Thursday, December 9, 2010

सौतेली...अनचाहा गर्भ ....और ..परिवर्तन ..

(१)

पिछले दिनों इक काम वाली लड़की ने जो अपनी दास्ताँ सुनाई तो कलम खामोश रह सकी .....
पहली नज़्म उसी के मनोभाव हैं ......दूसरी नज़्म अपना परिचय खुद देती है ....
वक़्त बदलता है ...परिवर्तन होते हैं मकानों की जगह अब बहुमंजिला इमारतें ली रही हैं ....
और ये इमारतें .....?
नाकामियों का सफ़र तय करते लोगों के काम आती हैं ....

सौतेली .....

तक मेरी ज़िन्दगी में
एक वही तो थी ....
जिसने मुझे
अपनी नज़र में बनाये रखा ...
रोज़ ज़िन्दगी के ...
आधे से ज्यादा कामों में मैं
उसकी सोच में बसी होती
कभी कपड़ों के ढेर में ...
कभी बर्तनों के अम्बार में ...
कभी चूल्हे की सिसकती आग में...
कभी उसकी दुखती पीठ पर
फिरती मेरी अँगुलियों में ...
तो कभी बिस्तर पर फैले
फटे कम्बल में से कंपकंपाती
ठण्ड में खनकती उसकी हँसी में
वह हर पल मेरे साथ होती .....

मेरी अपनी माँ तो .....
कबका जीना बंद कर चुकी थी .....!!

()

अनचाहा गर्भ ....

द्धिम बूढी लालटेन
अँधेरे का सीना चीर
देखने का असफल प्रयास करती है
तम से आवृत कोई स्त्री ...
अपनी गोद से ...
कुछ ,धीमे से नीचे रखती है
और थके क़दमों से, लौट जाती है
अँधेरी रात लिखने लगती है
अनचाहे गर्भ का भविष्य ...

मन में एक साथ ...
कई चिताएं जलने लगती हैं  .....!!

()

परिवर्तन .....

खुला दरवाजा
अधखुली खिड़कियाँ ...
उखड़ा पलस्तर ...
बरसों से कोई परिचित सी पदचाप
सुनने की आस में .....
इक पुराना जीर्ण, उपेक्षित सा मकां
आहिस्ता-आहिस्ता खंडहर हो गया है
शायद इसके गिरने के बाद यहाँ ....
एक बहुमंजिला इमारत बन जाये .....

मैं अखबार उठा पढ़ने लगती हूँ ...
इक बहुमंजिला इमारत से कूदकर
इक स्त्री ने खुदकशी कर ली ......!!

87 comments:

mark rai said...

मैं अखबार उठा पढ़ने लगती हूँ ...
इक बहुमंजिला इमारत से कूदकर
इक स्त्री ने खुदकशी कर ली .....
....ye pariwartan to nahi ho sakta...ye to puraatan vywstha ka ki ang dikhta hai ....very nice post...

सागर said...

doosra teesra kamaal hai

aur yeh bejod


मद्धिम बूढी लालटेन
अँधेरे का सीना चीर
देखने का असफल प्रयास करती है
तम से आवृत कोई स्त्री ...
अपनी गोद से ...
कुछ ,धीमे से नीचे रखती है
और थके क़दमों से, लौट जाती है
अँधेरी रात लिखने लगती है
अनचाहे गर्भ का भविष्य ...

मन में एक साथ ...
कई चिताएं जल उठी हैं .....!!

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

हीर जी ...

यह समोधन ही अद्भुत लगता है पहले तो मुझे ... :)

कपरिवर्तन, परपीड़ा और कुप्रथाएं सब पर तीखे कटाक्ष करने आसान है ..पर इन चीज़ों से उपजों दर्द को महसूस करना और कराना बड़ी बात है ..और यह बड़ी बातें आपकी तीनों नज्मों में मिलीं मुझे ...

सादर

आतिश

Kailash C Sharma said...

बहुत ही मर्मस्पर्शी तीनों रचनाएं..मन को छू लिया..आभार

शारदा अरोरा said...

ओह ये दर्द की दास्ताँ ...

इमरान अंसारी said...

हीर जी,

सारी नज्में बेहतरीन.....अनचाहा गर्भ.....सबसे अच्छी लगी.... एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा करती है....आखिर कब तक?...........बहुत खूब हीर जी

'उदय' said...

... bhaavpoorn rachanaayen !!!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

मेरी अपनी माँ तो .....
कबका जीना बंद कर चुकी थी .....
मार्मिक ....


अँधेरी रात लिखने लगती है
अनचाहे गर्भ का भविष्य ...

मन में एक साथ ...
कई चिताएं जल उठी हैं .....!!

वीभत्स चित्रण ...एक नारी की मजबूरी का या समाज के डर का ...

मैं अखबार उठा पढ़ने लगती हूँ ...
इक बहुमंजिला इमारत से कूदकर
इक स्त्री ने खुदकशी कर ली .

ऊँची इमारतों की यह भी त्रासदी ....सारी रचनाएँ मन को झिंझोडती सी ...

shikha varshney said...

मैं अखबार उठा पढ़ने लगती हूँ ...
इक बहुमंजिला इमारत से कूदकर
इक स्त्री ने खुदकशी कर ली ......
उफ़ ..डूब सा गया मन .
बहुत उम्दा रचनाएँ हैं सभी.

वाणी गीत said...

इन ऊँची होती जा रही इमारतों की नींव में कहीं इंसानियत दफ़न है ....
मार्मिक !

इमरान अंसारी said...

@ हीर जी....जज़्बात पर टिप्पणी का शुक्रिया ......हाँ जी वो टाइपिंग की ही गलती थी....एक बार फिर से आपका शुक्रिया|

ashish said...

"सौतेली " में पीड़ा और लाचारगी , मन को द्रवित कर गयी . "अनचाहा गर्भ " कलुषित समाज और विकृत मानसिकता पर पीड़ा दिल को छू गयी ."परिवर्तन" , अट्टालिकाए तो अपनी ऊँचाई पर इतराती ही रहेंगी , क्यू की वो नीचे नहीं देख सकती .

Mukesh Kumar Sinha said...

stri mann ko kitne sayane dhand se aapne apne shabd me peeroya......dhanya hain ham jo follow karte hain...........aur aisa kuchh padhne ko mil jata hai

abhar !~!!

DR. PAWAN K MISHRA said...

.आज कुछ दर्द उठ रहा है
.................पंजाबन जादू


--

वन्दना said...

तीनो रचनायें बेजोड्……………हर क्षणिका एक कहानी कहती हुयी।

Mukesh Kumar Sinha said...

stri mann ko kitne sayane dhang se aapne apne shabd me peeroya hai ......dhanya hain ham jo follow karte hain...........aur aisa kuchh padhne ko mil jata hai

abhar !~!!

arvind said...

sabhi rachnaayen gahare dard chhipaaye hue...maarmik.

संजय भास्कर said...

आदरणीय हीर जी
नमस्कार !
सारी नज्में बेहतरीन.....सारी रचनाएँ मन को झिंझोडती है

Akshita (Pakhi) said...

कित्ती सही बात लिखी न आपने..

sada said...

मैं अखबार उठा पढ़ने लगती हूँ ...
इक बहुमंजिला इमारत से कूदकर
इक स्त्री ने खुदकशी कर ली ...

यह पंक्तियां पढ़कर एक खामोशी सी छा जाती है ...गहन भाव लिये हुये सुन्‍दर शब्‍द रचना ।

डॉ टी एस दराल said...

ओह सौतेली मां तो सौतेली ही होती है ।
दूसरी और तीसरी से यही लगता है कि विकास की कीमत तो चुकानी पड़ती है ।

नीरज गोस्वामी said...

हरकीरत जी आपकी नज्में सीधे दिल पर असर करती हैं...ब्लॉग जगत में आप नज्मों की मलिका हैं...इन बेहतरीन नज्मों के लिए दाद कबूल करें...

नीरज

Vinay Prajapati 'Nazar' said...

हृदय स्पर्शी रचना

kunwarji's said...

man ko chhooti tino rachnaaye...

kunwar ji,

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

teeno rachnayen..
marmshparsi...
bhavpoorn...
ati sunder...
samaj aur zlndgi ki asundarta ko darshati hui....

रवि धवन said...

अँधेरी रात लिखने लगती है
अनचाहे गर्भ का भविष्य ...
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
याद आ रहे हैं मुझे अपने शहर के अनाथालय।

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत बेहतरीन

रामराम.

Apanatva said...

dil ko bhigo kar rakh dene walee rachanae..........
jeevan ke ek aur pahloo se parichay kara gayee.aabhar

rashmi ravija said...

मैं अखबार उठा पढ़ने लगती हूँ ...
इक बहुमंजिला इमारत से कूदकर
इक स्त्री ने खुदकशी कर ली

दर्द को महसूस कर उसे वैसा ही शब्दों में उतार देने की गज़ब की क्षमता है , आप में...पाठक भी उस दर्द को करीब से महसूस करता है.

प्रवीण पाण्डेय said...

मन भावों को व्यक्त करती, तीन बेहतरीन कवितायें।

mahendra verma said...

सभी नज़्में हृदय को स्पर्श करती हैं।
गहन अर्थों को समेटती हुई बेहतरीन रचनाएं।

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

हरकीरत जी, तीनों ही नज़्में बहुत अच्छी हैं...हमेशा की तरह.
अनचाहा गर्भ और परिवर्तन बहुत प्रभावित करने वाली हैं.

सतीश सक्सेना said...

बेहद संवेदन शील !शुभकामनायें आपको !

फ़िरदौस ख़ान said...

अब तक मेरी ज़िन्दगी में
एक वही तो थी ....
जिसने मुझे
अपनी नज़र में बनाये रखा ...
रोज़ ज़िन्दगी के ...
आधे से ज्यादा कामों में मैं
उसकी सोच में बसी होती
कभी कपड़ों के ढेर में ...
कभी बर्तनों के अम्बार में ...
कभी चूल्हे की सिसकती आग में...
कभी उसकी दुखती पीठ पर
फिरती मेरी अँगुलियों में ...
तो कभी बिस्तर पर फैले
फटे कम्बल में से कंपकंपाती
ठण्ड में खनकती उसकी हँसी में
वह हर पल मेरे साथ होती .....

मेरी अपनी माँ तो .....
कबका जीना बंद कर चुकी थी .....!!

मार्मिक...

रचना दीक्षित said...

मर्मस्पर्शी रचनाएं, लाजवाब लेखन. तीनों ही क्षणिकाएं बहुत खास लगीं.

M VERMA said...

आपकी नज़्मों के बिम्ब जो कहते हैं
वही लिखा आपने प्रतिबिम्ब जो कहते हैं

इस्मत ज़ैदी said...

सौतेली और अनचाहा गर्भ
मानव मन को झकझोर देने वाली रचनाएं हैं हरकीरत जी
बहुत ख़ूब !

Kunwar Kusumesh said...

भावना प्रधान तीनों रचनाएँ एक से बढ़कर एक हैं,दिल को छूने वाली हैं

उपेन्द्र ' उपेन ' said...

हीर जी, तीनों रचना बहुत ही गहरे भावों से भरी हुई तथा मर्मस्पर्शी है.... सुंदर प्रस्तुति.

केवल राम said...

इक बहुमंजिला इमारत से कूदकर
इक स्त्री ने खुदकशी कर ली ......!!
xxxxxxxxxxxxxxxxxxxx
कटु यथार्थ की अभिव्यक्ति .....तीनो रचनाओं में जीवन की सच्चाईयों को सामने लाया गया है ...बहुत आभार

Sunil Kumar said...

मैं अखबार उठा पढ़ने लगती हूँ ...
इक बहुमंजिला इमारत से कूदकर
इक स्त्री ने खुदकशी कर ली ......!!
ओह ये दर्द की दास्ताँ

राज भाटिय़ा said...

आप को पढ कर मन बेचेन हो ऊठता हे, बहुत मार्मिक कविताऎ. धन्यवाद

सुमन'मीत' said...

हीर जी ...क्या लिखूं निशब्द हूँ .....

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

तीनों ही रचनाएँ बेहतरीन हैं...... कमाल की प्रस्तुति......

दीपक बाबा said...

कहाँ से इतनी स्वेदंनाएं लाती है और कहाँ जाकर उनके लिए शब्द खोजती हैं.....

६-८ पंक्तियों की कविता को सोचते रहता हूँ....

saanjh said...

teenon hi nazmein bohot kamal hai heer ji....bohot hi zyaada touching hain....mann bhar aaya

ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...

आदरणीय हरकीरत जी,
आपकी कवितायें भावनाओं की संवेदना को स्वयं जीती हैं ! इतनी गहराई में डूब कर लिखना, जहाँ शब्दों के अर्थ-विम्ब आपके अनुसार अंकुरित होते हों ,सबके बस की बात नहीं है !
तीनो ही कवितायें संवेदना को प्राणवान करती हुई ब्लॉग जगत की गरिमा में श्रीवृद्धि कर रही हैं !
बहुत बहुत बधाई !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

सुभाष नीरव said...

हरकीरत जी, ये तीनों कविताएं गहरी मानवीय संवेदनाओं से भरी हुई हैं। इन कविताओं से आपके भीतर का कवि एक नया रूप लेता भी दिखाई देता है। बधाई !

शिवम् मिश्रा said...


बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

सुशील बाकलीवाल said...

तीनों रचनाएं बेहतरीन.
देखन में छोटी लगें, वार करे गम्भीर. शुभकामनाएँ...

neera said...

दर्द का स्वाद कुछः अलग हट कर.... तीनो कविताओं में छिपा औरत का दर्द भीतर घुलता चला जाता है....

रश्मि प्रभा... said...

खुला दरवाजा
अधखुली खिड़कियाँ ...
उखड़ा पलस्तर ...
बरसों से कोई परिचित सी पदचाप
सुनने की आस में .....
इक पुराना जीर्ण, उपेक्षित सा मकां
आहिस्ता-आहिस्ता खंडहर हो गया है
शायद इसके गिरने के बाद यहाँ ....
एक बहुमंजिला इमारत बन जाये .....

मैं अखबार उठा पढ़ने लगती हूँ ...
इक बहुमंजिला इमारत से कूदकर
इक स्त्री ने खुदकशी कर ली ......!!

aur main ungli se kathor zameen kuredne lagi hun

संजय कुमार चौरसिया said...

मैं अखबार उठा पढ़ने लगती हूँ ...
इक बहुमंजिला इमारत से कूदकर
इक स्त्री ने खुदकशी कर ली ......



बहुत उम्दा रचनाएँ हैं सभी.

कविता रावत said...

खुला दरवाजा
अधखुली खिड़कियाँ ...
उखड़ा पलस्तर ...
बरसों से कोई परिचित सी पदचाप
सुनने की आस में .....
इक पुराना जीर्ण, उपेक्षित सा मकां
आहिस्ता-आहिस्ता खंडहर हो गया है
शायद इसके गिरने के बाद यहाँ ....
एक बहुमंजिला इमारत बन जाये .....

मैं अखबार उठा पढ़ने लगती हूँ ...
इक बहुमंजिला इमारत से कूदकर
इक स्त्री ने खुदकशी कर ली ......!!

...समाज में छुपे अंतहीन दर्द की गहरी परत को उघाडती आपकी रचनाएँ सीधे मर्म को छूती है ... ... आवरण में एक सनसनाती गूंज सी उठती है......

अरविन्द जांगिड said...

सुन्दर लिखती है आप, साधुवाद.

ਤ੍ਵਾਦਾ ਪੁੰਜਾਬੀ ਲੇਖ ਭੀ ਪਾਧਿਯਾ, ਸੁੰਦਰ ਲਾਗਿਯਾ ਸੀ, ਏਸ ਕਰਕੇ, ਰਬ ਮੇਹਾਰ੍ਬਾਨਿਯ ਬਕਸ਼ੇ ਤਵਾਦੀ ਕਲਮ ਨੂ,

ਮੈਨੂ ਪੁੰਜਾਬੀ ਕਾਮ ਆਂਦੀ ਹੈ, ਜੇ ਕੋਈ ਗਲਤੀ ਹੋਵੇ ਤੋਂ ਮਾਫ਼ ਕਰਨਾ,

Ravi Rajbhar said...

Bahut-2 sunder post.

apko pdhkar suku miltan hai.

mridula pradhan said...

wah. bahut achcha likhtin hain aap.

देवेन्द्र पाण्डेय said...

1 में यह सही है न..!
कभी उसकी दुखती पीठ पर
फिरती मेरी अँगुलियों में ...

कहीं यह तो नहीं था..

कभी मेरी दुखती पीठ पर
फिरती उसकी अँगुलियों में ...

Avinash Chandra said...

तीसरी बहुत ज्यादा पसंद आई,शुभकामनाएँ

ममता त्रिपाठी said...

शोभनम्

जयकृष्ण राय तुषार said...

ek se badhkar ek kavitayen ma prasann ho gaya have a nice day

जयकृष्ण राय तुषार said...

ek se badhkar ek kavitayen ma prasann ho gaya have a nice day

जयकृष्ण राय तुषार said...

ek se badhkar ek kavitayen ma prasann ho gaya have a nice day

जयकृष्ण राय तुषार said...

adbhut kavitayen hain man prasann hua

जयकृष्ण राय तुषार said...

adbhut kavitayen hain man prasann hua

हरकीरत ' हीर' said...

1 में यह सही है न..!
कभी उसकी दुखती पीठ पर
फिरती मेरी अँगुलियों में ...

कहीं यह तो नहीं था..

कभी मेरी दुखती पीठ पर
फिरती उसकी अँगुलियों में ...

नहीं देवेन्द्र जी ....
यहाँ एक लड़की अपनी सौतेली माँ का वर्णन कर रही है ....
वह अपनी सौतेली माँ की सोच में हमेशा इसलिए बसी रहती थी क्योंकि उसे लड़की से बर्तन ,कपडे ,घर की सफाई और अपनी पीठ मलवानी होती .....और उसे ओढने के लिए एक फटा कम्बल दिया जाता ....
उम्मीद है अब भाव स्पष्ट हो गए होंगे .....

ѕнαιя ∂я. ѕαηנαу ∂αηι said...

बहुत ही मर्मस्पर्शी कवितायें,आज आपकी अभिव्यक्ति में एक चीज़ नोटिस में आई कि आपकी कविताओं की अन्तिम पंक्ति हज़ारों पंक्तियों से अकेले मुकबिला करने में सक्छम हैं, बधाई।

shekhar suman said...

मैंने अपना पुराना ब्लॉग खो दिया है..
कृपया मेरे नए ब्लॉग को फोलो करें... मेरा नया बसेरा.......

amar jeet said...

हरकीरत जी तीनो रचनाये उम्दा सभी मार्मिक और दिल को छूने वाली !
आपकी रचनाओ में जो दर्द है अकथनीय है!

हरीश प्रकाश गुप्त said...

हृदय को झकझोरती रचनाएं।

बहुत ही सुन्दर।

nilesh mathur said...

परिवर्तन! आप ने न जाने किस मनोभाव में ये लिखी है नहीं जानता, लेकिन मुझे मेरे मोनोभाव के साथ ये छू कर गुज़र गयी!

Parul said...

ati sundar...aur parivartan ne to man par chhaap chod di hai!

samratonlyfor said...

bahut hi achchha likha hai aapne

कुछ ,धीमे से नीचे रखती है
और थके क़दमों से, लौट जाती है
अँधेरी रात लिखने लगती है
अनचाहे गर्भ का भविष्य ...'
wah bahut achchha
Badhai ho

hot girl said...

nice poem.

देवेन्द्र पाण्डेय said...

धन्यवाद।
मैंने पहले नहीं समझा था। समझा तो बहुत अच्छी लगी कविता।

प्रदीप कांत said...

अब तक मेरी ज़िन्दगी में
एक वही तो थी ....
जिसने मुझे
अपनी नज़र में बनाये रखा ...
रोज़ ज़िन्दगी के ...
आधे से ज्यादा कामों में मैं
उसकी सोच में बसी होती
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सौतेली शब्द को लेकर अच्छा प्रयोग

Thakur M.Islam Vinay said...

पांच लाख से भी जियादा लोग फायदा उठा चुके हैं
प्यारे मालिक के ये दो नाम हैं जो कोई भी इनको सच्चे दिल से 100 बार पढेगा।
मालिक उसको हर परेशानी से छुटकारा देगा और अपना सच्चा रास्ता
दिखा कर रहेगा। वो दो नाम यह हैं।
या हादी
(ऐ सच्चा रास्ता दिखाने वाले)

या रहीम
(ऐ हर परेशानी में दया करने वाले)

आइये हमारे ब्लॉग पर और पढ़िए एक छोटी सी पुस्तक
{आप की अमानत आपकी सेवा में}
इस पुस्तक को पढ़ कर
पांच लाख से भी जियादा लोग
फायदा उठा चुके हैं ब्लॉग का पता है aapkiamanat.blogspotcom

निर्मला कपिला said...

शायद स्त्री की त्रासदी है कि कदम कदम पर जीवन के हर पग वही दुख सहती है और पीडा के दंश सहती है कभी सौतेली माँ कभी सौतेली बेटी कभी अनचाहा गर्भ तो कभी पुरुष के शोषण और कभी औरत को औरत दुआरा ही छले जाने से। गहरे चिन्तन से उपजे भावों को आपने करीने से समेटा है अपनी तीनो रचनाओं मे। बहुत खूब। शुभकामनायें।

جسوندر سنگھ JASWINDER SINGH said...

मैं अखबार उठा पढ़ने लगती हूँ ...
इक बहुमंजिला इमारत से कूदकर
इक स्त्री ने खुदकशी कर ली
...ਕਦੇ ਕਦੇ ਸੋਚਦਾ ਹਾਂ ,
...ਕਾਸ਼ ਨਾ ਬਣਦੀਆਂ ,
.....ਇਹ ਉੱਚੀਆਂ ਇਮਾਰਤਾਂ
.....ਕੱਚੇ ਕੋਠੇ ਨੂੰ ਲਿਪਦੀ ਮੇਰੀ ਮਾਂ
.....ਅਮਰ ਪਦਵੀ ਪਾ ਲੈਂਦੀ
ਕਿੰਨੀ ਕੁ ਸਿਫਤ ਕਰਾਂ ਤੁਹਾਡੀ ਤੇ ਤੁਹਾਡੀ ਕਲਮ ਦੀ ?

सहज साहित्य said...

सौतेली कविता बहुत मार्मिक है । एक बच्ची के दुखों को पर्त-दर पर्त खोलती है । व्यथा का इतना यथार्थ परक चित्रण मन को मथ देता है । अन्य कविताएँ भी उत्तम हैं

राकेश पाठक said...

बहुत सुंदर भाव भी और हां विषय भी...बेहद खूबसूरत रचना...

वन्दना महतो ! said...

मैं अखबार उठा पढ़ने लगती हूँ ...
इक बहुमंजिला इमारत से कूदकर
इक स्त्री ने खुदकशी कर ली ......!!

मेरी अपनी माँ तो .....
कबका जीना बंद कर चुकी थी .....!!

पढते पढते जैसे कहीं रुकी सी रह गयी. आपको पढ़ना वाकई किस्मती होने जैसा है.

usha rai said...

अनचाहा गर्भ ??? आपकी लेखनी ने कई कई शक्ल दे दी ! दर्द को साकार कर दी ! कितना सहज और कितना असहज ??? आभार !

डॉ. हरदीप संधु said...

सभी रचनाएँ बहुत उम्दा हैं मन को छू लिया.......आभार

.

Suman Sinha said...

suna tha ... aaj padha aur maun rah gaya

अभय said...

क्या बात लिखी है आपने आपका तहे दिल से शुक्रिया !

ਸੰਦੀਪ said...

संवेदनशील कविता !

अब तक मेरी ज़िन्दगी में
एक वही तो थी ....
जिसने मुझे
अपनी नज़र में बनाये रखा ...

मेरी अपनी माँ तो .....
कबका जीना बंद कर चुकी थी .....!!