Tuesday, August 24, 2010

अभी इक नज़्म मेरे अन्दर जंग छेड़े बैठी है .....

भी तो
आग का इक दरिया
लांघना बाकी है .....
अभी इक झील की गहराई को
समेटना है अपने भीतर ....
दोपहर के इस जलते सूरज की आग में
तपाना है ज़िस्म ....
इन सिसक- सिसक कर दम तोडती
हवाओं संग चलना है उनके
पत्थर हो जाने से पहले ...


इन जर्द पत्तों के
कन्धों पर रखना है हाथ .....
रात के अंधेरों में उतरते
इन नग्न अक्षरों की छाती पर
जलाना है दीया
ख़ामोशी से पहले ....

भी मेरी आँखों ने
वक़्त के कई पन्ने पढने हैं
जहाँ रिश्तों के धागे
दर्द की दरगाह पर बैठे
अपनी उम्रें गिनते हैं
जहाँ कई मासूम किलकारियां
हाड-मांस बनने से पहले ही
क़त्ल हो जाती हैं ...
जहाँ आग की लपटों से चीखें
मांगतीं हैं अपने दस्तखत .....

भी मुझे तुम्हारे बोये
उन बीजों की आँखों से
बरसती आग भी तो झेलनी है ...
रफ्ता-रफ्ता खामोश होती इन
दीवारों के माथों पर
रखने
हैं अपने
तप्त होंठ ...

अभी इक नज़्म ....
मेरे अन्दर जंग छेड़े बैठी है
कि तिनका- तिनका होती इस
ज़िन्दगी को कैसे समेटूं ...
अभी तू मुझ से
जमाने की बात मत कर ....
अभी तू मुझ से...
जमाने की बात मत कर ....!!


इसे मेरी आवाज़ में भी सुन सकते हैं ....यहाँ .....

69 comments:

VIJAY TIWARI 'KISLAY' said...

हरकीरत जी
अभिवंदन
आपकी रचना "अभी इक नज़्म मेरे अन्दर जंग छेड़े बैठी है ....." पढी,
फिर से पढी. फिर फिर आपकी आवाज़ में सुनी.
सच मानिए पढ़ कर दिल में दर्द हुआ, पर आपकी ठहरी और
दर्दीली आवाज़ ने उसे और प्रभावी बना दिया..
आपको इस रचना के के लिए बहुत बहुत बधाई.
-विजय तिवारी "किसलय "

Rajendra Swarnkar said...

हीर जी
………
अभी मुझे तुम्हारे बोये
उन बीजों की आंखों से
बरसती आग भी तो झेलनी है …

…… …… ……
अभी तू मुझ से …
जमाने की बात मत कर ……!!

…… …… ……

? ? ?
आता हूं फिर … !
बाअदब …
- राजेन्द्र स्वर्णकार

रानीविशाल said...

अभी मेरी आँखों ने
वक़्त के कई पन्ने पढने हैं
जहाँ रिश्तों के धागे
दर्द की दरगाह पर बैठे
अपनी उम्रें गिनते हैं
जहाँ कई मासूम किलकारियां
हाड-मांस बनने से पहले ही
क़त्ल हो जाती हैं ...
जहाँ आग की लपटों से चीखें
मांगतीं हैं अपने दस्तखत .....

आपकी इस रचना को बार बार पड़ा हर बार कुछ कसक उठी दिल में .....बड़ा ही विहंगम माहौल हुआ दिल में जिससे मैं कभी अनजान न थी ....मगर ये रचना जा समां बैठी सीधी वहां .....क्या बात है !
आपको सुनने का अनुभव बहुत ही अच्छा रहा ...आभार
मेरे भैया .....रानीविशाल
रक्षाबंधन की ढेरों शुभकामनाए !!

M VERMA said...

इन जर्द पत्तों के
कन्धों पर रखना है हाथ .....
तूलिका से चित्र उकेरते तो बहुत देखा है पर आपकी लेखनी जो चित्र उकेरती है वह और कहाँ.
और सम्वेदना का यह स्वर
जहाँ कई मासूम किलकारियां
हाड-मांस बनने से पहले ही
क़त्ल हो जाती हैं ...
और फिर आपकी दर्द भरी आवाज में इस दर्द को सुनना ... उफ नज़्म में दर्द है या आपकी आवाज में !!

manu said...

अभी इक नज़्म ....
मेरे अन्दर जंग छेड़े बैठी है

क्या बात है हीर जी....!!

अभी तू ज़माने की बात मत कर....!!

बहुत खूब....

manu said...

अभी इक नज़्म ....
मेरे अन्दर जंग छेड़े बैठी है

क्या बात है हीर जी....!!

अभी तू ज़माने की बात मत कर....!!

बहुत खूब....

फणि राज मणि चन्दन said...

Bahut kuchh bol gayeee, bahut saare baate sikhaa di...


waah!!

Regards
Fani Raj

इमरान अंसारी said...

हीर जी,

सुभानाल्लाह ...............आपकी नज़्म बहुत खुबसूरत हैं....मैं आज एक बात कहता हूँ की आप उच्च कोटि की साहित्यिक रचनाये लिखती हैं, बहुत ख़ुशी हुई ऐसी रचना पढ़कर...ऐसा लगा जैसे किसी मंझे हुए फनकार की नज़्म पड़ी हो, गुस्ताखी की माफ़ी के साथ कहता हूँ आपकी ये नज़्म .....गुलज़ार साहब की नज्मो से किसी तरह कम नहीं है|

हालाँकि ये छोटा मुंह बड़ी बात होगी पर एक गुज़ारिश है, अगर आप कबूल करें | रचना में किसी एक ज़बान को अहमियत दे ...चाहे वो हिंदी हो या उर्दू ....इससे रचना में एक रवानगी बनी रहती है....जैसे :-

"इन जर्द पत्तों के
कन्धों पर रखना है हाथ .....
रात के अंधेरों में उतरते
इन नग्न अक्षरों की छाती पर
जलाना है दीया
ख़ामोशी से पहले ...."

इसकी जगह :-

"इन जर्द पत्तों के
कन्धों पर रखना है हाथ .....
रात के अंधेरों में उतरते
इन नंगे अल्फाजों के सीने पर
जलाना है दीया
ख़ामोशी से पहले ...."

एक बार फिर कहता हूँ, आपकी रचना बहुत अच्छी बन पड़ी है .....शुभकामनायें|

अरुणेश मिश्र said...

अभी तो......
.......
बाकी है ।
अथातो जिज्ञासा ।
प्रशंसनीय ।

हरकीरत ' हीर' said...

इमरान जी ,
शुक्रिया .....!!
कोई हर्ज़ नहीं अगर अल्फाज़ भी लिख दिया जाये तो ....
आपका सुझाव सहेज लिया है ....!!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

अभी मेरी आँखों ने
वक़्त के कई पन्ने पढने हैं
जहाँ रिश्तों के धागे
दर्द की दरगाह पर बैठे
अपनी उम्रें गिनते हैं

मन की पीड़ा को कहती सुन्दर नज़्म ...

sada said...

कि तिनका- तिनका होती इस
ज़िन्दगी को कैसे समेटूं ...
अभी तू मुझ से
जमाने की बात मत कर ..।

गहरे शब्‍दों के भाव, सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति ।

Mithilesh dubey said...

हमेशा की तरह लाजवाब लगी रचना , कैसे आप इतने गहरे भाव समेट पाती है , बहुत खूब ।

Rajendra Swarnkar said...

@ इमरान जी दुरुस्त फ़रमाते हैं

रचना में किसी एक ज़बान को अहमियत दें ...चाहे वो हिंदी हो या उर्दू ....इससे रचना में एक रवानगी बनी रहती है....जैसे :-

"इन जर्द पत्तों के
कन्धों पर रखना है हाथ .....
रात के अंधेरों में उतरते
इन नंगे अल्फाजों के सीने पर
जलाना है दीया
ख़ामोशी से पहले ...."

लेकिन ,लफ़्ज़ वाहिद है उसका बहुवचन अल्फ़ाज़ ख़ुद है।
… अल्फाजों नहीं अल्फ़ाज़ होगा ।
उम्मीद , मुझसे सहमत होंगे …

PRATUL said...

हरकीरत जी, नमस्ते.
नज़्म पढ़ी, नज़्म सुनी.
आपकी आवाज सुनने का चाव था, लिंक दिया आभार. मुझे केवल स्वर ही स्वर सुनाई दिया, उनके अर्थों में घुसने सी सुध ही नहीं रही.

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

adbhut'''ek dum alag hee upmayen padhne ko mileen..... kavita kathya hriday tak pahuncha ...aur wo beejon keee ankhen ..patton ke kandhe ..aah kya kahun ..lazawaab

रचना दीक्षित said...

अभी इक नज़्म ....
मेरे अन्दर जंग छेड़े बैठी है
कि तिनका- तिनका होती इस
ज़िन्दगी को कैसे समेटूं ...
अभी तू मुझ से
जमाने की बात मत कर ....
अभी तू मुझ से...
जमाने की बात मत कर ....!!
उफ़!!! कितना दर्द है हमेशा की तरह लाजवाब

Mukesh Kumar Sinha said...

अभी इक नज़्म ....
मेरे अन्दर जंग छेड़े बैठी है
कि तिनका- तिनका होती इस
ज़िन्दगी को कैसे समेटूं ...
अभी तू मुझ से
जमाने की बात मत कर ....
अभी तू मुझ से...
जमाने की बात मत कर ....!!

pata nahi kahan se ye dard laa pati hain, pata nahi kahan se aapne inko samet rakha hai, aur jab chaha apne sabdo se uker deti hain.......bahut khub!!

waise aapki awaaj bhi pyari hai.....:)

महेन्द्र मिश्र said...

बहुत सुन्दर नज्म प्रभावी...इस नज्म को आपकी आवाज में सुनकर भावुक हो गया हूँ .... आभार हरकीरत जी

arvind said...

दोपहर के इस जलते सूरज की आग में
तपाना है ज़िस्म ....
इन सिसक- सिसक कर दम तोडती
हवाओं संग चलना है उनके
पत्थर हो जाने से पहले ...इस रचना के लिए बहुत बहुत बधाई.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत बहुत सुन्दर ..दिल को गहरे तक छु गयी आपकी लिखी यह रचना ..लाजवाब

डॉ. हरदीप संधु said...

Vah kia baat hai....
aap kee gazal ....
aap kee avaz....
Mubarak ho!!

ज्योति सिंह said...

अभी तो
आग का इक दरिया
लांघना बाकी है .....
अभी इक झील की गहराई को
समेटना है अपने भीतर ....
दोपहर के इस जलते सूरज की आग में
तपाना है ज़िस्म ....
इन सिसक- सिसक कर दम तोडती
हवाओं संग चलना है उनके
पत्थर हो जाने से पहले ...
waah bahut hi laazwaab ,shirshak behad prabhavshaali hai ,baar baar najar wahi jakar tik rahi hai ,shayad sabke bhitar aesi jang chalti hai ........

पी.सी.गोदियाल said...

Ati Sundar, bahut khoob !

Mrs. Asha Joglekar said...

अभी मेरी आँखों ने
वक़्त के कई पन्ने पढने हैं
जहाँ रिश्तों के धागे
दर्द की दरगाह पर बैठे
अपनी उम्रें गिनते हैं
जहाँ कई मासूम किलकारियां
हाड-मांस बनने से पहले ही
क़त्ल हो जाती हैं ...
जहाँ आग की लपटों से चीखें
मांगतीं हैं अपने दस्तखत .....
Jamane kee haqeekat aur dard bahut shiddat se mehsoos karatee hai aapki ye kawita . Aapki awaj me wah sara dard ubhar ke aaya hai.

डॉ टी एस दराल said...

हवाओं संग चलना है उनके
पत्थर हो जाने से पहले ...

अभी मेरी आँखों ने
वक़्त के कई पन्ने पढने हैं--बेशक !

अभी तू मुझ से...
जमाने की बात मत कर ....!!

आज फिर दर्द ही दर्द है फिज़ाओं में ।

लाज़वाब कर दिया !

Shah Nawaz said...

अभी मेरी आँखों ने
वक़्त के कई पन्ने पढने हैं
जहाँ रिश्तों के धागे
दर्द की दरगाह पर बैठे
अपनी उम्रें गिनते हैं
जहाँ कई मासूम किलकारियां
हाड-मांस बनने से पहले ही
क़त्ल हो जाती हैं ...
जहाँ आग की लपटों से चीखें
मांगतीं हैं अपने दस्तखत .....


बहुत ही बेहतरीन! बहुत ही उम्दा..... बहुत खूब!

Nisha said...
This comment has been removed by the author.
Nisha said...

hello harkirat heer ji.. aapke mere blog par aane va protsahan k liye bahut bahut shukriya.

aur ab aapki nazm ki baat karun to ye bhut hi dard bhari hai.. bahut achchi hai.. par dard hai.. aur yahi dard aapke apne baare me bataye section me bhi nazar aata hai.aisa laga jaise aapne bahut kuch dekha hai apni zindagi mein..in shabdon ko padh bas kavel ek hi baat dil me aai..ke aapka dard kuch kam ho aur kuch bahut khushi bhara bhi likhe aap.

ताऊ रामपुरिया said...

"अभी इक नज़्म मेरे अन्दर जंग छेड़े बैठी है ..जितनी सुंदर रचना है उतने ही सुंदर स्वर आपने इसे दिये हैं, बहुत शुभकामनाएं.

रामराम.

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

अभी मेरी आँखों ने
वक़्त के कई पन्ने पढने हैं
जहाँ रिश्तों के धागे
दर्द की दरगाह पर बैठे
अपनी उम्रें गिनते हैं
जहाँ कई मासूम किलकारियां
हाड-मांस बनने से पहले ही
क़त्ल हो जाती हैं ...
जहाँ आग की लपटों से चीखें
मांगतीं हैं अपने दस्तखत .....
हरकीरत जी....
भावपूर्ण...
बेहद भावपूर्ण नज़्म है आपकी.

राज भाटिय़ा said...

वाह वाह जी आप की आवाज ने तो इस गजल मै जान डाल दी, बहुत अच्छी लगी आप की यह रचना, धन्यवाद

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

अभी मेरी आँखों ने
वक़्त के कई पन्ने पढने हैं
जहाँ रिश्तों के धागे
दर्द की दरगाह पर बैठे
अपनी उम्रें गिनते हैं

वाह्! बेहतरीन गजल...आपके मधुर स्वर नें तो चार चाँद लगा दिए..
चर्चा मंच पर कल की चर्चा में सम्मिलित....

मनोज कुमार said...

आपकी नज़्म बहुत खुबसूरत हैं...!

चैन सिंह शेखावत said...

'जहाँ रिश्तों के धागे
दर्द की दरगाह पर बैठे
अपनी उम्रें गिनते हैं '

अब क्या कहूँ हरकीरत जी..
एक-एक शब्द से दर्द टपकता दिखता है..
आपका स्वर तो पूरी तरह दर्द से भीगा लगा..बहुत खूब..
शुभकामनाएँ.

दिगम्बर नासवा said...

बहुत खूब ... आपकी नज़्म सच में अपने आप से जिरह करने को माबूत कर देती है .....
बहुत ही अनमोल शब्दों का संयोजन होता है आपकी हर नज़्म में ...

shikha varshney said...

हाँ अभी तो बहुत कुछ बाकि है..बेहद खूबसूरत अंदाज.

nilesh mathur said...

लगता है जैसे सारे ज़माने का दर्द सिमट आया है!
कमाल की रचना, बेहतरीन!

Udan Tashtari said...

वाह! आह! बहुत खूब!! हर पंक्ति रोकती है.

अभी मेरी आँखों ने
वक़्त के कई पन्ने पढने हैं
जहाँ रिश्तों के धागे
दर्द की दरगाह पर बैठे
अपनी उम्रें गिनते हैं
जहाँ कई मासूम किलकारियां
हाड-मांस बनने से पहले ही
क़त्ल हो जाती हैं ...
जहाँ आग की लपटों से चीखें
मांगतीं हैं अपने दस्तखत .....

-जबरदस्त!

Udan Tashtari said...

वाह! आह! बहुत खूब!! हर पंक्ति रोकती है.

अभी मेरी आँखों ने
वक़्त के कई पन्ने पढने हैं
जहाँ रिश्तों के धागे
दर्द की दरगाह पर बैठे
अपनी उम्रें गिनते हैं
जहाँ कई मासूम किलकारियां
हाड-मांस बनने से पहले ही
क़त्ल हो जाती हैं ...
जहाँ आग की लपटों से चीखें
मांगतीं हैं अपने दस्तखत .....

-जबरदस्त!

सत्यप्रकाश पाण्डेय said...

आपकी रचना बहुत सुन्दर है.

संदीप 'शालीन ' said...

अभी इक नज़्म ....
मेरे अन्दर जंग छेड़े बैठी है
कि तिनका- तिनका होती इस
ज़िन्दगी को कैसे समेटूं ...
अभी तू मुझ से
जमाने की बात मत कर ....
अभी तू मुझ से...
जमाने की बात मत कर ....!!
हीर जी ..
बहुत ही बेहतरीन! बहुत ही उम्दा..... बहुत खूब

S.M.HABIB said...

अद्भुत... हीर जी,
"जहाँ रिश्तों के धागे
दर्द की दरगाह पर बैठे
अपनी उम्रें गिनते हैं...."
भावों में ऐसा चमत्कारिक प्रयोग...
पता नहीं क्यो एक बारगी लगा की अमृता प्रीतम जी को पढ़ रहा हूँ.
आपकी ठहरी हुई पुर असर आवाज में इसे सुनना ... शुभान अल्लाह...
इस एक नज़्म ने मुझे आपका प्रशंशक बना दिया है, अभी तो तमाम पोस्ट पढ़ना बाकी hai...

Virendra Singh Chauhan said...

अभी मेरी आँखों ने
वक़्त के कई पन्ने पढने हैं.
जहाँ रिश्तों के धागे
दर्द की दरगाह पर बैठे
अपनी उम्रें गिनते हैं
Kitni sachhaai hai in panktinyon men.
AAP hamesha bahut hi umda likhti hain.

Ye post bhi bahut hi achhi aur umda hai.

प्रवीण पाण्डेय said...

स्वयं को समेटूँ कि जमाने को देखूँ?

राजेश उत्‍साही said...

जंग जारी रहे।

Vijay Kumar Sappatti said...

harkiraat '
bahut dino baad yahan aana hua .. aur is nazm ne rok sa diya hai ..dil ko aur dil ke jazbaato ko .. ek kasak si ubhari aur gale me aakar atak gayi hai ..
abhi to shabd nahi jut paa rahe hai..phir kabhi ...

abhinandan..


VIJAY
आपसे निवेदन है की आप मेरी नयी कविता " मोरे सजनवा" जरुर पढ़े और अपनी अमूल्य राय देवे...
http://poemsofvijay.blogspot.com/2010/08/blog-post_21.html

cmpershad said...

झकझोरती कविता- बहुत गम है ज़माने में ... कैसे सुलझाएं, किसे बताएं :(

सुमन'मीत' said...

बेहतरीन......आपकी आवाज से कविता में और रंगत आ गई है.................

Anand Rathore said...

दर्द भरी आवाज़ , रुक रुक के सुनाई दी...आवाज़ में एक तस्वीर दिखाई दी. .. बहुत खूब ...

नीरज गोस्वामी said...

जहाँ रिश्तों के धागे
दर्द की दरगाह पर बैठे
अपनी उम्रें गिनते हैं

उफ्फ्फ....क्या लफ्ज़ हैं...वल्लाह....क्या कहूँ...???
नीरज

सुलभ § Sulabh said...

अभी मेरी आँखों ने
वक़्त के कई पन्ने पढने हैं
जहाँ रिश्तों के धागे
दर्द की दरगाह पर बैठे
अपनी उम्रें गिनते हैं
जहाँ कई मासूम किलकारियां
हाड-मांस बनने से पहले ही
क़त्ल हो जाती हैं ...
जहाँ आग की लपटों से चीखें
मांगतीं हैं अपने दस्तखत ....
अभी इक नज़्म ....
मेरे अन्दर जंग छेड़े बैठी है

क्या कहूँ, मैं?
बस सुना अभी आपको, शायद पहली बार सुना (मेरा मतलब इस कांपते आवाज़ को) जो इस नज़्म के पूरक हैं.
अक्सर उमरते अहसास को टिप्पणी में मै कह नहीं पाता.
बेहद असरदार पोस्ट है.

रश्मि प्रभा... said...

dua hai jung jaaree rahe

संजय कुमार चौरसिया said...

अभी इक नज़्म ....
मेरे अन्दर जंग छेड़े बैठी है


बहुत खूब....

महफूज़ अली said...

आपकी अवाज़ में बहुत अच्छी लगी यह पोस्ट...

Coral said...

bahut sundar

आग का इक दरिया
लांघना बाकी है .....
अभी इक झील की गहराई को
समेटना है अपने भीतर ....

शरद कोकास said...

बहुत खूब ।

Coral said...

इन्द्रनील पिछाले १५ दिनों से काम के सिलसिले में बहार गए है ....
और शायद और १५ दिन नहीं आयेंगे .... येसी जगह जहा मोबाइल coverage भी नहीं है....

बस यही दुःख लिखा है कवितामे !

वाणी गीत said...

अभी मुझे तुम्हारे बोये
उन बीजों की आँखों से
बरसती आग भी तो झेलनी है ...

अभी इक नज़्म ....
मेरे अन्दर जंग छेड़े बैठी है
कि तिनका- तिनका होती इस
ज़िन्दगी को कैसे समेटूं ...
अभी तू मुझ से
जमाने की बात मत कर ....

बिलकुल बात करने का मन नहीं कर रहा ...बस चुपचाप इसे पढ़ें और सुने , सुने और गुने ...
निःशब्द !!

Sonal said...

bahut hi pyara likha hai aapne... shukriya padwaane k liye..

A Silent Silence : Pyar na puche..(प्यार ना पूछे..)

Banned Area News : Firing near US consulate in Peshawar

जयकृष्ण राय तुषार said...

bahut sundar kavita badhai harkeeratji

Parul said...

lafzon ki ye jang ..aapki jeet aur hamesha ki tarah meri haar....is se jyada kya kehoon! :)

हेमंत कुमार ♠ Hemant Kumar said...

अभी मेरी आँखों ने
वक़्त के कई पन्ने पढने हैं
जहाँ रिश्तों के धागे
दर्द की दरगाह पर बैठे
अपनी उम्रें गिनते हैं
जहाँ कई मासूम किलकारियां
हाड-मांस बनने से पहले ही
क़त्ल हो जाती हैं ...
जहाँ आग की लपटों से चीखें
मांगतीं हैं अपने दस्तखत .....------------------हरकीरत जी ,आपके शब्दों का पैनापन बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर देता है।बहुत गहराई है आपकी रचनाओं में। बेहतरीन पंक्तियां।

अरुण मिश्रा said...

हीर जी,
ये नज़्म सभी शायरों का साझा दर्द समेटे हुए है ,
और हकीकत में एक कमाल है,अभिव्यक्ति की पीड़ा
और दायित्व का आग्रह दोनों को सफलता से
प्रस्तुत करती है आपकी नज़्म !

सुनील गज्जाणी said...

heer mem ,
namaskar !
achchi abhivyakti hai .
saadar !

manaskhatri said...

bahut hi sundar rachna..
shabdon ko badi hi sundarta se dhala hua hai....

****shubhkamnayein*****

JHAROKHA said...

अभी इक नज़्म ....
मेरे अन्दर जंग छेड़े बैठी है
कि तिनका- तिनका होती इस
ज़िन्दगी को कैसे समेटूं ...
अभी तू मुझ से
जमाने की बात मत कर ....
अभी तू मुझ से...
जमाने की बात मत कर ....!! हर बार की तरह ही बेहतरीन नज्म---शुभकामनायें।

Prem said...

बहत दिनों बाद समय को हाथों से पकड़ पाई हूँ ,पिछले कुछ महीनों की आपकी सब रचनाएँ पढ़ डाली ,शब्द नहीं किबयां करूँ -दर्द से नहा गई हूँ -दरद वोह जो सकूं दे जाता है । इतने सुंदर लेखन के लिए शुभकामनायें

सुशील कुमार छौक्कर said...

आज आपकी रचना को आप ही की आवाज़ में सुनकर अच्छा लगा। एक अलग अहसास महसूस हुआ। जितना दर्द इस रचना में है उसी दर्द को महसूस करते हुए आपने ये रचना पढी है।
अभी मेरी आँखों ने
वक़्त के कई पन्ने पढने हैं
जहाँ रिश्तों के धागे
दर्द की दरगाह पर बैठे
अपनी उम्रें गिनते हैं
जहाँ कई मासूम किलकारियां
हाड-मांस बनने से पहले ही
क़त्ल हो जाती हैं ...

बहुत कुछ कह जाते है ये शब्द। कुछ जिंदगियाँ यूँ ही जीने से पहले ही दफ़न क्यों हो जाती है? हमेशा की तरह बहुत अच्छी लगी आपकी रचना।