Monday, January 5, 2009

तखरीव का बादल

कोलतार सी पसरी रात
उम्‍मीदों के लहू में लिथडी़
बुदबुदा के कहती है
कोई दो घूंट पीला दे
दर्द का जा़म

दबोच रहा है
जैसे कोई गला
खराशें पड़ने लगीं हैं
सासों में
पथराई आँखों में है यथावत
इक मर्माहत प्‍यास

सूखे गलों में
अटकी पडी़ हैं
अधजली आवाजें
विश्‍वासों की जमीं
खिसकने लगी है
आक्रोश में पनपे
जहर के अंगारे
थिरकने लगे हैं
बाँध घुंघरू पैरों में

लील गया है सन्‍नाटा
स्‍वभाविक स्‍वाद
शब्‍द अटके पडे़ हैं
अधरों में
अवसाद और प्रताड़ना की
कातिल अभिव्‍यक्‍ति
है सडा़ध सिसकते
शयनकक्षों में

खौ़फ और दहशत
है अपने साये की
जु़म्‍बिश का
फूलों की ख्‍वाहिशें
डूब गई हैं
गिरते बुर्जों में
तखरीव का बादल
बरस रहा है
दर्द की बूँद लिए.

१.तखरीव- विनाश

प्रकाशित व पुरस्‍कृत (सितं ०८ हिन्‍द-युग्‍म)

38 comments:

रौशन said...

ये तय है कि ब्लॉग के टेम्पलेट की सुन्दरता कविता की सुन्दरता के आगे कुछ भी नही है . आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आना हुआ और हमें लग रहा है कि हमने अभी तक न आकर बहुत कुछ खोया है
वाकई बहुत सुंदर कवितायें हैं

कुश said...

बहुत ही उम्दा... वाकई

सीमा सचदेव said...

लील गया है सन्‍नाटा
स्‍वभाविक स्‍वाद
शब्‍द अटके पडे़ हैं
अधरों में
अवसाद और प्रताड़ना की
कातिल अभिव्‍यक्‍ति
है सडा़ध सिसकते
शयनकक्षों में
विनाश के भयानक मंजर को जिस तरह आपने शब्दों की माला में पिरोया है ,उसके लिए कोई शब्द ही नही है |
सादर
सीमा सचदेव

"अर्श" said...

बहोत खूब लिखा है आपने ढेरो बधाई आपको....

Shamikh Faraz said...

harkirat ji mujhe aapki ye kavita bahut achhi lagi. Khastor par jo panktiyan sabse zyada mutassir karti hain vo ye hain
खौ़फ और दहशत
है अपने साये की
जु़म्‍बिश का
फूलों की ख्‍वाहिशें
डूब गई हैं
गिरते बुर्जों में
तखरीव का बादल
बरस रहा है
दर्द की बूँद लिए.

dwij said...

रात के कोलतार- से पसरने का ,
विश्‍वासों की जमीं के खिसकने का
आक्रोश में पनपे जहर के अंगारों के थिरकने का
सन्‍नाटे के स्‍वाभाविक स्‍वाद लीलने का

जवाब नहीं
.

Udan Tashtari said...

सुन्दर बिम्ब-अद्भुत भाव...वाह!!

तखरीव का बादल
बरस रहा है
दर्द की बूँद लिए.

नियमित लेखन की शुभकामनाऐं.

सुशील कुमार छौक्कर said...

कई बार नि:शब्द हो जाता हूँ। आज इसको पढकर भी हो गया।

Harkirat Haqeer said...

इस बार कुछ नए प्रसंशको को देख खुशी हुई ...रौशनजी, सीमा जी, द्‌विज जी,उडन तश्‍तरी जी(हालाँकि
ये नाम सही नहीं लगता) और शामिख जी आपका स्‍वागत है...कुश, अर्श और सुशील जी आते
रहियेगा...!

Irshad said...

उपमाए और बिम्ब देखते ही बनते है, कितना दर्द चाहिए ऐसा लिखने के लिए, सहजता और सवेंदना के साथ काव्य-बोध का गठजोड़ करना आपको खूब आता है। मैं फिर से कहूंगा सभी बिम्ब कमाल के है। इसको भावनात्मक विजूलाइजेशन कहते हैं।

Arvind Mishra said...

आज कई कवितायें पढीं -सीमा गुप्ता और रंजना भाटिया के बाद आज की यह रचना भी बेहद अभिव्यक्तिपूर्ण है -कुछ भावों का अद्भुत साम्य भी इन तीनों नारी रचनाकारों में मिला आप ख़ुद देख लें -शायद श्रेष्ठतम अनुभूतियाँ भी देश काल व्यक्ति के निरपेक्ष होती हैं ! आपसे बहुत अपेक्षा है !

अक्षय-मन said...

तखरीव का बादल
बरस रहा है
दर्द की बूँद लिए.
कमाल है बहुत खूबसूरती से दर्द को पेश किया है आपने बहुत अच्छी अभिव्यक्ति.....
ढेर साड़ी भावनाओं को समेटे हुए


अक्षय-मन

रवि अजितसरिया said...

मैंने आप का संकलन 'इक दर्द' पढ़ा था, और उस विमोचन सभा में भी था, ब्लॉग पैर आपसे पहली मुलाकात हो रही है, आप को नव वर्ष की बधाई.

नीरज गोस्वामी said...

लाजवाब शब्द और भाव लिए हुए है आप की ये रचना...
नीरज

shelley said...

bahut achhi rachna hai.

दिगम्बर नासवा said...

तखरीव का बादल
बरस रहा है
दर्द की बूँद लिए.

वाह बहुत जुदा है आपके कहने का अंदाज, कोई छटपटाहट सी नज़र आतीहै

रश्मि प्रभा said...

रुंधे दर्द को पास रख दिया,
तारीफ से ऊपर की रचना है.....

नवीन शर्मा said...

हरकीरत जी आपकी टिप्प्णी का बहुत बहुत धन्यवाद ..
आपका पूरा ब्लाग पढ्ने की जुर्रत कर बैठा.. और यकीन मानिये कि खुद से बुदबुदाया ...

तारीफ में आपके लेखन की लिखें तो क्या लिखें,
कि चलती नहीं कलम, सज़्दा करने के बाद ...


आपकी स्पर्शी कविताओं का इन्त्जार रहेगा...

आदर सहित

sanams hot cake said...

aap ka mere blog pr aana wa mera aap tak jana ,silsila suru ho gaya hai bhav-path pr shabdo ke adan -pradan ka |
aapki kalam ka andaz aapke blog rupi chaman me kuch esa laga jaise dard ko bhi koi kushgwar bana kar kah raha ho ,sach aapki lakhni ne dard ko juban di hai aur wo hashi bahar ban kar aapke chaman ko mahaka raha hai |meri mangal kamanaye sweekare.
sanjaysanam

"VISHAL" said...

कई बार नि:शब्द हो जाता हूँ। आज इसको पढकर भी हो गया।

Susheel Kumar ji k yahi shab duhra sakta hu,bas.

------------------------"VISHAL"

Pyaasa Sajal said...

comment kya kare ab...yahaan par kuch bhi padhna bas mere liye ek learning experience hai...amazing is the word :)

मुकेश कुमार तिवारी said...

वैसे, तो मैं इस ब्लॉग पर पहले भी आया था पर सिलसिला कायम नही रख पाया.

मैं हरकीरत जी आपकी दी जाने वाली उपमाओं का बड़ा कायल हूँ, कहां से लाती हैं एकदम नई उपमाएँ उदाहरण बतौर :-
(१) खराशें पड़ने लगी हैं साँसों में.
(२) अधजली आवाजें.
(३) सिसकते हुये शयनकक्ष.

प्रभावी रचना के लिये बधाईयाँ.

मुकेश कुमार तिवारी

rajesh ranjan said...

bahut behtarin hai aapki kalam.

Vijay Kumar Sappatti said...

vinaash ki daastan bayan kar rahi hai aapki ye nazm..

bahut sundar abhivyakti.

badhai ..


vijay
Pls visit my blog for new poems:
http://poemsofvijay.blogspot.com/

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

सुन्‍दर कविता, बधाई।

नवीन शर्मा said...

आपके कामेन्टस का बेहद शुक्रिया, अगली नज्म का इंतजार करिये.. लिखी तो बहुत पहले थी पर आज तक असरदार है... जैसे किसी शायर का ये शेर ः-

नये दीवानों को देखूं तो खुशी होती है
हम भी ऐसे थे जब आये थे वीराने में

आदर सहित

संजय पटेल said...

बहुत नये एंगल की नज़्में हैं आपकी.
ताज़गी का झोंका लिये.
कहीं भीतर तक उतरता सा है
इस शब्दों का भाव.

Atul Sharma said...

शब्‍द नि:शब्‍द न रहें
अभिव्‍यक्तियॉं बोलती रहें
कुछ हम कहें कुछ आप कहें
और बातें ऐसी ही चलती रहें।

Mansoor Ali said...

दर्द ,दर्द और दर्द, आप की अभिव्यक्ति का i उर्जा स्त्रोत दर्द ही लगता है.,अच्छी अदायगी,

आशुतोष दुबे "सादिक" said...

bahut accha likha hai apne,aap aise hi likhti rahe.

प्रकाश बादल said...

अब नई कविता की प्रतीक्षा है। ये कविताएं तो पढते रहेंगे ही,लेकिन आप नई भी तो डालिए न! लेकिन मेरे ब्लॉग पर यही कंडीशन न लगाईएगा क्योंकि सच ये है कि मैने बड़े दिनो से कुछ नहीं लिखा । लेकिन हमें पता चला है कि आपके पास तो बहुत सी अच्छी कविताएं हैं? हिन्दी कविता में आपकी लेखनी बहुत प्रभावित करती है।

Dev said...

तारीख का बादल .....
लील गया है सन्‍नाटा
स्‍वभाविक स्‍वाद
शब्‍द अटके पडे़ हैं
अधरों में
अवसाद और प्रताड़ना की
कातिल अभिव्‍यक्‍ति
है सडा़ध सिसकते
शयनकक्षों में
आप की कविता की विशेषता यह है की सीधे दिल को दस्तक देती है ....
दिल को छु गई ....

योगेन्द्र मौदगिल said...

adbhut sampreshniyata se bhari kavitaen hain aapki.... hamesha ki tarah... or haan.. aapka sms bhi mil gaya tha. sadhuwaad swikaren.... ek baar fir behtreen...

hem pandey said...

सुंदर नहीं,बहुत सुंदर अभिव्यक्ति है. पूरी रचना ही उद्धृत करने लायक है. फ़िर भी कुछ पंक्तियाँ उद्धृत कर देता हूँ.

सूखे गलों में
अटकी पडी़ हैं
अधजली आवाजें
विश्‍वासों की जमीं
खिसकने लगी है
आक्रोश में पनपे
जहर के अंगारे
थिरकने लगे हैं
बाँध घुंघरू पैरों में

डॉ .अनुराग said...

खौ़फ और दहशत
है अपने साये की
जु़म्‍बिश का
फूलों की ख्‍वाहिशें
डूब गई हैं
गिरते बुर्जों में
तखरीव का बादल
बरस रहा है
दर्द की बूँद लिए.






इतनी उदासी क्यों टपकती है आप के लिखे मे .....?इस गम को कभी हौसलों से दूर भगायिये.....आपके लिखे मे एक खास अहसास है जिसकी एक अपनी पहचान है..अपना एक किरदार ....

purnima said...

लील गया है सन्‍नाटा
स्‍वभाविक स्‍वाद
शब्‍द अटके पडे़ हैं
अधरों में
bhut sundar likha he.

Dr.Bhawna said...

Bahut arthpurn ha aapki ye rachna..bahut-bahut badhai...

अल्पना वर्मा said...

behad khubsurat!!!!!!!!!!!!!!
kya kahen??

harkirat ka arth kya hota hai??kripya batayeeyega??