लिखकर तेरा नाम दीयों से , इन अंधेरों ने आज तुझे बुलाया है ....
आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं .......
(१)
दिवाली .....
ज़िन्दगी ....
हर रोज़ हादसों से
गुज़रती रही .....
और हर हादसे के बाद
इक चिराग़ बुझता गया ...
आज दिवाली है ......!!
(२)
वक़्त के निशान .....
आज.....
बरसों बाद जब ...
अपना पुराना संदूक खोला
उसमें तुम्हारा दिया
वो पीतल का दीया भी था .....
जो अब वक़्त के साथ
काला पड़ चूका है ......!!
(३)
मोहब्बत के दीये ....
मैं तो ...
जन्मों से
तुम्हारी ही थी ....
तो क्या हुआ, जो हम
साथ-साथ न जल सके
बस ख्याल रखना ...
हवा बुझा न दे कहीं
मोहब्बत के ये जलते दीये
हमारे दिलों से .....!!
(४)
रौशनी .....
बरसों पहले ...
इसी दिन .....
छोड़ आई थी मैं
अपनी रौशनी तुम्हारे पास
गर तुमने .....
दिल के किसी कोने में उसे ....
संभाले रखा है ....
तो दे जाना इस बार
मेरे चिराग़ अब ...
बुझने लगे हैं .....!!
(५)
तेल .....
कई बार ...
अंगुलियाँ जलाई हैं
कई बार....
छालों को सुई से कुरेदा है .....
अय मोहब्बत ! सच्च मान ....
तुझसे किये वादे की खातिर ही
मैं ताउम्र ........
अपने दीयों में
तेल डालती रही .....!!
(६)
पैगाम .....
कभी जो ...
दरिया किनारे बैठो
लहरों को दूर तलक
गौर से देखना ........
कहीं कोई , मझधार में ...
लड़खडाता सा दीया ...
मोहब्बत के ....
जिन्दा होने का
पैगाम .....
दे जायेगा .....!!
(७)
छाले .....
मेरा दीपक
काँपता है ....
शायद ............
बरसों के छाले हैं .....
इसके दिल पर ....!!
(८)
फ़रियाद.....
तुम्हें याद होगा ...
कभी हमने लिखे थे
दीयों से इक-दूसरे के नाम ....
आज भी दिवाली है ...
तुम लिखना इस बार फिर
अपने आँगन में मेरा नाम
मैं भी जलाऊंगी......
तुम्हारे नाम की शमा
मोहब्बत अब .......
रौशनी मांगती है ......!!
(९)
उम्मीदों के दीये ......
रातों की उदासी
और मायूसी के बीच
इस बार फिर जलाये हैं
कुछ उम्मीदों के दीये .......
देखना है चिरागों में रौशनी
लौटती है या नहीं .....!?!
(१०)
खुशबू .....
चारों तरफ
अँधेरा था ....
न चाँद की चाँदनी ......
न तारों की रौशनी .......
मैंने अपने भीतर झाँका
शायद कोई दीया मिल जाये ..
वहाँ भी अँधेरा था .............
अचानक किवाड़ों पे दस्तक हुई
मैंने हौले से पूछा : कौन है ...?
वह बोली : मैं हूँ ...........
मैंने धीमे से दरवाजा खोला
सबा थी ........
तेरे बदन की खुशबू लिए
और.....
चिराग़ जल उठे ....!!

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