm prastut karne ke liye badhaee

ज्योति सिंह said...

bahut khoobsurat rachna .mere paas imroz ji ki tasvir bhi hai amrita ji ke saath ,isliye ye mere dil ko chhoo gayi aur main padhte huye shabdo me kho bhi gayi .amrita ji ki rachana me inka jikr kafi hai .aapko dhero dhanyawaad .achchha laga byan nahi kar sakati .

Bahadur Patel said...

bahut badhiya hai.

SANJEEV MISHRA said...

मोहब्बत होने के बाद वो अपने घर में अपना नहीं रहा
घर में होते हुए भी घर में नहीं हो पाता
अब वो घरवाला ही नहीं रहा
पत्नी के पास पति भी नहीं रहा
पत्नी तो एक तरह से छूट चुकी थी
पर संस्कार नहीं छूट रहे थे .....

इमरोज़ की इस ना पढी हुई बेहद खूबसूरत नज़्म को पढने का मौका देने का शुक्रिया.

कहते हैं : " मुहब्बत के लिए कुछ ख़ास दिल मखसूस होते हैं ,
ये वो नग्मा है जो, हर साज़ पर गाया नहीं जाता ."
इस नज़्म को वही समझ और महसूस कर सकता है जिसने इस नगमे को दिल के साज़ पर सुन पाने की खुशनसीबी हासिल की हो.

बहुत बहुत शुक्रिया, और हाँ ब्लौग पर आने का भी.

सतीश सक्सेना said...

जो पहले कभी नहीं हुआ, उसे आज होना ही चाहिए , यही जीवन है !

अनिल कान्त : said...

उस एहसास को कितने खूबसूरती से यहाँ लिखा गया है
वाह !!

MUFLIS said...

imroz....
aur
muhobbat...
ek-dusre ke
poorak hi to haiN .

Apoorv said...

इमरोज़ साहब के बारे मे कुछ कुछ सुना और काफ़ी कुछ पढ़ा भी था..बड़ी और अज़ीम शख़्सियत की यह खासियत होती है कि वो रुखसत होने से पहले द्दुनिया को कुछ खास और खूबसूरत सी चीजें दे जाती है कि जिंदगी से बेजार और हारे हुए लोगों मे भी एक जज्बा और जीने की चाह आ जाती है..और यहाँ पर वो लेगेसी यह नज़्म नही है बल्कि उसमे नज़ाकत से लपेटे वो अहसास और जज्बातों की वो शिद्दत है जो कि जिंदगी और इसकी इन्ग्रेडिएन्ट्स पर यकीन और गाढ़ा कर देती है.
हालाँकि रिलेवेन्ट तो नही है मगर पाश साहब के चिडियों दे चंबे सी फ़ील आ गयी..पढ़ कर.
शुक्रिया

Mumukshh Ki Rachanain said...

कुछ दिनों से ये दावत और ये दिलेरी जीने की
मुझे बार बार याद आती रही है
जो पढ़े लिखों की ज़िन्दगी में अभी तक नहीं आई
*****************************************
पूछा सिर्फ़ हाज़र को जा सकता है
****************************************
कोई सफाई देने की जरुरत ही नहीं
कारण की भी नहीं
मोहब्बत का कोई कारण नहीं होता ....
*************************************
मर्द से पहली बार हाथ मिलाती है
और कहती है- पीछे मुड़कर न देखना
आपकी ज़िन्दगी आपके सामने है
और 'आज ' में है
अपने आज का ख्याल रखना
मेरे फ़िक्र अब मेरे हैं
और मैं अपना ख्याल रख सकती हूँ .....
************************************************
ज़िन्दगी को आदर के साथ जीने के लिए भी
आदर के साथ विदा करने के लिए भी
और आदर से विदा होने के लिए भी .......!!
**************************************************
जिसने भी तहे दिल से उपरोक्त फलसफे अपनी ज़िन्दगी में उतार लिए, वस्तुतः उसने ही असली मुहब्बत के संग जीना सिखा है, बाकि सब तो दिखावा है, अहम् है,.............

आपका हार्दिक आभार, इमरोज़ जी की इस अद्वितीय मुहब्बती नज़्म से रूबरू करवाने के लिए.
इमरोज़ जी को सदर मुहब्बती नमन.

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com

Manoj Bharti said...

हरकिरत जी !

आप ऊब का बहुत सुंदर उपयोग करती हैं
स्वयं को खोजने के लिए

आपने तो कविता के मर्म से कहीं आगे की टिप्पणी कर दी ।

richa said...

मोहब्बत का कोई कारण नहीं होता ....
इमरोज़ जी के बारे में कुछ भी कहने के लिये हम बहुत छोटे हैं, वो तो स्वयं ही मोहब्बत का एक साकार रूप हैं...
उनकी ये बेहतरीन नज़्म पढ़वाने का शुक्रिया हरकीरत जी

Dipak 'Mashal' said...

bahut naam suna tha aapka aur ye naam auron se kafi alag bhi hai. pahli baar aapke blog ki dahleez paar ki, ab ek mukammal guru talash raha hai mera jihan aapke tajurbe me.

monali said...

Pyaar karne k liye to shayad jang ladne se bhi zyada himmat chahiye...sundar rachna...

arun c roy said...

"किताबें पढने से लिखना पढ़ना आ जाता है
ज़िन्दगी पढ़ने से जीना
और प्यार करने से प्यार करना ......"

kavita toh bas in panktiyon mein puri ho gai hai... aage toh bas uska vistaar se byaura hai... bahut sundar rachna! bahut bahut badhai !

sadar

Sheena said...

bahut hi umda nazm

-Sheena

शोभना चौरे said...

इन्सान का एक व्यक्तित्व होता है जो सब जानते है पर प्यार का इजहार कबूल करना उस व्यक्तित्व में निखार ला दे देता है |

किताबें पढने से लिखना पढ़ना आ जाता है
ज़िन्दगी पढ़ने से जीना
और प्यार करने से प्यार करना
koi shabd hi nhi......

डॉ .अनुराग said...

इमरोज की इस नज़्म से वाकिफ हूँ...उनकी पहली किताब मेरी अलमारी में है ...

मानव मेहता said...

"हम ज़िन्दगी को ढो तो लेते हैं पर जीने की हिमाकत नहीं कर पाते"

इमरोज जी की इतनी खूबसूरत रचन पढ़वाने के लिये आपको हार्दिक आभार्। आनन्द आ गया

मानव मेहता said...

"हम ज़िन्दगी को ढो तो लेते हैं पर जीने की हिमाकत नहीं कर पाते"

इमरोज जी की इतनी खूबसूरत रचन पढ़वाने के लिये आपको हार्दिक आभार्। आनन्द आ गया

मानव मेहता said...
This comment has been removed by the author.
मानव मेहता said...

thanks harkirat ji apna samay mere blog ko dene ke liye aur tipani dene ke liye... vaise mere saransh-ek-ant blog par bhi aapka swagat hai.kuch naya likha hai,unhe padiye aur marg darshan kijiye......

Meenu Khare said...

किताबें पढने से लिखना पढ़ना आ जाता है
ज़िन्दगी पढ़ने से जीना
और प्यार करने से प्यार करना ......

इमरोज जी की इतनी बढ़िया नज्म पढ़वाने के लिये आभार।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

सुंदर भाव।
करवाचौथ और दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।
----------
बोटी-बोटी जिस्म नुचवाना कैसा लगता होगा?

Vijay Kumar Sappatti said...

harkirat ji

namaskar

imroz ji ke baare me kuch bhi kahna mohabbat ke suraj ko diya dikhlana honga .

he is a living legend of love..

kuch din pahle hi unse baat hui thi ..
unhone recently mujhe ek bahuyt acchi line likh kar bheji thi . jo ki hamesha ke liye mere dilo dimaag par chap gayi ..

"vijay , everything you love is yours "

imroz ji se milna , unki simple aur sahaz baate sunna aur sirf aur sirf mohabbat aur painting aur kavityao ke baare me baat karna , apne aap me ek na bhulaya jaane waal experiance hai

aap bahut khush naseeb hai ki unhone ye nazm aapko bheji ..

is post ke liye meri badhai sweekar kare..

dhanywad

vijay
www.poemofvijay.blogspot.com

ओम आर्य said...

ek bahut hi mulyawan rachana .....padhaawaane ke liye bahut bahut shukriya

Pawan Kumar said...

सिगलीगरों ने पढ़ाई तो कोई नहीं की
पर ज़िन्दगी से पढ़ लिया लगता है
सिगलीगरों की लड़की जवान होकर
जिसके साथ जी चाहे चल फ़िर सकती है
दोस्ती कर सकती है
और जब वह अपना मर्द चुन लेती है
एक दावत करती है अपना मर्द चुनने की खुशी में
अपने सारे दोस्तों को बुलाती है
और सबसे कहती है कि आज अपनी दोस्ती पूरी हो गई
और उसका मन चाहा सबसे हाथ मिलाता है
फ़िर सब मिलके दावत का जश्न करते हैं .....

aap acha likhti hain, kisi jaati ki parampara ko sunder bhav se abhivyakt karne ki kala aapki achi hai.

waise rajiv ji se mere rishte bahut purane hain, wo mere boss 4 saal pehle the or boss e jyada bade bhai ki tarah rahe mere ath chandigarh me

manu said...

अभी वक्त नहीं है जी पोस्ट पढने का...
आपको और सभी पाठकों को करवाचौथ की बधाई...


lekin nazm padh hi gayaa.....

hauz khaas ke itne paas mein rah kar bhi imroj yaa pratimaa se mulaakaat naa ho paane ka dukh hai hamein...

khoobsoorat nazm.....

kumar zahid said...

आप खड़ी हैं ,
इमरोज की कविता खडी ़है.
और मुहब्बत हवा की तरह फैली हुई है
कभी कभी जिस्म मुहब्बत हो जातेहै
और मुहब्बत शब्द नहीं होती
शब्दों का सहारा नहीं लेती
इसलिए जब मुहब्बत होती है तो
फिर वही होती है
हम तुम वो नहीं होते
.....
इमरोज की बयानी
इश्क की तर्जमानी
असपकी जुबानी
शादमानी
उफ्

संजय भास्कर said...

किताबें पढने से लिखना पढ़ना आ जाता है
ज़िन्दगी पढ़ने से जीना
और प्यार करने से प्यार करना ......


yeh line bahut achchi lagin.........

संजय भास्कर said...

आपको हार्दिक आभार्। आनन्द आ गया

हम बोलेगा तो बोलो गे की बोलता है said...

maaf krna ,adeem? mere shabdkosh mein ye shbd ab tk nhin tha . muhjey maatr azeeem ka pta tha .. adeem ke maaney btaiye ga to mere giankosh me izafa hoga.. sdhnyvaad
deepzirvi@yahoo.co.in

Harkirat Haqeer said...

दीप जी,

अदीम अरबी का शब्द है जिसका अर्थ है अप्राप्य .....अब अप्राप्य का अर्थ तो आपको पता ही होगा .....??

RAJ SINH said...

वाह इमरोज़ . यह आप ही हो सकते हो . अमृता का अमृत अभी तक बरक़रार है .क्या खूब !
हरकीरत जी बहुत ही धन्यवाद .