Sunday, February 3, 2013

यूँ हारी है बाज़ी मुहब्बत की हमने

पेश है इक ग़ज़ल जिसे सजाने संवारने का काम किया है चरनजीत मान जी ने ...... 
यूँ हारी है बाज़ी मुहब्बत की हमने .....


 मेरे दिल के अरमां  रहे रात जलते
रहे सब करवट पे करवट बदलते


यूँ हारी है बाज़ी मुहब्बत की हमने
बहुत रोया है दिल दहलते- दहलते

लगी दिल की है जख्म जाता नहीं ये
बहल जाएगा दिल बहलते- बहलते

  तड़प बेवफा मत जमाने की खातिर
 
चलें चल कहीं और टहलते -टहलते 

अभी इश्क का ये तो पहला कदम है
अभी  जख्म खाने कई चलते-चलते

है कमज़ोर सीढ़ी मुहब्बत की लेकिन
ये चढ़नी  पड़ेगी , संभलते  -संभलते


ये ज़ीस्त अब उजाले से डरने लगी है
हुई शाम क्यूँ दिन के यूँ  ढलते- ढलते 


जवाब आया न तो मुहब्बत क्या करते
बुझा दिल का आखिर दिया जलते -जलते

न घबरा तिरी जीत  ही 'हीर' होगी
वो पिघलेंगे इक दिन पिघलते-पिघलते 



१२२ १२२ १२२ १२२ 
फऊलुन फऊलुन फऊलुन फऊलुन   
(बह्र: मुतकारिब मुसम्मन सालिम)

35 comments:

केवल राम : said...

यूँ हारी है बाज़ी मुहब्बत की हमने
बहुत रोया है दिल दहलते- दहलते

मेरे दिल की भी कहने लगे अब तो आप ? हर एक लफ़्ज दिल की हार की याद दिला गया ...!

शालिनी कौशिक said...

बहुत सुन्दर भावनात्मक अभिव्यक्ति प्रस्तुति बेटी न जन्म ले यहाँ कहना ही पड़ गया . आप भी जाने मानवाधिकार व् कानून :क्या अपराधियों के लिए ही बने हैं ?

Ashok Saluja said...

मिल जाएगी एक दिन तुझ को भी मंजिल ऐ हीर
खुली रखना अपनी ये आँखे बस यूँ ही मलते मलते.. ..शुभकामनायें!

RAHUL- DIL SE........ said...

अभी इश्क का ये तो पहला कदम है
अभी जख्म खाने कई चलते-चलते...

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

ओह. बहुत सुंदर रचना
क्या कहने

Anupama Tripathi said...

प्यार से भरा दिल और बहुत सुंदर जज़्बात ....
बहुत सुंदर लिखा है हरकीरत जी ...

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

बहुत अच्छी गज़ल है...

Suman said...

अभी इश्क का ये तो पहला कदम है
अभी जख्म खाने कई चलते-चलते

प्रेम पंथ ऐसा ही कठीन है !

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत गहन संवेदनायें..सुन्दर प्रस्तुति भावों की..

Saras said...

तड़प बेवफा मत जमाने की खातिर
चलें चल कहीं और टहलते -टहलते
...इस दुनिया से दूर.....जो सिर्फ ज़ख्म दे सकती है ....मरहम नहीं बन सकती

सदा said...

हर शेर लाजवाब ... बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति

आभार आपका

संजय कुमार चौरसिया said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

Anita (अनिता) said...

बहुत ही सुंदर... हरकीरत जी !
मोहब्बत की राहें कठिन हैं बहुत ही
मिले इस पे मंज़िल...ठहरते ठहरते... :-)
~सादर!!!

Anita (अनिता) said...

बहुत ही सुंदर... हरकीरत जी !
मोहब्बत की राहें कठिन हैं बहुत ही
मिले इस पे मंज़िल...ठहरते ठहरते... :-)
~सादर!!!

शिवम् मिश्रा said...

वाह बहुत खूब ... सादर !


कौन करेगा नमक का हक़ अदा - ब्लॉग बुलेटिन आज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

निहार रंजन said...

सारे शेर बहुत अच्छे लगे.

डॉ टी एस दराल said...

न घबरा तिरी जीत ही 'हीर' होगी
वो पिघलेंगे इक दिन पिघलते-पिघलते

आमीन !

जीतने वालों के गले में भी लोग 'हार' ही डालते हैं।
बढ़िया ग़ज़ल लिखी है। बधाई।

दर्शन कौर धनोय said...

अच्छी या बुरी ग़ज़ल की कोई परिभाषा नहीं होती ...ग़ज़ल जब लिखी जाती है तो दिल का लहू कलम में अपने आप आ जाता है ....हर हर्फ़ सुंदर जान पड़ता है ..बहुत खूब हीर ...

नीरज गोस्वामी said...

तड़प बेवफा मत जमाने की खातिर
चलें चल कहीं और टहलते -टहलते

Balle Balle Ji Waah. Behtariin ghazal. Daad kabool karen.

Neeraj

Shalini Rastogi said...

बहुत खूबसूरत गज़ल...!

Shalini Rastogi said...

बहुत खूबसूरत गज़ल...!

सुखदरशन सेखों said...

कैसा है, क्या है, क्यों है ये किसी के भी सवालों का हल नहीं |
बात ये है कि आपकी रचना को नज़र अंदाज़ करना कैसे भी सरल नहीं ..

Rajeev Sharma said...


बहुत सुंदर प्रस्तुति.......
मन खुश हो गया

आशा जोगळेकर said...

अभी इश्क का ये तो पहला कदम है
अभी जख्म खाने कई चलते-चलते

है कमज़ोर सीढ़ी मुहब्बत की लेकिन
ये चढ़नी पड़ेगी , संभलते -संभलते

बहोत खूब हीर जी ।

Anju (Anu) Chaudhary said...

खूबसूरत गज़ल

Balvinder Singh said...

padhi hamney yeh gazal, ankhey maltey maltey

Bahut khoob Harkeerat Ji

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत उम्दा गज़ल ...

हरकीरत ' हीर' said...

Shukriya Balvinder ji ....:))

काजल कुमार Kajal Kumar said...

वाह जी बहुत बढ़िया

"पलाश" said...

bahut khoob kahi aapne

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

"यूँ हारी है बाज़ी मुहब्बत की हमने
बहुत रोया है दिल दहलते- दहलते
अभी इश्क का ये तो पहला कदम है
अभी जख्म खाने कई चलते-चलते"
उम्दा शेर... बहुत अच्छी ग़ज़ल...बहुत बहुत बधाई...

सतीश सक्सेना said...

तकलीफदेह यादें , जीवन भर के लिए ...
शुभकामनायें ..

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...



न घबरा तिरी जीत ही 'हीर' होगी
वो पिघलेंगे इक दिन पिघलते-पिघलते

आमीन !

आदरणीया हरकीरत 'हीर' जी
बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल लिखी है आपने ...

तमाम अशआर काबिले-तारीफ़ हैं
यह शेर ख़ुद के मन-बहलाव के लिए कोट कर रहा हूं...
है कमज़ोर सीढ़ी मुहब्बत की लेकिन
ये चढ़नी पड़ेगी , संभलते-संभलते

पूरी ग़ज़ल शानदार-जानदार है
बहुत ख़ूबसूरत !
वाह ! वाऽह !
भरपूर मुबारकबाद !!

बसंत पंचमी एवं
आने वाले सभी उत्सवों-मंगलदिवसों के लिए
हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं !
राजेन्द्र स्वर्णकार

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...



हां ,
कुछ तब्दीलियों के लिए अलग से मुबारकबाद !
ब्लॉग के बेकग्राउंड पर छाई सियाही / कालिमा हरे रंग से होते हुए अब गुलाबी हो चुकी है ...
:)
बहुत खिल रहा है गुलाबी रंग !
खिलते रहें... गुलाब और जियादा !!


tbsingh said...

bahut sunder rachana.