Sunday, January 6, 2013

इबादत प्रेम की (ताँका )

 

ताँका विधा में लिखी गई कुछ रचनायें ......

 

इबादत प्रेम की (ताँका )


1
ये कतरने
सियाह कपड़ों की
न धागा कोई
बता मैं कैसे सीऊँ ?
बदन ज़खमी है !
2
कैसी आवाज़ें
बदन पे रेंगती
ड़ी मेखों सी
पास ही कहीं कोई
आज टूटी है चूड़ी 
3
किताबे -दर्द 
लिखी यूँ ज़िन्दगी ने
भूमिका थी मैं
आग की लकीर -सी
हर इक दास्ताँ की
4
'हीर-राँझा' है
इबादत प्रेम  की
बंदे पढ़ ले
मिल जा ,जो
तू दिल में लिख ले
5
कुँआरे लफ्ज़
कटघरे में खड़े
मौन ठगे- से ...
फिर चीख उठी है
कोख से तू गिरी है  
6
वह नज़्म है
ज़िन्दगी लिखती है
वह गीत है
खुद को जीती भी है
खुद को गाती भी है !
7
नहीं मिलता
कभी बना बनाया
प्यार का रिश्ता
प्यार तराशना है
प्यार उपासना है  ।
8
पिंजरे कभी
उमर नहीं देते
रिश्ते भी नहीं ,
कानून न रिश्तों का
न ही पिंजरों का है  ।

Tuesday, January 1, 2013

बुझ गई तेरे लिए जलती हुई छोड़ के लौ.......

नव वर्ष आया पर साथ में इतना दर्दनाक हादसा  लाया कि जेहन में न कोई ख़ुशी रही  न उठकर  उसका स्वागत करने की हिम्मत .....
16 दिसम्बर की वह  चलती बस में की गई इतनी घिनौनी हरकत
(गैंग रेप )कि  जिसे सुनकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं पर जिसने उसे भोगा , झेला ,सहा और 13 दिनों तक उस दर्द के साथ ज़िंदा रही  (29 दिस को उसकी मौत सिंगापुर के किसी अस्पताल में हो जाती है )उसने कैसे जरा होगा ये सब  हम तो सिर्फ कल्पना ही कर सकते हैं  ....
अपने आप को उस स्थिति में रखती हूँ तो आंसू थमते नहीं ......
रब्ब दामिनी की आत्मा को मुक्ति दे इसी दुआ के साथ पेश है दामिनी को समर्पित कुछ हाइकू और एक  ग़ज़ल .....
इसे संवारने में सहयोग दिया है चरनजीत मान जी ने ......



कुछ हाइकू दामिनी को नम आँखों से .....(श्रद्धांजलि स्वरूप )

(1)
तू बुझी नहीं
ये मशाल है अब
मेरे हाथों में
(2)

दिल ज़ख़्मी है
रूह छलनी , पर
आँखों में आग
(3)

हम करेंगे
सजा मुकम्मल
काट अंगों को
(4)

मोमबत्तियां
नहीं, हैं ये जलते
हुए अंगारे
(5)

इक सरिया
आर-पार अंगों के
उफ़्फ़ या रब्बा !
(6)
इंसा नहीं वो
हैवान भी नहीं वो
थे वो दरिंदे
(7)

जम गई है
बरफ़ सी भीतर
जैसे मुझ में
(9)
उफ्फ !क्यों तूने
मज़लूम की चीखें
सुनी न रब्बा .. !

(10)

अय कमीनों
है थू -थू तुझ पर
हर नज़र

(11)

थमा गई तू
जिस्म अपना जला
जलती शमा

(12)

रो रही आत्मा
संग तेरे दामिनी
है जग सारा


बुझ गई तेरे लिए जलती हुई छोड़ के लौ.......

ज अँगारों के बिस्तर पे बसर करती है
देख हर लड़की ही आज आँख को तर करती है

खुद तो हूँ बुझ गई देकर के मैं हाथों में मशाल
देखना क्या कि चिंगारी ये कहर  करती है


एक मज़लूम की चीखें न सुनी रब तूने
मौत के बाद यह फरयाद क़बर करती है

नहीं महफूज़ आबरू किसी लड़की की यहाँ
अब कि डर-डर के यह दिल्ली भी बसर करती है

देह भी लूट दरिन्दों ने ली,सांसें छीनी
बददुआ जा तेरे  जीवन को ज़हर करती है

अै खुदा़ आँधियों ने दी उजाड़ ज़ीस्त मेरी
यह हवाएं भी तुझे रो- रो खबर करती है


बुझ गई तेरे लिए जलती हुई छोड़  के लौ
दामिनी आज भी हर बस में सफ़र करती है

कमीनो शर्म करो जाओ , कहीं डूब मरो
आज देखे जो तुम्हें थू-थू नज़र करती है

Saturday, December 15, 2012

असम का ऐतिहासिक गुरुद्वारा 'श्री गुरु तेग बहादुर साहिबजी ' (धुबड़ी)

 असम का ऐतिहासिक गुरुद्वारा 'श्री गुरु तेग बहादुर साहिबजी ' (धुबड़ी)  :
Dhubri Gurdwara Lji 2.jpg
धुबड़ी (असम )में स्थित गुरुद्वारा ' गुरुद्वारा श्री गुरु तेग बहादुर साहिबजी ''


सिख पंथ के नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर, श्री गुरु नानक देव जी महाराज के बाद पहले ऐसे गुरु थे जिन्होंने पंजाब के बाहर धर्म प्रचार के लिए यात्रा की। पूर्व की यात्रा के समय गुरु नानक मिशन का प्रचार करते हुए 1666ई. में वे पटना साहिब आए। इनके साथ गुरु जी की माता नानकीजी, पत्नी माता गुजरी जी, उनके भाई कृपाल चंद जी व दरबारी भी आए। गुरु जी कुछ समय बडी संगत, गायघाटठहरने के बाद परिवार सहित सालिस राय जौहरी की संगत मंजी साहिब में आए। उस समय इस संगत का संचालन अधरकाके परपोते घनश्याम करते थे। गुरु तेग बहादुर जी कुछ दिन रुकने बाद परिवार को यहां छोड कर बंगाल व आसाम (असम) चले गए।गुरु जी का पड़ाव हमेशा किसी नदी या गाँव के किनारे होता। इस प्रकार गुरु किरतपुर , सैफाबाद , कैथल , पाहवा, बरना, करनखेड़ा , कुरुक्षेत्र , दिल्ली इटावा, थानपुर, फतेहपुर , प्रयाग , मिर्जापुर, जौनपुर, पटना  होते हुए ढाका पहुंचे। दिसम्बर 1667 में औरंगजेब को असम से खबर  मिली कि जिले का राजा बागी हो गया है और मुग़ल फौजों को जबर्दस्त शिकस्त दी है और गुवाहाटी पर कब्जा कर लिया है . असम ही एक ऐसा राज्य था जहां मुग़ल शासकों को अब तक सफलता  नहीं मिली थी . जो भी मुग़ल शासक आगे बढ़ता या तो उसे हार मिलती या मौत के घाट उतार दिया जाता। इसकी वजह वे असम में उस समय प्रचलित तांत्रिक शक्तियों के प्रयोग को मानते हैं . औरंगजेब ने  गुवाहाटी पर कब्जा  करने के   लिए राम सिंग को सेना देकर असम भेजने का फैसला किया। राजा राम सिंह उस समय उसकी हिरासत में था . औरंगजेब ने सोचा अगर यह मर गया तो एक काफिर खत्म हो जाएगा और कहीं जीत गया ती लाभ ही लाभ है। राजा राम सिंह अपनी फ़ौज लेकर पटना पहुंचा। पटना उसे पता चला कि गुरु तेग बहादुर जी अपने परिवार को पटना छोड़ कर यात्रा के लिए ढाका  गए  हैं . इन्हीं दिनों पटना में गुरु तेग बहादुर जी के एक  पुत्र गोविन्द सिंह का जन्म हुआ। इधर राजा राम सिंह और उसके शैनिक असम में प्रचलित  जादू- टोने और तांत्रिक शक्तियों  से अति भयभीत थे और वे गुरु जी के तेज और प्रताप से भी परिचित थे। अत: राम सिंह ने सोचा कि अगर वह गुरु जी को अपने साथ असम ली जाने के लिए मना लेता है तो वह इन तांत्रिक शक्तियों सेबच  सकता है . वह पटना से  गुरु जी के पास ढाका पहुँच गया और गुरु जी से अपने साथ असम चलने की बिनती की। गुरु जी तो असम  यात्रा का पहले ही मन बना  चुके थे क्योंकि वे गुरु नानक के उस स्थान को देखना चाहते थे जहां (धुबड़ी) उनहोंने आसन ग्रहण किया था। असम पहुंच कर गुरु जी ने धुबड़ी साहिब मेंब ही डेरा डाला। फौजें 15 मिल दूर रंगमाटी में ठहरी।
ऐसा माना जाता है कि उस समय असम में तांत्रिक शक्तियों का उपयोग बहुत ज्यादा होता था। खुद मुसलमान लेखकों ने भी अपनी लेखनी में इन शक्तियों का आँखों देखा वर्णन प्रस्तुत किया है। गुवाहाटी का कामख्या मंदिर तो इस तांत्रिक विद्या का केंद्र था। दुश्मन को हराने के लिए तथा और शक्तियां प्राप्त करने के लिए यहाँ मनुष्यों की बलि दी जाती।
कहते हैं मुग़ल फ़ौज जब रंगामाटी पहुंची तब तांत्रिक शक्तियों में निर्लिप्त स्त्रियाँ कामाख्या में पुजा अर्चना करने के बाद धुबड़ी के सम्मुख ब्रम्हपुत्र नदी नदी के पार अपने तम्बू गाड़ बैठ गई। उन्हें ज्ञात हुआ कि मुग़ल सेना के साथ सिखों के गुरु तेग बहादुर भी हैं जो तेज प्रताप वाले महापुरुष हैं।  उन्होंने  नदी के पार से अपनी तांत्रिक शक्तियों का प्रयोग करना शुरू कर दिया। मन्त्र चलाये , शक्तियाँ दिखीं पर गुरु जी विचलित न हुए और सबको आदेश दिया कि इस्वर का नाम स्मरण करें और भजन बंदगी में लीन रहे क्योंकि हमें  करामत या बल नहीं दिखाना है। जब इस जादूगरनियों के तन्त्र-मन्त्र काम न आये तब इन्होंने अपनी तंत्र शक्ति द्वारा एक भरी पत्थर गुरु जी की ओर चलाया। जो गुरु जी के इशारे पर कुछ दूरी  पर ही गिर गया . यह पत्थर 13 फुट धरती के अन्दर और 13 फुट धरती के ऊपर है।

यह पत्थर 26 फुट लम्बा और इसका घेरा 26 x 28 फुट तथा 33 फुट करीबन चुकास है . यह पत्थर धुबड़ी साहिब गुरुद्वारे में आज भी अवस्थित है। इसके बाद उन क्रोधित  जादूगरनियों ने एक पेड़ भी उठा कर गुरु जी की ओर मरा पर गुरु जी ने उसे भी रोक दिया। उसके बाद उनहोंने तीर चलाये , जौहर दिखये पर गुरु जी पर कोई असर न हुआ . गुरु जी के तेज प्रताप के आगे उनकी समस्त शक्तियाँ नष्ट हो गईं।

तांत्रिक मत के अनुसार जिनकी शक्तियों के ऊपर कोई दुसरा हावी हो जाता है उनकी समस्त शक्तियाँ नष्ट हो जाती हैं और उसकी मौत हो जाती है . अब जादूगरनियाँ घबरा गईं उन्हें ज्ञात हो गया कि गुरु तेग बहादुर एक पहुंचे हुए संत हैं जो साक्षात् इश्वर का प्त्रिरूप हैं। वे गुरु जी के चरणों पर गिर पड़ीं और क्षमा याचना करने लगीं गुरु जी ने उन्हें मुस्कुराते हुए क्षमा कर दिया और तंत्र -मन्त्र का कुमार्ग त्याग देने का वचन लिया।

इधर असम के राजा चक्रध्वज ने जब सारा वृत्तांत सुना तो उसने गुरु जी को अपने निवास पर दर्शन देने का किया। गुरु जी स्वयं चल कर राजा चक्रध्वज के निवास पर गए और उनके आग्रह पर गुरु जी ने राजा राम सिंह को गुवाहाटी पर आक्रमण न करने के लिए मना  लिया और दोनों की संधि करवा दी।

इस  अमन शान्ति  के लिए गुरु जी की दोनों शासको ने शुक्र गुजारी की और दोनों के सैनिकों ने रंगमाटी से लाल मिटटी लाकर गुरु जी के स्थान पर एक ऊँचा टीला  बनवाया। आज भी यह टीला धुबड़ी साहिब में मौजूद है जिसे घेर कर रखा गया है और जिसकी मिटटी लोग श्रद्धावश लाकर अपने घर के पवित्र स्थानों पर रखते हैं।

इस प्रकार धुबड़ी साहिब असम का एक ऐतिहासिक धर्म-स्थल बन गया। प्रतिवर्ष गुरु तेग बहादुर के शहीदी दिवस पर यहाँ तीन दिनों तक भारी  मेला लगता है। तीनों दिन यहाँ  कडाह प्रसाद , लंगर व दूध  की सेवा मुफ्त होती है। रहने और नहाने की विशाल व्यवस्था की जाती है। यहाँ देश भर से संगत एकत्रित है। गुवाहाटी गुरुद्वारे से भी स्पेशल बसें चलायी जातीं हैं . इस ऐतिहासिक गुरुद्वारे में इन तीन दिनों तक शब्द कीर्तन , कथा-वाचन , और नगर कीर्तन होता है। देश केअन्य  धार्मिक गुरुद्वारों से महापुरुषों को शब्द-कीर्तन व प्रवचन के लिए बुलाया जाता है



धुबड़ी साहिब गुरुद्वारे में लगी एतिहासिक पट्टी जिस गुरु आगमन का सारी  घटना की जानकारी लिखी हुई है 


गुरु जी के प्रताप को देख तभी बहुत से असमिया सिख बन गए थे , वे आज भी पगड़ी बांधते हैं और सिख धर्म की पालना करते हैं . एक बार असम सिख एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष एस.के. सिंह ने अपने कथन में कहा था कि हमें यहाँ  'डुप्लिकेट सिख' या 'पंजाब में अपने समकक्षों से द्वितीय श्रेणी के सिखों में रखा जाता है," आज मैं यहाँ कहना चाहूंगी ऐसा बिलकुल नहीं है .कहीं न कहीं उनके भीतर ही ऐसी भावना पनप रही है क्योंकि आज भी उनकी  मातृ -भाषा असमिया ही है . गुरुद्वारों में भी उनकी उपस्थिति न के बराबर रहती है जबकि सिखों के गुरुद्वारों में सभी धर्मों के लोगों को आदर दिया जाता है। 


विश्व इतिहास में धर्म एवं मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धांत की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वालों में गुरु तेग बहादुर साहब का स्थान अद्वितीय है।
"धरम हेत साका जिनि कीआ
सीस दीआ पर सिरड न दीआ।"

इस महावाक्य अनुसार गुरुजी का बलिदान न केवल धर्म पालन के लिए नहीं अपितु समस्त मानवीय सांस्कृतिक विरासत की खातिर बलिदान था। धर्म उनके लिए सांस्कृतिक मूल्यों और जीवन विधान का नाम था। इसलिए धर्म के सत्य शाश्वत मूल्यों के लिए उनका बलि चढ़ जाना वस्तुतः सांस्कृतिक विरासत और इच्छित जीवन विधान के पक्ष में एक परम साहसिक अभियान था।
धर्म स्वतंत्रता की नींव श्री गुरुनानकदेवजी ने रखी और शहीदी की रस्म शहीदों के सरताज श्री गुरु अरजनदेवजी द्वारा शुरू की गई। परंतु श्री गुरु तेगबहादुरजी की शहादत के समान कोई मिसाल नहीं मिलती, क्योंकि कातिल तो मकतूल के पास आता है, परंतु मकतूल कातिल के पास नहीं जाता।गुरु साहिबजी की शहादत संसार के इतिहास में एक विलक्षण शहादत है, जो उन मान्यताओं के लिए दी गई कुर्बानी है जिनके ऊपर गुरु साहिब का अपना विश्वास नहीं था।पंजाबी के कवि सोहन सिंह मीसा ने गुरु जी के बारे सही कहा है -
गुरु ने दसिया सानुं ,है बन के हिन्द दी चादर
धरम सारे पवित्र ने ,करो हर धरम डा आदर 

बनी हुन्दी अजेही भीड़ जे सुन्नत नमाज उत्ते
जां लगदी रोक किदरे वी अजानां दी आवाज़ उत्ते
गुरु ने तद वी एदां ही दुखी दी पीड़  हरनी सी
सी देना शीश एदां ही , ना मुख तों  सी उचारनी सी

गुरु तेगबहादुर सिंह में ईश्वरीय निष्ठा के साथ समता, करुणा, प्रेम, सहानुभूति, त्याग और बलिदान जैसे मानवीय गुण विद्यमान थे। शस्त्र और शास्त्र, संघर्ष और वैराग्य, लौकिक और अलौकिक, रणनीति और आचार-नीति, राजनीति और कूटनीति, संग्रह और त्याग आदि का ऐसा संयोग मध्ययुगीन साहित्य व इतिहास में बिरला है।
गुरु तेगबहादरसिंह ने धर्म की रक्षा और धार्मिक स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया और सही अर्थों में 'हिन्द की चादर' कहलाए।

Tuesday, November 27, 2012

लोकार्पण की कुछ तसवीरें ......





आज देखिये शनिवार 24 नवम्बर 2012  को हुए मेरे संपादन में निकली पत्रिका 'सरस्वति-सुमन' और मेरे काव्य संग्रह 'दर्द की 'महक  के लोकार्पण की कुछ तसवीरें ......








Monday, November 12, 2012

अय अंधेरों !जरा संभलना आज की रात

अय अंधेरों !जरा संभलना आज की रात
मैंने डाला है दीयों में उसके नाम का तेल 

दीपावली की शुभकामनाओं सहित पेश हैं कुछ हाइकू ......
इन्हें आप यहाँ भी देख सकते हैं ......http://hindihaiku.wordpress.com/2012/11/12/%E0%A4%A4%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%87-%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%AE-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%A6%E0%A5%80%E0%A4%AF%E0%A4%BE/#comment-3419

 तेरे नाम का दीया ........
1
बाती प्रेम की
डाल,दीप जलाया
अब  न जाना ।
2
कैसे जलाऊँ
दीपक, तुझ बिन
सूनी  दिवाली  ।
3
अन्धकार है
मन के दीपक में
करो उजाला  ।
4
जलूँ  बाती -सी
हर दिवाली, प्रिय
यादों में तेरी  ।
5
जलाऊँ प्रिय
तेरे नाम का दीया
हर  दिवाली  ।
6
दूर दिखे जो
कोई बुझता दीप
करना याद  ।
7
दिखे दीप में
बस तेरा चेहरा
 प्रीतम मेरे  ।
8
डाला दीप में
तेरे नाम का तेल
जलते जाना। ।
9
दीपक रोया
जले है बाती ही क्यों
प्रेम में मेरे  ।
10
लौट के आ जा
बुझ न जाए कहीं
उम्र का दीया !
11
बुझा पड़ा है
मुहब्बत का दीया
जलाऊँ कैसे  ?
12
इस बार जो
आओ तो जला जाना
प्रेम का दीप ।

Sunday, October 21, 2012

'सरस्वती सुमन' पर आई समीक्षाएं और प्रतिक्रियाएँ

'सरस्वती सुमन' पर आई समीक्षाएं और प्रतिक्रियाएँ  कुछ इस प्रकार  रहीं   .....
(1)डॉ. उमेश महादोषी

जन्म : लगभग पचास वर्ष पूर्व उत्तर प्रदेश के जनपद एटा के एक छोटे से गावं दौलपुरा में।


शिक्षा : कृषि अर्थशास्त्र में पी-एच० डी० एवं सी ऐ आई आई बी


कार्यक्षेत्र-

लगभग तेईस वर्षों तक एक राष्ट्रीयकृत बैंक में सेवा के बाद ज

नवरी २००९ में प्रबंधक पद से स्वैच्छिक सेवानिवृति ली। संप्रति प्रबंधकीय शिक्षा में संलग्न एक कालेज में प्राध्यापक एवं निदेशक के रूप में कार्यरत तथा साहित्यिक त्रैमासिक लघु पत्रिका "अविराम" का संपादन। मुख्यतः नई कविता एवं क्षणिकाओं के साथ साथ अन्य विधाओं में यदा-कदा लेखन।

प्रकाशित कृतियाँ-

-साहित्यिक गतिविधियाँ- १९९२-१९९३ तक निरंतर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन, उसी दौरान "नई कविता" एवं "क्षणिका" पर कुछ प्रकाशनों का सम्पादन। आगरा की तत्कालीन बहुचर्चित संस्था "शारदा साहित्य एवं ललित कला मंच" से जुड़कर साहित्यिक कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी निभाई। वर्ष १९९२-९३ के बाद से लम्बे साहित्यिक विश्राम के बाद २००९ में फिर से साहित्यिक दुनिया में लौटने की कोशिश के साथ वर्ष २०१० में समग्र साहित्य की लघु पत्रिका के रूप में "अविराम" का पुनर्प्रकाशन एवं संपादन प्रारंभ किया।

ईमेल- umeshmahadoshi@gmail.कॉम



समीक्षक - डॉ उमेश महादोषी

'सरस्वती-सुमन' का प्रतीक्षित क्षणिका विशेषांक मिला। निःसन्देह उम्मीदों के अनुरूप एक सार्थक अंक है। मुझे लगता है कि सृजन और संपादन/प्रकाशन के कुछ उद्देश्यों व सरोकारों के सामान्य होने के बावजूद कुछ उद्देश्य व सरोकार भिन्न भी होते हैं। मसलन सृजन के विविध पहलुओं/आयामों को सामने लाना प्रकाशन/संपादन का एक भिन्न उद्देश्य होता है। ऐसे में किसी भी पत्रिका, विशेषतः विशेषांक के संपादन/प्रकाशन को उसकी व्यापक उद्देश्यपरकता के सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए। इसलिए इस अंक में शामिल सृजन में यदि समालोचनात्मक दृष्टि से किसी के लिए कुछ है तो उसे भी सकारात्मक दृष्टि से देखा जाना जरूरी है। ‘क्षणिका’ को विधागत कसौटी पर परखने की जो घोर उपेक्षा हुई है, उसके संदर्भ में आपने जो सोचा, संकल्प लिया और सामर्थ्यवान एवं क्षणिका के शिल्प को अपने लेखन में पहचान देने वाली कवयित्री हरकीरत हीर एवं संतुलित समालोचनात्मक दृष्टि के धनी युवा रचनाकार-समालोचक जितेन्द्र जौहर की क्षमताओं का भरपूर उपयोग करते हुए उस संकल्प को पूरा किया, यह अत्यंत महवपूर्ण है। विश्वासपूर्वक कह सकता हूँ कि आपकी प्रणम्य दृष्टि और यह आहुति क्षणिका के यज्ञ के प्रभावों को दूर तक ले जायेगी और अनेकानेक सुफलों की प्रेरणा बनेगी। इस अंक की रचनाओं को क्षणिका के सन्दर्भ में परखने के लिए समालोचकों को समय मिलेगा, लेकिन एक बात तय है कि क्षणिका के अनेकानेक पक्ष उभरकर सामने आयेंगे। जैसे-जैसे क्षणिका पर चर्चा आगे बढ़ेगी, इस अंक की महत्ता वैसे-वैसे अधिक, और अधिक उभरकर सामने आयेगी। इसलिए यह अंक आज के लिए होने से ज्यादा भविष्य का दस्तावेज है। हीर जी परिश्रमी और सामर्थ्यवान तो हैं ही, पर वह दूसरों के दृष्टिकोंण और भविष्य की चीजों को भी समझने का माद्दा रखती हैं। रचनाओं के चयन और संकलन से यह बात स्पष्ट है। अनुवाद के माध्यम से उन्होंने हिन्दीतर भारतीय भाषाओं- असमी एवं पंजाबी के कई सशक्त क्षणिकाकारों को प्रस्तुत किया है। जितेन्द्र जी, कथूरिया जी और बलराम अग्रवाल जी के आलेख क्षणिका के प्रति समझ विकसित करने में सहायक होंगे। जितेन्द्र जी ने अपने आलेख में अपनी शोधवृत्ति के सहारे कई दृष्टियों से क्षणिका का विवेचन प्रस्तुत किया है। यद्यपि उन्होंने मेरे छुटपुट कार्य की कुछ ज्यादा चर्चा कर दी है, पर उसको छोड़कर भी आलेख को देखा जाये, तो उन्होंने कई अच्छी चीजें रखी हैं। श्रद्धेय विष्णु प्रभाकर जी की क्षणिका को लेकर क्षणिका के रूप-स्वरूप को स्पष्ट करने से क्षणिका के रूपाकार को एक प्रामाणिकता मिली है। एक विधा के साथ लेखन करते हुए कई बार दूसरी विधाओं के साथ हम कैसे जुड़ जाते हैं, इसे उन्होंने वरिष्ठ कवयित्री आदरणीया डॉ. मिथिलेश दीक्षित जी की क्षणिका का उदाहरण देकर स्पष्ट किया है। दरअसल यह ऐसी प्रक्रिया है, जो बेहद स्वाभाविक होती है और अपने स्वभाववश बहुत बार तो दूसरी विधाओं के प्रस्फुटन का कारण बनती है (और समरूप विधाओं के मध्य अन्तर को रेखांकित करने का सूत्र भी उपलब्ध करवाती है)। स्वयं क्षणिका का प्रस्फुटन इसी प्रक्रिया का एक उदाहरण है। मिथिलेश दीदी अच्छी-समर्पित क्षणिकाकार हैं और खोजने पर उनकी रचनाओं में शोध की दृष्टि से काफी कुछ मिलेगा, जो अन्ततः क्षणिका की पंखुड़ियों को खोलने में मदद करेगा। ऐसे कुछ उदाहरण इस विशेषांक में अन्य रचनाकारों की क्षणिकाओं के मध्य भी उपस्थित हैं। अध्ययनशील रचनाकारों के लिए इस आलेख में कई संपर्क सूत्र भी दिए हैं जितेन्द्र जी ने। कई युवा रचनाकारों में सम्भावनाओं को टटोलते हुए उन्हें भविष्य में अच्छी क्षणिकाएं देने के लिए प्रेरित किया है। आदरणीय डॉ. कथूरिया जी के आलेख की कुछेक बातों पर भले मेरी दृष्टि में विस्तार से चर्चा की गुंजाइश हो, पर उन्होंने जिन सशक्त उदाहरणों के माध्यम से अपनी बात को सामने रखा है, वे क्षणिका की वास्तविक सामर्थ्य को रेखांकित करते हैं। उम्मीद है उनका मार्गदर्शन भविष्य में भी क्षणिकाकारों को उपकृत करता रहेगा। डॉ. बलराम अग्रवाल जी मूलतः लघुकथा से जुड़े होने और अपनी तत्संबंधी अत्यधिक व्यस्तताओं के बावजूद पिछली सदी के आठवें दशक के मध्य से ही क्षणिका को सृजन और चिन्तन- दोनों स्तरों पर अपना प्रभावशाली समर्थन देते रहे हैं। दुर्भाग्यवश क्षणिका से जुड़े लोग उनका लाभ नहीं उठा पाये। भविष्य में क्षणिका पर काम होगा तो उनका मार्गदर्शन और समर्थन भी मिलेगा ही।
सरस्वती सुमन का यह अंक क्षणिका के मैदान में छाए सन्नाटे को तोड़ेगा, हर हाल में तोड़ेगा। मेरी ओर से संपादन-परिवार, हीर जी, जितेन्द्र जी- सभी को हार्दिक बधाई, बार-बार बधाई!

उमेश महादोषी, एफ-488/2, गली संख्या-11, राजेन्द्रनगर, रुड़की-247667, जिला-हरिद्वार (उत्तराखण्ड) मोबाइल : 9412842467
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 (2) रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी की समीक्षा 
रस्वती सुमन’ त्रैमासिक का क्षणिका विशेषांक मिला । लघुकथा, मुक्तक और अब क्षणिका विशेषांक तथा अगला अंक ‘ हाइकु’ के रूप में प्रस्तावित है । कोई विधा अपने आकार -प्रकार से नही वरन् प्रभावापन्न होने   से ही महत्त्वपूर्ण होती है ।श्री आनन्द  सुमन सिंह  जी  ने  विशेषांकों के माध्यम से हिन्दी -जगत् का ध्यान आकृष्ट किया है । मुक्तक और क्षणिका के क्षेत्र में यह पहला बड़ा प्रयास है । इसके अतिथि सम्पादकों के लिए भी यह कार्य चुनौतीपूर्ण रहा है । हरकीरत’हीर’ जी ने असमिया और पंजाबी भाषा की क्षणिकाएँ देकर भाषायी  सेतु का निर्माण किया है जो आज के भारत की सबसे  बड़ी ज़रूरत है । सबसे बड़ी आश्वस्ति की बात यह है कि आपने रचना का चयन किया है , रचनाकार का नहीं । किसी बड़े साहित्यकार की सन्तान होने से ही किसी को  साहित्यकार नहीं माना जा सकता । यह तो वही बात हुई कि हमारे दादा ने घी खाया था ,हमारे हाथ सूँघ लो । हरकीरत जी स्वय भी संवेदन्शील कवयिती हैं , इसका प्रभाव इनके चयन में भी नज़र आता है । इमरोज़ की ‘प्यार’, प्रतिभा कटियार की  ‘तुमसे मिलकर’, सीरियाई कवयित्री मरम अली मासरी की दूसरी और तीसरी क्षणिकाएँ( उसने पुरुष  से कहा -नमक के कणों की मानिन्द), मीरा ठाकुर की  दूसरी क्षणिका ‘ मैं/ सुख में रहूँ / या दु:ख में’ मंजु मिश्रा की ‘रिश्ते’ ,  एक ही विषय पर रचना श्रीवास्तव की दसों क्षणिकाएँ , डॉ (सुश्री ) शरद सिंह की सभी क्षणिकाएँ एक अलग संवेदना लिये हुए हैं, जो क्षणिका को  गहन और गम्भीर काव्य -रचना के रूप में प्रतिष्ठित करती हैं ।  डॉ गोपाल बाबू शर्मा की ‘मीठे सपने’, सर्वजीत ‘सवी’ की पंजाब, डॉ मिथिलेश दीक्षित की क्षणिकाएँ अलग तेवर लिये हुए हैं। इस अंक में और भी ढेर सारी क्षणिकाएँ प्रभावित करती हैं , जिनका उल्लेख यहां सम्भव नहीं। यदि  डॉ दीक्षित के अनुसार कहूँ -‘नहीं फ़र्क होता  है/ वय से / कविता उपजी/ अन्तर्लय से’। इस अंक की क्षणिकाओं में जो अन्तर्लय है , वह इसे उन हल्की और भद्दी  रचनाओं से अलग करेगी  ,जो  क्षणिकाओं के नाम पर मंचों पर परोसी जाती हैं । जितेन्द्र ‘जौहर’ ,डॉ उमेश महादोषी और डॉ सुन्दर  लाल कथूरिया के लेख क्षणिका  के भाव-रूप की सूक्ष्म जानकारी देते  हैं । अपनी पारिवारिक कठिनाइयों के बावज़ूद हरकीरत जी ने इस अंक को बेहतर बनाने में जो बेहतर प्रयास किया है , वह श्लाघ्य है ।
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
फ्लैट न-76,( दिल्ली सरकार आवासीय परिसर)
रोहिणी सैक्टर -11 , नई दिल्ली-110085
(3)सुखदर्शन सेखों जी की प्रतिक्रिया .....
 
संक्षिप्त परिचय .....
नाम- सुखदर्शन सेखों
शिक्षा - स्नातक , डिप्लोमा इन नैचुरोपैथी
कृतित्व- टी.वी धारावाहिक दाने अनार के ( लेखक व निर्देशक ),ए.डी फिल्म(हिंदुस्तान कम्बाइन,गुरु रिपेयर ,डिस्कवरी जींस , राजा नस्बर, बिसलेरी, ओक्सेम्बेर्ग, डोकोमेन्ट्री फिल्म (चौपाल गिद्दा

, नगर कीर्तन , एक अकेली लड़की, यू आर इन अ क्यू ) टेली फिल्म (एक मसीहा होर, सितारों से आगे , बचपन डा प्यार , है मीरा रानिये, धोखा , झूठे साजना, सोनिका तेरे बिन , बरसात आदि )
संवाद लेखन , धारावाहिकों के शीर्षक गीतों का लेखन , गीत, नज्में , कहानियाँ ,उपन्यास ,फीचर फिल्म
सम्प्रति - फिल्म निर्माता निर्देशक और लेखक
संपर्क - sukhdrshnsekhon@in.com


क्षणिका विशेषांक मिला , पढ़कर बहुत ही ख़ुशी हुई . इतनी मेहनत की है आपने कि कभी भी भुलाई नहीं जा सकती . उम्र भर संभाल कर रखने वाला अंक बन गया है . हरकीरत हीर जी ने मेरी क्षणिकाएं अनुदित कर
मेरी खुशियों में और भी इजाफ़ा किया है . और ऊपर से क्षणिका के महत्व का भी गंभीरता से पता चल गया है कि एक क्षणिका कैसे अपने भीतर एक पूरी कहानी छुपाये रहती है . बहुत सारे लेखकों की क्षणिकाएं पसंद आईं जिनमें अमृता प्रीतम , अनिता कपूर , अशोक दर्द , हरकीरत हीर , अदेले ग्राफ , इमरोज़, चित्रा सिंह, जितेन्द्र जौहर , आशा रावत , पल्लवी दीक्षित , रमा द्रिवेदी , रनवीर कलसी , सुदर्शन गासो , धर्मेन्द्र सिखों , प्रियंका गुप्ता आदि का ज़िक्र किये बगैर नहीं रह सकता . अब तो जब भी समय मिलेगा इसको बार-बार पढूंगा . एक बार फिर आपको ऐसा अंक परोसने के लिए धन्यवाद .....!!

दर्शन दरवेश
अजीतगढ़ (मोहाली) पंजाब
+919041411198
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(4)  त्रिपुरारी कुमार शर्मा की प्रतिक्रिया 

आज डेढ़ साल की प्रतीक्षा के बाद त्रैमासिक पत्रिका ‘सरस्वती सुमन’ प्राप्त हुई। क्षणिका विशेषांक (अतिथि सम्पादक : Harkirat Haqeer) का यह अंक सराहणीय और पर्सनल लाइब्रेरी में संजोने योग्य है। इस अंक में विष्णु प्रभाकर, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, अमृता प्रीतम, अज्ञेय सहित 179 रचनाकारों को शामिल किया गया है, जिसमें एक छोटा-सा नाम मेरा, त्रिपुरारि कुमार शर्मा भी है।

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(5)  संगीता स्वरूप जी की प्रतिक्रिया .....

हरकीरत  जी ,

आपके सौजन्य  से मुझे सरस्वती सुमन पत्रिका प्राप्त हुई ... सरस्वती सुमन का यह क्षणिका विशेषांक  बहुत पसंद आया । 
क्षणिका विधा पर जितेंद्र जौहर जी का विस्तृत लेख  जिससे इस विधा के बारे में  काफी कुछ जानने और समझने का अवसर मिला ।
शुभड़ा पांडे जी द्वारा क्षणिका  को परिभाषा में बांधने का प्रयास भी सराहनीय लगा । क्षणिका को जानने और समझने के लिए इसमे दिये चारों लेख महत्त्वपूर्ण  स्थान रखते हैं । 
संपादक के रूप में निश्चय ही दुरूह कार्य  रहा होगा .... लेकिन आपने जिस योग्यता से इसे किया है उसके लिए साधुवाद ।  इतने सारे रचनाकारों से संपर्क करना , उनसे रचनाएँ आमंत्रित करना और फिर स्तरीय  रचनाओं का चयन करना अपने आप में किला फतह करने जैसा है । भिन्न भाषाओं के रचनाकारों की क्षणिकाओं के अनुवाद  भी शामिल किए हैं और कुछ के अनुवाद तो आपने स्वयं ही किए हैं .... इस तरह पाठकों को अन्य भाषाओं के रचनाकारों की कृतियाँ पढ़ने का भी सहज अवसर प्रदान किया है ।
जाने माने  साहित्यकारों की  रचनाएँ पढ़ने का भी  सौभाग्य इस पत्रिका के माध्यम से  आपने प्रदान किया ..... आपके माध्यम से मैं आनंद सुमन जी  को हार्दिक बधाई देती हूँ जो यह श्रमसाध्य  काम कर रहे हैं ..... यह पत्रिका निश्चय ही हिन्दी साहित्य  के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित होगी .... जाने माने रचनाकारों के बीच स्वयं को पा कर गौरवान्वित हूँ ...इसके लिए मैं हृदय  से आपकी आभारी हूँ ...


  संगीता स्वरूप,
333  बहावलपुर   सोसाइटी  CGHS , प्लाट  नो - 1 , सेक्टर  - 4 / द्वारका  / न्यू  डेल्ही  - 75 

मो . -- 9868769021
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(6) वंदना गुप्ता की प्रतिक्रिया .....

आदरणीय हरकीरत जी,जितेन्द्र जौहर जी
सादर नमस्कार

मुझे क्षणिका विशेषांक मिल गया जिसके लिये हार्दिक आभार । उसे पढकर जो भाव उभरे भेज रही हूँ  और कल इसे ब्लोग व फ़ेसबुक पर भी लगाऊँग़ी।


क्षणिका………एक दृष्टिकोण


क्षण क्षण भावों का रेला

कैसे रूप बदलता है

तभी तो प्रतिपल

क्षणिका का ढांचा बनता है





क्षणिक अभिव्यक्ति

क्षणिक आवेग

क्षणिक संवेग

क्षणिक है जीवन की प्रतिछाया

तभी तो क्षणिका के क्षण क्षण मे
जीवन का हर रंग समाया





क्षण क्षण मे क्षण घट रहा

नया रूप ले रहा

वंचित भावों का उदगम स्थल

त्वरित विचारों का जाल

क्षणिका का रूप बन रहा





दोस्तों ,



क्षणों का हमारे जीवन मे कितना महत्त्व है ये उस वक्त पता लगा जब सरस्वती सुमन पत्रिका का त्रैमासिक क्षणिका विशेषांक (अक्टूबर - दिसम्बर 2012)  मिला तो ख़ुशी का पारावार न रहा . इतनी बड़ी पत्रिका में एक नाम हमारा भी जुड़ गया . ह्रदय से आभारी हूँ हरकीरत हीर जी की और जीतेन्द्र जौहर जी की जो उन्होंने हमें इस लायक समझा और इतने वरिष्ठ कवियो और  रचनाकारों के बीच एक स्थान हमें भी दिया .

क्षणिका विशेषांक पढना अपने आप में एक सुखद अनुभूति है . सबसे जरूरी होता है उस विशेषांक का महत्त्व दर्शाना और उसकी विशेषता बताना , उसकी बारीकियों पर रौशनी डालना और ये काम आदरणीय जीतेन्द्र जौहर जी ने बखूबी किया है .पहले तो सबकी क्षणिकाएं आमंत्रित करना उसके बाद 179 रचनाकारों को छांटकर उन की क्षणिकाओं को स्थान देना कोई आसान कार्य नहीं था जिसे हरकीरत जी ने बखूबी निभाया . तक़रीबन एक साल से वो इसके संपादन में जुडी थीं ....नमन है उनकी उर्जा और कटिबद्धता को .

सरस्वती सुमन का क्षणिका विशेषांक यूं लगता है जैसे किसी माली ने  उपवन के एक- एक फूल पर अपना प्यार लुटाया हो . कुछ भी व्यर्थ या अनपेक्षित नहीं ........सब क्रमवार . संयोजित और संतुलित ढंग से सहेजना ही कुशल संपादन का प्रतीक है . शुभदा पाण्डेय जी द्वारा " क्षणिका क्या है " की व्याख्या करना क्षणिका के महत्त्व को द्विगुणित करता है . क्षणिका के शिल्प और संवेदना पर प्रोफेसर सुन्दर लाल कथूरिया जी का आलेख क्षणिका के प्रति गंभीरता का दर्शन कराता है तो दूसरी तरफ डॉक्टर उमेश महादोषी ने क्षणिका के सामर्थ्य पर एक बेहद सारगर्भित आलेख प्रस्तुत किया है जो क्षणिका की बारीकियों के साथ कैसे क्षणिकाएं लिखी जाएँ उस पर रौशनी डालता है और कम से कम नवोदितों को एक बार इस विशेषांक को जरूर पढना चाहिए क्योंकि ये विशेषांक अपने आप में क्षणिकाओं का एक महासागर है जिसमे वो सब कुछ है जो किसी को भी लिखने से पहले पढना जरूरी है . बलराम अग्रवाल जी द्वारा क्षणिका के रचना विधान को समझाया गया है कि  काव्य से क्षणिका किस तरह भिन्न है और उसे कैसे प्रयोग करना चाहिए , कैसे लिखना चाहिए हर विधा को बेहद सरलता और सूक्ष्मता  से समझाया गया है .

पूरा विशेषांक एक उम्दा , बेजोड़ , पठनीय और संग्रहनीय संस्करण है और यदि ये संस्करण किसी के पास नहीं है तो वो एक अनमोल धरोहर से वंचित है . सब रचनाकारों के विषय में कहना तो कठिन है क्योंकि सभी बेजोड़ हैं . हर क्षणिका अपने में एक कहानी समेटे हुए हैं . सोच के दायरे को विस्तार देती अपने होने का अहसास कराती है जो किसी भी पत्रिका का अहम् अंग होता है . क्षणिका विशेषांक निकलना अपने आप में पहला और अनूठा प्रयास है जो पूरी तरह सफल है जिसकी सफलता में सभी संयोजकों और संपादकों की निष्ठा और लगन का हाथ है जिसके लिए सभी रचनाकार कृतज्ञ हैं।

अंत में आनंद सिंह सुमन जी का हार्दिक आभार जो अपनी पत्नी की याद में ये पत्रिका निकालते हैं अगर कोई संपर्क करना चाहे तो इस मेल या पते पर कर सकता है

सारस्वतम
1---छिब्बर मार्ग (आर्यनगर) देहरादून --- 248001

mail id ...... saraswatisuman@rediffmail.com

Tuesday, October 9, 2012

फैसला,अक्स,तलाश,नज़्म का जन्म और दर्द की नौकाएं....

मित्रो मेरी कुछ नज्में ज्ञानपीठ से निकलने वाली देश  की सर्वश्रेष्ठ पत्रिका 'नया ज्ञानोदय' के अक्टूबर- १२ के अंक  में प्रकाशित हुई हैं ...उन्हें आप सब के लिए यहाँ पुन: प्रेषित  कर रही हूँ ...साथ ही पत्रिका का वह अंश भी संलग्न है जिसमें रचनायें प्रकाशित हैं .... आप सब के साथ एक और खुशखबरी सांझा करना चाहती हूँ जैसा कि मैं पहले भी सूचित कर चुकी हूँ  कि बोधी प्रकाशन पूर्वोत्तर के रचनाकारों को लेकर  ( पूर्वोत्तर से तात्पर्य - असम, मणिपुर , नागालैंड , मेघालय ,अरुणाचल , सिक्किम ,इम्फाल से है )एक काव्य-संग्रह निकालने जा  रहा है ...जिसके संपादन का दायित्व  उन्होंने मुझे सौंपा है ...अत: पूर्वोत्तर के सभी रचनाकारों से अनुरोध है कि अपनी दो-तीन रचनायें (स्त्री विमर्श पर आधारित ), संक्षिप्त परिचय और तस्वीर ३० अक्टूबर तक  मुझे इस पते पर मेल कर  दें  harkirathaqeer@gmail.com या बोधी प्रकाशन के इस मेल पर मेल करें ....bodhiprakashan@gmail.com
(१)

फैसला ....


तूने ....
सिर्फ उन परिंदों की बात की
जो अपनी उडारियों से
 छूना चाहते थे आसमां
कभी जो ...
उनके प्रेम से
चोंच से चोंच मिलाकर
दानों के लिए ...
जद्दोजहद की बात करते
तो मैं.....
साथ चल पड़ती .....!!

(२)
अक्स.....

अभी-अभी हुई बारिश में
सड़क पर तैरते बुलबुलों के बीच
तलाशना चाहती थी तेरा अक्स
कि गुजरती इक कार ने
सब कुछ तहस -नहस कर दिया
उतरती इक नज़्म
फिर वहीँ ...
खामोश हो गई .....!

(३)

तलाश ....

न जाने कितने  रिश्ते
बिखरे पड़े हैं मेरी देह में
फिर भी तलाश है जारी है
इक ऐसे रिश्ते की
जो लापता है उस दिन से
बाँध दी गई थी गाँठ
जिस दिन ...
सात फेरों साथ
चूल्हे की आग संग ....

(४)

नज़्म का जन्म .....

इस नज़्म के
जन्म से पहले
ढूंढ लाई थी अपने आस-पास से
कई सारे दर्द के टुकड़े
कुछ कब्रों की मिट्टी
कुछ दरख्तों के ज़िस्म से
सूखकर झड़ चुके पत्ते
फिर इक बुत तैयार किया
ख़ामोशी का बुत ...
और लिख दिए इसके सीने पर
तेरे नाम के अक्षर
नज़्म ज़िंदा हो गई .....

(५)

दर्द की नौकाएं  ....

बरसों से ...
बाँध रखी थी दिल में
दर्द की नौकाएं
आज तुम्हारी छाती पर
खोल देना चाहती हूँ इन्हें ...
पर तुम्हें ...
इक वादा करना होगा
तुम बनोगे इक दरिया
और मोहब्बत की पतवार से
बहा ले जाओगे इन्हें
वहां .....
जहाँ प्रेम का घर है ....!!