खौफ़ ....ज़ंजीर....और पिंजरा ...अक्सर औरत और चिड़िया अपने नसीबों में मेहँदी के साथ इनका नाम भी लिखा लाती हैं .....और मौत ....जी भर दर्द पीने भी नहीं देती के हक़ जताने आ खड़ी होती है ....उजाला बेशक रास्ता भूल जाये ...पर कम्बखत ये नहीं भूलती ......औरत का दर्द नंगे पाँव चलकर आता है ....जब साँस उखड़ने लगती है तो वह पी लेना चाहती है एक ही बार में सारे गम ......पर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है .....
रब्बा अपनी दुनियाँ में इक हँसी का जंगल उगाना ......जहाँ रूहें अपने पंख पसार खुले आसमां में बेखौफ उड़ सकें ......
(१)
झुलसे पंख
वह मासूम सी
इक दिन महानगर के
इक विशाल दरख़्त पे जा बैठी
अचानक पत्तों ने इक आग सी उगली
और उसके पंख झुलस गए
अब वह उड़ती नहीं .......!!
(२)
खौफ़
अचानक
इक खौफनाक
धमाके की आवाज़ हुई
वह जहाँ थी वहीँ सिकुड़ गई
खौफ़ ने उसे उड़ना भुला दिया .....!!
(३)
ज़ंजीर
उसने बड़ी उम्मीद से
आसमां की ओर देखा
पंख फड़फड़ाये .....
उडारी भरने की कोशिश में
औंधे मुँह जा गिरी
उसने झुककर नीचे देखा
इक ज़ंजीर पैरों से बंधी थी .......!!
(४)
पिंजरा
वह .....
बरसों से कैद थी
पिंजरे में
आज जब मैंने उसे
मुक्त करना चाहा
तो देखा .....
उसका ज़िस्म
पत्थर हो गया है .......!!
(५)
प्यास
वह प्यासी थी
पर प्यास उसे पानी की न थी
वह पी लेना चाहती थी
उसके होंठों से
अपने हिस्से के
तमाम दर्द .....!!
Wednesday, May 19, 2010
Saturday, May 8, 2010
Posted by
हरकीरत ' हीर'
at
10:25 PM
हथेलियों पे लगा इक खुशनुमा रंग है .............मुहब्बत
खूबसूरती का महकता एहसास है ..................मुहब्बत
अँधेरे से रौशनी की ओर चलता ख्याल है .....मुहब्बत
उदास चेहरों पर खिली मुस्कान है ............. ...मुहब्बत
जन्मों - जन्मों की इक तलाश है .............. ...मुहब्बत
मुहब्बत मिट्टी के वजूद पर खिला इक सुर्ख गुलाब है ............
पेश हैं कुछ क्षणिकाएं ....जो आज फिर मुहब्बत के दरवाजे पे दस्तक दे रही हैं ........
(१)
प्रेम .....
ऊंचाई से लुढ़क के
पेड़ों के झुरमुटे में
कहीं अटका पड़ा था प्रेम
मैंने उसे उठाकर खड़ा किया
धूल झाड़ी और कहा.....
अभी तुझे चलना है
मित्र ......!!
(२)
अनकहे शब्द ......
तुम .....
मेरी लिखी नज्मों में
ढूंढते रहे अपने लफ्ज़
मैं तेरी लिखी सतरों में
ढूंढती रही कुछ छूटे हर्फ़
ज़िन्दगी यूँ ही तेरे
अनकहे शब्दों के
इंतजार में
कटती गयी ......!!
(३)
तेरा ज़िक्र .....
कई बार पलटी हूँ
मुहब्बत के दर से खाली हाथ
इसलिए नहीं देती मैं
तेरी चाहत को
इश्क़ का नाम
तेरा ज़िक्र ....
उस पाक नाम से
कहीं ऊपर है .......!!
(४)
सुर्ख होते पत्ते .......
इक दीवाना खरीद लाया
इश्क़ के गहने मेरे लिए
जो मैंने पहने ....
तो बदन के ज़र्द पत्ते
सुर्ख हो गए ......!!
(५)
मुहब्बत का रंग .....
तुम आना ....
मैं आसमां के सारे रंग
उड़ेल दूंगी तुम्हारे पैरों पर
तुम बस इक रंग मुहब्बत का
मेरे लबों पे सहेज जाना .....!!
(६)
मुहब्बत के रस्ते ....
जब-जब ....
मुहब्बत की ऊँगली में
इश्क़ ने अंगूठी पहनाई
उम्रों के पत्ते कट गए ...
रब्बा....!
ये मुहब्बत के रस्ते
मौत की कगार से
क्यूँ चलते हैं .....!?!
खूबसूरती का महकता एहसास है ..................मुहब्बत
अँधेरे से रौशनी की ओर चलता ख्याल है .....मुहब्बत
उदास चेहरों पर खिली मुस्कान है ............. ...मुहब्बत
जन्मों - जन्मों की इक तलाश है .............. ...मुहब्बत
मुहब्बत मिट्टी के वजूद पर खिला इक सुर्ख गुलाब है ............
पेश हैं कुछ क्षणिकाएं ....जो आज फिर मुहब्बत के दरवाजे पे दस्तक दे रही हैं ........
(१)
प्रेम .....
ऊंचाई से लुढ़क के
पेड़ों के झुरमुटे में
कहीं अटका पड़ा था प्रेम
मैंने उसे उठाकर खड़ा किया
धूल झाड़ी और कहा.....
अभी तुझे चलना है
मित्र ......!!
(२)
अनकहे शब्द ......
तुम .....
मेरी लिखी नज्मों में
ढूंढते रहे अपने लफ्ज़
मैं तेरी लिखी सतरों में
ढूंढती रही कुछ छूटे हर्फ़
ज़िन्दगी यूँ ही तेरे
अनकहे शब्दों के
इंतजार में
कटती गयी ......!!
(३)
तेरा ज़िक्र .....
कई बार पलटी हूँ
मुहब्बत के दर से खाली हाथ
इसलिए नहीं देती मैं
तेरी चाहत को
इश्क़ का नाम
तेरा ज़िक्र ....
उस पाक नाम से
कहीं ऊपर है .......!!
(४)
सुर्ख होते पत्ते .......
इक दीवाना खरीद लाया
इश्क़ के गहने मेरे लिए
जो मैंने पहने ....
तो बदन के ज़र्द पत्ते
सुर्ख हो गए ......!!
(५)
मुहब्बत का रंग .....
तुम आना ....
मैं आसमां के सारे रंग
उड़ेल दूंगी तुम्हारे पैरों पर
तुम बस इक रंग मुहब्बत का
मेरे लबों पे सहेज जाना .....!!
(६)
मुहब्बत के रस्ते ....
जब-जब ....
मुहब्बत की ऊँगली में
इश्क़ ने अंगूठी पहनाई
उम्रों के पत्ते कट गए ...
रब्बा....!
ये मुहब्बत के रस्ते
मौत की कगार से
क्यूँ चलते हैं .....!?!
Saturday, May 1, 2010
खूंटियों पर टंगी श्लीलता .......
Posted by
हरकीरत ' हीर'
at
3:55 PM
कविता अगर आपके मानसपटल पर बज्रपात नहीं करती तो महज आपके विचारों का तहखाना बनकर रह जाती है ....पिछले दिनों ब्लॉग जगत के कुछ युवा रचनाकारों ने सर्जना के प्रांगण में नए धरातलों को छूने का प्रयास किया है .... मुद्दत बाद पिछले दिनों चेतना - मंथन वाली कुछ ऐसी ही कवितायें ब्लॉग जगत में पढने को मिलीं ....उन्हीं में से इक कविता थी सागर (लेखनी जब फुर्सत पाती है ) की ....मुझे लगा इस लम्बी कविता को नोटिश में लिया जाना चाहिए ....कविता थी... " कवि कह गया है -7" कविता समाज के ह्रास होते विवेक पर गोली-बारी करती हुई मानों शोकगीत लिख देती है ....व्यक्तिवाद की क्रूरता,दगाबाजी, स्वार्थलोलुपता के यह कविता कपड़े उतारती प्रतीत होती है .....हल्का सा प्रतिवाद भी हुआ इस पर शब्दों को लेकर ....पर कविता चेतना को कचोटती है इस लिए कवि बधाई का पात्र है .....
उसी कविता से उपजी है यह कविता ...." खूंटियों पर टंगी श्लीलता ...."
मद्धिम है रौशनी
पर जलते अंगारे
अभी बुझे नहीं हैं
तपती रेत से
उठते बगुल
गढ़ते हैं परिभाषा
कविता की .....
खूंटियों पर
टंगी है श्लीलता ....
कुछ हवा में गाँठ
बाँधने की कोशिश में
नग्न हो जाती है
बार-बार .....
अब नहीं है किसी को
शब्द सम्मान की फ़िक्र
अहंकार की ढूह पर
पड़ी है एक उदात्त
वैचारिक जड़ता .....
कुछ शब्द खलनायक से
लगाते है ठहाके
साहित्य और संस्कृति के
चिंताकुल प्रश्नों पर .....
शायद तभी
आज का कवि
अश्लीलता की हद तक
शब्दों से करता है वज्रपात
और कविता ........
मुंहतोड़ प्रतिवाद में
खड़ी हो जाती है ......!!
उसी कविता से उपजी है यह कविता ...." खूंटियों पर टंगी श्लीलता ...."
मद्धिम है रौशनी
पर जलते अंगारे
अभी बुझे नहीं हैं
तपती रेत से
उठते बगुल
गढ़ते हैं परिभाषा
कविता की .....
खूंटियों पर
टंगी है श्लीलता ....
कुछ हवा में गाँठ
बाँधने की कोशिश में
नग्न हो जाती है
बार-बार .....
अब नहीं है किसी को
शब्द सम्मान की फ़िक्र
अहंकार की ढूह पर
पड़ी है एक उदात्त
वैचारिक जड़ता .....
कुछ शब्द खलनायक से
लगाते है ठहाके
साहित्य और संस्कृति के
चिंताकुल प्रश्नों पर .....
शायद तभी
आज का कवि
अश्लीलता की हद तक
शब्दों से करता है वज्रपात
और कविता ........
मुंहतोड़ प्रतिवाद में
खड़ी हो जाती है ......!!
Friday, April 23, 2010
३० नंबर की बीड़ी ......
Posted by
हरकीरत ' हीर'
at
11:11 PM
ज़िन्दगी तेरा ज़िक्र अब ......रात के वजूद पर टिकी सुब्ह का सा है ...जिसे सूरज कहीं रख कर भूल गया है ....इंतजार के पन्ने अब सड़ने लगे हैं ....और दीवारे अभी बहुत ऊंची हैं .....बहुत ......
डालना कुछ और चाहती थी ....इक बड़ी प्यारी सी नज़्म उतरी थी ...पर शब्दों ने मुँह फेर लिया .....सागर की कविता (वही जिसपर हल्का सा विवाद हुआ था ) के एवज में भी कुछ लिखा था वह भी धरा रह गया ......शायद अगली बार ......
जाने कब
मिट्टी के ढेर को
उड़ा ले गयी थी सबा
कब्र की कोख से
उठने लगा था धुआं
रात....अभी बहुत
लम्बी है .....
तूने कभी पीया है
बीड़ी में डालकर
जहरीले अक्षरों का ज़हर ?
नहीं न ?
कभी पीना भी मत
फेंफडे बगावत कर उठेंगे ...
औरत पीती है
हर रोज़ अँधेरी रातों में
कुछ हथेली पे मल के
होंठों तले दबा लेती है
कुनैन की तरह
ज़िन्दगी को ......
ये नज्में
यूँ ही नहीं उतरती
रफ्ता-रफ्ता धुएँ में
तलाशनी पड़ती है
अपनी परछाई
और फिर ...
३० नंबर की ये बीड़ी
प्रतिवाद स्वरूप
खड़ी हो जाती है
विल्स के एवज में .....!!
डालना कुछ और चाहती थी ....इक बड़ी प्यारी सी नज़्म उतरी थी ...पर शब्दों ने मुँह फेर लिया .....सागर की कविता (वही जिसपर हल्का सा विवाद हुआ था ) के एवज में भी कुछ लिखा था वह भी धरा रह गया ......शायद अगली बार ......
जाने कब
मिट्टी के ढेर को
उड़ा ले गयी थी सबा
कब्र की कोख से
उठने लगा था धुआं
रात....अभी बहुत
लम्बी है .....
तूने कभी पीया है
बीड़ी में डालकर
जहरीले अक्षरों का ज़हर ?
नहीं न ?
कभी पीना भी मत
फेंफडे बगावत कर उठेंगे ...
औरत पीती है
हर रोज़ अँधेरी रातों में
कुछ हथेली पे मल के
होंठों तले दबा लेती है
कुनैन की तरह
ज़िन्दगी को ......
ये नज्में
यूँ ही नहीं उतरती
रफ्ता-रफ्ता धुएँ में
तलाशनी पड़ती है
अपनी परछाई
और फिर ...
३० नंबर की ये बीड़ी
प्रतिवाद स्वरूप
खड़ी हो जाती है
विल्स के एवज में .....!!
Sunday, April 18, 2010
बड़े मदहोश लम्हे थे सनम जब सामने आये.....
Posted by
हरकीरत ' हीर'
at
9:29 AM
पिछले दिनों वीनस जी ने ग़ज़ल कि दिशा में इक नया ब्लॉग शुरू किया था ......" आइये इक शेर कहें "....जिसे किन्हीं निजी कारणों से वीनस जी को बंद कर देना पड़ा ......खैर जितने दीं कक्षा चली हमने खूब मज़े लूटे ....और वहीँ से लुट-पिट के आई ये ग़ज़ल .....
मत्ला दिया था समीर जी ने .............
फरिश्ते इस ज़मीं पर आके , अक्सर टूट जाते हैं
संभल कर साथ में चलना, ये रिश्ते टूट जाते हैं
ग़ज़लगोओं से इल्तिजा है कि इस ग़ज़ल में रह गयी खामियों पर अपने नज़रीयात पेश करें .........
ग़ज़ल
क्यूँ ये चाहतों के सिलसिले यूँ छूट जाते हें
बता क्यूँ दिल मोहब्बत से भरे ये टूट जाते हें ?
नज़र जो मुंतजिर होती कभी हम लौट ही आते
घरौंदे ये उम्मीदों के भला क्यूँ टूट जाते हैं...?
शजर हमने लगाये जो , वो अक्सर सूख जाते हैं
जहाँ हमने मुहब्बत की शहर ही छूट जाते हैं
जफ़ा देखी वफ़ा देखी जहाँ की हर अदा देखी
छुपा चहरे नकाबों में , चमन वो लूट जाते हैं
वो कश्ती हूँ बिखरती जो रही बेबस हवाओं से
बहाना था वगरना दिल कहाँ यूँ टूट जाते हैं
सदा जो मुस्कुरा कर हैं कभी देते सनम मुझको
बहारें लौट आतीं फिर गिले भी छूट जाते हें
घरौंदे साहिलों पर तुम बना लो शौक से लेकिन
बने हों रेत से जो घर , वो 'हीर' टूट जाते हैं
बहर - १२२२,१२२२,१२२२,१२२२
मुन्तज़िर - प्रतीक्षक
मत्ला दिया था समीर जी ने .............
फरिश्ते इस ज़मीं पर आके , अक्सर टूट जाते हैं
संभल कर साथ में चलना, ये रिश्ते टूट जाते हैं
ग़ज़लगोओं से इल्तिजा है कि इस ग़ज़ल में रह गयी खामियों पर अपने नज़रीयात पेश करें .........
ग़ज़ल
क्यूँ ये चाहतों के सिलसिले यूँ छूट जाते हें
बता क्यूँ दिल मोहब्बत से भरे ये टूट जाते हें ?
नज़र जो मुंतजिर होती कभी हम लौट ही आते
घरौंदे ये उम्मीदों के भला क्यूँ टूट जाते हैं...?
शजर हमने लगाये जो , वो अक्सर सूख जाते हैं
जहाँ हमने मुहब्बत की शहर ही छूट जाते हैं
जफ़ा देखी वफ़ा देखी जहाँ की हर अदा देखी
छुपा चहरे नकाबों में , चमन वो लूट जाते हैं
वो कश्ती हूँ बिखरती जो रही बेबस हवाओं से
बहाना था वगरना दिल कहाँ यूँ टूट जाते हैं
सदा जो मुस्कुरा कर हैं कभी देते सनम मुझको
बहारें लौट आतीं फिर गिले भी छूट जाते हें
घरौंदे साहिलों पर तुम बना लो शौक से लेकिन
बने हों रेत से जो घर , वो 'हीर' टूट जाते हैं
बहर - १२२२,१२२२,१२२२,१२२२
मुन्तज़िर - प्रतीक्षक
Friday, April 9, 2010
कब्र और नज़्म .......
Posted by
हरकीरत ' हीर'
at
3:07 PM
न इश्क़ दरिया है ........न इश्क़ है शराब ....इश्क़ मरहम है ....हर रिसते ज़ख्म पर रखा ...ईमान है ...इश्क़ खुदा है ...कभी इश्क़ की किताब कायदे से पढ़ लेना ...ज़िन्दगी संवर जाएगी ...... .....
आज न जाने ये कैसी
बेमुरब्बत सी हवा चली
के बुझती आँखों में
फिर हसरत लिए
हूँ अडोल सी खड़ी ....
इश्क़ ने खोले हैं
दिल के कोरे वरके
चुपके से इक नज़्म
हुस्न का काफिया
तोड़ चली ......
उठने लगी है
चाँद के ज़िस्म से
हिज्र की इक आग सी
चाँदनी पंचम स्वर में
गीत गाने लगी .......
आज लफ़्ज़ों ने
छेड़ दी है जो तान
इश्क़ की ...
कब्र तो आँखें मूंदे
पड़ी रही ...
और नज़्म ......
अक्षर- अक्षर उसे
पढ़ती रही .....!!
आज न जाने ये कैसी
बेमुरब्बत सी हवा चली
के बुझती आँखों में
फिर हसरत लिए
हूँ अडोल सी खड़ी ....
इश्क़ ने खोले हैं
दिल के कोरे वरके
चुपके से इक नज़्म
हुस्न का काफिया
तोड़ चली ......
उठने लगी है
चाँद के ज़िस्म से
हिज्र की इक आग सी
चाँदनी पंचम स्वर में
गीत गाने लगी .......
आज लफ़्ज़ों ने
छेड़ दी है जो तान
इश्क़ की ...
कब्र तो आँखें मूंदे
पड़ी रही ...
और नज़्म ......
अक्षर- अक्षर उसे
पढ़ती रही .....!!
Monday, April 5, 2010
Posted by
हरकीरत ' हीर'
at
9:22 AM
" मिर्ज़ा-ग़ालिब ".....आज टी. वी आन करते ही सामने स्क्रीन पे यही फिल्म चल रही थी ....और वही ग़ज़ल जिसका शे'र पिछली पोस्ट में तिलक राज़ जी लिख गए थे ........
हमने माना कि तग़ाफुल न करोगे लेकिन
ख़ाक हो जायेंगे हम तुमको ख़बर होने तक
अब तक मुझे मालूम न था कि ये ग़ज़ल इस फिल्म में है ......पूरी फिल्म देख डाली.... ...शेरो-शायरी के बीच अद्भुत त्रिकोणीय प्रेम-कहानी है ग़ालिब जी की ......अभी तक जेहन में डूब उतर रही है ......
ये न थी हमारी किस्मत के विसाले यार होता
ख़ाक हो जायेंगे हम तुमको ख़बर होने तक
अब तक मुझे मालूम न था कि ये ग़ज़ल इस फिल्म में है ......पूरी फिल्म देख डाली.... ...शेरो-शायरी के बीच अद्भुत त्रिकोणीय प्रेम-कहानी है ग़ालिब जी की ......अभी तक जेहन में डूब उतर रही है ......
ये न थी हमारी किस्मत के विसाले यार होता
अगर और जीते रहते यही इन्तजार होता ....
इस ग़ज़ल के साथ ही अंत में प्रेमिका ग़ालिब की बाँहों में दम तोड़ देती है ......इक और ग़ज़ल की पंक्तियाँ अंत में बैक ग्राउंड में बजतीं हैं ..... 'शमा बुझती है तो उसमें से धुंआ उठता है
शोला ऐ इश्क सिया पोश हुआ मेरे बाद'
जिस पर गरूर है तू वो भी दिखा के देख
फ़न को बुलंदियों पर कुछ यूँ सजा के देख
मुझको हबीब कितने उल्फ़त ने दे दिए हैं
हैबत से न बनेंगे, इक तो बना के देख
तेरी गली की राहें मुझको पता हैं लेकिन
आवाज़ दे कभी तो, मुझको बुला के देख
मत पूछ क्या मिला है उसको गले लगा के
दिल में मुहब्बतों का गुलशन लगा के देख
ऐसा तो वो नहीं था , बातों में आ गया है
उसकी नज़र से अपनी नज़रें मिला के देख
गर इश्क़ है खता तो , मुझसे खता हुई है
मुंसिफ सजा बता मत, मुझको सुना के देख
तुझे 'हीर' में मिलेंगे मैखाना और मंदिर
भूले से ही कभी पर , नज़रें उठा के देख
हबीब- मित्र ,हैबत- आतंक
बह्र: मफ़ऊल फायलातुन मफ़ऊल फायलातुन
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