जितेन्द्र जौहर के ‘सफ़र’ ने सौंपा एक ‘अभूतपूर्व साहित्यिक दस्तावेज’

(समीक्षा त्रैमा. ‘सरस्वती-सुमन’/मुक्तक विशेषांक, अक्तू.-दिस.-११)
त्रैमा. ‘सरस्वती-सुमन’ (देहरादून) का ‘मुक्तक-विशेषांक’ (अक्टू.-दिस.-11) मेरे हाथों में है- आठ देश, नौ भाषाएँ, ५४ औज़ान और लगभग तीन सौ रचनाकारों के मुक्तक-रुबाइयाँ-क़त्आत्... यह है- अतिथि संपादक जितेन्द्र ‘जौहर’ जी की एक वर्ष की कड़ी मेहनत का श्रीफल...! इस विशेषांक को ‘जौहर’ जी ने तर्कपूर्ण ढंग से ‘मुरुक़ विशेषांक’ कहकर एक नया एवं सटीक शब्द गढ़ा है- ‘मुरुक़’ (यानी ‘मु+रु+क़’), जिसे प्रधान संपादक डॉ. आनन्दसुमन सिंह जी ने भी ‘मेरी बात’ में रेखांकित किया है।
ग़ौरतलब है कि इस विशेषांक ने अपने प्रकाशन के एक महीने के अन्दर ही लोकप्रियता की नयी ऊँचाइयों का स्पर्श किया है। उप्र हिन्दी संस्थान, लखनऊ के ‘निराला सभागार’ में इसके भव्य विमोचन का समाचार प्रिंट तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में आते ही साहित्य-जगत में इसकी भरपूर माँग होने लगी थी। माँग तो होनी ही थी...आख़िर यह एक ‘अभूतपूर्व साहित्यिक दस्तावेज’ जो है...‘मुरुक़ दस्तावेज’...मुक्तक+रुबाई+क़ता का ‘विश्वकोश-सा’! एक-साथ तीन-तीन पीढ़ियों के कवियों की रचनात्मक उपस्थिति में आख़िर 1500 से अधिक मुक्तक/क़त्आत और 200 से अधिक विलक्षण प्रयोगवादी रुबाइयाँ किसी एक ही ग्रंथ में एक-साथ कहाँ मिल सकेंगी? इसमें ‘हाइकु रुबाइयाँ’, आदि बहुत कुछ ऐसा भी शामिल है, जो हिन्दी-उर्दू साहित्य में पहली बार प्रकाशित हुआ है...कमाल की खोज की है- जितेन्द्र ‘जौहर’ जी ने!
आज जब मैं खुद भी इस कार्य को लेकर बैठी हूँ, तो समझ सकती हूँ कि यह अतिथि-संपादन... वो भी ‘विशेषांक’ का कार्य... कितना मुश्किल है... ख़ासकर ‘मुक्तक विशेषांक’ तो और भी क्योंकि इसमें मात्राओं, वज़्न, लय, आदि का भी ध्यान रखना पड़ता है.... तिस पर भी जितेन्द्र जी का यह लिखना कि- ‘अभी-अभी लौटा हूँ, 'मुरुक-प्रदेश' की एक ‘रोचक’ यात्रा से...’ उनकी क़ाबलियत और विद्वता को दर्शाता है क्योंकि इस यात्रा को 'रोचक' तो वही लिख सकता है, जो खुद इसमें पारंगत हो, निपुण हो... और यह सत्य भी है। इस विशेषांक में जितेन्द्र जी ने न केवल विभिन्न साहित्यकारों, रुबाईकारों और स्वयं मुक्तक, रुबाई और क़ता की विस्तृत जानकारियाँ दीं, बल्कि 'मुरुक-संग्रहों' की एक शोधपूर्ण सूची को सामने रखा जो कि निश्चित रूप से विद्वानों, जिज्ञासुओं और शोधार्थियों के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी। इसके अलावा इस ‘मुरुक़ विशेषांक’ में ‘जौहर’ जी ‘विविध भाषा वाटिका, दूर देश से, विनम्र श्रद्धांजलि, पर्यावरण, हास्य-व्यंग्य, नारी, दोहा-मुक्तक, हाइकु-मुक्तक’ आदि-आदि विभिन्न आयाम जोड़ दिये हैं...इसे लम्बे समय तक याद रखा जायेगा।
जितेन्द्र जी को मैं इस कार्य के लिए सलाम करती हूँ क्योंकि आसान नहीं था उनका ये ‘सफ़र’... वो भी इतनी लम्बी व अलग-अलग प्रयोगवादी मुक्तकों की यात्रा... सिर्फ़ यात्रा ही नहीं, बल्कि वे यात्रा के साथ-साथ उसका भूगोल, इतिहास और व्याकरण भी बताते गये जिसके लिए जितेन्द्र जी मेरी बधाई के वास्तविक हक़दार हैं... यह एक बेजोड़/अभूतपूर्व विशेषांक है... संभवत: भारत में अपनी तरह का यह पहला विशेषांक है, जिसमें इतने प्रयोगवादी मुरुक़ (मुक्तक-रुबाई-कता) एक साथ प्रकाशित हुए हैं- हाइकु रुबाइयाँ, मुहावरेदार, सन्अते-मुसल्लस , ज़ंजीर, ज़ुल/सह्-काफ़्तैन, फ़ाईलुन, मुर्सरा, एकाक्षरांतर रुबाइयाँ आदि। इसके अलावा इसमें संस्कृत, उर्दू, भोजपुरी, अवधी, बुन्देली, छत्तीसगढ़ी, पंजाबी, नेपाली मुक्तकों को भी बानगी के तौर पर पेश किया गया है। ...और जहाँ तक मुक्तकों का प्रश्न है, तो कहना पड़ेगा- ‘माशाल्लाह! चुन-चुन कर रखे हैं जौहर जी ने, जो कि पाठको व मंच-संचालकों के लिए एक अनुपम भेंट साबित होंगे। स्वयं अतिथि-संपादक जितेन्द्र ‘जौहर’ जी के मुक्तक/क़ता का एक उदाहरण देखें-
फ़कत ये फूस वाला आशियाना ही बहुत मुझको
बदन पर एक कपड़ा ये पुराना ही बहुत मुझको
मुबारक हो तुम्हें झूमर लगी ये चाँदनी ‘जौहर’
दरख़्तों का क़ुदरती शामियाना ही बहुत मुझको।
१८० पृष्ठ के इस ‘मुरुक़ विशेषांक’ में न सिर्फ़ भारत के, बल्कि उन्होंने आठ अन्य देशों के रचनाकारों को भी इसमें शामिल कर इसे अन्तर्राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान करते हुए साहित्य-जगत को एक अज़ीम तोहफ़ा दिया है।
इसके अतिरिक्त ‘अमर-काव्य’ के अंतर्गत अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, दुष्यंत कुमार, शमशेर बहादुर सिंह, सुभद्रा कुमारी चौहान, उमर ख़य्याम, ‘जोश’ मलीहाबादी, साहिर लुधियानवी, अकबर इलाहाबादी आदि को पढ़ना अत्यन्त सुखकर लगा। पत्र-पत्रिकाओं में मुक्तक विधा पर किये जाने वाले कार्यों में ‘हरिऔध’ जी का नाम उपेक्षा का शिकार रहा है। इस बारे में जौहर जी लिखते हैं- ‘मुरुक़ पर किये जा रहे कार्यों में उनके नाम का उल्लेख न होना, किसी दुराग्रह अथवा अज्ञान का प्रतीक है...सहधर्मियों की इस भूल को न दोहराते हुए, इस विशेषांक में प्रथम प्रस्तुति के रूप में ‘हरिऔध’ जी का मुक्तक ‘अमरकाव्य’ के अन्तर्गत दिया गया है...’
इस विशेषांक में एक और सुखद आश्चर्य देखने को मिला... जितेन्द्र जी और उनकी धर्मपत्नी रीना जी के बनाये चित्र ...भावों के अनुरूप हर चित्र में उनकी कलाकृति को देखना अलग ही आनंद देता है...!
पत्रिका के प्रधान संपादक डॉ। आनंदसुमन जी हार्दिक बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने सुपरिचित कवि/समालोचक जितेन्द्र ‘जौहर’ जी को यह दायित्व देकर हम पर इनायत की...जिससे यह ख़ूबसूरत दस्तावेजी विशेषांक एक विशुद्ध साहित्यिक धरोहर के रूप में सामने आया है। निश्चित रूप से यह अंक उन शोधार्थियों एवं विश्वविद्यालयों के लिए भी संग्रहणीय है, जो ‘मुरुक’ पर शोध करना चाहते हैं...!
अगर आप इच्छुक हैं पत्रिका के इस विशेष अंक के लिए तो संपर्क करें जितेंदर जौहर जी से ०९४५०३२०४७२ पर ......
पत्रिका: त्रैमा. ‘सरस्वती सुमन’
(मुक्तक विशेषांक, अक्तू.-दिस.-११)
कुल पृष्ठ सं.: 180 पृष्ठ, बड़ा आकार (लगभग 300 मुक्तककार)
मूल्य: रु 500/- (पाँच वर्षीय शुल्क)
अतिथि संपादक: जितेन्द्र ‘जौहर’ (सोनभद्र, उप्र)
प्रधान संपादक: डॉ. आनन्द सुमन सिंह (देहरादून)
( अंत में सभी से क्षमा चाहते हुए ...पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण किसी के ब्लॉग पे नहीं आ पा रही हूँ ...कृपया अन्यथा न लें .....)