Thursday, October 22, 2009

रितिका के नाम .......

आसमां के चाँद पे तो जीवन के आसार दिखाई देने लगे हैं .....पर धरती का चाँद आज भी रातों में सिसकता है ....समाज के बनाये रस्मों - रिवाजों में बंधी ये नारी जब भी अपने हक के लिए खामोशी का लिबास उतारती है तो उसे मौत की सजा मिलती है .....जी हाँ ; पिछले दिनों (२५ सितं.) इस शहर में ऐसा ही एक दिल दहला देने वाला हादसा हुआ ....रितिका जैन जो पहले ही अपने शौहर की बेवफाई का ग़म झेल रही थी अपने देवर व सास द्वारा जिन्दा जला दी जाती है ......मन तभी से बेचैन था ......कुछ न कर पाने का मलाल भी ....आज इस नज़्म को लिखते वक्त न जाने कितनी बार आँखें नम हुई होंगी .....बस जहन में एक ही सवाल कौंधता है ....क्यों .....? क्यों...... ?? क्यों .....???
पर जवाब नदारद होता .......

रितिका तुम्हें नम आंखों से ये नज़्म समर्पित है .......

ह कपड़ों से
अंगारों की राख़ झाड़ती
तो ज़ख्मों की कई सुइयां गिर पड़तीं
जुबां दर्द का शोर मचाती
तो सन्नाटे के कई टुकड़े
कोरे कागज़ पर, स्याह रंग फैला देते
और फ़िर इक दिन, यही स्याह रंग
लील जाता है उसे
आग की शक्ल में ......

आह .....!!
ज़मीं बिक जाती है पर
उसके दुःख का बंटवारा नहीं होता
दूर कहीं पहाड़ी के नीचे हरियाली थी
मगर उसके लिए वहाँ तक पहुँच पाना
नामुमकिन.....

इक दिन न जाने कहाँ से
इक आवारा मौज
बहा ले गई थी,उसके बदन की खुशबू
जब हवाओं ने विरोधी रुख अख्तियार किया
तो बादल बागी हो गया था
और फ़िर फैलती गयीं बिस्तर पे
दर्द की सिलवटें .......

दीवारों की खामोशी से अब
उस पर लगीं तसवीरें
तिड़कने लगीं ...
खिलौने टूटते तो
कितने ही हर्फ़ जिंदा दफ्न हो जाते
ए.सी.की सर्द हवा
तल्खी में तब्दील हो
हलक में मुर्दा सांसें लेने लगतीं
शीशे में बंद मछलियाँ
काँटों की झाड़ से
आँखें फोड़ने लगतीं .....

घडी की ज़र्द आँखें,
बर्तनों की सिसकन,
गुलदानों की उदासी में अब
चिराग़ टूटने लगे थे ...

वह जानती थी
इन पेशेवालियों की हँसी
कार में फैली
मंहगे परफ्यूम की खुशबू
लुढ़की बोतलों
जेबों में खिलखिलाते
टूथपिकों का राज .....
वह फ़िर भी खामोश थी ......

अब रात
हौले- हौले जलने लगी थी
चाँद की तन्हाई ...
तकिये पर
हजारों कहानियां लिख डालती...

इक दिन वह
एल्बम से अपने बचपन की यादें निकालती है
देखती है सहेलियों के गोल घेरे के बीच
वह कमर पर हाथ रखे रानी बनी खड़ी है
होंठ धीरे- धीरे बुदबुदाने लगते हैं
इतना-इतना पानी
घर- घर रानी ...
इतना-इतना पानी
घर - घर रानी
इतना-इतना पानी
घर - घर रानी.........!!

70 comments:

Harkirat Haqeer said...

मैं जल्द ही रितिका की कुछ तसवीरें और पेपर की कटिंग पेश करने की कोशिश करुँगी .....!!

Udan Tashtari said...

वह बीच में कमर पर हाथ रखे खड़ी है
होंठ धीरे- धीरे बुदबुदाने लगते हैं
इतना-इतना पानी
घर- घर रानी ...
इतना-इतना पानी
घर - घर रानी .........!!


-संदर्भ देख आँखे नम हो आई...आज भी यही...सच है...आखिर कब तक!!

nilesh mathur said...

हरकीरत जी, नमस्कार,
रितिका जैन हत्याकांड ने सचमुच झकझोर कर रख दिया था, आपने उस दिवंगत आत्मा के दर्द को शब्दों के माध्यम से जनता तक पहुँचाया, धन्यवाद्! हर लेखक का ये कर्त्तव्य होना चाहिए की सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाए!

Mishra Pankaj said...

और फ़िर इक दिन यही स्याह रंग
लील जाता है उसे
आग की शक्ल में ......

आह .....!!

बहुत सुन्दर

GATHAREE said...

behad sharmnaak aur man ko jhakjhor dene wali ghatna

कुलवंत हैप्पी said...

जिन्दा मुर्दों की तरह जलाई जाती हैं यहां फूलों सी मिट्टी में मिलाई जाती हैं यहां
रह जाती हैं कल की खबर बन
जल जाती हैं चिता बन
और दफन हो जाती हैं कबर बन

nilesh mathur said...

कल पुस्तकालय में आपका कविता संग्रह 'इक दर्द' पढ़ा, असम में भी हिंदी के इतने अच्छे लेखक हैं जानकार ख़ुशी हुई, इक दर्द तो वाकई दिल को छूने वाली रचना है, इसके अलावा' इक उदास सी शाम मेरी खिड़की पे उतर आई है' और अंतिम कविता संवेदना जो की अमृता प्रीतम जी के लिए लिखी है ने भी बहुत प्रभावित किया, शुभकामना !

M VERMA said...

आह .....!!
ज़मीं बिक जाती है पर
उसके दुःख का बंटवारा नहीं होता
ओह! इस हद तक मार्मिक, आपने तो इसमे दर्द कूट कूट कर भरा है -- नही नही पर शायद रितिका के दर्द से कम.
बेहद मार्मिक और संवेदनशील

MANOJ KUMAR said...

इक्कीसवीं सदी में भी सामंती रूढ़ियों वाले पुरु-प्रधान समाज में नारी के लिए आत्माभिव्यक्ति में कितनी कठिनाई हो सकती है, यह सहज अनुमेय है। फिर भी आपने नज़्म के माध्यम से जो आवाज उठाई है वह प्रशंसनीय है। इस नज़्म में बिल्कुल भिन्न स्वाद है, यह खलल पैदा करता है, विचलन पैदा करता है। क्रूर सच को कहने का आपका अंदाजे बयां कुछ और है।

प्रकाश गोविन्द said...

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shyam1950 said...

कहाँ धोऊँ मैं अपने आदमी होने की शर्म ?

डॉ टी एस दराल said...

कितने अरमानों के साथ बेटियों को विदा किया जाता है, हमारे समाज में. इस तरह की दर्द भरी घटनाएँ समाज पर कलंक हैं.
नारी के वेदना को बहुत ही संवेदनशील तरीके से पेश किया है आपने.

अनिल कान्त : said...

बेहद मार्मिक और संवेदनशील
आँखे नम हो आई

महेन्द्र मिश्र said...

रितिका को समर्पित नज़्म बहुत भावपूर्ण है आँखे नम हो गई. आभार...

Sheena said...

Harkirat ji aapne yeh vishay chun kar bahut hi achha kiya...shayad iske madhyam se logo ko Ritika ke dard ka ehsaas kara sakein

-Sheena

रश्मि प्रभा... said...

kuch nahi kahna, kuch bhi nahi.......mere paas itne vihwal shabd nahi, jo us aag ko bujha sake.....aansuon ki shradhanjli hai

आनन्द वर्धन ओझा said...

हरकीरतजी,
स्तब्ध हूँ... आपकी ये नज़्म सिर्फ नज़्म नहीं, एक ऐसा बयान है जो आग के समंदर में डुबो देता है... एक ऐसा दर्द-भरा नाला है, जो पिघले शीशे की तरह कलेजे में उतर गया है... नुकीले नश्तर की तरह... हतप्रभ हूँ, निःशब्द हूँ, स्तब्ध हूँ... आ.

shikha varshney said...
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shikha varshney said...

सहेलियां बाँहों का गोल घेरा बनाये हैं
वह बीच में कमर पर हाथ रखे खड़ी है
होंठ धीरे- धीरे बुदबुदाने लगते हैं
इतना-इतना पानी
घर- घर रानी ...
इतना-इतना पानी
घर - घर रानी ......
आँखों के कोर भिगो जाती है आपकी रचना. कुछ शब्द नहीं हैं बस एक अफ़सोस भरी आह कि कब सुधरेंगे हालात.

Devendra said...

कल मेरे मित्र ने खबर दी... उसकी मौसी की लड़की मार दी गई
अभी एक वर्ष ही हुए थे उसकी शादी के.
आज आपकी कविता पढ़ी..
शब्दों के मोती पिरो दिए हैं आपने... दर्द की अभिव्यक्ति में..
जो संवेदनशील हैं वे रो दिए आपकी तरह...
मगर उन पाषाण हृदय का क्या करें?
जो अमानवीयता की हदें पार करने पर आमादा हैं..
इस कविता की एक बूँद भी नहीं ठहर पाएगी चिकने घड़ों पर.
हाँ ..
आपकी कविता उन्हें नींद से जरूर जगा सकती है
जो जग सकते हैं मगर अभी तक सो रहे हैं।
-बधाई।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

आज मेरे इस समाज को सही अध्यात्म की आवश्यकता है

विनोद कुमार पांडेय said...

आज की सच को दर्शाती आपकी यह रचना बेहद संवेदनशील है..समाज सुधार का कार्यक्रम रोज होता है पर समाज सुधारने का नाम ही नही लेता...कुछ तो होना चाहिए...

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

शब्द नहीं कहने को.......

SACCHAI said...

" dard ubhar aaya padhte padhte ..behad hi sahi ...aakhir kab tak yunhi chalta rahega ?..."

" aapa sukriya "

----- eksacchai{ aawaz }

http://eksacchai.blogspot.com

neera said...

ज़मीं बिक जाती है पर
उसके दुःख का बंटवारा नहीं होता..

इतने बड़े कटु सत्य को इतने आसान शब्दों में सिर्फ आप बयां कर सकती हैं...

खुशदीप सहगल said...

आखिर कब तक...रितिकाएं जलाई जाती रहेंगी...और भारत महान और महान होता जाएगा...

जय हिंद...

संध्या आर्य said...

वह एल्बम से अपने बचपन की यादें निकालती
सहेलियां बाँहों का गोल घेरा बनाये हैं
वह बीच में कमर पर हाथ रखे खड़ी है
होंठ धीरे- धीरे बुदबुदाने लगते हैं
इतना-इतना पानी
घर- घर रानी ...
इतना-इतना पानी
घर - घर रानी .........!!
आपकी इन पंक्तियो को पढने के बाद आंसू थम ही नही रहे है .......दांतो को दबा रही हूँ ताकि आंसू रुके पर दांत दबते ही भावानाये फुट पड रही है.....सुबह सुबह आपकी इस रचना की हर पंक्ति मेरे जिस्म के रोम रोम को रुला कर गयी है ........
कई बार ऐसा लगता है कि औरत किस किस जगह पर अपने लिये रास्ता बनायेगी .....मै हिम्मत तोडने की बात नही कर रही हूँ पर समाज मे फैली समस्याओ को देखती हूँ तो पाती हूँ कि हर कदम पर औरतो का जीवन दूभर होता है मसलन गर कोई औरत फोन पर हंस कर अपने सम्बन्धियो से बाते कर ले तो भी उसे प्रताडित किया जाये ,जब वह अपने घर आये भाई या किसी रिश्तेदार का थोडा सा मान दिखा दे,तो भी वह उसके अधिकार क्षेत्र मे नही आता है,उसे जमकर उसके भाई या बाप जो भी है उसे जमकर डान्ट ड्पट पिलाई जाये,मानवियता नगी होकर ऐसी स्थिती मे कही किसी चौराहे पर कराहने लगती है तब भी उसमे कराह नही दिखती हो इस समाज मे मौजूद समाजिक ठेकेदारो को ,उन औरतो क्या होगा जो दिन रात घर की फैक्ट्री को सफल बनाने के लिये दिन रात जुटी रहती है और उन्हे जलाया भी नही जाता है उनके जिस्म पर मौजूद बालो को एक एक कर खिचा जाता हो,और वह आह खिचने वाले की कान तक नही पहुंच पाता हो, बडे ही करीने से जिसमे दर्द हो पर वह दर्द घर की चारदिवारी मे ही सिमटकर रह जाती है.......यह दर्द जब तनहाई मे जब आपना आकार पाते होंगे तो वह दर्द के दैत्य के रुप मे ही आते होंगे ना पर उस दर्द का दैत्य उसे निगल नही पाता होगा क्योकि उन दर्दो के सहने की क्षमता उंके नन्हे जान ही बढाते होंगे शायद.......मेरे कहने एक और मतलब है कि हर रात कई घरो मे न जाने कितनी औरते जिन्हे प्यार एक कण पाये बिना जिन्दा जलती है और उनके अरमनो को उनकी आंखो के सामने जालाया जाता है उनके स्वाभिमान का बोटि बोटि नोच कर खा लिया जाता हो किसी नरभक्क्षी की तरह और हर रात मर के सुबह होने तक जिन्दा हो जाती है ताकि घर की फैक्टरी मे उनके बच्चे ना पिस जाये और ताउम्र पिसी जाती है अह्ंकार मे,आमानविय परिस्थितियो मे सिर्फ और सिर्फ आपनी कोमल भावनाओ के वजह से अपने बच्चे अपने घर के लिये!

ऐसी औरतो की तदाद बहुत ही ज्यादा है जो हर रात कोई नरभक्क्षी उनकी भावनाओ को बहुत ही करीने से खाते है और अल सुबह अपने काम पर जाते है .............समाज मे अपने होने का परचम लहराते है और सबसे बडी बात यह एक औरत ही एक औरत की दुश्मन क्यो होती है?इसका जबाव मुझे पैतीस साल की उम्र तक नही मिली है ......खोज जारी है पर आपको पता हो तो अवश्य बताये मेरी सोच मे थोडा इजाफा हो .........वैसे आपको पढकर बहुत ही अच्छा लगता है क्योकि आप सिर्फ और सिर्फ आपने दर्द को ही नही बल्कि समाज मे फैले दर्दो को भी आप अपने शब्दो से आकार देती है ..........जो मुझे बेहद अच्छा लगता है .......आज बहुत दिनो बाद आपको मै कमेंट देने से नही रोक पा रही हूँ वैसे पढती तो हूँ ...........आप बहुत ही सुन्दर लिखते हो आपकी रचनाओ से सिखने को भी बहुत कुछ मिलता है आप ऐसे ही लिखते रहे ......धन्यवाद!

संध्या आर्य said...
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Prem said...

vआपकी अक्तूबर की सब रचनाएँ पढ़ डाली ,बहुत अच्छा लिखती हैं बधाई । आपको दीवाली की हार्दिक मंगल कामनाएं ।

श्रीश पाठक 'प्रखर' said...

अनबोला हूँ मै, घटना पर भी और कविता पर भी....

Harkirat Haqeer said...

Sandhya ji ,

Aapki is tippni se ruke hue aansu jhar jhar kar bahne lage hain ....abhi puri padhi nahi fir aaungi padhne ....!!

sada said...

वह एल्बम से अपने बचपन की यादें निकालती
सहेलियां बाँहों का गोल घेरा बनाये हैं
वह बीच में कमर पर हाथ रखे खड़ी है
होंठ धीरे- धीरे बुदबुदाने लगते हैं
इतना-इतना पानी
घर- घर रानी ...
इतना-इतना पानी
घर - घर रानी, बेहद मार्मिक प्रस्‍तुति ऐसे हादसे इस कदर व्‍यथित कर देते हैं और कुछ न कर पाने की पीड़ा मन को कुरेदती रहती है ।

महफूज़ अली said...

aankhen bhar aayin..........

aur kya kahun ab?

Balvinder Singh said...

Zameen Bik Jaati Hai Par Uske Dukh Ka Bantwara Naheen Hota. Kitna sahee kaha

Nirmla Kapila said...

जिस दिन अखबार मे पडःअ था उस दिन बहुत दुख हुया था मगर आपकी इस मार्मिक रचना ने आँखें नम कर दी हैं आभार

वन्दना said...

nishabd kar diya aapki rachna aur sandhya ji ne jo sachchayi ujagar ki hai usne........ek aisa sach jis ka kahin koi jawaab nhi hai.

सुशील कुमार छौक्कर said...

बहुत ही मार्मिक पोस्ट। ना जाने क्यों ऐसा होता है? पता नही कितनी धडकने अब भी दुनिया में डर के मारे धीरे धीरे घड़कती होगी और ऐसे ही पूरी जिदंग़ी बीता देती होगी हडिड्यों का एक ढाँचा बनकर। क्या सच में अपनी जिदंगी जी लेती है वो धड़कने? ना जाने किस मिट्टी की बनी होती है ये धड़कने कभी कभी सोचने लगता हूँ मैं। सच पूछिए तो आज आँखे नम नही है बस गुस्सा आ रहा है और जी कर रहा है कि ...............

अब रात हौले- हौले जलने लगी थी
चाँद की तन्हाई ...
तकिये पर
हजारों कहानियां लिख डालती
वह एल्बम से अपने बचपन की यादें निकालती
सहेलियां बाँहों का गोल घेरा बनाये हैं
वह बीच में कमर पर हाथ रखे खड़ी है
होंठ धीरे- धीरे बुदबुदाने लगते हैं
इतना-इतना पानी
घर- घर रानी ...
इतना-इतना पानी
घर - घर रानी .........!!

इसके आगे निशब्द हूँ .......

Harkirat Haqeer said...

सुशील जी ,


मैं अपनी ही नज़्म जितनी बार पढ़ती हूँ रोने लगती हूँ क्योंकि यह खेल हम बचपन में खेला करते थे ....तब नहीं पता होता बड़े होकर नसीब में क्या लिखा होगा .....हर लड़की का सपना होता है कि कोई राजकुमार आएगा और वह रानी बन कर रहेगी ......शायद रितिका का भी यही सपना रहा हो ......दो मासूम बच्चे हैं उसके जो बेघर हो गए हैं ....क्या कहूँ ....सोचती हूँ तो दिमाग कि नसें फटने लगतीं हैं ......!!

गौतम राजरिशी said...

अखबार में खबर देख कर दहल गया था और आपका भी ख्याल आया कि आप उधर हो, कहीं आपकी कोई करीबी तो नहीं....नज़्म पढ़कर फिर से दहल गया।

कैसे लोग इतने अमानुषिक और पाश्विक हो जाते हैं अपनों के साथ?

दिगम्बर नासवा said...

GAHREE SAMVEDNA HAI AAPKI RACHNA MEIN .... SACH MEIN KISI SACH KO APNE ITNA KAREEB JHELA AASAAN NAHI HOTA ... DIL BHAR AAYA PADH KAR ....

Pankaj Upadhyay said...

OMG!!! superb, amazing..

"वह कपड़ों पर से अंगारों की राख़ झाड़ती
तो आग की कई सुइयां गिर पड़तीं
जुबां दर्द का शोर मचाती
तो सन्नाटे के कई टुकड़े
कोरे कागज़ पर स्याह रंग फैला देते
और फ़िर इक दिन यही स्याह रंग
लील जाता है उसे
आग की शक्ल में ......"

"अब रात हौले- हौले जलने लगी थी
चाँद की तन्हाई ...
तकिये पर
हजारों कहानियां लिख डालती
वह एल्बम से अपने बचपन की यादें निकालती
सहेलियां बाँहों का गोल घेरा बनाये हैं
वह बीच में कमर पर हाथ रखे खड़ी है
होंठ धीरे- धीरे बुदबुदाने लगते हैं
इतना-इतना पानी
घर- घर रानी ...
इतना-इतना पानी
घर - घर रानी .........!!"

aaj jitna khoobsoorat aagaaz, utna marmik anzaam ...bhagwaan unki aatmaa ko shaanti de..aur unke mata pita ko is hadse se ladne ki shaqti......

"लोकेन्द्र" said...

uff...
निःशब्द हो गया हूँ मै तो........

Manish Kumar said...

वह कपड़ों पर से अंगारों की राख़ झाड़ती
तो आग की कई सुइयां गिर पड़तीं
जुबां दर्द का शोर मचाती
तो सन्नाटे के कई टुकड़े
कोरे कागज़ पर स्याह रंग फैला देते
और फ़िर इक दिन यही स्याह रंग
लील जाता है उसे
आग की शक्ल में ......

रितिका की पीड़ा को शब्दों में बेहद खूबसूरती से उभारा है आपने..

JHAROKHA said...

यथार्थ से वाकिफ़ कराती है ये नज़्म्…आज के समाज पे कटाक्श है ये…
आँखें नम हो गयी॥

dr.rakesh minocha said...

aise log duniya se beyaulad hi chalein jayen, to accha dr minocha

रचना दीक्षित said...

हरकीरत जी,
नमस्कार,


आपकी शब्दों ने दिल को झकझोर
कर रख दिया,

वह कपड़ों पर से अंगारों की राख़ झाड़ती
तो आग की कई सुइयां गिर पड़तीं
जुबां दर्द का शोर मचाती
तो सन्नाटे के कई टुकड़े

काश भविष्य में ऐसी पुनारावृतियाँ न हो सुंदर रचना दिल को अन्दर तक छू जाती है,

रचना दीक्षित

Kishore Choudhary said...

इक दिन न जाने कहाँ से
इक आवारा मौज
बहा ले गई थी
उसके बदन की खुशबू
जब हवाओं ने
विरोधी रुख अख्तियार किया
तो बादल बागी हो गया
और फ़िर फैलती गयीं बिस्तर पे
सिलवटें .......

नज़्में तो होती ही जादू से भरी हैं, कविता के सौन्दर्य के सभी तत्व आपकी रचनाओं में बिना किसी अतिक्रमण के चले आया करते हैं, समाज की तल्ख़ सच्चाई और रूमानी खाबों के बीच के दायरे भी आप बखूबी भर लिया जैसे आपके ये शब्द..

वह जानती थी
पेशेवालियों की हँसी
कार में फैली
मंहगे परफ्यूम की खुशबू
लुढ़की बोतलों
जेबों में खिलखिलाते
टूथपिकों का राज .....

वह फ़िर भी खामोश थी ......

आपने कविता को पूर्णता कुछ इस अंदाज में दी है कि एक लोकजीवन में रचा बसा खेल इस कदर मुझे भयावह करने लगता है कि मैं आपको लिखा नहीं सकता.

Satya.... a vagrant said...

is post per Madhur bhandarkar ka ek quote dena uchit jaan padta hai
"yeh apko apne hi chair per kasmasha dene ke liye vivash kar deti hai"

bahut yathartparak rachana

satya vyas

Satya.... a vagrant said...

is post per Madhur bhandarkar ka ek quote dena uchit jaan padta hai
"yeh apko apne hi chair per kasmasha dene ke liye vivash kar deti hai"

bahut yathartparak rachana

satya vyas

रवि धवन said...

आपकी रचना से अश्रु भी आये तो क्रोध भी सहसा आ गया...
कब हम बदलेंगे, मालूम नहीं.
शायद सृष्टि के अंत समय या फिर समय रहते

धीयाँ लाख वंडावन दुःख
फेर वि एनानु न जाने क्यों पुत्तरा दी भुख
आज किस किस नु लाईये फाहे
रावण जो बैठा है हर राहे
राम नहीं कोई आना
न औना किसी कृषण ने
आपो आप नु आ करिए वादा
समझो न मेनू कमजोर
दुःख नहीं सहना होर
बस दुःख नहीं सहना होर.....

संगम "कर्मयोगी" said...

शुक्रिया हरकीरतजी...संगम कोई जगह नहीं है...संगम का मतलब है "मिलन",,
जिस पाक जगह की आप बात कर रही हैं, वो प्रयाग है..इलाहाबाद!
आपकी इस रचना में बहुत दर्द है..और भरपूर प्यार किसी अपने के लिए..
आपकी ये रचना दिल तक आवाज़ करती है!

ANAAM. JASWINDER (001-514-447-1562) said...

ਹਰਕੀਰਤ ਜੀ , ਅੱਖਾਂ ਖੁਸ਼ਕ ਹੋਣ ਦਾ ਨਾਮ ਨਹੀਂ ਲੈ ਰਹੀਆਂ
......ਆਹ

ਲੱਖ ਵਾਰ ਡੰਡਾਉਤ ਬੰਦਨਾ ਤੁਹਾਨੂੰ

mark rai said...

aaj bhi ye sab ho raha hai..hame mdern aur open minded kahlane ka koi haque nahi...

डॉ .अनुराग said...

मौन हूं कुछ कहने की हालत में नहीं हूं !

Apanatva said...

dil ko cheer kar kaleja bahar nikal rakh dene kee shakti valee rachana .soubhagy hai ki aap kee rachanae padane ka mouka mil raha hai .

Apanatva said...

dil ko cheer kar kaleja bahar nikal rakh dene kee shakti valee rachana .soubhagy hai ki aap kee rachanae padane ka mouka mil raha hai .

गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' said...

Ati Sundar

kumar zahid said...
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kumar zahid said...

आह .....!!
ज़मीं बिक जाती है पर
उसके दुःख का बंटवारा नहीं होता
दूर कहीं पहाड़ी के नीचे हरियाली थी
मगर उसके लिए वहाँ तक पहुँच पाना
बहुत कठिन .......

इक दिन न जाने कहाँ से
इक आवारा मौज
बहा ले गई थी
उसके बदन की खुशबू
जब हवाओं ने
विरोधी रुख अख्तियार किया
तो बादल बागी हो गया
और फ़िर फैलती गयीं बिस्तर पे
सिलवटें .......

आपकी रचना और आपकी अभिव्यक्ति आपके अहसासों की धारा में यूं बहते हैं जैसे प्यार से संवारे हुए मासूम आज्ञाकारी बच्चे।
हरकीरत जी ! क्या कहूं ! इस रचना से मैं इतना मुतासिर हूं कि उस हवा , उस मिट्टी , उस ज़बीन को प्रणाम करता हूं जहां अहसास अभिव्यक्ति के अदृभुत रूप लेकर कभी अमृता , कभी गुलजार और कभी हरकीरत की शक्लें अख्तियार कर लेता है....

Murari Pareek said...

ritika ka sara dard aapne udel diyaa !!

Nagarjuna said...

bahut sundar kavita hai...seedhe aatma mein utarti hai.marm ko chhooti hai...hardik badhaai.

Ashwini Kumar said...

and they say man is civilised !! manav sabhyta hum purushon tak kab pahunchegi?

MUFLIS said...

मुह्तर्मा...!!
"saraswati-suman" meiN
मुफलिस को सिर्फ हज़ल में नहीं ,
पुस्तक-समीक्षा में तलाश कीजिये
और अगर कहीं कोई कमी / कोताही
नज़र आये तो कृपया ध्यान दिलाईये

MUFLIS said...

ritika ke marm ko
itni gehri samvedanaaoN meiN
dhaalne par
abhivaadan svikaareiN

aleem azmi said...

आज की सच को दर्शाती आपकी यह रचना बेहद संवेदनशील है..समाज सुधार का कार्यक्रम रोज होता है पर समाज सुधारने का नाम ही नही लेता...sarkaar ko is baare me koi kadam uthaane chahiye

creativekona said...

वह कपड़ों पर से अंगारों की राख़ झाड़ती
तो आग की कई सुइयां गिर पड़तीं
जुबां दर्द का शोर मचाती
तो सन्नाटे के कई टुकड़े
कोरे कागज़ पर स्याह रंग फैला देते
और फ़िर इक दिन यही स्याह रंग
लील जाता है उसे
आग की शक्ल में ......

हरकीरत जी,
आपकी इस कविता ने तो एकदम निःशब्द कर दिया है- आखिर कब तक समाज में यह सब चलता रहेगा?
हेमन्त

singhsdm said...

२१ वी सदी में हम अभी भी १४-१५वी सदी की मानसिकता में जी रहे हैं.......

रंजना said...

Aap bahut himmat wali hain ki aapne peeda ko abhivyakt karne ko shabd paa liye .......

main to nihshabd hun....aur aapki lekhni tatha aapke samvedansheelta ko naman karti hun.....

राजाभाई कौशिक said...

नमन् के अतिरिक्त कुछ समझ मे नही आरहा है
यदि आ भी गया तो तुच्छ ही होगा..... इसलिये मौनधर्मा

manu said...

सारा दर्द भर दिया है आपने रितिका का ..
इस नज्म में...

इश्वेर जल्दी दुष्टों को उनके किये की सजा दे..
रितिका की आत्मा की शांति के लिए दुआ करते हैं..