Thursday, August 6, 2009

ये नज्में ........

" ये नज्में " .....लुढ़कते पत्थरों को मौसम देतीं ये नज्में ....जैसे खामोशी का लफ्ज़ बन जातीं हैं .....ठहरे हुए पानी में फेंका गया एक पत्थर अपने दायरे में उठी लहरों में अपनी किस्मत की कहानी कहता है ...और वो पत्थर जुबां बन जाता है ......पत्थरों की जुबां ....खामोशी की जुबां .....लाशों की जुबां ...कुछ ऐसे शब्द जो हमारे भीतर बरसों से मुर्दा पड़े हैं .......इन नज्मों के रूप में जन्म लेते हैं ......इसी नज़्म को मैंने परिभाषित करने की कोशिस की है इन क्षणिकाओं में ......

ये नज्में ...........

(१)

ज़िन्दगी इक ज़हर थी

जिसमें खुद को घोलकर

इन नज्मों ने

हर रोज़ पिया है

जिसका रंग

जिसका स्वाद

इसके अक्षरों में

सुलगता है

(२)

ज़ख्मों पर

उभर आए थे कुछ खुरंड

जिन्हें ये हर रोज़

एक-एक कर

उतारती हैं

(३)

इक हँसी

जो बरसों से कैद थी

ताबूत के अन्दर

उसका ये मांगती हैं

मुआवजा

(४)

कटघरे में खड़ी हैं

कई सवालों के साथ

के बरसों से सीने में दबी

मोहब्बत ने

खुदकशी क्यों की ....??

(५)

कुछ फूल थे गजरे के

जो आँधियों से बिखर गए थे

उन्हें ये हर रोज़

एक-एक कर चुनती हैं

(६)

शाख़ से झड़े हुए पत्तों का

शदीद दर्द है

जो वक्त- बे -वक्त

मुस्कुरा उठता है

चोट खाकर

( शदीद -तेज )

(७)

उन कहकहों का उबाल हैं

जो चीखें नंगे पाँव दौड़ी हैं

कब्रों की ओर

(८)

इक वहशत जो

बर्दाश्त से परे थी

इन लफ्ज़ों में

घूंघट काढे बैठी है

(९)

खामोशी का लफ्ज़ हैं

जो चुपके-चुपके

बहाते हैं आंसू

ख्वाहिशों का

कफ़न ओढे

१०)

जब-जब कैद में

कुछ लफ्ज़ फड़फड़ाते हैं

कुछ कतरे लहू के

सफहों पर

टपक उठते हैं

(११)

ये नज्में .....

उम्मीद हैं ....

दास्तां हैं ....

दर्द हैं .....

हँसी हैं ....

सज़दा हैं .....

दीन हैं .....

मज़हब हैं ....

ईमान हैं ....

खुदा .....

और ....

मोहब्बत का जाम भी हैं ....!!

Friday, July 24, 2009

जो देते हैं दर्द उन गमों से क्या सिला रखना...............................................

इन दिनों वक्त कुछ की कमी सी है ....तो अपनी पुरानी डायरी में से ही एक नज़्म ...शायद ९८ के आस - पास लिखी गई ....



जो देते हैं दर्द उन ग़मों से क्या सिला रखना
बहा दो अश्कों से न उन्हें दिल में दबा रखना

वो भला क्या समझेंगे मोहब्बत की बातें
जिनकी है अदा हर दिल को ख़फा रखना

बेच दी हो जिसने गैरत भी अपनी
क्या उनके लिए दिल में गिला रखना

आ चल चलें कहीं दिल को बहलाने
जरुरी है हर ज़ख्म को खुला रखना

मिल जायेंगे इस जहाँ में सैंकडों हमसफ़र
प्यार के फूल 'हक़ीर' दिल में खिला रखना

Monday, July 13, 2009

बोलते पत्थर ........

(१)

बोलते पत्थर ........

जब कभी छूती हूँ मैं

इन बेजां पत्थरों को

बोलने लगते हैं

ज़िन्दगी की अदालत में

थके- हारे ये पत्थर

भयग्रसित

मेरी पनाह में आकर

टूटते चले गए

बोले......

कभी धर्म के नाम पर

कभी जातीयता के नाम पर

कभी प्रांतीयता के नाम पर

कभी ज़र,जोरू, जमीन के नाम पर

हमें फेंका गया है

और हम ....

न जाने कितनी चीखें

अपने भीतर

दफ़्न किए

बैठे हैं ........!!

(२)

मन्दिर मस्जिद विवाद ....

वह ....

कुछ कहना चाह रहा था

मैंने झुक कर

उसकी आवाज़ सुनी

वह कराहते हुए धीमें से बोला......

मैं तो बरसों से चुपचाप

इन दीवारों का बोझ

अपने कन्धों पर

ढो रहा था

फ़िर......

मुझे क्यों तोड़ा गया ....?

मैंने एक ठंडी आह भरी

और बोली, मित्र .......

अब तेरे नाम के साथ

इक और नाम

जुड़ गया था

'मन्दिर' का नाम ......!!

(३)

भ्रूण हत्या ......

मन्दिर में आसन्न

भगवान से

मैंने पूछा .......

तुम तो पत्थर के हो ....

फ़िर तुम्हें किस बात गम ....?

तुम क्यों यूँ मौन बैठे हो......??

वह बोला .......

जहां मैं बसता हूँ

उन कोखों में

नित....

न जाने कितनी बार

कत्ल किया जाता हूँ मैं .....!!

(४)

आतंक के बाद ......

सड़क के बीचो- बीच

पड़े ....

कुछ पत्थरों ने ...

मुझे ....

हाथ के इशारे से

रोका....

और कराहते हुए बोले.....

हमें जरा

किनारे तक

छोड़ दो मित्र

मैंने देखा .....

उनके माथे से

खून रिस रहा था

मैंने पूछा ....

'तुम्हारी ये हालत....?'

वे आह भर कर बोले .....

तुम इंसानों के

इंसानों को दिए ज़ख्म

इन माथों से बहते हैं .....!!

Wednesday, July 8, 2009

मोहब्बत की निगार है नज़्म....

एक छोटा सा तोहफा और .....ये ' पदक ' और ये ' सम्मान- पत्र ' ...... इसी के साथ पेश है "एक दुष्यंत और " में प्रकाशित एक नज़्म.........." मोहब्बत की निगार है नज़्म...."



नज़्म....


मानो तो ख़ुदा की इबादत का साज़ है नज़्म
बेबस खामोशी की आवाज है नज़्म

किसी कब्र में सिसकती मोहब्बत की निगार है नज़्म
आशिकों की रूह से निकली पुकार है नज़्म

हवाओं का भी रुख मोड़ दे वो तूफान है नज़्म
दिल में छुपे दर्द की जुबान है नज़्म

बेंध दे सीना पत्थरों का वो औज़ार है नज़्म
शायर और आशिकों की मजार है नज़्म

चट्टानों पर लिखा इश्क का पैगाम है नज़्म
न भूले सदियों तक 'हकीर' वो इलहाम है नज़्म


१) निगार - प्रतिमा, मूर्ति , २) इलहाम - देववाणी

Friday, July 3, 2009

चाँद फ़िर निकला.....

Wednesday, June 24, 2009

मैं तेरा दीवाना हूँ......

मीरा ने कहा था ...' हे री मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दर्द न जाने कोय ' ....अगर मैं ये कहूँ ....' हे री मैं तो दर्द दीवानी मेरा प्रेम न जाने कोय ' तो अतिशयोक्ति न होगी ....मुझे दर्द से कोई गिला शिकवा नहीं ....सच कहूँ तो अब इन्हीं से इश्क सा हो गया है और इसे मुझसे ...ये मेरे हमराज , हमसाया ,हमसफ़र ,हमदर्द सब हैं ...कृपया मुझे इनसे अलग होकर लिखने के लिए न कहें .......और एक बात मैंने ब्लॉग बंद करने की बात इसलिए भी की थी कि मुझे समय बहोत कम मिल पाता है ...और काम बहुत पड़ा है ....पर आप सब ने जाने नहीं दिया .... अब मुझे पोस्ट की समय सीमा तो बढाने की इजाजत है ना ....? .... इस नए टैम्पलेट के साथ कुछ क्षणिकाएं पेश हैं .....उम्मीद है इस बार आप निराश नहीं होंगे .......

(1)

तोहफ़ा

रात आसमां कुछ सितारे

झोली में भर कर ले आया

मैंने कहा ......

मेरा सितारा तो मेरे पास है

वह बोला ......

पर वो तुझे रौशनी नहीं देता

ये तुझे रौशनी भी देंगे ,

और रास्ता भी ....

मैंने पूछा कौन हैं ये ....?

तेरी नज्मों के दीवाने

वो मुस्कुराया ......!!

(२)

साथी

कुछ लफ्ज़ कमरे में

इधर-उधर बिखरे पड़े थे

मैंने छूकर देखा ....

सभी दम तोड़ चुके थे

सिर्फ़ एक लफ्ज़ जिंदा था

मैंने उसे पलट कर देखा

वह ' दर्द ' था .....

मैंने उसे उठाया

और सीने से लगा लिया .....!!

(३)

दर्द का शिकवा

वह इक कोने में बैठा

सिसक रहा था ....

मैंने पूछा .....

' क्यों रो रहे हो साथी ....? '

वह बोला ......

वे तुम्हें मुझसे

छीन लेना चाहते हैं .....!!

(४)

दीवाना

वह झुक कर

धीमें से बोला .....

मैं तेरा दीवाना हूँ ' हक़ीर '

और मेरे लबों को चूम लिया

मैंने पलकें खोलीं तो देखा

वह दर्द था .......!!!

Monday, June 22, 2009

इस दर्द को कैसे अलग करूँ ....!!

मन आहत है और कुछ बेचैन भी .....मुझे याद है पिछली किसी पोस्ट में डा। अनुराग ने कहा था , 'कवि मन बहुत ही संवेदनशील होता है ' ....पिछली कुछ टिप्पणियों ने मुझे कई बार ब्लॉग बंद करने के ख्याल की ओर कितनी कितनी कितनी अग्रसर किया .....' दर्द का ब्रांड ', ' शब्दों का हूनर ' , संस्कार' जैसे लफ्ज़ कहीं भीतर तक चोट कर गए .....संस्कार......? हुंह ये संस्कार तो बरसों से मेरे घर की दहलीज़ पर बैठे गुनगुना रहे हैं ....न जाने रोज़ कितनी इन संस्कारों की बलि चढ़ जाती होंगी ........ये संस्कार, ये मर्यादाएं ,ये लक्ष्मन रेखाएं क्या पुरुषों के लिए नहीं होती .....सोचती हूँ और सोचते - सोचते ज़िन्दगी के कई सफर तय कर जाती हूँ .....


नहीं ......
इस बार मैं अपने चेहरे का दर्द
नहीं पिरोऊंगी शब्दों में
मैं आईने के पास आ खड़ी होती हूँ
और फिर जोर से हंस पड़ती हूँ
तुझे तो लोगों से सिर्फ सहानुभूति चाहिए
चेहरा पूछता है .....
क्या यही सच्चाई है ...?
तभी आईने में बचपन का एक
डरा , सहमा चेहरा उभर आता है
वह मासूम सी भयभीत खड़ी है
शायद तब वह बलात्कार जैसे शब्द से
परिचित नहीं थी .......
तभी वह शख्स पास आता है ....
देखो .... तुम किसी से कुछ नहीं कहोगी
नहीं कहोगी न....?

हाँ ...!
मैं किसी से कुछ नहीं कहूँगी
मुझे किसी से सहानुभूति नहीं चाहिए
मष्तिष्क में घटनाएँ तेजी से बदलने लगतीं हैं ....
आतिशबाजी ,शोर,धुआं ,चीख जैसे
एक साथ हजारों मिसाइलें सी चलने लगीं हों ....
आँखें खौफ से फ़ैल जाती हैं
एक कंपकंपी पूरे वजूद में सरसरा जाती है
अन्दर का सच नंगा होकर बाहर आना चाहता है
पर यह सब तो संस्कारों के खिलाफ हो जायेगा
ओह .....! ये संस्कार .....! !

सुनो.....
कमजोर और ज़ज्बाती मत बनो
अपने हक के लिए लड़ना सीखो
पर वह खुद जुल्म सहते - सहते
मौत से न लड़ पाई....
वह ब्रेन कैंसर मर गई ...

तभी वह जोर से चिल्लाई .....
हाँ ...मैं डायन हूँ ....
मैं सब को मार डालूंगी ....
खून पी जाउंगी सब का...
लोग उसे डायन कह कर पीट रहे थे
पर वह डायन नहीं थी
वह सदमें से पागल हो गई थी
उसका पति ...
रोज शराब पीकर उसी के सामने
एक नई औरत के साथ सोता था
विरोध किया तो डायन हो गई

मष्तिष्क में फिर अंधाधुंध
गोलियाँ सी चलने लगीं थीं
आँखों में दर्द नाच उठा
पुतलियाँ फ्रिज सी हो गयीं ....
धुआं-धुआं से दृश्य गुम होने लगे
सामने कुछ शब्द बिखरे पड़े थे
हजारों जालों में लिपटे
मैं साफ करने लगती हूँ ....
दीदी है ....
आग में जलती हुई ....
मैं चीखती हूँ, चिल्लाती हूँ , पूछती हूँ ...
' दीदी ऐसा क्यों किया...? '
पर वह मौन है , कुछ नहीं कहती
बिलकुल मौन ,पथराई आँखों में
मेरे सारे सवालों के जवाब बंद हैं

" शब्दों का हूनर " ,
" दर्द का ब्रांड "," संस्कार "
मुझे वो सारी टिप्पणियाँ
स्मरण हो आती हैं ......
सोचती हूँ ....
इस दर्द को ख़ुद से कैसे अलग करूँ
कैसे अलग करूँ ....!!