मन बड़ा खिन्न है ....पिछले दिनों ब्लॉग जगत के कुछ वरिष्ठ ब्लोगरों से बड़ा कटु अनुभव रहा ...जरा सी किसी के लेखन में आप खामी क्या निकाल दो केंचुल उतारने लगते हैं ......ऐसे में न जाने क्यों मुझे नीमा (अपनी पड़ोसन) की डरी सहमी आँखें याद आने लगती हैं .....पहली नज़्म उसी नीमा को समर्पित है जो अपनी प्रतिभा कहीं खो बैठी है .....और कुछ साज़िशों में नग्न होती औरत की दास्ताँ है .....और इक हवस बनता प्रेम ......
(१)
पहचान......
....................
जितने मुसाफ़िर
उतने सफ़र ...
जितने रास्ते
उतनी मुश्किलें ...
उम्रभर दौडती रहती है ज़िन्दगी ...
रास्तों से अधिक लम्बी है मंजिलें ...
राह में ......
धोखा है ,छल है ,कपट है ,बेवफाई है
काई के नीचे जड़ें ....
तलाशतीं हैं अपनी पहचान ....
कोई कुटिल , अपने अहं की खातिर
झाड़ियों के पीछे ....
उतारता है अपनी
केंचुल ......!!
(२)
तूफ़ान ......
....................
वह काँप रही थी
सुबक रही थी ...
बहुत कोशिशों के बाद
धीमें से हाँफते -हाँफते
शब्दों को गले से धकेला
पर उसकी सुबकियों में
आवाज़ कहीं गुम हो गई ....
इक तूफ़ान ने दरख़्त के सारे पत्ते
नोच लिए थे .....
अब वह नग्न खड़ा था .......!!
(३)
कॉल गर्ल
.........................
वह ....
हाथों में पर्ची लिए
फूट-फूटकर रो पड़ा ...
''तुमने ऐसा क्यों किया एंजिल ...?"
वह .....
तल्खी भरे स्वर में
मुस्कुराकर बोली .....
''मुझे देने वाला भी कोई मर्द ही था जानम ...''
वह एच आई वी पोजिटिव थी .....!!
(४)
साज़िश .....
......................
उसने एक-एक कर
बदन से सारे कपड़े
उतार कर रख दिए ...
जैसे चिड़िया उतारती है पंख
रात ने धीमें से दरवाज़ा खोला
शैम्पू से धुले बाल ...
फैलते गए उसके ज़िस्म पर ....
वक़्त ने ललचाई आँखों से
कई -कई कोणों से
कैद कर लिया देह को
ज़िस्म की मुस्कराहट
अंधेरों की साज़िश में
दम तोड़ती रही .....!!
(५)
हवस .....
......................
एक खत ..दो.. तीन ख़त ....
हवस के अंधड़ में खोया आदमी
आदी हो जाता है खतों का ...
चाँदनी फाड़ती है ज़िस्म
मोहब्बत दांत किटकिटाती है
बाथरूम से निकलकर
अचानक सामने आ खड़ी होती है
कोई खतवाली .....
अंगुलियाँ हौले-हौले पढने लगतीं हैं
खत की एक-एक तहरीर
धीरे -धीरे बढ़ने लगती है
खतों की तादाद ...
आदमी दब जाता है कहीं
खतों के ढेर में ......!!
Friday, October 8, 2010
Saturday, September 25, 2010
कुछ मोहब्बत के ख्याल .......
Posted by
हरकीरत ' हीर'
at
11:25 PM
उम्मीद का इक उड़ता पंछी न जाने कब मेरी खिड़की पे आ बैठा .....पेड़ों के पत्ते हरे हो गए ....सबा ने झोली से कई सारे फूल निकाले ....और बिखेर दिए मेरे सामने .....मैंने देखा उसमें तुम्हारा वो सुर्ख फूल भी था ....मैंने हौले से उसे छुआ ....वह तेरी तस्वीर बन मुस्कुराने लगा ............
बस ये मोहब्बत के कुछ ख्याल उतर आये यूँ ही .........
(१)
धरती में .....
जब चारों ओर आग लगी थी
सूरज ने अपना चेहरा ढक लिया था शर्म से .....
चाँद लुढ़क आया था पत्थरों पे ..
कोई जहरीले धागों से सी रहा था कफ़न .....
उस वक़्त ......
मुहब्बत सफ़ेद लिबास में मेरे सामने खड़ी थी
मैंने हौले से उसे छुआ और पूछा -
''क्या तुम मुझे इक.......
फूल दोगी ....!?! ''
(२)
जरा सी .....
नज़र क्या मिली
कितने ही रंग फ़ैल गए
ज़िस्म की दीवार पर ....
ये मोहब्बत क्या ....
रौशनियों की नगरी होती है .....!?!
(३)
आज ये मरुस्थल में
जाने कैसा ...
सुर्ख सा फूल खिला
आज की रात ....
पिघलेगी कोई बर्फ ...
मुहब्बत की आग में .......!!
(४)
मेरे एक हाथ की मुट्ठी में
ज़िन्दगी है .....
और दुसरे हाथ की मुट्ठी में
मौत ......
देखना है मोहब्बत ....
किस रस्ते चलती है .......!!
(५)
ये उम्र दराज़ के लोग
भले ही अपने दरीचों से
झांकते रहे हमारी खिडकियों की ओर
हम बंद कमरों में सी लेंगे
अपनी मुहब्बत का...
पैरहन ......!!
(६)
तुम्हारी नज्में ...
अब भी हैं मेरे पास
तुम्हारी भेजीं , वो तस्वीरें भी ...
कभी -कभी बड़ी बेहयाई से
ज़िस्म से बातें करने लगतीं हैं ....
ऐसे में मैं उन्हें ओढा देती हूँ ....
गर्म साँसों का कम्बल ......!!
(७)
मुहब्बत अक्षरों को ...
घुलने नहीं देती पानी संग
न किसी और ज़मीं की तलाश में
लांघती है दहलीज़ ....
वह उन अक्षरों को जोड़ कर
देना चाहती हूँ करती है
जहाँ मैं आज की
रात लिख ....!!
(८)
सूरज ........
बदनसीबी की रौशनी से रंग देता है
मेरे लिखे हर लफ्ज़ को ....
इससे पहले कि वह फिर छीन ले
मेरे हाथ से कलम ...
और निराशा में मेरे सारे
हर्फ़ मर जायें
मैं आज की रात
लिख देना चाहती हूँ
मोहब्बत के नाम ...
पहला ख़त .....!!
(९)
ऊपर स्याह आसमां था
और नीचे आग से जलते अक्षर
इन दोनों के बीच से गुजर कर
मैंने अपनी मुहब्बत अयाँ की है
इससे पहले कि वह फिर
ख़ामोशी में पनाह ले
आ इसे.....
इन हवाओं में
नस्ब कर दें .....!!
नस्ब- कायम
(१०)
आज का ये आधा चाँद
लिख इन है अपनी तकदीर
खंज़र की नोक पर ....
आज की रात यह
फिर सोयेगा .....
सूरज के आगोश में ......!!
बस ये मोहब्बत के कुछ ख्याल उतर आये यूँ ही .........
(१)
धरती में .....
जब चारों ओर आग लगी थी
सूरज ने अपना चेहरा ढक लिया था शर्म से .....
चाँद लुढ़क आया था पत्थरों पे ..
कोई जहरीले धागों से सी रहा था कफ़न .....
उस वक़्त ......
मुहब्बत सफ़ेद लिबास में मेरे सामने खड़ी थी
मैंने हौले से उसे छुआ और पूछा -
''क्या तुम मुझे इक.......
फूल दोगी ....!?! ''
(२)
जरा सी .....
नज़र क्या मिली
कितने ही रंग फ़ैल गए
ज़िस्म की दीवार पर ....
ये मोहब्बत क्या ....
रौशनियों की नगरी होती है .....!?!
(३)
आज ये मरुस्थल में
जाने कैसा ...
सुर्ख सा फूल खिला
आज की रात ....
पिघलेगी कोई बर्फ ...
मुहब्बत की आग में .......!!
(४)
मेरे एक हाथ की मुट्ठी में
ज़िन्दगी है .....
और दुसरे हाथ की मुट्ठी में
मौत ......
देखना है मोहब्बत ....
किस रस्ते चलती है .......!!
(५)
ये उम्र दराज़ के लोग
भले ही अपने दरीचों से
झांकते रहे हमारी खिडकियों की ओर
हम बंद कमरों में सी लेंगे
अपनी मुहब्बत का...
पैरहन ......!!
(६)
तुम्हारी नज्में ...
अब भी हैं मेरे पास
तुम्हारी भेजीं , वो तस्वीरें भी ...
कभी -कभी बड़ी बेहयाई से
ज़िस्म से बातें करने लगतीं हैं ....
ऐसे में मैं उन्हें ओढा देती हूँ ....
गर्म साँसों का कम्बल ......!!
(७)
मुहब्बत अक्षरों को ...
घुलने नहीं देती पानी संग
न किसी और ज़मीं की तलाश में
लांघती है दहलीज़ ....
वह उन अक्षरों को जोड़ कर
देना चाहती हूँ करती है
जहाँ मैं आज की
रात लिख ....!!
(८)
सूरज ........
बदनसीबी की रौशनी से रंग देता है
मेरे लिखे हर लफ्ज़ को ....
इससे पहले कि वह फिर छीन ले
मेरे हाथ से कलम ...
और निराशा में मेरे सारे
हर्फ़ मर जायें
मैं आज की रात
लिख देना चाहती हूँ
मोहब्बत के नाम ...
पहला ख़त .....!!
(९)
ऊपर स्याह आसमां था
और नीचे आग से जलते अक्षर
इन दोनों के बीच से गुजर कर
मैंने अपनी मुहब्बत अयाँ की है
इससे पहले कि वह फिर
ख़ामोशी में पनाह ले
आ इसे.....
इन हवाओं में
नस्ब कर दें .....!!
नस्ब- कायम
(१०)
आज का ये आधा चाँद
लिख इन है अपनी तकदीर
खंज़र की नोक पर ....
आज की रात यह
फिर सोयेगा .....
सूरज के आगोश में ......!!
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