Tuesday, March 1, 2011

इक औरत .....

पिछले दो महीने पत्र-पत्रिकाओं में खूब नज्में छपीं ....बहुत से फोन काल्स ...ख़त ...पत्रिकाएँ ....नज्मों की मांग ....
इनमें से दो खतों (मेल) ने ज्यादा खुशी दी ...एक तो 'सिल्ली सिल्ली आंदी है हव़ा ' गीत लिखने वाले अमरदीप जी का ख़त और दुसरे निर्मेश ठक्कर जी का जिनका गिनीज बुक में नाम है ....
सबसे ज्यादा नज्में पसंद की गई दृष्टिकोण में छपी नज्में ....पहचान, तूफ़ान ,कॉल गर्ल ,साज़िश हवस ...'दृष्टिकोण' के संपादक नरेंद्र जी का बहुत -बहुत आभार...शुक्रिया जिन्होंने मुझे रचनाओं के लिए दो बार ख़त लिख आग्रह किया ..... इसके अलावा ...अविराम , अभिनव-प्रयास ,पुष्पगंधा ,समकालीन भारतीय -साहित्य ,कथासागर आदि में भी रचनायें छपी ....
अब पेश है इक नज़्म ....' इक औरत ''



इक औरत

सुप्त सी ...
अनसिये ज़ख्मों तले
लिपटा ली जाती है देह मेरी
जहाँ ज़िस्म की गंध उतरती है  
कभी दूसरी,कभी तीसरी .....
तो कभी चौथी बन ....

रात गला काटती है
कई ज़ज्बात मरते हैं  
इक ज़हरीली सी कड़वाहट
उतर जाती है हलक में ..... 
 तुम नहीं खड़ी हो सकती 
 अपने हक़ की खातिर
  मेरी बराबरी पर .....
तुम्हारा वजूद .....
ज़ुल्म सहने ,तिरस्कार झेलने
और बुर्के की ओट में कैद है
तुम्हारी नस्ल को....
तालीम हासिल करने का हक नहीं 
 तुम्हारा गुनाह है ...
तुम लड़की होकर में पैदा हुई ....
तुम जिन्दा रहोगी
तो मेरे रहमोकरम पर ..... 
 उफ्फ़ .... 
इन शब्दों का खौफ
डराता है मुझे .....
ये किसकी अर्थी है ...
पत्ते सी  झूलती हुई .....
ये कौन लिए जा रहा है
मेरे मन की लाशें ......

''औरत तुम्हारी खेती है
इसे जैसे चाहो इस्तेमाल करो''
ओह ....!
 
ये कैसा धर्म है ...?
ये कैसा ईमान है ....?
ये कैसी जहालतें हैं ...?  
ये कैसा कानून है ...?
मेरे ज़िस्म पर मेरे खाविंद का 
 मालिकाना हक़ है ...  
मेरे विचारों पर फतवे हैं ... 
 मेरी सोच पर लगाम है ...
यकसां....
ये 'तलाक' का
तीन बार कहा गया शब्द 
 मेरे सामने चीखने लगा है ......  
मेरे अन्दर कोई पौधा कैक्टस बन  
उग आया है 
 ये पत्थर हुई औरतें

क्यूँ रोशनदानों की ओर झाँकने लगी हैं ?
 चुप्पी की चादर ताने ये सुरमई अँधेरा
किस उडीक में है ......?

अधिकार
के सारे शब्द तुम्हारे हाथों में .....
और मेरे हाथों में सारे कर्तव्य ?

अय
खुदा ...!
बता मैं कटघरे में क्यों हूँ ? 
 मैं औरत क्यों हूँ ...?
मुझे औरत होने से गुरेज है ... 
 मुझे औरत होने से गुरेज है ......!!




171 comments:

rashmi ravija said...

मुबारकां जी...मुबारकां...अच्छा लगता है यूँ आपके पाठकों का दायरा बढ़ते देख...ढेरो शुभकामनाएं.

और ये नज़्म तो बस रूह तक असर कर गयी...कई जगह का सच तो है ही ये.

सागर शर्मा said...

अय खुदा ...!
बता मैं कटघरे में क्यों हूँ ?
मैं औरत क्यों हूँ ...?
मुझे औरत होने से गुरेज है ...
मुझे औरत होने से गुरेज है ...


अति उतम ,भाव्पुरण रचना है...............आपकी कल्पनाशिलता प्रकट होती है अत्यंत मजबूत एवम गहरी ..............सोचने को मजबूर करती ये पंक्तियाँ वाकई

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुन्दर/भावपूर्ण रचना.

shikha varshney said...

सबसे पहले बहुत बहुत मुबारकबाद ..अब आपकी नज्म तक आते आते तो शब्द ही खतम हो जाते मेरे पास.
बेहद भावपूर्ण,सच्चाई बयान करती रचना.

रंजना said...

जब इनकी जिन्दगी महसूसने की कोशिश करती हूँ तो एकदम यही अहसास मेरा भी दम एकदम इसी तरह घोंटने लगते हैं...

लेकिन आप कल्पना करेंगी...चूँकि हम इनसे बेहतर हालत में हैं इसलिए इस तरह से यह सब देख सोच पाते हैं, इस मजहब में निचले तबके की औरतें तो ऐसा सोच तक नहीं पाती...इसे अपना नसीब,धर्म और परम्परा मानकर ओढ़ चुपचाप इसके नीचे दबे रह प्राणोत्सर्ग को तैयार रहती हैं...

खैर आपने इन्हें जुबान देने की जो सार्थक कोशिश की है,इसके लिए मैं आपकी बहुत बहुत शुक्रगुजार हूँ....ईश्वर करें इन्हें अपनी परतंत्रता का इल्म हो और ये खुद उठकर बेड़ियों को काटने को तत्पर हों...

साधुवाद इस प्रभावशाली सुन्दर रचना के लिए...

'साहिल' said...

बहुत ही प्रभावी नज़्म, कडवा सच लिए हुए

लेकिन हो सकता इस धर्म से सम्बंधित कुछ लोगों को (जिनमें औरतें भी शामिल होंगी) बहुत ही प्रभावी नज़्म, कडवा सच लिए हुए

लेकिन हो सकता इस धर्म से सम्बंधित कुछ लोगों को (जिनमें औरतें भी शामिल होंगी) आपका ये 'सुर' पसंद न आये, क्योंकि उनकी नज़र में इस्लाम की सर्वश्रेष्ठ धर्म है और उसकी सभी रीतियाँ सही हैं.
सो आप कुछ कडवे कमेंट्स झेलने के लिए तैयार रहें.................मगर लिखते रहिये!
शुभकामनायें !

हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे
जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे (फैज़)

ज्योति सिंह said...

तुम नहीं खड़ी हो सकती
खुदा की इबादत के लिए
मेरी बराबरी पर .....
तुम्हारा वजूद .....
ज़ुल्म सहने ,तिरस्कार झेलने
और बुर्के की ओट में कैद है
तुम्हारी नस्ल को....
तालीम हासिल करने का हक नहीं
तुम्हारा गुनाह है ...
तुम इस्लाम में पैदा हुई ....
तुम जिन्दा रहोगी तो
मेरे रहमोकरम पर .....
yah baat hame sochne par vivash karti hai ,kya hamari sanskriti me naari ka sthan pichhda hua hi rahega ,aakhir ye dwand is yug me kyo chal raha ?mujhe dard aur taklif dono hai .....aap laazwaab likhti hai koi shak nahi .

शिखा कौशिक said...

aurat ke jajbaton se roobru karatee sarthak post .

डॉ टी एस दराल said...

क्या जन्म लेना भी एक भाग्य की बात है ?
बेशक ।
अब एक नज़्म समाधान के लिए भी हो जाए ।

प्रवीण पाण्डेय said...

मन उद्वेलित करती रचना।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

फतवे से बचकर रहियेगा.... अभी कुछ लोग आकर नसीहतें देंगे और कुछ धमकी...
मुझे तो बहुत अच्छी लगी आपकी अभिव्यक्ति..

kunwarji's said...

जिसको शर्म होगी उसे शर्म आ ही जायेगी....जिनको नहीं है उनके लिए तो सारे प्रयास "बहुत बढ़िया लिखा है" तक ही असर कर पायेंगे....
बहुत दिनों के बाद पढ़ा जी आपको,एक बार फिर संवेदी विषय पर संवेदी और सशक्त रचना पढना को मिली!मई जब भी आपको पढ़ता हूँ तो सोचता हूँ अगली बार मेरा प्रयास भी ऐसा ही होगा....पर कहा..???
लेकिन एक दिन ऐसा सा जरुर लिखूंगा...


कुंवर जी,

Mukesh Kumar Sinha said...

sabse pahle to bahut bahut badhai..aapko awaam ke bich vistar badhane ke liye...:)

मेरे ज़िस्म पर मेरे खाविंद का
मालिकाना हक़ है ...
मेरे विचारों पर फतवे हैं ...
मेरी सोच पर लगाम है ...

aur sach me najm ke liye kaya kahun...itna dard ek aurat ke jeewan ka aap hi shabdo me samet sakte ho...waise bilkul sahi kaha...

: केवल राम : said...

आपको बहुत बहुत बधाई आशा है आपकी रचनात्मकता आपको नयी बुलंदियों तक ले जाएगी


अधिकार के सारे शब्द
तुम्हारे हाथों में .....
और मेरे हाथों में सारे कर्तव्य ?

जीवंत सच्चाई को सार्थक शब्द दे दिए हैं आपने

OM KASHYAP said...

BAHUT BHAPURNA RACHNA
BADHAI
AAP SABHI KO MAHASHIVRATRI KI SUBHKAMNAYE..

दर्शन कौर धनोए said...

औरत होना क्या इसलाम में इतना खोफ भरा हे ? फक्र करती हु अपने सिख-धर्म पर जहां ओरत का दर्जा मर्द से कम नही आँका जाता |

बेहद कुलीन गजल ! बेदाग शब्द रचना ! वाह !

ताऊ रामपुरिया said...

सशक्त और भावपूर्ण रचना.

रामराम.

रश्मि प्रभा... said...

ये किसकी अर्थी है ...
पत्तो से झूलती हुई .....
ये कौन लिए जा रहा है
मेरे मन की लाशें ......
yah blog mere liye khuda ki ibaadat se kam nahi.... badhaai ho nazmon kee baharon ke liye

हरकीरत ' हीर' said...

रंजना जी ,
सही कहा ....
न जाने कैसे जीती हैं ये इस्लामिक औरत ...
इतनी पाबंदियों के बीच....
क्यों वह पुरुष के साथ बैठ नमाज़ नहीं पढ़ सकती ...?
क्या वह सिर्फ भोग्या है ...या दासी ...?
स्त्री अगर न हो तो क्या पुरुष का अस्तित्व है ...?
फिर उसे सम्मान क्यों नहीं ...
वह भी उसी सम्मान की हक़दार है .....

रंजना जी आपने इसे दिल से महसूस किया ..शुक्रगुजार हूँ ....

साहिल ,
मैं भी एक औरत हूँ ...
औरत के साथ ये सरासर नाइंसाफ़ी है ....
पर जैसा रंजना जी ने कहा उनके दिलों में बचपन से ही
ये बातें इस कदर बैठा दी जाती हैं कि वे इससे निकलना ही नहीं चाहती ....
पर ये शुरुआत तो हो चुकी है न्युयोर्क से लेकर दक्षिण भारत तक की मुसलमान औरतें
बराबरी पर नमाज़ अदा कर रही हैं ....
जो विरोध करती हैं उनमें तालीम की कमी है ....

यूँ इस नज़्म को लिखते वक़्त ये सवाल ज़हन में आया था ...
पर मेरा विरोध धर्म से नहीं उन गलत परम्पराओं से है उन रिवायतों से है
जो स्त्री विरोधी हैं ....

दर्शन कौर जी ,
सही कहा ...सिख धर्म में ऐसी पाबंदियां तो नहीं ....
गुरुनानक ने तो यहाँ तक कह दिया .....
''सो क्यों मंदा आखिए जिन जम्मे राजान.....''

सदा said...

सबसे पहले तो आपको ढेरों बधाईयां ..आपकी लेखनी यूं ही हमेशा बुलंदियों पर रहे ...

और यह पंक्तियां बहुत गहराई लिये हुये

अधिकार के सारे शब्द
तुम्हारे हाथों में .....
और मेरे हाथों में सारे कर्तव्य ?

इस बेहतरीन अभिव्‍यक्ति के लिये एक बार फिर से बधाई ।

संजय कुमार चौरसिया said...

बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना,
सच्चाई बयान करती रचना.

कौशलेन्द्र said...

एक बार मैं भी असफल प्रयास कर चुका हूँ......भारतीय और पाकिस्तानी मुस्लिम समाज की अधिकाँश महिलाओं ने इसे अपनी नियत मानकर स्वीकार कर लिया है ....वे अपने दुःख को जानती हैं .....पर पता नहीं क्यों उससे बाहर नहीं आना चाहतीं ........वे भी मलेशियाई महिलाओं की तरह आगे बढ़ सकती हैं ....उनमें इच्छा-शक्ति जागृत करनी होगी. और यह काम उन्हीं के समाज के लोग बेहतर कर सकते हैं.
एक स्त्री की हैसियत से दूसरी स्त्री की तकलीफों को आपने महसूस किया ...और उन्हें अपनी संवेदनशील आवाज़ देने की कोशिश की ...इसके लिए आपको सलाम ! सलाम ! ! सलाम ! ! !
साहित्य men aap एक mukaam की or बढ़ rhee हैं lakh-lakh badhaiyaan ji aapko

दीपक बाबा said...

अय खुदा ...!
बता मैं कटघरे में क्यों हूँ ?
मैं औरत क्यों हूँ ...?


yaksh prashan .

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

आदरणीया हीर जी ,

आपकी नज़्म बहुत ही मार्मिक एवं भावपूर्ण है | अंतस की पीड़ा छलक-छलक उठती है | कोमल भावनावों का क्रन्तिकारी स्वरूप प्रशंसनीय है |

सुमन'मीत' said...

heer ji
bahut hi gazab ki nazm ...
bahut sundar

अरविन्द जांगिड said...

ओह! बहुत ही भावपूर्ण...सुन्दर नज्म के लिए आभार.

आपका मार्गदर्शन यूँ ही बनाए रखे..
साथ अँधेरों का निभाना

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (2-3-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

Minakshi Pant said...

खुबसूरत रचना पर वो दर्द अभी भी बरकरार जैसे चीख - चीख कर अपने होने का सबूत मांग रहे हों
खुबसूरत रचना

Mrs. Asha Joglekar said...

हीर जी बहुत बहुत मुबारक की आप जोर शोर से छपने लगीं हैं । हम खुश नसीब कि कह सकते हैं हरकीरत हीर को तो मै अच्छे से जानती हूँ ।
ये नज्म तो जड से हिला गई । खुदा का शुक्रिया, औरत होने की इतनी त्रासदी हमारे हिस्से न आई ।
पर इनमें से अधिकांश को यही जिंदगी सच्ची और अच्छी (?) लगती है ।

S.M.HABIB said...

सुलगते सवाल...
सुलगते लफ्ज़...
सुलगती नज़्म....
(यद्यपि, जैसा कि आपने स्वीकारा कि अब माहौल में कुछ सकारात्मकता घुलने लगी है... अच्छा संकेत है... फिर भी...)

"काश यह हो
कि यह आग
तमाम जंजीरों को पिघला दे...
तमाम बुराईयों को
भस्म कर दे,
और इंसान को
इंसान बन कर जीना सिखला दे..."

arganikbhagyoday said...

बहुत सुन्दर/भावपूर्ण,सच्चाई !

गौरव शर्मा "भारतीय" said...

इस पोस्ट को पढ़कर मन में यह सवाल भी आ रहा है कि क्या केवल मुस्लिम स्त्रियों की ही यह दशा है ? क्या स्त्रियों को हम आज भी उनका सही सम्मान दे पाए हैं ? आपके पोस्ट ने वाकई विचार करने को मजबूर कर दिया है .........सादर आभार !!

udaya veer singh said...

priya harkirat ji ,

pyar bhari satshriakal.
pahali bar aapko padha ,shayad der ho gayi ,ek sikh hone ke nate "sarbat da
bhala " ham mangate hi hain , par jitani dileri se aapne bibiyon ke paksh
ka pratinidhtwa kar rahi hain ,kabile tarif hai .kavya shilp achha hai . fir bhi lekhan men sanyam bhi aachar men aata hai.mafichahenge agar koyi bat achhi na lagi ho .rachana -dharmita ke liye sadhuvad,achha lagi
bhav purn kavita .

डॉ .अनुराग said...

ये किसकी अर्थी है ...
पत्तो से झूलती हुई .....
ये कौन लिए जा रहा है
मेरे मन की लाशें ......


nazm ko nazm jaisa banaate hai ye lafz..!

ehsas said...

बिल्कुल सही कहा है आपने। सच्चाई बयान करती है आपकी ये कविता। आभार।

neera said...

धर्म से नहीं सिर्फ औरत होने से तालुक है..

सिर्फ सच और इसके सिवा सिर्फ सच !
मेरे विचारों पर फतवे हैं...
मेरी सोच पर लगाम है
अधिकार के सारे शब्द
तुम्हारे हाथों में .....
और मेरे हाथों में सारे कर्तव्य ?

manu said...

सचमुच दुखद ...
लेकिन अब इस्लाम में काफी फर्क पडा है पहले की बनिस्बत...

बाकी बात रही पुरुष के वर्चस्व की..सो वो कहीं भी किसी भी कौम में देखने को मिल जाता है.....

बहरहाल...

सोचने पर मजबूर करती नज़्म...

cmpershad said...

ज़न, ज़ेवर और ज़मीन पर मर्द का जो हक़ है, जैसे चाहे इस्तेमाल कर लें। गनीमत है कि प्राचीन काल की तरह अनारकली बना कर बाज़ार में हर्राज़ नहीं किया जा रहा है :(

वाणी गीत said...

आह! ...नज़्म के लिए
वाह !...इतनी सारी उपलब्धियों के लिए

chirag said...

bahut khoob jee...
superb...

Udan Tashtari said...

बेहतरीन एवं उम्दा!!


बहुत मुबारकबाद .

Patali-The-Village said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति|
महाशिवरात्री की हार्दिक शुभकामनाएँ|

Rahul Singh said...

कब तक बनी रहेगी ऐसी नजमों की प्रासंगिकता.

Ajit Pal Singh Daia said...

ati sundar bhav pravan rachna.. aapko padhna achchha laga..

Shah Nawaz said...

नज़्म की आड़ में आपने इस्लाम पर बहुत ही बेबुनियादी इलज़ाम लगाएं हैं... बहुत ज्यादा दुःख हुआ कि आप जैसी सुलझी हुई शक्सियत भी बिना हकीक़त से रूबरू हुए, बिना पूरी जानकारी के भ्रम जाल को बुन रही हैं.... आप यह सब मुसलमानों के लिए लिखती तब भी ठीक था, लेकिन आपने यह सब इस्लाम को निशाना बनाने के नियत से लिखा... इसलिए अधिक निराशा हुई....

Shah Nawaz said...

ना तो आपको यह मालूम है कि औरत अपने पति के साथ नमाज़ पढ़ सकती है... और ना आप यह जानना चाहती है कि तलाक़ का हक मर्द और औरत दोनों के लिए बराबर है... यहाँ तक की पर्दा भी औरत और मर्द दोनों के लिए है...

यह और बात है कि अक्सर मुसलमान सारे हक सिर्फ औरतों के सर थोपते हैं.... लेकिन ऐसा हर जगह नहीं होता.... और यह धर्म का हिस्सा भी नहीं है... फिर कैसे आप धर्म पर इलज़ाम लगा सकती हैं???

क्षितिजा .... said...

सबसे पहले तो बधाई स्वीकार करें हीर जी ....
नज़्म बहुत गहरी है हीर जी ... पढ़ कर मन में एक उदासी सी छा गयी ...औत इस बात के लिए रब का शुक्रिया भी करती हूँ की मैं उसकी जगह पर नहीं हूँ ..

Suman said...

bahut sunder rachna harkirat ji,
inake mamle ham aur khushnasib hai........

Suman said...

bahut bahut badhai.......

इस्मत ज़ैदी said...

हरकीरत जी
नज़्म की दुनिया में आप एक जाना पहचाना नाम हैं ,बहुत ख़ूबसूरत और संवेदनशील नज़्में लिखती हैं आप इस नज़्म में औरत का जो दुःख है वो कमोबेश हर जगह ऐसा ही है ,
चूंकि इस नज़्म को एक धर्म विशेष se जोड़ा है इसलिए मैं कुछ बातें pointwise स्पष्ट करना चाहती हूँ --

१-तुम्हारी नस्ल को....
तालीम हासिल करने का हक नहीं
जहाँ तक प्रश्न तालीम का है इस्लाम की एक हदीस है -"तलबुल इल्मे फरीज़तुन अला कुल्ले मुस्लेमिन वा मुसलेमा "
जिस का अर्थ है कि "इल्म हासिल करना हर मुस्लिम मर्द और औरत पर फ़र्ज़ है" तो इस्लाम में शिक्षा प्राप्त करना औरतों का केवल हक़ ही नहीं कर्तव्य भी है और अगर महिलाओं को ये हक़ नहीं मिल पाया है तो इस के लिए दोषी धर्म नहीं तथाकथित मुसलमान हैं I

2- तुम नहीं खड़ी हो सकती
खुदा की इबादत के लिए
मेरी बराबरी पर.. इस्लाम में 'हज' एक अहम फ़रीज़ा है जिस के दारण मर्द और औरत एक साथ सारे धार्मिक फरायेज़ अदा करते हैं ,जहाँ स्त्री - पुरुष होने के नाते कोई आगे पीछे कि जगह तय नहीं की गई है ,ये भी सुबूत है इस बात का कि धर्म तो बराबरी का दर्जा देता है परन्तु ये हम हैं जो अंतर करते हैं I

३-मेरे ज़िस्म पर मेरे खाविंद का
मालिकाना हक़ है ...
हरकीरत जी ,इस्लाम औरत के साथ ज़बरदस्ती की इजाज़त किसी भी हाल में नहीं देता ,जो लोग ऐसा करते हैं वो अत्याचारी हैं लेकिन इस बात का approval उन्हें धर्म se नहीं मिलता

४- अधिकार के सारे शब्द
तुम्हारे हाथों में .......
अधिकार औरतों के भी हैं जो महिलाओं को अज्ञानतावश मालूम नहीं हैं लेकिन उन्हें जाहिल रखने का प्रावधान धर्म में नहीं हैं बल्कि ये एक सामाजिक ढांचा है

५- एक और अहम बात 'तलाक़' के बारे में __ इस्लाम में ग़ुस्से में किया गया कोई कम valid नहीं होता इसलिए केवल ३ बार तलाक़ कह देने se तलाक़ हो जाता है ये एक भ्रान्ति है
तलाक़ देते समय २ गवाहों का होना ज़रूरी है जिस तरह निकाह पढ़ा जाता है ,तलाक़ भी उसी तरह मंत्रोच्चार के साथ पढ़ा जाना चाहिए ,इस प्रक्रिया में भी दोनों पक्षों की मर्ज़ी होना ज़रूरी है
इस प्रक्रिया के पूर्ण होने की एक अवधि निश्चित होती है जिसमें दोनों पक्षों के पास पुनर्विचार का पूरा समय होता है और इस बीच पति पत्नी साथ ही रहते हैं

अंततः मैं केवल इतना कहना चाहती हूँ कि कोई भी धर्म अनैतिकता की ,अमान्वीयता की शिक्षा नहीं देता अतः सामजिक कुरीतियों को धर्म se जोड़ कर देखना मेरे विचार se ठीक नहीं
और जो लोग धर्म के उपदेशों या नियमों के विपरीत कार्य करते हैं वे 'तथाकथित धार्मिक ' होते हैं जिन की ग़लत बातों को कोई भी धर्म approve नहीं करता .
धन्यवाद

इस्मत ज़ैदी said...

ग़ुस्से में किया गया कोई कम valid नहीं होता

yahan kam ko kaam paddha jaye
dhanyavad

इमरान अंसारी said...
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अरूण साथी said...

कौन लिये जा रहा है मेरे मन की लाशे

उद्वेलित कर गया पर सच्चाई के करीब है यह रचना। इस्लाम की औरत का दर्द बाकई बेदर्द है समाज।

Arshad Ali said...

हरकीरत दीदी ,
आपके लेखनी का जवाब नहीं...और कोई सवाल नहीं उठा सकता मगर एक लेखक वही लिखता है जो वो सोंचता है ..और सभी सोंच सभी पर सही बैठे ये कोई ज़रूरी नहीं...यहाँ तक की आपकी सोंच अभी किसी मुद्दे पर जो भी है कोई ज़रूरी नहीं अगले पञ्च साल में वही रह जाएगी ...बदल भी सकती है..
चुकी आपकी कविता "इस्लाम की इक औरत..."
समुदाय की सभी महिलाओं को लपेटे में लेते हुए इस्लाम को दोषी बना सकती है..जो एक बिवाद को जन्म देता है.और इस्लाम औरत -आदमी में भेद-भाव नहीं करता पुरुष-महिला में भेद भाव हममे से अनपद लोग करते है..अब अनपद लोग किसी एक समुदाय में हीं हो .ऐसा कोई ज़रूरी नहीं.. और उसके लिए उसका धर्म दोषी बने ये भी गलत है...अतः इस मुद्दे पर इस्लाम को लाना "कुत्ते की मौत पर संसद में शोक सभा" करने जैसा है ..
इस्लाम या किसी भी धर्म का आधार जीवन को आसन और सुलभ बनाने के लिए है..अब ये अलग बात है की हम लोगों में से कुछ लोग अपने फायदे के लिए उसे गलत तरह से प्रयोग करते है..जिसमे तलाक भी आता है ..तो उसके लिए वो इन्सान दोषी है न की इस्लाम .... खैर ,आपको आपकी लेखनी की बधाई पूरी दुनिया से मिले ..और वास्तव में आपके शब्द के आगे कोई और शब्द आता हीं नहीं..मगर सोंच किसी मुद्दे पर प्रस्तुत हो तो सहमती और बिरोध का सामना करना पड़ सकता है... मुझे ऐसा लगता है..
और अंत में मै, मेरी पत्नी,माँ, बहन,नानी-दादी खाला-बुआ को आपके कविता के पात्र जैसा नहीं पाता हूँ जबकि वो सभी भी इस्लाम को मानने वाली महिलाएं हें ..और आप बिश्वास कीजिये वो आपके ही तरह से स्वतंत्र है...

Arshad Ali said...
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हरकीरत ' हीर' said...

आद. शाह नवाज़ जी ,
अगर कहीं औरत और मर्द की नमाज़ को लेकर
सवाल उठे हैं तो यकीनन किसी औरत ने ही उठाये होंगे
जो उसे अनुचित या नागवार गुज़रे ....
हो सकता है मेरी कम जानकारी रही हो ...
मैं उस धर्म से ताल्लुख भी नहीं रखती ..
फिर कही पढ़ा तो है ....
आपसे इल्तजा है इस बात का खुलासा करें ..
कि औरत और मर्द की नमाज़ में क्या फर्क है ....
@ क्या वह मस्जिद में पुरुष के बराबर नमाज़ अदा कर सकती है ....?
@ क्या नमाज़ के वक़्त उसे पर्दा करना जरुरी है ....?
@ विवाहित स्त्रियाँ भी मस्जिद में जा सकती हैं ....?

आद . इस्मत जैदी साहिबा ....

बहुत बहुत शुक्रिया बात को स्पष्ट करने के लिए ....
मुस्लिम समाज में स्त्री पर लगी पाबंदियों पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं ....
कहीं न कहीं कुछ अनैतिक है जो धुआँ उठा ....
धर्म से जुड़ा है या तथाकथित समाज की देन है ये पता नहीं ...
आपके एक मुल्ला हजरात फरमाते हैं कि अल्लाह ने हर मर्द को
औरत से आला बनाया है इसलिए औरत और मर्द के बीच बराबरी नहीं हो सकती ....
वे ये भी दावा करते हैं कि औरत सवाल नहीं खड़े कर सकती क्योंकि यह अल्लाह का कानून है ...
मुसलमान होने के नाते क्या आप पति की दूसरी ,तीसरी ,चौथी शादी के लिए खुद को जेहनी तौर पे तैयार नहीं रखती होंगी ....?
मुल्लाओं के अनुसार औरत पर मर्द का मालिकाना हक़ है वह उसका खाविंद और कव्वाम है
इस्लामी महिलाओं की जो समाज में छवि है वो तो यही दर्शाती है ...
हाँ ...धर्म ऐसा नहीं मानता ये जानकार ख़ुशी हुई ...
अगर इस बाबत कभी कुछ विस्तार से पढने को मिला तो आप तक जरुर पहुंचाऊँगी ....

शुक्रिया इस खुलासे के लिए ....

हरकीरत ' हीर' said...

आद. अरशद अली जी ,

आय दिन मुस्लिम औरतों को लेकर पत्र -पत्रिकाओं में लेख छपते रहते हैं ....
क्या वे सारे बे बुनियाद हैं ....?
कभी इस तरह के आलेख पढने को मिले तो उनका ज़िक्र आप से जरुर करुँगी ....

रवि धवन said...

बता मैं कटघरे में क्यों हूँ ? मैं औरत क्यों हूँ ...?मुझे औरत होने से गुरेज है ...मुझे औरत होने से गुरेज है ......!!
सच ही तो बयां करती है ये नज़म। आपको पढ़कर मालूम नहीं कुछ अलग ही अहसास होता है।

ghazalganga said...

हरकीरत हीर जी!
कविता हर लिहाज़ से जानदार और संवेदना को झिंझोड़ने वाली है. साथ ही कई सवाल भी खड़े करती है. महिलाओं की स्थिति तो कमोबेश हर समाज में यही है. पश्चिमी देशों में जहां उन्हें काफी हद तक पुरुषों के बराबर अधिकार मिल चुकने का दावा किया जाता है वहां भी महिला उत्पीडन की घटनाएँ कम नहीं होतीं. वहां भी नारीवादी आंदोलनों की ज़रूरत पड़ती है. यह अलग बात है कि उन्हें अपनी बात कहने की आज़ादी है. वो अपना जीवन अपने तरीके से जी सकती हैं.बहरहाल इस विचारोत्तेजक कविता के लिए बधाई स्वीकार करें. आपके अन्दर जो आग है वह प्रज्ज्वलित रहे यही कामना है.
----देवेन्द्र गौतम

mridula pradhan said...

atyant hi marmik aur samvedansheel.

Arshad Ali said...

हरकीरत दीदी,
त्वरित टिपण्णी के लिए धन्वाद ..
दीदी अगर आप किसी भी तरह का कोई समाचार ऐसा पाती है तो आप तुरंत दोष किसे देती हें?
चलिए आपको एक समाचार देता हूँ ...एक ६० साल के इन्सान ने पाचवी शादी कर ली ..आप दोष उस इन्सान को देंगी या उसके धर्म को? अब धर्म की बात करें तो इस्लाम का उदय जब हो रहा था तो बिरोधियों द्वारा इस्लाम के मानने वाले पुरुषों की हत्या होने की वजह से महिलाओं और पुरुषों का अनुपात असंतुलित होने के कारण एक पुरुष को एक से अधिक शादी कर समाज को संतुलित रखने का अधिकार दिया गया था ..वो भी उन पुरसों को जो सभी के साथ न्याय और सभी का एक सामान भरन पोसन कर सके..यहाँ महिलाओं का शोषण उद्देश्य नहीं था..वरन महिलाओं को एक सामजिक पहचान और भरण पोषण का अधिकार देना था..अब बात मेरे द्वारा दी गयी समाचार की करें तो आपको ये देखना होगा की उस बूढ़े इन्सान ने पाचवी शादी क्यों की? क्या उसने शादी अपनी पिछले सभी बीबी को रहते हुए भी सिर्फ ये कह कर कर लिया की इस्लाम उसे ये अधिकार देता है तो ..ये उस इन्सान की बहुत बड़ी भूल है..और वो अपनी भूख को मिटाने के लिए इस्लाम को दाव पर लगा रहा है..और यहाँ वो इन्सान दोषी है..न की इस्लाम ...मगर यदि कुछ ऐसा हो की उस बूढ़े इन्सान का कोई न हो और इसी तरह एक महिला जिसका भी कोई सहारा न हो और वो दोनों शादी कर ले तो इसे इस्लाम की तरफ से जीवन को आसन करने का एक तरीका माना जायेगा..मैंने पहले भी कहा की अगर कोई इन्सान ऐसा काम कर रहा है जो तर्कसंगत बिलकुल नहीं है...तो दोष उस इन्सान का है ..क्यों की वो अपने धर्म को अच्छी तरह से नहीं जानता उसे अपने धर्म के कांसेप्ट की जानकारी हीं नहीं..वो इन्सान दोषी है न की उसका धर्म..इस्लाम की बात करें तो अन्य धमों की तरह उसका भी उद्देश्य जीवन को आसान करना है....ये अलग बात है की अपनी लालसाओं को पूरा करने के लिए कोई इन्सान धर्म को आगे कर दे तो सबसे पहले वो खुदा का दोषी है..तब जाकर उस इन्सान का जिसके साथ उसने नाजायज़ किया..फिर समाज का दोषी...होगा ..वो इन्सान तीनों जगहों पर दोषी है..न की उसका धर्म
..
कुछ समाचार के आधार पर इस्लाम धर्म को दोष देना बिलकुल सही नहीं...हम उन लोगों का बिरोध ज़रूर करें जो गलत करने के लिए धर्म का हवाला देते हें..और वो उस धर्म में होने का दावा करते हें मगर उनका कोई धर्म नहीं होता ....वो शैतान के मानने वाले अनपद लोग हें जिनके कारण से हम पढ़े लिखे लोग भी उलझने लगते है....
आपका प्रसंसक
अरशद

सुनील गज्जाणी said...

हीर मेम !
नमस्कार !
मैंने आप कि नज़म भी पढ़ी और सारी प्रतिक्रियाए भी ! एक पत्रिका में मैंने अरब देशो में इस्लामिक क़ानून के बारे में पढ़ा जिस पढ़ा बहुत हैरत हुई .. मेरी इस प्रतिक्रिया को आप कोई भी अन्याथा मत लीजियेगा . बस आप सभी से सांझा कर रहा हूँ .... जो क़ानून पढ़ा उस देश को श्याद इरान में है कि अगर कोई स्त्री पर पुरष के साथ सम्बन्ध बनाए और उसका शोहर उसे देख कर आवेश में आ कत्ल करदे तो उसे हत्यारा नहीं माना जाता और अगर यही बात स्त्री अगर अपने शोहर को देख ले तो वो उसे कुछ नहीं कह सकती क्यूँ कि ये उसका हक है इस प्रकार के और भी बहुत से बिंदु पढ़े .. खैर .... कोई भी धरम हिंसा करना नहीं सिखाता . धरम के ठेकेदार भ्रान्तिया उत्पन करते रहते है . और इस्पे सिर्फ बहस के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सकता कोई भी .
हीर मेम ! रचना के लिए बधाई

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

आदरणीया हीर जी
सादर सस्नेहाभिवादन !

आज की नज़्म इस्लाम की इक औरत .... तथा इस तरह की अन्य नज़्में
मुझे ग़लत या सही लगने के बारे में तो बाद में बात होगी …
अगर यह राजेन्द्रजी मैं ही हूं तो… :)


# भाई शाहनवाज़ जी
# आदरणीया आपा इस्मत ज़ैदी जी
# भाई इमरान अंसारी जी
# अरशद अली जी

आप सब ने इस्लाम की अंदरूनी बातों का हवाला देते हुए स्पष्टीकरण किया … जो काबिले-ता'रीफ़ है ।

वैसे आपमें से कोई निम्नांकित उद्धरण पर कुछ कह पाएं तो जिज्ञासा शांत होगी
# { तुम्हारी औरतें तुम्हारी खेतियां हैं ,
अतः अपनी खेतियों में जहां से चाहो , जाओ-आओ ।

( दसूर तुल बकरा : 22 33 )

आप जानते हैं कि यह प्रसंग उमर रजियल्लाहु द्वारा कजावे को बदलने को ले'कर
पै.मो. के साथ वार्तालाप संदर्भ में है

यहां कजावा बदलने के अर्थ का खुलासा करने का आप में से किसी से भी मेरा कोई आग्रह नहीं … आवश्यक भी नहीं । }



कुल मिला कर निवेदन यही है कि स्नेह - सौहार्द की भावना सबसे ऊपर रहनी चाहिए ।
हरकीरत जी थोड़ा लचीलापन रखते हुए नज़्म का शीर्षक
मुस्लिम समाज की आम औरत या कुछ और रख पाएं तो … जिसमें मुल्लों तथा समाज के झूठे ठेकेदारों
द्वारा आम मुस्लिम औरत की जो बदतर स्थिति बनाई हुई है उसका आभास भी हो सके …


आदरणीया रंजना जी , साहिल जी, ज्योति सिंह जी ,
डॉ.कौशलेन्द्र जी , एस एम हबीब जी , गौरव शर्मा "भारतीय" जी , उदयवीर सिंह जी , मनु जी ,
देवेन्द्र गौतम जी
के विचार भी सराहनीय और समझने लायक हैं ।


♥ हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं ! ♥
- राजेन्द्र स्वर्णकार

Shah Nawaz said...

आद. शाह नवाज़ जी ,
अगर कहीं औरत और मर्द की नमाज़ को लेकर
सवाल उठे हैं तो यकीनन किसी औरत ने ही उठाये होंगे
जो उसे अनुचित या नागवार गुज़रे ....
हो सकता है मेरी कम जानकारी रही हो ...
मैं उस धर्म से ताल्लुख भी नहीं रखती ..
फिर कही पढ़ा तो है ....
आपसे इल्तजा है इस बात का खुलासा करें ..
कि औरत और मर्द की नमाज़ में क्या फर्क है ....



आदरणीय हरकीरत ' हीर' जी,


औरतों और मर्दों की नमाज़ में कोई फर्क नहीं है... दोनों की नमाज़ एक ही तरह की है...

@ क्या वह मस्जिद में पुरुष के बराबर नमाज़ अदा कर सकती है ....?

बराबर का मतलब अगर एक जैसी नमाज़ से है तो बिलकुल दोनों की नमाज़ में कोई फर्क नहीं है.... जहाँ तक बात मस्जिद में नमाज़ अदा करने की है, तो औरतों को भी मस्जिद में नमाज़ अदा करने का हक है... और कई मुल्कों में इसका चलन है... मैंने खुद कई जगह, कई बार अपनी पत्नी के साथ एक ही मस्जिद में एक साथ नमाज़ अदा की है... और अपने घर में अक्सर अपनी पत्नी के साथ नमाज़ अदा की है.... यह बात ज़रूर है की औरतें मर्दों की फेहरिस्त में नमाज़ अदा नहीं कर सकती है... बल्कि औरतों और मर्दों के लिए नमाज़ की अलग-अलग जगह होती है.... यहाँ यह बात भी काबिले ग़ौर है कि औरतों ही की तरह मर्दों को भी इजाज़त नहीं है ग़ैर-औरत औरत के साथ खड़े हो कर नमाज़ पढने की. तो क्या मर्द यह कहें की हमारे साथ अन्याय हो रहा है? नहीं!!!!

@ क्या नमाज़ के वक़्त उसे पर्दा करना जरुरी है ....?


जितना पर्दा आम समय में ज़रूरी है उतना ही पर्दा नमाज़ के समय भी है...

@ विवाहित स्त्रियाँ भी मस्जिद में जा सकती हैं ....?

बिलकुल विवाहित स्त्रियाँ हो या अविवाहित दोनों जा सकती हैं... लेकिन मर्द और औरत, दोनों के लिए कुछ समय ऐसे होते हैं, जिसमें मस्जिद में जाने की मनाही होती है...

Shah Nawaz said...
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Shah Nawaz said...

वैसे आपमें से कोई निम्नांकित उद्धरण पर कुछ कह पाएं तो जिज्ञासा शांत होगी
# { तुम्हारी औरतें तुम्हारी खेतियां हैं ,
अतः अपनी खेतियों में जहां से चाहो , जाओ-आओ ।
( दसूर तुल बकरा : 22 33 )


राजेन्द्र स्वर्णकार जी,

कुरआन-ऐ-करीम की उपरोक्त आयात का मतलब वोह नहीं है जो आप समझ रहे है... यह क्योंकि पति-पत्नी के संबंधो को लेकर है इसलिए इसकी चर्चा सबके सामने नहीं करना ही बेहतर है... परन्तु आपने मालूम किया है तो थोडा सा खुलासा करके बता देता हूँ... आशा है आप समझ जाएँगे... यह कुछ-कुछ काम-सूत्र के कुछ आसनों के प्रयोग की इजाज़त से सम्बंधित मात्र है... अधिक समझने के लिए आप मुझे ईमेल कर सकते हैं.

क्योंकि इसे आप आधा और बिना सन्दर्भ के पढ़ रहे हैं इसलिए मतलब कुछ और ही समझ में आ रहा है... अधुरा ज्ञान हमेशा ही खतरनाक होता है... एक उदहारण से समझाता हूँ..... मानलो एक जगह लिखा है कि "कुछ समय में महिलाओं का नमाज़ पढना मना है".. अब अगर कोई इसमें से इतना ही पढ़े कि "महिलाओं का नमाज़ पढना मना है"... तो क्या बात का बतंगड़ नहीं बनेगा???

Shah Nawaz said...

हरकीरत ' हीर' जी,


आपने कहा कि एक मुल्ला फरमाता है... तो इतना ज़रूर समझ लीजिए कि इस्लाम में इस बात पर तो बात हो सकती है कि अल्लाह क्या फरमाता है या फिर उसके संदेष्ठा मुहम्मद (स.) क्या फरमाते हैं... लेकिन इस बात से इस्लाम का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता कि कोई मुल्ला क्या कहता है...!!! कुछ ऐसे मुल्लो-मौलवियों ने ही धर्म का दुरूपयोग किया है और बदनाम किया है...

अल्लाह का इस्लाम और मुल्ला का इस्लाम एक-दुसरे से बिलकुल जुदा हैं...

Parul said...

aapki kalam samwedanhin samaj mein samwedna paida karne ki takat rakhti hai..!

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

# भाई शाहनवाज़ जी
आपके जवाब से कुछ भी स्पष्ट नहीं हुआ …
# कुरआन-ऐ-करीम की उपरोक्त आयत का मतलब वोह नहीं है
जो आप समझ रहे है...

( जो कमेंट मिटाया गया उसमें आपने लिखा था -
# कुरआन-ऐ-करीम उपरोक्त का मतलब वोह नहीं है
जो आम-तौर पर समझा जाता है...)

अर्थात् कुछ ऐसा है ज़रूर जिसे आम तौर पर समझा जाता है …


पहले तो स्पष्ट कीजिए कि वोह मतलब कौनसा ?

फिर बताइए मैं क्या समझा ?

~~~~~~~~~~

# इसे आप आधा और बिना सन्दर्भ के पढ़ रहे हैं इसलिए मतलब कुछ और ही समझ में आ रहा है.
अवसर है , यह पुण्य कमा ही लीजिए संदर्भ सहित पूरा आप बता दीजिए
ताकि जितने पाठक यहां पढ़ें , कम से कम उनको तो समझ में आ जाए … और उनके माध्यम से अन्य असंख्यों को … ।



# लेकिन यहां तो आप हज़रत को काम कला के आसन सिखाने वालाभी बता रहे हैं ।


# और पूरा ज्ञानी आपके ध्यान में कहीं हो तो बताइएगा ,
उनके चरण धो'कर पान करके अपना जीवन धन्य मानूंगा …

Arvind Mishra said...

अच्छी ब्लॉग नज्म -अभिव्यक्ति की आजादी सभी को होना चाहिए ...यह बात दीगर है कि ऐसी रचनाओं को तसलीमा नसरीन बासी कर चुकी हैं !

हरकीरत ' हीर' said...

आद. शाह नवाज़ जी ...

यकीन मानिए नज़्म की आड़ में किसी की धार्मिक भावनाओं या धर्म पर आक्षेप करने की मंशा नहीं थी मेरी.....मैंने तो केवल एक समाज विशेष की स्त्री की तकलीफों को जानकर-महसूस कर उनके पक्ष में आवाज़ उठाने की कोशिश की है. हाँ यह ज़रूर है कि मैंने इस्लाम का अध्ययन नहीं किया है....पर जो बातें मेरी जानकारी में मुस्लिम समाज की महिलाओं द्वारा लाई गयीं हैं मैंने उन्हीं का ज़िक्र किया है. मेरे लिए धर्म से पहले मनुष्य है और मैंने उसी के हक की बात की है. किसी भी बुद्धिजीवी के लिए उस धर्म की कोई अहमियत नहीं जो मनुष्य-मनुष्य में भेद करता हो ..फिर वह कोई भी धर्म क्यों न हो. और फिर हम धर्म की व्याख्या के लिए नहीं मनुष्य की अनुभूतियों के लिए नज़्म लिखते हैं ....कृपया मेरा आशय समझने का प्रयास करें और उपदेश एवं करनी के फर्क को दूर करने में समाज की मदद करें. नज़्म की सार्थकता इसी में है ...बहस में नहीं.

हरकीरत ' हीर' said...

ik blogar mahila mitr ki mel .....


अभी आपकी ये नज़्म पढ़ी, दिल को बहुत सुकूँ मिला....कम से कम किसी औरत ने तो पहल की....वरना आपने जिनके लिए लिखी है....वो तो वैसी ही जिन्दगी को अपना भाग्य मान गुरूर करती हैं...कलम-ए-पाक और शरियत के कानूनों का पालन कर रही हैं.....अरे हम पूछते हैं के ये कानून बनाये किसने....ये दोगलापन नहीं है तो और क्या है.....अपने मतलब के लिए इस्तेमाल करो फिर निकाल फेंक दो ......काश! औरते जागरूक हो पाए.....खुद आगे बढे ....बरसो से शोषित और तथाकथित परम्पराओं से परे जा नई परम्पराएं बनाए.

जानती तो होंगी ही आप प्रेम चाँद ने जिनके लिए लिखा....वो ये भी नहीं जानते के प्रेमचंद कौन थे...दुआ है आपने जिनकी ओर से पहल की है वो अपनी सोच में मानसिक बदलाव ला अपनी तकदीर खुद लिखे.....


मुमकिन है मेरे कमेन्ट से कुछ लोगों को आपत्ति होती ...इस लिए मेल कर रहे हैं

कौशलेन्द्र said...

आदरणीया हीर जी के सम्माननीय पाठको !
हीर जी तो नेपथ्य में हो गयीं ..अपनी महिला वेदना के साथ ....सामने आ गया "धर्म" ...जिसे चीन में अफीम की संज्ञा दे दी गयी थी किसी ज़माने में...... और उसके बाद ही चीन दुनिया को चुनौती देने के लायक बन सका.....आज वह अमेरिका को भी आँख दिखा सकने की जुर्रत रखता है. खैर ! बात धर्म की हो रही थी .....जो फसाद की जड़ है ...कम से कम हमारे देश में तो है ही. मैं दो बार उत्तर प्रदेश और एक बार राजस्थान में धर्मोन्माद की मारकाट के बीच से जान बचाने में सफल रहा ...और अभी तक ज़िंदा हूँ. ....यह बता दूं कि मैं तो हर बार एक नए शहर में राहगीर के रूप में चपेट में आया .
तकलीफ होती है ....इंसानियत से बड़ा भी कोई धर्म होता है ? जहां मेरे-तेरे धर्म की श्रेष्ठता या निकृष्टता की बात होती है ..मैं मान लेता हूँ कि यहाँ विग्रह्य संभाषा या वितंडा भर है. मनुष्य मात्र को कष्ट दिये बिना......प्रकृति-प्रदत्त किसी के अधिकारों का हनन किये बिना .....सार्व भौमिक सुख की दिशा में ...सर्व कल्याणकारी आचार-संहिता का पालन ही "एक मात्र धर्म" मेरी समझ में आ सका है अभी तक. इससे विमुख यदि कोई सामाजिक नियमावली है तो वह और कुछ भी हो पर धर्म तो कदापि नहीं हो सकता.
यदि किसी समाज में स्त्री या पुरुष ..किसी के भी सहज अधिकारों का हनन हो रहा है तो उसके लिए वहाँ का समाज दोषी है .....यदि वह समाज किसी धर्म के हवाले से ऐसा कर रहा है तो उसे रोका जाना चाहिए ..अन्यथा धर्म पर आक्षेप आना स्वाभाविक है......क्योंकि धर्म की विशद व्याख्या वहाँ अप्रासंगिक हो जाती है वहाँ तो धर्म का वही रूप चर्चित होता है जिसकी व्याख्या करके तथाकथित धर्माधिकारी शोषण की जड़ों को पुख्ता कर रहे हैं. .....
अभी पाकिस्तान में ईशनिंदा के नाम पर एक "ईसाई धर्मावलम्बी" कैबिनेट मंत्री की सरे आम हत्या कर दी गयी ......और भविष्य में भी ईशनिंदा करने पर ऐसा ही करने की प्रतिज्ञा की गयी ...कितने लोगों ने इसका विरोध किया ? यदि विरोध नहीं किया गया तो इसका साधारण सा अर्थ यह हुआ कि शेष समाज को इसमें कोई ऐतराज़ नहीं है. इससे विश्व में किस प्रकार का सन्देश जाएगा ...यह विचारणीय है.
मैं सभी लोगों से विनम्र निवेदन करना चाहूँगा कि हीर जी की भावना का आदर करते हुए उनकी मंशा को समझा जाय और यदि कर सकें तो भारतीय मुस्लिम महिलाओं को अन्य विकसित मुस्लिम देश की महिलाओं की तरह जीने की स्थितियां निर्मित करने आगे आयें और इस नज़्म को सार्थकता प्रदान करें.

Shah Nawaz said...

सबसे पहले तो हरकीरत हीर जी से माफ़ी चाहूँगा की उनकी पोस्ट से अलग बात कर रहा हूँ... लेकिन राजेन्द्र जी नी मालूम किया है इसलिए लिहाज़ रखते हुए थोडा सा लिख रहा हूँ... वैसे जितना पहले समझाया चुका था उतना काफी था, लेकिन वह समझना नहीं चाह रहे थे इसलिए थोडा सा और लिख रहा हूँ...

राजेन्द्र स्वर्णकार जी

'आम तौर पर समझा जाता है' से मतलब जिन इस्लाम विरोधी साईट से आप यह कॉपी करके लाएं हैं, उनके द्वारा प्रचार करके उलटे-सीधे मतलब बता कर लोगो को भरमाया जाता है... इन आयातों से कई तरह के गलत मतलब निकाले जाते हैं, जिसमें से एक यह भी है की इसमें औरत को एक वस्तु मात्र बताया गया है... जबकि इससे तात्पर्य यह है शारीरिक सम्बन्ध बनाने में उन तरीकों को (जिनकी इजाज़त है) प्रयोग किया जा सकता है...

आपने आयत का नंबर यहाँ तक की नाम भी गलत लिखा है... आपकी जानकारी के लिए बता रहा हूँ की यह सूरए बक़रह – अठ्ठाईसवाँ रूकू है.



इस विषय पर इस मंच पर मैं इससे आगे कुछ नहीं कहूँगा... अगर आपने आगे बात करनी है तो आप मुझे ईमेल कर सकते है, या फिर मेरे ब्लॉग पर आ सकते हैं...

कौशलेन्द्र said...

उत्तर-मधुशाला की एक रूबाई पेश करने की इजाज़त चाहूंगा आप सबसे -

धर्म-धर्म की रट करते सब
मर्म समझ ना कोई पाया /
कर्म संभालो अपने-अपने,
होगी मधुमय कड़वी हाला // २३

.....और रूबाइयों के लिए हमारे जंगल में तशरीफ लाइयेगा ...

urdu adab said...

हीरजी के आदरणीय पाठको,
मेरी आप से गुजारिश है कि हीरजी की इस रचना पर टिप्पणी देने से पहले
www.light-of-life.com पर जाकर मशहूर इस्लामी स्कालर जनाब Hamdun Dagher की किताब
The Position of Women in Islaam जरूर पढ़ें.उनके दो chapter १.the rights a man acquires over his wife २.how a man should discipline his wife पढने बाद अपने दिल पर हाथ रखकर सोचें कि जो आप टिप्पणी दे रहे हैं क्या वो जायज़ है?

वन्दना अवस्थी दुबे said...

हरकीरत जी, सबसे पहले तो सुन्दर नज़्म के लिए बधाई.
बहुत संवेदनशील कवियित्री हैं आप, तमाम पत्र-पत्रिकाएँ आपके परिष्कृत लेखन का सबूत पेश कर रही हैं. एक बार फिर बधाई. अब एक नज़र तमाम टिप्पणियों के सुर पर डाल लें न?
मेरी समझ में ही नहीं आता कि हम हिन्दू, मुस्लिम को कब वर्गीकृत करना बंद करेंगे. ये स्थितियां तो लगभग सभी धर्मों के अधिसंख्य परिवारों में औरत की है. औरत को कमतर समझने के मामले में दोषी धर्म नहीं, समाज के वे तथाकथित ठेकेदार हैं जिन्होंने बताया कि औरत कमतर है. ये ठेकेदार सभी धर्मों में एक जैसी सोच और शक्ल के ही है.
काश! आपने किसी धर्म विशेष का नाम लिए बिना केवल एक शोषित औरत के लिए नज़्म लिखी होती, तो इतनी सुन्दर नज़्म बहस के घेरे में न होती.
मुझे एक बात और लगती है, कि हम इस्लाम धर्म के बारे में कितना जानते हैं? तब किसी भी धर्म को धिक्कारने का मतलब? किसी भी धर्म में सताने के रास्ते नहीं सुझाए गए हैं. सभी धर्मों के सन्देश और शिक्षाएं एक जैसी हैं, उन्हें तामील करने वाले हम लोगों ने ही उसमें अपनी सुविधानुसार परिवर्तन कर लिए.
इस्मत ने बहुत सलीके से बिन्दुबार जानकारियां दीं हैं, सहमत हूँ उनसे.

जयकृष्ण राय तुषार said...

हरकीरत जी आपकी लेखनी में जादू है आपकी हर नज्म दिलों को छूने में कामयाब रहती है |बधाई और शुभकामनाएं |

saanjh said...

kya kaha jaye aapki nazmon par heer ji.....laajawaab

अमित शर्मा said...

हरकीरत जी, सबसे पहले तो सुन्दर नज़्म के लिए बधाई.

***********************************
शायद बात औरत कि लाचारी से शुरू हुयी थी और ख़त्म भी उसी सन्दर्भ में होनी चाहिये थी. लेकिन वही बात जिसका अंदाजा पोस्ट करते वक्त आपको भी नहीं रहा होगा ................... यहाँ पंडा,पूजा,मंदिर आदि शब्द रहे होते तो शायद इतनी हील-हुज्ज़त नहीं होती. खैर कुछ शब्दों ने औरत कि व्यथा को दबा डाला जैसा कि परम्परा से होता आया है.
अब कुछ संवाद प्रवाह में ऐसे मुद्दे भी उठ आयें है, जिन्हें शायद उठना भी नहीं चाहिये था, ठीक है उठ गए तो उठ गए और उनके समुचित समाधान भी मिलेंगे .................... पर उससे क्या ??????? ........... अबला की बला तो वैसी की वैसी ही रही !!!!!
राजिंदर काका को जबरिया खींच लिए हैं आप :) वे भलमानुस कुछ शब्दों के फेर में गहरे उलझ जायेंगे ................. सहनावाज़ भाई तो गरिमामय पूर्ण निराकरण कर देंगे जिनसे शायद काकाश्री संतुष्ट भी होंगे ............... पर उन कुछ लोगो का क्या जो सिर्फ गरियाने के लिए ही डोलते फिरतें है :)

प्रतुल वशिष्ठ said...

.

यह रचना उस समय आयी जब देश-प्रेम की बयार बह रही है, और झूठ बे-बुरखा हो रहा है.
यह रचना एक आहुति है उस राष्ट्रीय-यज्ञ में जो कुछ समय पहले ही शुरू हुआ था.
इस यज्ञ के मुख्य पुरोहित हैं : सुरेश चिपलूनकर
अन्य ऋषि हैं : पंडित बे के शर्मा जी और पंडित अमित शर्मा जी.
इस राष्ट्रीय-कुंड में हमें तो घृत-आहुति देने में आनंद आता है.

जिस प्रकार आहुति में घृत, समिधा, सामग्री आदि पड़ती है. उसी प्रकार आदरणीया हीर जी आपकी यह रचना एक ऎसी समिधा है जो यज्ञ में पढ़कर धुआँ दे रही है.
कृपया अपने भावों की स्पष्टता से समिधाएँ सुखा कर डाला करें अन्यथा यज्ञ बिगाड़ने वालों को भ्रम होगा कि आप उनकी हिमायती हैं.

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प्रतुल वशिष्ठ said...
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प्रतुल वशिष्ठ said...

अरे इस १०१ कुंडीय यज्ञ में आहुति का नाम बदल गया!!! घोर आश्चर्य!!!!!!!

Ravi Rajbhar said...

Sabase Pahle "Heer Ji" aapko bahut-2 badhai jo aapne ek samajik mudde par likhane ki himmat ki.

Mai yahan Bhai.. Arshad Ali ji aur Sahnwaj ji se kuchh kahna chahunga.

Bhai Arshad ji,
Sach puchhiye mujhe khusi hui aapke comment padha kar kar aap dharm se pare insaniyat ko wariyata dete hain.. hona bhi yahi chaiye.
par jahan tak islam ki baat hai
to yaha kisi bhi adesh ya waqy ke kahane ke sath "Allah aur Islam" ka bhi Certificate attache kiya jata hai.... jo islam ke badnam hone ki mukhya wajah hai.
aur aschary is baat ka hai ki is certificate ke sath log kisi bhi adesh ya fatawe ko kubul kar lete hain .
Mai Azmgarh ke padhosi distt Mau se hun...! asha hai sab kuchh aapko nahi batana padega. Hamre yaha well educated muslimo ki ginti nahi ki ja sakti hai.aage aap agar news par nazar rakhate honge to batane ki jarurat nahi hogi.

Dost mai bachpan se islamiyo ke bich raha hun...aur aaj bhi hun.
Mai sabhi Dharmo ki ijjat karta hun...Mujhe ye Nazm bilkil islamik aurato ki Zameen se judi lagi.
Asha hai aaplog hamari bato ko anyatha nahi lenge.

रंजना said...

मैं सबसे अनुरोध करना चाहूंगी कि धर्म की बात न की जाय....

संसार का कोई भी धर्म/सम्प्रदाय मनुष्य को सत्पथ पर चलने की ही राह दिखाता है...बात तो वहां बिगडती है जब उपदेशों/नियमों को लोग नकारात्मक ढंग से अपने फायदे के लिए इस्तेमाल में लाते हैं...चूँकि सीधे सीधे गलत करेंगे तो उनकी ऐसी तैसी हो जायेगी तो धर्म की मनमानी व्याख्या कर उसकी आड़ ले कुकर्म निपटा लेते हैं...

हिन्दुओं में ही बहुतेरे हैं जो दूसरी तीसरी शादी करने के लिए धर्म परिवर्तन कर लेते हैं,यह हम आये दिन देखते रहते हैं...ब्राह्मणों को जिन्हें कि सात्विक जीवन जीने की बाध्यता है, दुर्गा माता को बलि देने के नाम पर पशुओं की हत्या करते हैं और प्रसाद कहकर तामसिक भोजन खाते हैं...

धार्मिक नियमो को कैसे तोडा मरोड़ा जाता है अपने फायदे के लिए यह हम सभी जानते हैं,इसलिए उसपर बात कर हम केवल वैमनस्यता को न्योता देंगे और कुछ भी हासिल नहीं होगा...

भारत सहित एशियाई देशों में स्त्रियों की स्थिति आज भी ऐसी नहीं है जिसपर हम उत्साहित हो पायें,इससे संभवतः कोई इनकार नहीं करेगा...जो स्त्री पूरे समाज की जननी है वही दयनीय स्थिति में रहे, उपेक्षित शोषित रहे और वह भी धर्म के नाम पर, इससे हमें आपत्ति होना चाहिए न.....और यही इस नज्म में भी अनुगूंजित हुई है...एक स्त्री ने स्त्री समूह की पीड़ा से व्यथित हो अपना स्वर उसे दिया है,इसे बस इसी रूप में लिया जाय तो कल्याणकारी होगा....

इस्लाम की ही बात नहीं,हिन्दुओं में भी अशिक्षित समाज में स्त्रियाँ लगभग उसी अवस्था से गुजरती हैं जिससे मुस्लिम महिलायें गुजरती हैं..और एक मनुष्य होने के नाते ,पुत्र और पुत्री होने के नाते, अपनी माताओं और बेटियों के प्रति हो रहे अन्याय के खिलाफ तो हमें आवाज उठानी चाहिए न....नहीं????

एस.एम.मासूम said...

कविता की तारीफ जितनी की जाए कम है.
.
हरकीरत जी जब किसे धर्म के बारे मैं ना जानती हों सही क्या और ग़लत क्या तो उस धर्म का नाम ले के कुछ ना कहा जाए यही बेहतर होता है.
.
क्यूं आज आप जैसी कवित्री भी खुद को औरत की आज़ादी पे केवल एक ही धर्म के खिलाफ बुलने से ना रोक सकी?

.
वंदना जी ने सही कहा है की "काश! आपने किसी धर्म विशेष का नाम लिए बिना केवल एक शोषित औरत के लिए नज़्म लिखी होती, तो इतनी सुन्दर नज़्म बहस के घेरे में न होती."
.
यदि हर कोई अपने ही धर्म की अच्छाई या बुराई की बातें करे तो शायद कभी ऐसे हालत ना पैदा हों.
.
क्या यह कविता उसी हरकीरत की है जिसने अमन का पैग़ाम पे एक दिन कहा था:
पहचानो ....
अपनी लहुलुहान होती
आत्मा की आवाज़ ....

झूठे उसूल , झूठी शान , झूठी चाह
दौड़ते फिरोगे आखिर कब तक ....?
अब भी वक़्त है ,रोक लो

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

पूरी नज़्म जैसे रोम रोम तक रच बस गयी ...

प्रिया said...

जों औरत आदमी को जमीं पे लाती है, जिसके वजूद से सम्पूर्ण स्रष्टि का वजूद है... उसको कैसे रहना चाहिए, क्या पहनना चाहिए,इबादत, पूजा, प्रेयर कब, कैसे करनी चहिये.....मैं पूछती हूँ ये सवाल आये कहाँ से....बाद किसी भी मजहब की हो, समाज की हो, दोगला बर्ताव हमेशा से रहा है....फर्क इतना है क़ि किसी समाज विशेष क़ि औरत ज्यादा शोषित है तो किसी की कम...... लानत है ऐसे समाज पर जहाँ धर्म-गुरुवो की पदवी आदमियों ने सम्हाल रखी है....और इन्होने अपनी सहूलियत के हिसाब से मजहब को थोडा-मरोड़ा, गलत व्याख्यान परोसे और सिर्फ इस्तेमाल किया .....मैं पूछती हूँ दुनिया के कितने प्रतिशत लोग ध्राम्नुसार आचरण करते हैं....ये सारे मानसिक लकवाग्रस्त लोग है....जों कभी लिंग के परे सोच ही नहीं पाते

मैं पूछती हो आज तक कोई स्त्री धर्म गुरु क्यों नहीं? हाँ, हिदू समाज में पहल हो चुकी है.....जरूरत है जागरूकता अभियान की और नज़रिए में बदलाव की

Another setback for Women due to Hadith
« on: September 24, 2004, 01:38:22 PM »

http://free-minds.org/forum/index.php?PHPSESSID=7da75a2f7b3e10207e89dc79b21bf561&topic=8866.msg30484#msg30484

सुभाष नीरव said...

ये पत्थर क्यूँ रोशनदानों से झांकते हैं ?
चुप की चादर ताने ये सुरमई अँधेरा
किस उडीक में है ......?

बहुत खूब पंक्तियाँ दिल में उतरतीं… मुझे बहुत अच्छा लगा कि आपने पंजाबी शब्द 'उडीक' का अपनी इस कविता में इतना सुन्दर प्रयोग किया। यहाँ 'प्रतीक्षा' या 'इंतज़ार' से अर्थ तो संप्रेषित होते, परन्तु जो महक यह 'उडीक' शब्द दे रहा है, वह शायद 'प्रतीक्षा' या 'इंतज़ार' शब्द न दे पाते… बहुत सुन्दर !

DR. ANWER JAMAL said...

इस्लाम आपको इतना अच्छा लगेगा कि आप भी मुसलमान हो जाएँगी , इंशा अल्लाह .
हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े लिखे को पंजाबी क्या ?
बहन हरकीरत जी ! इस्लाम का इल्म रखने वाले और उस पर अमल करने वाले किसी भी आलिम के घर में या किसी भी आम आदमी के घर में जाकर देख लीजिये कि उनकी औरतें दुनिया में भी जन्नत में रहती हैं . आप मेरे घर में आकर देख लीजिये . आप न आ सकें तो मुझ से फोन नंबर लेकर मेरी बहनों और मेरी बीवी से बात कर लीजिये कि वो मुझ से और इस्लाम के कानून से कितनी संतुष्ट हैं . सभी परदे कीई पाबंद हैं और कान्वेंट एजुकेटिड हैं, बीवी विदेश में तालीम पा चुकी हैं और मेरी बहनें पोस्ट ग्रेजुएट कर चुकी हैं .
अब मैं आपको अन्दर की बात भी बट्टा दूँ , जो कि आम तौर पर कोई आपको न बताएगा .
मेरी बीवी नेक है लेकिन किसी को तबलीग नहीं कर सकती अर्थात निहायत तन्हाई पसंद है, कुछ उनके घरवालों की गलतियाँ भी थीं कि शादी के बाद मेरे घर में झगड़ा शुरू हो गया और मैंने पक्का इरादा कर लिया कि मैं उन्हें हर हाल में तलाक़ देकर रहूँगा . यह गुस्सा इतनी पक्की बुनियादों पर था कि उनके वालिद न कल बोल सकते थे और न आज बोल सकते हैं कि मैं गलत हूँ. तीन बच्चे होने के बाद भी मेरा इरादा यही था कि तलाक़ तो मैं हर हाल में दूंगा लेकिन जब भी कुरान पढ़ा , हदीस पढ़ी . अपने मौलाना से पूछा, हर जगह से यही आवाज़ आई कि यह काम मत करना , गलतियों को माफ़ करो और भुला दो तुम्हारा रब भी यही करता है और ऐसा ही करने के किये कहता है तमाम जायज़ चीज़ों में अल्लाह के नज़दीक सबसे नापसंद चीज़ तलाक़ है .
खुदा कि नापसंद चीज़ को मैं कैसे करूं ?
माँ बाप और भाई बहन सब बीवी की तरफ से खड़े हो गए . सास ससुर तो विदेश लौट गए थे अपनी बेटी इण्डिया में ब्याह कर . उनकी तरफ से मेरे घर वाले ही मेरे फैसले कि मुखालिफ़त करते थे . उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ भी मैं जा ही नहीं सकता था .
मेरी हिम्मत नहीं होती थी तलाक़ देने की और वक़्त गुज़रता रहा और फिर ऐसा हुआ कि वक़्त ने दिल के घाव पर मरहम का काम किया और अब मेरे दिल में अन्दर से भी कोई ख्वाहिश नहीं है कि मैं अपनी बीवी को तलाक़ दूं. और मज़े की बात यह है कि मेरी बीवी मुझ से , मेरे बर्ताव से आज जितना खुश हैं उससे ज्यादा खुश वो तब थीं जब मैं तलाक़ देने का इरादा रखता था क्योंकि पिछले एक साल से इंटरनेट मेरा बहुत वक्त पी जाता है.
'गैरमुस्लिम इस्लाम-दुश्मनों' की किताबों से इस्लाम को जानने की कोशिश मत कीजिये . इस्लाम पर इल्म के साथ अमल करने वालों कि जिंदगियां देखिये आपको इतना अच्छा लगेगा कि आप भी मुसलमान हो जाएँगी , इंशा अल्लाह .जैसे की कमलादास और बहुत सी हिन्दू कवयित्रियाँ मुसलमान हो चुकी हैं .
मैं जो करता हूँ वही कहता हूँ और जो सोचता हूँ वही आपको बताता हूँ .
Please also see
http://hamarivani.com/user_profile.php?userid=15

ashish said...

आपकी नज़्म पढने के बाद बहुत सारे विचार मन में कौतूहल बन के उभरते है .यथार्थ को सुगमता और अप्रतिम भाव प्रवणता से कलम बद्ध आपकी कलम ही कर सकती है . मेरा सलाम ऐसी लेखनी को . आपकी इस नज़्म ने मुझे प्रसाद जी वो पंक्तियाँ याद दिला दी जो शायद आज भी कुछ हद तक खरी उतरती है .

नारी तुम केवल श्रद्धा हो , विश्वास रचित इस नभ थल में
पियूष स्रोत सी बहा करो , जीवन के सुन्दर समतल में

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

"हकीकत "

कौशलेन्द्र said...

धर्म वह लगाम है जो सही रास्ते पर चलने की वकालत करता है .....पर हकीकत यह है कि दुनिया भर में भटकाव बदस्तूर जारी है.
मैं सभी लोगों से गुजारिश करना चाहूंगा कि किसी के व्यक्तिगत ब्लॉग को धर्म-प्रचार का माध्यम न बनाया जाय ...और न ही किसी धर्म विशेष को तुलनात्मक दृष्टि से हेय प्रदर्शित किया जाय...किसी को किसी की भावनाएं आहत करने का कोई हक नहीं .....जब हम कहते हैं कि यह खूबी तो सिर्फ इसी धर्म में है दुनिया के अन्य धर्मों में नहीं ........तो जाहिर है कि हम दूसरे धर्म पर नकारात्मक टिप्पणी करते हैं .......लोकतंत्र का लिहाज़ किया जाना चाहिए ........जो मुद्दे की बात है उससे भटकने की आवश्यकता नहीं है.
हीर जी ने इस्लाम शब्द हटा दिया है अब बात यहीं ख़त्म हो जानी चाहिए. इस शब्द के स्तेमाल से यदि किसी को चोट लगी हो तो मैं हीर जी की ओर से क्षमाप्रार्थी हूँ .........बस अब और इस विषय पर चर्चा न की जाय. मुख्य मुद्दा है "स्त्री-शोषण" ...कहीं कम कहीं ज्यादा ......है दुनिया भर में....तो पुरुषों का क्या उत्तर दायित्व बनता है ...विचारणीय यह है ....हमें इसी विषय पर चिंतन मनन करना है.

बलबीर सिंह (आमिर) said...

सब नामसझी का खेल है, जो समझ गया उसका बेडा पार है, युरोप और अमेरिका में अधिक स्‍वतन्त्र और शिक्षित महिलायें अधिक किस धर्म की तरफ जा रही हैं विचारणीय है,फ्रांस जैसा देश जहां की सरकार परदे के विरोधी है वहां का हाल है Converts to islam 70000 every year in France

Dr Varsha Singh said...

रात गला काटती है
कई ज़ज्बात मरते हैं
इक ज़हरीली सी कड़वाहट
उतर जाती है हलक में .....

गहरी वेदना है आपकी कविता में.

amit-nivedita said...

well timed expressions....this is the need of the hour .

ROHIT said...

हरकीरत हीर जी ने बिल्कुल सही लिखा है
उसमे किसी के कहने से कुछ मिटाने की जरुरत नही है
इस्लाम मे औरतो की हालत कितनी दयनीय है वो किसी से छुपी नही है
मै ऐसी कई मुस्लिम लड़कियो को जानता हूँ जो घर से कालेज जाने के लिये तो बुर्का पहन के निकलती है
लेकिन थोड़ी दूर जाने के बाद बुर्का हटा देती है और सिँपल ड्रेस मे जाती है
आखिर इसका मतलब क्या है
मतलब ये है कि वो बुर्का नही पहनना चाहती लेकिन जबरदस्ती पहनना पड़ता है.
इस्लाम मे महिलायो की स्थिति क्या है उनका दर्द आप फिरदौस खान जी के ब्लाग मे पुराने लेख पढ़कर लगा सकते है
वो स्वयं मुसलमान महिला है और उनकी सोच और हरकीरत हीर जी की सोच बिल्कुल एक है

और मै यहाँ पर आये हुये पुरुष मुस्लिम ब्लागर्स से भी एक बात कहूंगा कि इस विषय मे इतनी बहस करने की कोई जरुरत नही थी
मुस्लिम औरतो की दयनीय स्थिति के बारे मे दुनिया जानती है.
आप किस किस की सोच बदलेँगे. किस किस को सफाई देते फिरेँगे.
लोगो की सोच तभी बदलेगी जब वाकई मे मुस्लिम महिलायो की स्थिति अच्छी होगी. केवल मुहजबानी नही.

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

हीर जी

दो दिन अति व्यस्तता के रहे…
लौट कर आने में अप्रत्याशित विलंब के लिए क्षमा चाहूंगा ।

समकालीन भारतीय साहित्य , दृष्टिकोण , अविराम , अभिनव-प्रयास , पुष्पगंधा , कथासागर
आदि शीर्षस्थ साहित्यिक पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित होने के लिए हार्दिक बधाई !


आपने कविता की भूमिका में लिखा कि -
इस नज्म के लिए मैं राजेन्द्र जी से माफ़ी चाहूंगी क्योंकि उन्हें इस तरह की नज्में जायज़ नहीं लगतीं … )

… :) मोहतरमा , मैं औरत के लिए मर्यादा में रहने की बात अवश्य करता हूं , ( पुरुष के लिए भी )
… लेकिन इसके लिए औरत के स्वविवेक का ही प्रबल पक्षधर हूं ।
अपनी बात मनवाने के लिए कायरतापूर्ण तरीके से ज़ोर ज़बरदस्ती , धार्मिक पाखंड ,
भावनात्मक ब्लेकमेलिंग , और अपनी खोखली मानसिकता की आड़ में प्रताड़ना या बल प्रयोग द्वारा ख़ौफ़ दिखा कर
भयभीत और आतंकित करने का ज़रा-सा प्रयास करने वाला दक़्यानूस और दोगला तथाकथित स्वनामधन्य मर्द
मेरी नज़रों में घृणा , बहिष्कार और दंड का पात्र है ।

तो ये तो रहे नारी समानता के प्रति सम्मान के मेरे भाव , जिन्हें मैं जीता हूं …
मेरी श्रीमतीजी से बात करके देखें न !
कहीं मैं दोहरा चरित्र तो नहीं जी रहा ? … :)

दराल साहब की लघुकथा पर मेरी टिप्पणी से शायद कुछ भ्रांति उत्पन्न हुई होगी …

ख़ैर …


(… लगातार )

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

अब आते हैं आपकी आज की बेहतरीन कविता पर …

आपकी कविता के शिल्प और कथ्य पर कुछ कहना सूर्य को दीपक दिखाने जैसा ही होता है हमेशा ।
आज की कविता के लिए आप विशेष बधाई की पात्र हैं

कविता के परिप्रेक्ष्य में आए विचार ध्यान आकर्षित करते हैं , यथा -

# हम इनसे बेहतर हालत में हैं इसलिए इस तरह से यह सब देख सोच पाते हैं,
इस मजहब में निचले तबके की औरतें तो ऐसा सोच तक नहीं पाती...
इसे अपना नसीब,धर्म और परम्परा मानकर ओढ़ चुपचाप इसके नीचे दबे रह प्राणोत्सर्ग को तैयार रहती हैं...

# फक्र करती हूं अपने धर्म पर जहां औरत का दर्जा मर्द से कम नही आंका जाता ।

# लानत है ऐसे समाज पर जहां धर्म-गुरुवो की पदवी आदमियों ने सम्हाल रखी है....
और इन्होने अपनी सहूलियत के हिसाब से मजहब को तोडा-मरोड़ा, गलत व्याख्यान परोसे
और सिर्फ इस्तेमाल किया ....ये सारे मानसिक लकवाग्रस्त लोग है....

# यह ब्लॉग मेरे लिए ख़ुदा की इबादत से कम नहीं ।

# खुदा का शुक्रिया, औरत होने की इतनी त्रासदी हमारे हिस्से न आई ।

# पूरी नज़्म जैसे रोम रोम तक रच बस गयी ...

# जितनी दिलेरी से आप औरतों के पक्ष का प्रतिनिधित्व करती हैं , काबिले-ता'रीफ़ है ।

# यहां पंडा,पूजा,मंदिर आदि शब्द रहे होते तो शायद इतनी हील-हुज्ज़त नहीं होती ।
खैर कुछ शब्दों ने औरत कि व्यथा को दबा डाला जैसा कि परम्परा से होता आया है।

# यह रचना एक आहुति है ।

# अरे इस १०१ कुंडीय यज्ञ में आहुति का नाम बदल गया!!! घोर आश्चर्य!!!!!!!


…लेकिन कहूंगा कि शीर्षक बदलने से तथ्य नहीं बदल जाते हक़ीक़त नहीं बदल जाती ।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने की कोशिश फ़ासिज़्म है , जिसकी हम घोर निंदा करते हैं !


(… लगातार )

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...



कामों में उलझने के करण भाई शाहनवाज़ जी को आभार कहने में विलंब हो गया …

मैं आदरणीय कौशलेन्द्रजी से सहमत हूं , आदरणीया रंजनाजी का सम्मान करता हुं
इसलिए हीर जी की कविता , पोस्ट अथवा ब्लॉग से इतर किसी बात को
यहां और अधिक जारी रखने के पक्ष में नहीं …
हीर जी चाहें तो इस कमेंट को भी मिटा सकती हैं …


# शाहनवाज़ जी , किसी इस्लाम विरोधी साईट का मुझे इल्म भी नहीं है ,
होता तो भी मैं जाता नहीं । … जैसा कि कुछ हिंदू धर्म के प्रति अनर्गल प्रलाप करने वाले ब्लॉग - साइट पर संयोगवश कभी पहुंचा था ,
और पहचानने के बाद उधर झांकने में भी अपना बहुमूल्य समय नष्ट नहीं किया करता ।

यह कहीं से कॉपी करके नहीं लाया गया , मेरे अनेक मुस्लिम मित्रों से भेंट में प्राप्त साहित्य में से देख कर लिखा गया है ।

आपने लिखा कि -
आपने आयत का नंबर यहां तक की नाम भी गलत लिखा है... यह सूरए बक़रह – अठ्ठाईसवाँ रूकू है.

आभारी हूं , सही जानकारी के लिए … लेकिन मैंने उसमें छपे हुए को ही हूबहू लिखा । संभवतः यह उन्हीं की कंपोजिंग त्रुटि हो ।

बहरहाल … आपके ब्लॉग पर आ'कर भी कोई हल निकलना नहीं है …

हमारे अनेक मुस्लिम मित्र और आत्मीय स्नेहीजन बड़ी ईमानदारी से हमें बताते रहते हैं कि
कुरआन और हदीस में वर्णित अनेक बातें ऐसी भी हैं जिनका जवाब देना , स्पष्टीकरण करना तो दूर ,
उन पर बात करना भी नागवार और बर्दाश्त के बाहर होता है ।

… यहां भी , उन मित्रों की ही बात की पुष्टि हुई है ।

जिसकी चर्चा सबके सामने नहीं करना ही बेहतर होता हो
वह "बहुजन हिताय बहुजन सुखाय " जैसी पावन पवित्र अवधारणा पर आधारित बात हो ही नहीं सकती , यह तय है ।

छुप कर षड़यंत्र रचे जा सकते हैं , अनैतिक कार्य किये जा सकते हैं ।
कहा गया है -

सांचा बिच मैदान ह्वै निधड़क अर निष्पाप !
जाके मन है पाप , वो कूणा जोवै आप !!


"सर्वे भवंतु सुखिना" का उद्देश्य और लक्ष्य हमने तो जहां देखा , वहां लुकाव-छुपाव कभी पाया नहीं ।
आप सही हो सकते हैं , मैं और मुझ जैसे अन्य सारे ही ग़लत हो सकते हैं … यह बहस अनावश्यक है ।

आपसे मेरे बहुत स्नेह भरे संबंध हैं … अगले प्रश्न या इस प्रश्न पर कभी रूबरू बैठ कर बात हो तो हो …
यहां आप जितना कह पाए , न कह पाए …
उसके लिए हृदय से आभार व्यक्त करते हुए विदा लेता हूं ।

मज़हब तो देता नहीं , नफ़रत का पैग़ाम !
शैतां आदम - भेष में करता है यह काम !!


सद्भावना सहित
राजेन्द्र स्वर्णकार

प्रतुल वशिष्ठ said...

.

मज़हब तो देता नहीं , नफ़रत का पैग़ाम !
शैतां आदम - भेष में करता है यह काम !!

@ सभी टिप्पणियों की बेहतरीन समीक्षा करते हुए राजेन्द्र जी ने अपने हृदय की पीड़ा को स्वर दे दिया, आखें नम हो गयीं.
हरकीरत जी की नज़्म ने स्त्री की दुर्दशा को बयान करते हुए मुझे अवाक कर दिया था. राजेन्द्र जी की इस दर्दीली समीक्षा ने मुझे निरुत्तर कर दिया.

.

प्रतुल वशिष्ठ said...

.

पत्नी कहती है कि स्त्री-अधिकार के मामले में सिक्ख धर्म सबसे मेच्योर है.
सिक्ख धर्म में स्त्री बराबरी का हक़ पाने के कारण ही आज़ अन्य कौमों से अधिक उन्नत है शिक्षा और अर्थ दोनों की दृष्टि से.

मैंने कहा कि एक समय में सिक्ख धर्म हिन्दू धर्म का ही सुधरा हुआ रूप बनकर उभरा था.

.

mahendra verma said...

अय खुदा
बता मैं कटघरे में क्यों हूँ ?
मैं औरत क्यों हूँ ?
मुझे औरत होने से गुरेज है !!

अमृता प्रीतम ने पाकिस्तानी शायरा सारा शगुफ्ता पर एक किताब लिखी है- एक थी सारा।
सारा ने भी वह सब अनुभव किया जो आपकी इस नज़्म में है।
काबिले-तारीफ़ नज़्म।

अहसास की परतें - समीक्षा said...

हरकीरत जी आप जैसी कुछ महिलाएं इस्लाम मे भी हैं जो इन कठमुल्लों से अपने हक के लिए लड रही हैं, इसलिए इनका निशाना अब पढीलिखी महिलाऍ, तरक्की की राह पर बढ चुकी महिलाएं हैं। अभी सलीम खन ने HBFI पर एक पोस्ट डाली, उसका लब्बोलुआब कुल मिला कर यह था कि अगर महिला तरक्की करती है तो वो अपनी इज्जत से खिलवाड करके ही ऐसा करती है, इस प्रकार की छिछोरी पोस्ट पर जब मैने अपना विरोध दर्ज किया तो जमाल गोटे ने उसे delete कर दिया। और यहां जो मुस्लिम इस्लाम मे स्त्रियों की समानता की बात करते नही अघा रहे और बुर्का को स्वयं की इच्छा का प्रश्न बता रहे हैं उनमे से अधिकतर फिरदौस बहन के ब्लॉग पर जा कर उन्हे गालियों से नवाज़ कर स्वयं को बडा वीर समझ रहे थे।

डॉ. हरदीप संधु said...

भावपूर्ण रचना...सच्चाई बयान करती हुई !
बहुत दिनों के बाद आपको पढ़ा है !

Dinesh pareek said...

बहुत ही सुन्दर और रोचक लगी | आपकी हर पोस्ट
आप मेरे ब्लॉग पे भी आये |
मैं अपने ब्लॉग का लिंक दे रहा हु
http://vangaydinesh.blogspot.com/

Akshita (Pakhi) said...

दृष्टिकोण में मैंने भी आपकी फोटो और कविता देखी थी. मम्मा को बताया भी था कि ये आंटी जी ब्लॉग पर भी दिखती हैं.
_______________
पाखी बनी परी...आसमां की सैर करने चलेंगें क्या !!

Sharif Khan said...

मैं हमेशा कोशिश करता हूँ कि कभी ऐसी बात न कहूं जिस से किसी का दिल दुखे. आज हरकीरत "हीर'' जी कि कविता में मुस्लिम महिलाओं के बारे में कवियित्री के इस्लाम के मुताल्लिक अल्पज्ञान बल्कि अज्ञान देखकर दुःख हुआ. अब मेरी विनती है कि मुस्लिम महिलाओं कि जानकारी देने से पहले कन्यादान पर कुछ लिखें क्योंकि जहांतक में समझता हूँ दान किसी बेजान वस्तु या जानवर का दिया जाता है इंसान का नहीं क्योंकि इन्सान की भावनाएं व अधिकार होते हैं और दान में दी गयी चीज़ कि भावनाओं का गला घोंटने के साथ उसके अधिकार भी समाप्त हो जाते हैं. लिहाज़ा जहाँ कन्या को दान की जाने वाली वास्तु या ....... समझा जाता हो वहां महिलाओं कि स्थिति पर कविता की आवश्यकता से इंकार नहीं किया जा सकता.

दिगम्बर नासवा said...

गहरी वेदना ... मार्मिक ... नारी मन को आपसे बेहतर शायद ही कोई जनता हो ....
शब्दों में दर्द उड़ेल कर रख देती हैं आप ...

Avinash Chandra said...

ये किसकी अर्थी है ...
पत्तो से झूलती हुई .....
ये कौन लिए जा रहा है
मेरे मन की लाशें ......

धंसते हैं ये शब्द, आप का हुनर नायाब है।

Sharif Khan said...

बहन हरकीरत 'हीर' जी स्त्रियों के प्रति संवेदना एक कवि हृदय में भी अगर न होगी तो कहाँ होगी इसलिए आप के दिल में स्त्रियों के प्रति दर्द होना स्वाभाविक है. अगर आप इस्लाम में स्त्रियों को दिए गए अधिकारों को जान लें तो हो सकता है की आप अपने समाज में भी उनको लागू करने की बात पर गौर करेंगी. मिसाल के तौर पर निकाह बंधन न होकर एग्रीमेंट है जब तक दोनों संतुष्ट रहें ठीक वर्ना दोनों में से कोई एक पक्ष तलाक लेने या देने का हकदार है. दूसरी बात यह है कि इस्लाम ने स्त्रियों को पिता की छोड़ी हुई संपत्ति में से भी हिस्सा दिया है और सुसराल में भी हिस्सेदार बनाया है. तीसरी बात यह है कि पत्नी कि सुरक्षा और उसकी ज़रूरतों को पूरा करने कि ज़िम्मेदारी पूर्ण रूप से पति के ऊपर डाल दी है और बदले में पत्नी को घर के अंदर रह कर घर सँभालने कि ज़िम्मेदारी सौंपी है. संतान के लिए माँ का दर्जा पिता से भी तीन गुना अधिक है. इसीलिये इस्लाम में वृद्धाश्रम का प्राविधान नहीं है. अब बताइए कौन सी बात ऐसी है जहाँ स्त्रियों पर ज़ुल्म की बू आती हो.

कौशलेन्द्र said...

ज़नाब शरीफ खान जी ! दान में सबसे अच्छी और सबसे प्रिय चीज़ ही दी जाती है....जहां तक कन्या दान का प्रश्न है यह एक पवित्रतम एवं व्यक्ति का सर्वोत्कृष्ट दान है ......यह अनुभव करने की बात है भारतीय परिवेश में रहकर भी यदि आप दान की उत्कृष्टता और पवित्रता नहीं समझ सके तो कोई समझा भी नहीं सकेगा. कर्ण का दान अपने सर्वस्व का दान हुआ करता था.....हमारे यहाँ विद्या का दान दिया जाता है...जो विद्यार्थी के जीवन को संवारता है. दान को हेय अर्थों में लेने की आवश्यकता नहीं है.... मुझे ऐसा लगता है कि बहुत सारी परम्पराएं सन्दर्भ विशेष में अपने व्यापक अर्थ रखती हैं......उस सन्दर्भ को छोड़ दिया जाय तो परम्परा को समझना संभव नहीं है.
वृद्धाश्रम की परंपरा पश्चिमी देशों से आयातित की गयी है ...भारतीय परम्परा में तो बुजुर्गों का sammaan kiyaa जाता है

कौशलेन्द्र said...

हीर जी ने एक समस्या को रखा ......लोगों ने उसे धर्म की प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया .....विवाद शुरू हुआ तो उन्होंने पटाक्षेप की दृष्टि से एक शब्द विलोपित कर दिया ...सुकून मिला कि स्त्री-शोषण पर प्रारम्भ हुआ एक विमर्श फिलहाल ठन्डे बस्ते में गया ....समस्या यथावत रहे यही तो चाहा गया था ........शोषण के खिलाफ जब भी आवाज़ उठे तो किसी भी तरह उसे दबा दिया जाय ........शुतुरमुर्ग बन जाया जाय ........समस्या को हमने नहीं देखा ....तो सिद्ध हो गया कि समस्या है ही नहीं.
अत्यंत शांतिपूर्ण समाधान निकल आया उस समस्या को जो सिर्फ हीर जी देख सकीं .....बाकियों के यहाँ वह समस्या है ही नहीं.......आनंद ही आनंद है.
मैं सोचता हूँ कि मेरी उन महिला मरीजों और उनके बच्चों की स्वास्थ्य, कुपोषण , अशिक्षा, निर्धनता, पाबंदियां .......कलह .........भूख .....आदि-आदि समस्याएं भी निराकृत हो गयी होंगी ........सिर्फ एक शब्द के विलोपित कर दिए जाने से ....वाह ! कमाल है ! ! ! समस्याओं के समाधान का क्या नायाब तरीका है !
मगर हीर जी ! मैं उन कुपोषणग्रस्त ....गंदे कपड़ों में लिपटी गर्भिणी बहुओं के आंसुओं को कैसे भूल जाऊं जो पहले से ही तीन-तीन या चार-चार बीमार नन्हें बच्चों की माँ हैं ....फिर से माँ नहीं बनना चाहतीं ....पर उन्हें अपनी मर्जी के खिलाफ माँ बनना पड़ता है ...मैं अपने पास से या सैम्पल की कितनी और कितने लोगों को दवाइयां दे सकूंगा ? हीर जी ! आज मन बहुत भारी हो गया है ....मुझे उन महिलाओं के और उनके बच्चों के चेहरे याद आ रहे हैं ........मैंने उस्मान भाई से कहा था ....क्या हम इन्हें कोई कुटीर उद्योग नहीं करवा सकते .....उनका जवाब था -"आप नाहक परेशान हो रहे हैं ....कुछ लोग हैं जो इसकी इजाज़त नहीं देते ....इन्हें यूं ही पिसते ...घुट-घुट कर मरते देखने में ही शायद उन्हें संतुष्टि मिलती हो.......इनका कुछ भी नहीं हो सकता "

प्रतुल वशिष्ठ said...

कौशलेन्द्र जी ने भारतीय संस्कृति का पक्ष मजबूती से रखा और वह भी मन की पीड़ा के साथ. दान और खैरात में अंतर समझा दिया गया होगा.
'दान' शब्द की पवित्रता को वही जान सकता है जो उसका सम्मान करता हो.

प्रतुल वशिष्ठ said...

# दान और खैरात में अंतर समझा दिया गया होगा.
@ दान और खैरात में अंतर समझ आ गया होगा.

संजय कुमार चौरसिया said...

सर्वप्रथम महिला - दिवस पर आपको शत - शत नमन

Kunwar Kusumesh said...

अधिकार के सारे शब्द तुम्हारे हाथों में .....
और मेरे हाथों में सारे कर्तव्य ?

उक्त दो पंक्तियों में पूरी कविता है,हीर जी.
बेहतरीन नज़्म.

aarkay said...

अय खुदा ...!
बता मैं कटघरे में क्यों हूँ ?
मैं औरत क्यों हूँ ...?
मुझे औरत होने से गुरेज है ...
मुझे औरत होने से गुरेज है ......!!

भावपूर्ण प्रस्तुति !

batkahi said...

najayaj hak,fatve aur lagaam ko jhatak kar dhata batati hui aapki ye najm...ek aurat ki kaid udaan ko bayaan karti hai mitr...kitni bhi pratikul sthitiyan hon udaan bharne ka swapn marne nahi dena...nayi subah ka aagaj jarur hoga...aapke kartavyon men ye bhi shamil hai..stri divas ke avsar par aapke jajbe ko salaam..

yadvendra

Kunwar Kusumesh said...

महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

निर्मला कपिला said...

हरकीरत जी देर से आने के लिये माफी चाहती हूँ रात सोते हुये ख्याल आया कि आपके ब्लाग पर जाना ही भूल गयी{उम्र का तकाज़ा है} सुबह आते ही पहले भागी आयी। अब समझ नही पा रही किस किस पँक्ति की तारीफ करूँ? कहाँ से लाती हैं ऐसी एहसास ऐसे जज्बात? दिल को छू गयी आपकी पोस्ट
अधिकार के सारे शब्द तुम्हारे हाथों में .....
और मेरे हाथों में सारे कर्तव्य ?इसके लिये एक शेर है आपकी नज़र--
हर फर्ज़ है मेरे लिये सब दर्द हैं मेरे लिये
तकदीर मे मेरे लिखी भस उम्र भर आज़िजी
शुभकामनायें।

bahuroopiya said...

हीर जी! आपकी नज़्म पढ़ी. उसपर प्रतिक्रियाएं भी देखीं. नज़्म में व्यक्त आक्रोश उचित है लेकिन जाने-अनजाने एक खास मज़हब निशाने पर आ गया है. एक अनावश्यक विवाद खड़ा हो गया है. मेरी सलाह मानें तो नयी नज़्म पोस्ट कर अब इस विवाद को विराम दे दें.

Sharif Khan said...

बहन हरकीरत 'हीर' जी आपके लिए बहुत सी दुआएं ! मेरे ब्लॉग 'हक्नमा' पर आपकी यह टिप्पणी ..
''कन्यादान की बात उठाई ....आभार ....
मैं इस विषय पर पहले भी लिख चुकी हूँ ....सच कहूँ तो इस शब्द ने मुझे बहुत आहत किया है .... यकीं मानिये मेरा किसी धर्म को निचा दिखने जैसी कोई मंशा नहीं है ....स्त्री के प्रति अवहेलना ही मुझे आहत कर जाती है ......''
आपके भावुक हृदय का आइना है.

Shah Nawaz said...
This comment has been removed by the author.
Shah Nawaz said...
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Shah Nawaz said...

आदरणीय हरकीरत 'हीर' जी,

इसमें कोई दो-राय नहीं है कि मुस्लिम समाज में मर्दों ने अपना अभिपत्य जमाने के इरादे से औरतों को दबा कर रखा है और उनके साथ ज्यादती की हैं... और इसकी वजह शिक्षा का ना होना है. क्योंकि औरतों को पता ही नहीं होता है कि उनके हक क्या हैं... लेकिन शिक्षा के प्रसार के कारण आज स्थिति बदल रही है...

अगर आप मुस्लिम समाज पर यह कविता लिखती तो मैं पूर्णत: आपके साथ होता.. लेकिन मुस्लिम समाज की जगह इस्लाम लिखने से और समाज की जगह धर्म पर आरोप लगने से ही यह वाद-विवाद की स्थिति उत्पन्न हुई, जिसके लिए मैं क्षमा का प्रार्थी हूँ...


एक बार फिर से माफ़ी मांगूंगा कि आपकी पोस्ट पर राजेंद्र जी के सवाल का जवाब दे रहा हूँ...

राजेन्द्र स्वर्णकार जी,

ऐसा बिलकुल भी नहीं है कि इस्लाम में किसी बात पर बात नहीं की जा सकती... या बात करना नागवार मना जाता है... बल्कि इस्लाम में तो बात को समझने का हुक्म है. लेकिन कुछ बातें ऐसी भी होती हैं जिनमें मर्यादा का ख़याल रखा जाता है, मतलब हर बात हर एक के सामने नहीं की जा सकती है... जैसे पति-पत्नी की बीच आन्तरिक संबंधो की बातें बहन अथवा माँ के सामने करना अनुचित होता है, हालाँकि बात एकदम जायज़ होती है....

खैर! मैंने जो बात यहाँ मर्यादा का लिहाज़ रखते हुए संक्षिप्त शब्दों में कही थी वह पूरी आपको ईमेल कर दी है... अगर आपको लगता है कि वह इस मंच पर (जिसका विषय अलग है और यह मंच भी ना तो मेरा है और ना आपका) कही जा सकती हैं तो आप टिपण्णी के द्वारा लिख सकते हैं...

राजेश उत्‍साही said...

बात जब भी निकलती है तो दूर तलक जाती है।

Ramesh Sharma said...

बेहतरीन अभिव्‍यक्ति
भावपूर्ण.

विनोद कुमार पांडेय said...

हरकिरत जी, निश्चित रूप से आपकी यह रचना सम्मान की हक़दार है..हमेशा की तरह एक प्रभावशाली कविता..हर पंक्ति भावविभोर करने वाली....इस प्रभावशाली रचना के लिए हार्दिक बधाई..

बी एस पाबला said...

अफ़सोस!

मैंने ठान रखा है कि धर्म व राजनीति पर अपने विचार कम से कम ब्लॉगों पर नहीं रखूँगा। यहाँ भी वही मसला उभर आया है।

टिप्पणी न करने का खेद है

सुज्ञ said...

सम्वेदन्शील कवियत्री द्व्रारा सम्वेदनशील विषयपर सुदृढ धारदार सशक्त अभिव्यक्ति!!

कवि जो देखता है वही तो लिखता है!! इस दृष्टि से यथार्थ के शिखर को छूती हुई रचना।

नज्म हृदय-तल को विदीर्ण कर सत्य प्रकट करती है, हम अपने निहितार्थ इस यथार्थ को स्वीकार करें अथवा नहीं।

साकारात्मक और नकारात्मक दोनो तरह के कमेंट यह निर्देशित कर रहे हैं कि रचना प्रभावशाली है। बस इमानदारी से हृदय-कपाट खोलने जरूरी है।

गंगा में जल की कमी के लिये गंगोत्री भी उतनी ही उत्तरदायी है।

सुज्ञ said...

@…"बहुजन हिताय बहुजन सुखाय"… राजेंद्र जी से सहमत होते हुए,
गंगा में जल की कमी के लिये गंगोत्री भी उतनी ही उत्तरदायी है।

धर्म और समाज को अलग अलग कर विश्लेषित करना भी पूर्ण न्यायोचित नहीं है। धर्म, समाज को सुचारू बनाने के लिये ही होता है, समाज, धर्म से नियम व अनुशासन पाता है। इसलिये धर्म को, विरोधाभास और संशय रहित होना ही चाहिए। यदि किसी ईशवाणी से अन्यार्थ विपरितार्थ निकलते है तो वह कैसी सर्वज्ञ सर्वदर्शी की वाणी।

उचित मार्गदर्शन का श्रेय यदि धर्म को है तो अनुचित छट्कबारीयों (दुरपयोग) का ठीकरा भी धर्म के माथे होना चाहिए। उसमें वह कमी-बेसी ही क्यों है कि उसके मनगढंत और भ्रांत अर्थ किये जा सके। आखिर वह सर्वज्ञ- सर्वदर्शी ईश्वर की वाणी है, किसी शिक्षक की किताब तो नहीं। ईश्वर तो स्पष्ठ जानते थे यदि मैने संदिग्ध भाषा में उपदेश दिया तो लोग गलत अनुपालन करेंगे। धर्म ही समाज को सही दिशा देने का उत्तरदायित्व निभाते है। समाज की वस्तुस्थिति देखकर धर्म के उपदेशों व आदेशों का आंकलन किया जा सकता है। क्योंकि समाजरूपी गंगा का मूल स्रोत धर्म-गंगोत्री ही है।
अगर गंगोत्री में नहीं तो गंगा में कहाँ से आयेगा।

हरकीरत ' हीर' said...

शाहनवाज़ जी ,

आप लिखते हैं -
"इसमें कोई दो-राय नहीं है कि
मुस्लिम समाज में मर्दों ने अपना अभिपत्य जमाने के इरादे से औरतों को दबा कर रखा है
और उनके साथ ज्यादती की हैं... "

सही शब्द अभिपत्य नहीं , आधिपत्य है , जिसका अर्थ
supremacy = स्वयंभू , सर्वेसर्वा ,
lordship = प्रभुत्व , अनियंत्रित शासन
governorship = अधिकारपूर्वक शासन करना/करने की तलब
से संबद्ध है ।

आपने स्वीकार तो किया...

... और मेरा आशय इससे अलग तो नहीं था ....?
इस्लाम की बात करने वाला वर्ग मुसलमान है या कोई और ?
मुसलमान समाज का मर्द इस्लाम का अनुपालन करने वाला होता है या किसी और दीन धरम का ?!

जाहिर है , जिन रवायतों को मानने का दम आप भर रहे होते हो ,
आपके क्रिया कलाप अगर गलत हैं तो उन पर उंगली उठती ही है ।
वरना आप अपने कामों , चाल चलन से , उसकी इज्जत अफ़जाई के लिए खुद ही तत्पर रहें ।

मैं स्पष्ट कर देती हूं ,
आप से मतलब हर शख्स से है मुसलमान भी और हिन्दू ,सिक्ख या और धर्मों का दम भरने वाले सब ।


सबसे पहली टिपण्णी विरोध स्वरूप आपकी ही आई थी .."नज़्म की आड़ में आपने इस्लाम पर बहुत ही बेबुनियादी इलज़ाम लगाएं हैं..".जबकि आप जानते थे मेरी मंशा स्त्रियों से जुडी हुई है ...

और वो अब भी है ....

यहाँ स्त्री को लेकर कुछ बातें उभर कर सामने आईं हैं ......

१) एक पत्रिका में मैंने अरब देशो में इस्लामिक क़ानून के बारे में पढ़ा जिस पढ़ा बहुत हैरत हुई .. मेरी इस प्रतिक्रिया को आप कोई भी अन्याथा मत लीजियेगा . बस आप सभी से सांझा कर रहा हूँ .... जो क़ानून पढ़ा उस देश को श्याद इरान में है कि अगर कोई स्त्री पर पुरष के साथ सम्बन्ध बनाए और उसका शोहर उसे देख कर आवेश में आ कत्ल करदे तो उसे हत्यारा नहीं माना जाता और अगर यही बात स्त्री अगर अपने शोहर को देख ले तो वो उसे कुछ नहीं कह सकती क्यूँ कि ये उसका हक है .....( सुनील गज्जाणी)


२) तुम्हारी औरतें तुम्हारी खेतियां हैं ,
अतः अपनी खेतियों में जहां से चाहो , जाओ-आओ ...( राजेन्द्र जी )


३) मैं पूछती हो आज तक कोई स्त्री धर्म गुरु क्यों नहीं?.....(प्रिया )


४) मै ऐसी कई मुस्लिम लड़कियो को जानता हूँ जो घर से कालेज जाने के लिये तो बुर्का पहन के निकलती है
लेकिन थोड़ी दूर जाने के बाद बुर्का हटा देती है और सिँपल ड्रेस मे जाती है....(रोहित जी )


५) अभी सलीम खान ने HBFI पर एक पोस्ट डाली, उसका लब्बोलुआब कुल मिला कर यह था कि अगर महिला तरक्की करती है तो वो अपनी इज्जत से खिलवाड करके ही ऐसा करती है... अहसास की परतें - समीक्षा


६) इस्लाम मे महिलायो की स्थिति क्या है उनका दर्द आप फिरदौस खान जी के ब्लाग मे पुराने लेख पढ़कर लगा सकते है
वो स्वयं मुसलमान महिला है और उनकी सोच और हरकीरत हीर जी की सोच बिल्कुल एक है....(रोहित )


७) मैं उन कुपोषणग्रस्त ....गंदे कपड़ों में लिपटी गर्भिणी बहुओं के आंसुओं को कैसे भूल जाऊं जो पहले से ही तीन-तीन या चार-चार बीमार नन्हें बच्चों की माँ हैं ....फिर से माँ नहीं बनना चाहतीं ....पर उन्हें अपनी मर्जी के खिलाफ माँ बनना पड़ता है ...(डॉ कौशलेन्द्र जी )

ये मुस्लिम समाज से जुडी स्त्री जन्य समस्याएं हैं ....

जिस पर गौर करना आवश्यक है .....

jaari.....

हरकीरत ' हीर' said...

आपने महिला दिवस पर बड़ी बड़ी पोस्टें लिख डालीं .... औरतें हमारी माँ है , बेटी है ,बहु है ...उसके अधिकार ये हैं ..फलां हैं ...पर कितनों ने इन समस्याओं पर गौर किया ...या यह विचार किया की इन्हें दूर होना चाहए ....?


ये धर्म ,रीति रिवाज बनाने वाले कौन थे ....?

रब्ब ने तो कोई धर्म बनाकर नहीं भेजा था ....कोई रीति रिवाज नहीं बनाये थे ....

ये हमी में से कोई था ....

अगर कोई गलत परम्पराएं , रीति रिवाज बने हैं तो समय के अनुसार उन्हें बदला जाना चाहिए ...

क्योंकि उस वक़्त के विचारों में और अब के विचारों में बहुत अंतर आ चूका है ....

न कि यह मानते हुए कि ऐसा हमारे धर्म ग्रन्थों में लिखा है इसलिए ऐसा ही होना चाहिए ...

यहाँ सुनील गज्जाणी जी की कही बात और डॉ कौशलेन्द्र जी की उठाई समस्या , रोहित जी कि उठाई बात और फिरदौस जी का ब्लॉग विचार मांगते है .....


माननीय ...वंदना अवस्थी दुबे और जैदी साहिबां .....

महिला होने के नाते आपकी टिप्पणियों ने मुझे सबसे ज्यादा आहत किया ....

अगर इस्लाम में स्त्री के लिए खेती जैसा शब्द इस्तेमाल हुआ है तो घोर निंदनीय है ...भले ही वह रति क्रिया से सम्बन्धित हो ....विवाहित स्त्री के साथ जबरन किया गया सम्भोग भी अपराध की श्रेणी में आता है व बलात्कार कहलाता है ...और यहाँ विवाहित स्त्री को खेती की उपमा देकर जैसे चाहो इस्तेमाल करो जैसा संदेश है ....

जिसे पढ़ते ही मैं अपमान में डूबी जा रही हूँ .....

वंदना अवस्थी दुबे जी ग़ौर फरमालें शाहनवाज़जी खुद मानते हैं कि ....
"इसमें कोई दो-राय नहीं है कि
मुस्लिम समाज में मर्दों ने अपना अभिपत्य जमाने के इरादे से औरतों को दबा कर रखा है
और उनके साथ ज्यादती की हैं..."

अभी -अभी आई टिपण्णी में सुज्ञ जी के विचार इस बहस को विराम देते हैं .....

'' धर्म और समाज को अलग अलग कर विश्लेषित करना भी पूर्ण न्यायोचित नहीं है। धर्म, समाज को सुचारू बनाने के लिये ही होता है, समाज, धर्म से नियम व अनुशासन पाता है। इसलिये धर्म को, विरोधाभास और संशय रहित होना ही चाहिए। यदि किसी ईशवाणी से अन्यार्थ विपरितार्थ निकलते है तो वह कैसी सर्वज्ञ सर्वदर्शी की वाणी...''

तो अब और बहस का सवाल नहीं उठता ...

शुक्रगुजार हूँ ...प्रिया जी की , राजेन्द्र जी की , कौशलेन्द्र जी की , प्रतुल जी की , सुनील गज्जाणी जी की , रवि राजभर जी की , देवेन्द्र गौतम जी की , रंजना जी यादवेन्द्र जी और सुज्ञ जी की जिन्होंने अपने विचारों और अनुभवों को यहाँ खुलकर सामने रखा ...और एक सार्थक बहस हुई ....!!

हरीश सिंह said...

आदरणीय महोदया , सादर प्रणाम

आज आपके ब्लॉग पर आकर हमें अच्छा लगा.

आपके बारे में हमें "भारतीय ब्लॉग लेखक मंच" पर शिखा कौशिक व शालिनी कौशिक जी द्वारा लिखे गए पोस्ट के माध्यम से जानकारी मिली, जिसका लिंक है......http://www.upkhabar.in/2011/03/vandana-devi-nutan-shikha-mamta-preeti.html

इस ब्लॉग की परिकल्पना हमने एक भारतीय ब्लॉग परिवार के रूप में की है. हम चाहते है की इस परिवार से प्रत्येक वह भारतीय जुड़े जिसे अपने देश के प्रति प्रेम, समाज को एक नजरिये से देखने की चाहत, हिन्दू-मुस्लिम न होकर पहले वह भारतीय हो, जिसे खुद को हिन्दुस्तानी कहने पर गर्व हो, जो इंसानियत धर्म को मानता हो. और जो अन्याय, जुल्म की खिलाफत करना जानता हो, जो विवादित बातों से परे हो, जो दूसरी की भावनाओ का सम्मान करना जानता हो.

और इस परिवार में दोस्त, भाई,बहन, माँ, बेटी जैसे मर्यादित रिश्तो का मान रख सके.

धार्मिक विवादों से परे एक ऐसा परिवार जिसमे आत्मिक लगाव हो..........

मैं इस बृहद परिवार का एक छोटा सा सदस्य आपको निमंत्रण देने आया हूँ. आपसे अनुरोध है कि इस परिवार को अपना आशीर्वाद व सहयोग देने के लिए follower व लेखक बन कर हमारा मान बढ़ाएं...साथ ही मार्गदर्शन करें.


आपकी प्रतीक्षा में...........

हरीश सिंह


संस्थापक/संयोजक -- "भारतीय ब्लॉग लेखक मंच" www.upkhabar.in/

...

Shah Nawaz said...

सुज्ञ भाई,

धर्म में विरोधाभास होते नहीं है बल्कि किए जाते हैं... किसी भी बात को अपूर्ण: या बिना सन्दर्भ के पढने या जानबूझकर पढवाने से ऐसा होता है... ऐसा करने वाले इंसान ही होते हैं, और आमतौर पर इंसान गलतियाँ ना करें यह तो हो ही नहीं सकता है... कुछ लोग जानबूझ कर ऐसा करते हैं और कुछ लोग अनजाने में ही ऐसे लोगों का शिकार बन जाते हैं...

आपका कहना है कि धर्म को विरोधाभास और संशय रहित होना चाहिए... आपकी बात बिलकुल सही है... धर्म ऐसा ही होता है.... लेकिन लोग अपने अज्ञान के कारण अथवा जानबूझ कर लोगो को गुमराह करते हैं... जैसा कि मैंने ऊपर भी उदहारण दिया था... कि अगर कहीं लिखा है कि कुछ समय ऐसे होते हैं जिसमें औरतों अथवा मर्दों का नमाज़ पढना मना है.. अब अगर कोई केवल यह पढ़े कि "औरतों का नमाज़ पढना मना है" तो इसमें कोई क्या कर सकता है? केवल इतना ही कि अगर मालूम किया जाए तो जिसे मालूम है वह सही बात बता दे.

ऐसा हर धार्मिक ग्रन्थ के साथ होता है... कुरआन ही नहीं बल्कि बाइबिल तथा वेदों जैसे सभी धर्म ग्रंथो को लेकर कुछ लोग दूसरों को गुमराह करते हैं... लेकिन गुमराह होते वहीँ हैं, जो समझने का प्रयास नहीं करते. जो कोशिश करते हैं, वह आसानी से बुरे लोगों की चाल को समझ जाते हैं...

Shah Nawaz said...

हरकीरत ' हीर' जी,

मेरे विचार से यह बहस गलत तरफ जा रही है और विषय से हटकर है...

कौशलेन्द्र said...

यूं लोग मुझे नास्तिक कहते हैं पर मुझे लगता है कि धर्म पर एक सार्थक बहस होनी चाहिए. आदरणीया हीर जी ने अभी जो अपना ज़वाब पेश किया है वह पर्याप्त है इस ब्लॉग के सन्दर्भ में विराम के लिए. यूं भी यहाँ वितंडा अधिक हो रहा था....फिर भी कुछ सार्थक बातें निकलकर आयी हैं. हरीश जी ने खारे पानी में डुबकी लगाकर मोती निकालने का अवसर हाथ से नहीं जाने दिया...कदाचित यही एक सकारात्मक बात हुयी है .....यह स्वीकार्यता भी है हीर जी के विचारों की......खैर मैं, सुज्ञ जी द्वारा उठाये गए अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदुओं पर अपने ब्लॉग में विमर्श करूंगा ...यहाँ नहीं.

Shah Nawaz said...

हरकीरत ' हीर' जी,

आपने कहा कि "आपने स्वीकार तो किया..." तो मैं तो यह कभी अस्वीकार करता भी नहीं हूँ... सच्चाई से मुंह चुराना ऐसा ही है जैसे 'बिल्ली के सामने आँखें बंद करके यह सोचना कि वह चली जाएगी". और यह बुराइयाँ मुस्लिम ही नहीं हर समाज में, लेकिन मैं यह नहीं मानता कि क्योंकि हर समाज में है इसलिए बर्दाश्त करना चाहिए, बल्कि मेरा भी यही मानना है कि जितना हो सके बुराइयों का पुरज़ोर विरोध करना चाहिए...

आधिपत्य को अभिपत्य लिख गया, ध्यान दिलाने के लिए आपका धन्यवाद, टाइपिंग एरर के कारण ही मैंने पहली दो टिपण्णी हटाई थी.. इस और ध्यान नहीं गया......कभी-कभी इन्टरनेट धीमा चलने के कारण और गूगल ट्रांसलीट्रेशन के कारण टाइपिंग में गलतियाँ हो जाती हैं...

आपने लिखा

"सबसे पहली टिपण्णी विरोध स्वरूप आपकी ही आई थी .."नज़्म की आड़ में आपने इस्लाम पर बहुत ही बेबुनियादी इलज़ाम लगाएं हैं..".जबकि आप जानते थे मेरी मंशा स्त्रियों से जुडी हुई है ..."

जैसा कि मैंने पहले ही कहा कि अगर आप मुस्लिम समाज में व्याप्त बुराइयों की बात करती तो मैं आपके साथ खड़ा हुआ होता... लेकिन आपकी रचना समाज को नहीं धर्म को लेकर थी.. और यहाँ मेरी राय आपसे अलग है इसलिए मैंने अपना विरोध जताया... मेरे विचार से विरोध जाताना मेरा हक है... फिर मैंने अपने विचार के समर्थन में साक्ष्य भी दिए... आप कहेंगी और भी साक्ष्य उपलब्ध कराने की कोशिश करूँगा.. बशर्ते की बहस कडवाहट को जन्म ना दे... अक्सर ऐसी बहस से कडवाहट जन्म लेती है, और इसी कारण मैं ऐसी बहसों से दूर रहता हूँ..

आपके पॉइंट्स पर कुछ कहने की कोशिश करता हूँ:

१)

आपने अरब देशों के कानूनों के बारे में कहा... तो इसपर यही कहूँगा कि किसी देश के कानून पर मैं कोई टिप्पणी नहीं करूँगा... केवल इतना ही कहूँगा कि ना तो वहां की सरकारे इस्लामिक हैं और ना ही उनके कानून इस्लामिक है... जो सरकारें इस्लाम के खिलाफ बनी हों, वह अपनी हरकतों से धर्म को नुक्सान ही पहुंचाएंगी... इस्लाम के किसी भी कानून में गुनाहगार को खुद सज़ा देने का कोई प्रावधान नहीं है... बल्कि इसके लिए अदालत का प्रावधान होता है... और गुनाहगार चाहे मर्द हो या औरत बराबर है... इस्लाम के अनुसार बलात्कार अथवा अवैध सम्बन्ध बनाने की सज़ा सज़ा-ए-मौत है...

२)

मैं इस मसले पर यहाँ बात नहीं करना चाहता था, क्यों आम तौर पर ब्लॉग पढने वालो में उम्र की सीमा नहीं होती है, और हर उम्र के लोग पढ़ते हैं... लेकिन आप और कुछ अन्य लोग बार-बार यही बात दोहरा रहे हैं तो बता देता हूँ... आपको पूरा अधिकार है, आप यह टिप्पणी हटा सकती हैं...

Shah Nawaz said...

इसमें पहले बात तो खेत शब्द का प्रयोग नहीं बल्कि शब्द 'हरसुल-लकुम' प्रयोग हुआ है जिसका अर्थ "खेती / बुआई / रोपना / tilth" है, उदहारण के लिए किसान खेत में बीज बोता / रोपता है... इस आयत में पहले समझाया गया है कि मासिक धर्म के दिनों में सम्बन्ध बनाना गलत है और फिर कहा गया है कि तुम्हारी पत्नी तुम्हारी खेती हैं जैसे चाहो वैसे आओ... इस आयत से यह समझाया गया है कि पति-पत्नी की बीच कब और कैसे संबंध बनाए जा सकते हैं... अर्थात पत्नी के साथ सम्बन्ध बनाने के लिए आगे अथवा पीछे की और से आया जा सकता है, बशर्ते कि सम्बन्ध बच्चा पैदा होने वाली जगह ही हो... आप को और आसानी से समझाने के लिए नीचे एक हदीस [मुहम्मद (स.) के शब्द] लिख रहा हूँ.. आशा है इन्हें पढ़कर समझ में आ जाएगा...

"This hadith has been reported on the authority of Jabir through another chain of transmitters, but in the hadith transmitted on the authority of Zuhri there is an addition (of these words): 'If he likes he may (have intercourse) being on the back or in front of her, but it should be through one opening (vagina).' (Translation of Sahih Muslim, Book 8, The Book of Marriage (Kitab Al-Nikah), Number 3365)"

Shah Nawaz said...

३)

मुस्लिम समाज में हज़ारों ही नहीं लाखों धर्मगुरु (मुफ्ती) हैं....

४)

बुरखा इस्लाम का अंग नहीं है, बल्कि हिजाब इस्लाम का अंग है... जिसमें पुरे बदन पर ढीले-ढाले कपडे पहनना और मुंह और हाथ को छोड़कर पुरे शरीर को ढंकना शामिल है... शरीर और सर को ढंकना केवल इस्लाम का ही हिस्सा नहीं है, बल्कि सभी समाजों ने इसे अपनाया है... और बदन पर ढीले-ढाले कपडे पहनना भी केवल औरतों के लिए नहीं है बल्कि मर्दों भी इसमें शामिल हैं...

५)

यह सलीम का व्यक्तिगत राय हो सकती है, इस्लामिक राय बिलकुल नहीं है... हज़रत मुहम्मद (स.) की पत्नी माँ खदीजा एक बहुत बड़े व्यसाय की मालिक थी जिसका कारोबार विदेशों में भी होता था...



६)

किसी और के ऊपर बात करना सही नहीं है, जबकि वह खुद यहाँ नहीं है... उनके किसी विचार पर अवश्य बात हो सकती है... लेकिन वह भी यहाँ नहीं लिखा गया है...



७)

इसका जवाब तो मैं पहले ही दे चूका हूँ... अशिक्षा के कारण हज़ारों गलत काम हो रहे हैं, और केवल मुस्लिम ही नहीं बल्कि हिन्दू तथा अन्य समाजों में भी हो रहे हैं... इसमें जागरूकता फैलाए जाने की ज़रूरत है...

इस और काफी लोग कार्य कर रहे... आप मौलाना वहीदुद्दीन खान के आर्टिकल पढ़-सुन सकते हैं...

इसी तरह के कारणों को देखते हुए मेरे पिताजी ने एक वेब साईट शुरू की है जिसका पता www.islamhindi.com है...
मैं खुद भी इस पर सक्रिय होने की कोशिश करता हूँ...

सुज्ञ said...

शाहनवाज़ साहब,
वैसे तो माननीय हरकीरत जी नें बहस को विराम दे दिया है। किन्तु मेरे विचारों की प्रतिक्रिया स्वरूप आपने जो बाते रखी उसका उत्तर भी आवश्यक है।

बात घुम फ़िर कर वहीं आती है। लोग तो अज्ञानतावश और जानबुझ कर स्वार्थवश अर्थ परिवर्तन करेंगे ही। इस बात का धर्म प्रस्तोता ईश्वर को आभास ही होगा। क्योंकि ईश्वर सर्वज्ञ सर्वज्ञानी है उसकी वाणी किसी भी तरह की भाषाई कमजोरी से परे ही होगी। अन्य अर्थ निकल सके ऐसी संदिग्ध भाषा-वाणी सर्वज्ञ की नहीं हो सकती।
@जैसा कि मैंने ऊपर भी उदहारण दिया था... कि अगर कहीं लिखा है कि कुछ समय ऐसे होते हैं जिसमें औरतों अथवा मर्दों का नमाज़ पढना मना है.. अब अगर कोई केवल यह पढ़े कि "औरतों का नमाज़ पढना मना है" तो इसमें कोई क्या कर सकता है?

धर्मोपदेशों में इस उदाहरण के समान मामूली सी भ्रांतियां यूँ बरसों बरस चलाई जा सकती है तो हज़ारों वर्षों से हज़ारों आलिम आखिर कर क्या रहे थे? वे उपदेशों के अनुवाद का भी अनवरत शुद्ध उद्धार कर न पाए, और कथित भ्रंतिया दृढतर बनती रही।

अहसास की परतें - समीक्षा said...

बहन हरकीरत मेरे अभिमत को आपने अपने टिप्पणी मे स्थान दिया मैं गौरवान्वित हुआ। बहन मैं अपनी तरफ से कुछ भी नही लिखता जो भी इस ब्लॉग जगत मे देख रहा हूँ सिर्फ उस पर अपनी टिप्पणी देता हूँ मै कोइ बहुत ज्ञानी नही जो बडी बडी बाते कर सके पर ऐसा भी नही कि कोइ भी मुझे कुछ भी बता दे और मैं उसको मान लूं।

मैने देखा कि एक बहुत ही ज्ञानी पुरुष इस, जो कि इस दुनिया के योग्य नही हैं उन्हे तो कहीं ऊपर होना चाहिए था, पर क्या हुआ कि गलती से खुदा ने ऊपर से टपका दिया तो वो नीचे गिर पडे, अब इतनी ऊँचाई से गिरे तो दिमाग मे क्रैक हो गया, ऐसे मे उनके ब्लॉग पर कुछ गलतियां दिखी तो उनका विरोध करने के उद्देश्य से मैने अपना वज़ूद खड़ा किया। देख रहा हूँ कि उनसे भी ज्यादा क्रैक सलीम के दिमाग मे हुआ है, तो उसको भी समझाने कि कोशिश की, पर पहले वाले ज्ञानी को बुरा लगा और उसने मेरी टिप्पणी delete कर दी।

एस.एम.मासूम said...

हरकीरत हीर जे की कविता मैं केवल औरत का दर्द नहीं बयान किया गया है बल्कि इस्लाम मैं औरत पे ज़ुल्म की बात कही गयी है. और उनके जवाबात भी इस बात की तरफ इशारा करते हैं की इस्लाम मैं औरत को आज़ादी नहीं है और उसपे ज़ुल्म हो रहा है ऐसा हरकीरत जी का मान ना है और इस के साथ साथ हरकीरत जी ने यह बात भी साफ़ कर दी है की उनको इस्लाम के बारे मैं अधिक जानकारी नहीं है.
आप ने जो भी सवालात किये वो भी यह बात ज़ाहिर करते हैं की इस्लाम के उसूल आप को नहीं पाता. जब किसी विषय मैं अधिक जानकारी ना हो तो इंसान को यह कोशिश करने चाहिए के उस विषय पे ना बोले या बोलने के पहले सही तरीके से उसकी जानकारी ले ले.
समाज मैं औरत पे ज़ुल्म उसका इस्तेमाल आज इस पुरुषप्रधान समाज मैं हर जगह हो रहा है, इस से कोई किसी भी धर्म अछूता नहीं है. यह धर्म की बुराई नहीं बल्कि इंसानी कमजोरी है.
मर्द अपनी ताक़त का इस्तेमाल औरत पे हमेशा से करता आया है. इस से बड़ा ज़ुल्म क्या होगा की जिस इस्लाम ने आते ही औरत को पैदा होते की मार डालनी के खिलाफ आवाज़ उठाई उसी मज़हब पे औरत पे ज़ुल्म का इलज़ाम.?

हरकीरत जी यदि हर इंसान केवल अपने धर्म मैं औरत पे हो रहे ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठा ले तो औरत का भला भी हो जाएगा और यह काम सही तरीके से हो भी सकेगा क्यूं की हर इंसान अपने धर्म के कानून अधिक अच्छे से जानता है.

बुराई किसी धर्म मैं नहीं लेकिन हर धर्म को मानने वालों मैं बहुत से कमियां हैं और यह इंसानी कमजोरी है. किसी इंसान या राजनीती के तहत बनाए कानून के नाम पे किसी भी धर्म को निशाना बना लेना नफरत फैलाता है.
आशा है मेरी बात को समझेंगी.
यह तीन लेख देख लें क्यों की शायद आप के कुछ सवालों के जवाब यहाँ मिल सकते हैं.


इस संसार में रहते रहते हम क्रोध काम, और लोभ के अधीन हो जाते हैं
विवाह से पूर्व लड़की से राय अवश्य लें. Womens Day specia
ना जाने क्यों हम आदिमानव युग मैं वापस लौटने को आज तरक्की का नाम दे रहे हैं?

VIJUY RONJAN said...

bahut hi khubsurat...

VIJUY RONJAN said...

Harkeerat ji,bahut ho khoobsoorat nazm hai..kya kahun...itna hi ki jo khuda saman hote hain unhe ibadat ki izazat nahin kyunki ibadat to unki hi ki jaati hai.

Aurat to khuda ka roop hai...
Dharm ke thekedar shayad mujhe bhi galat samjhein par maine to yahi jaana hai....yahi mahsoos kiya hai...

उपेन्द्र ' उपेन ' said...

हीर जी, बहुत ही सच्चाई बयां की है आपने ....................इक औरत में स्त्री की तकलीफों को आपने बखूबी बयां किया है.

vedvyathit said...

sundr sadhuvad
ydi schchai kisi ko buri lge to is sch kahne vale ka kya dosh hai soorj to din me hi niklega
lekhak kam schchaai ko vykt krna hai nsahity smaj ka drpn hone ke sath 2 deepk bhi hai jo rah dikhat hai

सलीम ख़ान said...

islam hi duniyan ka pahla aur iklauta dharm hai jisne jaydaat men auraton ko hissa diya...!!

visit my article to wash-up your doubts about islam !

अहसास की परतें - समीक्षा said...

शाहनवाज़ के विरोध का कोइ मतलब नही वो फालतु की बातें करता है, फालतु के लिंक देता है। उसने सलीम के ब्ळॉग पर एक लिंक दिया था जिसमे लिखा है कि एन डी तिवारी का विवाह इंदिरा गांधी से हुआ था

Dinesh pareek said...

वाह वाह के कहे आपके शब्दों के बारे में जीतन कहे उतन कम ही है | अति सुन्दर
बहुत बहुत धन्यवाद् आपको असी पोस्ट करने के लिए
कभी फुरसत मिले तो मेरे बलों पे आये
दिनेश पारीक

Saleem Khan said...

औरत और इस्लाम


यहाँ पर इस्लाम में जो हसियत औरतों की बताई गई है गलत है ..जितनी इज्ज़त और ताकत इस्लाम में औरतों को दी गई है वो कहीं और नही है ...बुरका औरतों या लड़कियों की सुरक्षा के लिए होता है ..कैद के लिए नही ...इस्लाम में तो बेटी को बाप की संपत्ति में भी अधिकार दिया गया है ... ऐसा मैंने आज तक किसी धर्म नही देखा ......माँ के परों में जन्नत बताई गई है .....इस्लाम में तो गैर औरत से हाथ भी मिलाना मना है ..इसका उद्देश्य केवल औरतों और लड़कियों की सुरक्षा है ...हज़रात मोहम्मद सल्लाही अल्लेही वास्सलम ने तो यहाँ तक कहा है की अगर किसी ने अपनी बहन बेटी की सही से परवरिश कर दी और शादी कर दी तो जन्नत में उसका घर पक्का है ....

अहसास की परतें - समीक्षा said...

इस्लाम मे और्रतों की क्या हैसियत है यह तो इसी से सिद्ध हो जाता है कि तुम लोगो का धर्म ग्रन्थ खुले आम औरतों का पीटा जाना सही घोषित करता है।

रही बात सुरक्षा की तो यह हास्यास्पद है कि सुरक्षा के नाम पर औरतों को कैद मे रखने की चालाकी भरी बातें करते हो, पर जब कोइ मुस्लिम कहीं लूटा जाता है तब उसको नही बोलते कि घर मे क्यों नही बैठते?
आस्ट्रेलिया मे जब डॉ हनीफ मोहम्मद को हिरासत मे लिया गया था (आतंकवादियों से संबंध रखने के संदेह मे) तब क्यों सब चिल्ला चिल्ला कर आसमान पर उठा रहे थे? क्यों नही बोला उसे कि भारत मे ही रहता क्यों आस्ट्रेलिया गया (उसके पिछवाडे पर बराबर सम्मान पूर्वक कार्यवाही होने के बाद भी अब फिर से वो आस्ट्रेलिया मे है, डॉलर किसे नही चाहिए, चाहे पिछवाडा थोडा बिगड ही क्यों न जाए)

संपत्ति मे अधिकार की जो बात कर रहे हो वो इकलौता अधिकार इस्लाम ने स्त्रियों को दिया वहां भी बराबरी नही, जब कि हिन्दुओं ने इस भेदभाव को जाना और बहनों को भाईयों के समान अधिकार दिया है।

अहसास की परतें - समीक्षा said...

सलीम तुमने लिखा है "अगर किसी ने अपनी बहन बेटी की सही से परवरिश कर दी और शादी कर दी तो जन्नत में उसका घर पक्का है" तो तनिक यह भी लगे हाथ बता दो कि अपनी ही पुत्रवधु से बलात्कार करने पर भी जन्नत मे घर पक्का होगा क्योंकि अब तो फतवा भी पूरे हिन्दुस्तान ने पढा इस विषय मे कि अगर ससुर पुत्रवधु से बलात्कार करे तो वो ससुर की वैध बीवी हो जाती है।

हरकीरत ' हीर' said...

सलीम जी आपके लिए एक खुशखबरी है .....
पढ़िए एक खबर .....

पेरिस .निजी आज़ादी पर बेबाकी से बोलने वाले यूरोपीय देश आर सदैव किसी भी प्रकार के अभिव्यक्ति के पुरजोर समर्थक फ्रांस में सोमवार से बुर्के पर रोक लग रही है. शनिवार को फ्रांस की राजधानी पैरिस में प्रतिबंध के खिलाफ प्रदर्शन हुए. पुलिस ने 59 लोगों को गिरफ्तार किया है. फ्रांस में सरकार ने केवल बुर्के पर ही रोक नहीं लगाई है, बल्कि रोक के खिलाफ प्रदर्शन करने पर भी पाबंदी है. इसीलिए शनिवार को उत्तरी पैरिस में प्रदर्शन कर रहे लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. कानून के मुताबिक यदि कोई भी महिला सार्वजनिक स्थलों पर बुर्का पहने दिखाई देती है, तो उसे 150 यूरो यानी 9,000 रुपये का जुर्माना देना होगा. पुलिस ने बताया कि गिरफ्तार लिए गए 20 लोग बुर्का पहन कर प्रदर्शन करने आए थे. यह लोग प्लेस दे ला नात्सिओं के बाहर प्रदर्शन कर रहे थे. इसके अलावा दो व्यक्तियों को फ्रांस में उतरते पर ही गिरफ्तार कर लिया गया. इन में से एक व्यक्ति ब्रिटेन से और एक बेल्जियम से आया था. पुलिस ने बताया कि सभी व्यक्तियों की जांच चल रही है. एक व्यक्ति को हथियार रखने के जुर्म में हिरासत में ले लिया गया है. फ्रांस की अधिकतम आबादी कैथोलिक ईसाइयों की है, लेकिन देश में 50 लाख मुस्लिम भी रहते हैं.


भारत में भी इस तरह के कदम शीघ्र उठाये जाने चाहिए .....

प्रतुल वशिष्ठ said...
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प्रतुल वशिष्ठ said...

हीर जी की टिप्पणी पर :
अच्छा तो .. आप जले पर नमक भी लगा लेते हैं.
मुझे तो अच्छा लगा ये व्यंग बाण.

कौशलेन्द्र said...

सलीम ख़ान said...
islam hi duniyan ka pahla aur iklauta dharm hai jisne jaydaat men auraton ko hissa diya...!!

सलीम जी ! आपका प्रवचन धर्मान्धता की सीमा तक आ पहुंचा है ...जिसमें तर्क का निताँत अभाव है. दूसरे, आपके प्रवचन की भाषा अन्य धर्मों से इस्लाम को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए वितंडावाद पर आश्रित है. आपको या किसी को कोई अधिकार नहीं कि वह दूसरे के धर्म को हेय सिद्ध करने में अपनी विद्वता का प्रदर्शन करे. धर्म एक आचरण का मार्ग है ....अपनी-अपनी सुविधा, देश-काल और आवश्यकताओं के अनुसार तत्कालीन समझदारों द्वारा बनायी गयी एक नियमावली मात्र .......इसलिए इसमें भिन्नताओं का होना स्वाभाविक है. यद्यपि मैं मानता हूँ कि इसके बाद भी एक धर्म ऐसा भी है जो सभी धर्मों से श्रेष्ठ है ..उसका कोई नाम नहीं है .....वह सार्वभौमिक है ....उसके पालनकर्ता विरले संत ही होते हैं ......वे प्रदर्शन नहीं करते.....और पूरे विश्व में कहीं भी पाए जा सकते हैं ....वह किसी धर्म का विरोधी नहीं है ......वह केवल मानवीयता की बात करता है ...वह अलिखित है ...और चिंतनशील व सात्विक व्यक्तियों के मन में स्वतः प्रकट होता है इसलिए सार्वभौमिक होते हुए भी वैयक्तिक है.
वस्तुतः यह सारा विवाद आध्यात्मिक समझ के अभाव में उत्पन्न होता है ....हमें प्रयास करना चाहिये कि बिना किसी को नीचा दिखाए हुए हम अपने समाज की बेहतरी के लिए काम करें और आवश्यकतानुरूप उसमें परिवर्तन करें. अभी पाकिस्तान से मोहतरमा ज़ाहिदा हिना जी ने बताया कि एक ज़माने में वहाँ की मस्जिदों से क्रिकेट के खिलाफ फतवे जारी किये जाते थे ...इस बार मस्जिदों में विश्व कप जीतने के लिए दुआएं की गयीं. जाहिदा जी को मस्जिदों का यह वैचारिक परिवर्तन अच्छा लगा ...और बेशक मुझे भी. यह परिवर्तन एक उम्मीद जगाता है कि हमें समय के अनुसार लचीला और परिवर्तनशील होना चाहिए. जहाँ लचीलापन नहीं है वहाँ परिवर्तन भी नहीं है .....इसीलिये वहाँ सुधार भी नहीं है ...और जहाँ सुधार नहीं है वहाँ यात्रा अधिक लम्बी नहीं होती ....दुनिया में न जाने कितनी भाषाएँ ...जातियाँ और प्रजातियाँ समाप्त हो गयीं . अंत में अनुरोध है कि श्रेष्ठता की लड़ाई को छोड़ अपने-अपने मातानुसार ...बिना किसी का अहित किये...... आचरण करने में ही कल्याण है.

अहसास की परतें - समीक्षा said...

नवभारत टाइम्स से साभार "डीएलएफ फेज-2 स्थित क्लब में एक युवक से मारपीट और जबरन डांस कराने का मामला सामने आया है। पीड़ित युवक का आरोप है कि कार सवार 4 युवक जबरन उसे क्लब ले गए। साथ ही उसके कपड़े भी उतरवाए गए।"

सलीम अब तो युवकों को भी सरेआम नंगा किया जाने लगा और नाच नचवाया जाने लगा, साथ ही समलैंगिकों की बढती संख्या भी युवकों के कौमार्य (??????) की सुरक्षा पर एक चिंता उत्पन्न करता है, क्या तुम मुस्लिम पुरुषों को भी बुर्का पहनाओगे?

अहसास की परतें - समीक्षा said...

कौशलेन्द्र जी आपने बीन अच्छी बजाई, पर बजाई भैंस के सामने, अब इस पर वो नागिन डांस तो करने से रही वो तो दूध ही देगी।

अहसास की परतें - समीक्षा said...

आश्चर्य है कि हीर जी के द्वारा इस्लाम शब्द को हटा लिये जाने पर भी कठमुल्ले लतियाए जाने के लिए यहां बार बार आ रहे हैं।

masoomshayer said...

is nazm ko bar bar sochaa jaa saktaa hai bas kuch kahane ke liye shabd nahee hain

vinod said...

aapki rachnaye samvednao ka sagar hai
badhai Vinod Babbar Delhi

KISHORE DIWASE said...

हरकीरत जी...
सत सिरी अकाल जी...
आपकी भावनाओं से मेरे अल्फाजो ने कब चुपके से गलबहियां कर ली पता ही न चला .खैर यह तो होना ही था. आपका चेहरा और इक दर्द की सवा पांच लाइने देखकर मन सोचने लगा था.कुछ बताने लायक नहीं कहने वाले लोग ही अमूमन बगैर बताये लोगो के दिल-दिमाग में पूरी तहजीब से सेंधमारी कर उसे अपना बना लेते हैं.लिहाजा यकीन मानिये आपके दिल का इक दर्द बरास्ता लफजों के मेरे सीने में आकर धडकने लगा है.कितनी मासूम है आप जो आपको अहसास ही न हो पाया कि जब आप दिल में अंगारे लिए जिंदगी की सीढियां चढ़ रही थी तब मेरे अल्फाज ने ही तो आपकी भावना का हाथ थाम रखा था.हम दोनोंके माजियों की कतरनें भी तो कितनी अजीजी से आपस में बतिया रही थी... नहीं सुना था क्या? आपकी भावना जब जख्मों के टाके सिल रही थी तब मेरे अल्फाज ने ही तो पंखिल एहसास से धागा पिरोया था.हरकीरत जी यकीनन अब वो एक दर्द -साझा दर्द बन गया है .हमारे अल्फाज रूठते मानते हँसते खेलते ... आपस में छेड़खानी करते बतियाते रहेंगे.
यूं ही भावनाओ में बहने लगा था....
अपना ख्याल रखियेगा....सपरिवार शुभकामनायें
किशोर दिवसे
माय ब्लॉग- kishordiwase.blogspot.com
e-mail-kishore_diwase@yahoo.com
जब पुस्तक भेजने का मन करेगा आप घर का पता पूछेंगी . मई फ़ौरन भेज दूंगा.

Aryaman Chetas Pandey said...

very true....indeed!!

Zafar said...

Sorry for this true comment.
That your beautiful poem does not fit on Muslim Women.
Contrary to your views, muslim women live like queens in their homes. Just visit a practicing muslim home and see yourself.
May be you have seen any exceptional case and assumed all women to be in the same conditions.
Believe me ,it is not true at all.
Hope you will understand it.

Zafar said...

I see the paper very regularly and I have seen coutless cases of suppression of women and even killing the unborn females in non-muslims. What would you say about it, Maam. Dont see these type of cases in distorted light.

Islam is the purest and 100% natural way of life. Each and every guidline is logical, extremely logical.

Zafar said...

A large of number of women from so called liberated societies like USA & Europe are turning towards Islam, why ?

Because women get the most respectable status and most comfortable life in a True Muslim society.

Zafar said...

The basic rule of comparision is that the study cases must be from the same socio-economic strata.

Compare a good number of cases following the above rule and you will find it out that the women in muslim families are in the best position.

See thru a clear lens and you will love to be a Muslim.

fairmind said...

POLYANDRY PRACTICES
http://timesofindia.indiatimes.com/india/Modern-Draupadis-exist-in-Mansa-villages/articleshow/7847515.cms
http://edition.cnn.com/2008/WORLD/asiapcf/10/24/polygamy.investigation/index.html?iref=topnews
http://en.wikipedia.org/wiki/Polyandry_in_India

fairmind said...

पंजाब और उत्तर भारत के कुछ राज्योंमें बहुपति प्रथा प्रचलित है जिसमें पत्नी को इच्छा के विपरीत एक से ज्यादा पतियोंकी पत्नी बनन पड़ता है| अतः उन आधुनिक द्रौपदियों की मनःस्थिति विषद करनेवाली कविता लिखना भी संयुक्तिक रहेगा|
इस संबंध में कृपया Modern Draupadis exist in Mansa villages यह आलेख
http://timesofindia.indiatimes.com/india/Modern-Draupadis-exist-in-Mansa-villages/articleshow/7847515.cms इस लिंक पर पढ़ें|
उसीप्रकार Brothers share wife to secure family land यह आलेख
http://edition.cnn.com/2008/WORLD/asiapcf/10/24/polygamy.investigation/index.html?iref=topnews इस लिंक पढ़ें