Tuesday, April 7, 2009

खुले ज़ख्म.....!!

मित्रो,
मैं तहेदिल आपसब की शुक्रगुजार हूँ जो आपने मुझे इतना प्यार दिया ....मैंने उम्मीद भी नहीं की थी कि इन कठिन परिस्थियों में आप सब इस तरह मेरे साथ खड़े हो लेंगे .... मेरे पास लफ्ज नहीं हैं अपनी ख़ुशी जाहिर करने के लिए ....सच कहूँ तो अब मुझे कोई रंज नहीं है नज़्म के चोरी होने का .. अब आपसब का स्नेह भरा हाथ जो है सर पर.......जाइये मुनव्वर सुल्ताना जी सजा लीजिये अपना घर चोरी के फूलों से .....
जा सजा ले अपना घर मेरे आँगन के फूलों से
हमें तो तेरे दिए खार रास आ गए............!!

पेश है एक छोटी सी नज़्म है ...".खुले ज़ख्म...

खुले ज़ख्म.....!!


आज नज्मों ने
टांका छेड़ा
और लगा दी
भूल जाने की .....

मैंने ज़ख्मों की
पट्टी खोल दी
और कहा ....
देख दर्देआशना
मेरा हर रिसता ज़ख्म
तेरी रहमतों का
मेहरबां है ....

नज्मों ने
मुस्कुरा के
मेरे हाथों से
पट्टी छीन ली
और कहा ...
तो फिर इन्हें
खुला रख
तेरी हर टीस पे
मेरे हर्फ़ बोलते हैं.....


अब मैं
ज़ख्मों को
खुला रखती हूँ
और...
मेरी हर टीस
नज़्म बन
पन्नों पे
सिसक उठती है.....!!

42 comments:

संध्या आर्य said...

अब मैं
ज़ख्मों को
खुला रखती हूँ
और...
मेरी हर टीस
नज़्म बन
पन्नों पे
सिसक उठती है.....!!

जिन्दगी इन्ही टीसो की दास्तान है ........सही कहा आपने .....

अनिल कान्त : said...

aapke andaaze bayan bhi khoob hain

डॉ. मनोज मिश्र said...

अच्छी रचना ..

ओम आर्य said...

in jakhmon ka jindagi se kuch jaroori sa bandhan hai hai aur isliye najmon ka jindagi se.

Aaapne tees utha di dil men.

दिगम्बर नासवा said...

अब मैं
ज़ख्मों को
खुला रखती हूँ
और...
मेरी हर टीस
नज़्म बन
पन्नों पे
सिसक उठती है.....!!

सुन्दर रचना है..........
हर लाइन..........एक जख्म की तरह कुछ नयी बात कहती नज़र आती है
बेहतरीन प्रस्तुति

सुशील कुमार छौक्कर said...

आज सुबह से आपके ब्लोग टेम्पलेट में कुछ गडबड थी। जिसकी वजह ये रचना पहले नही पढ पाया। सच खुले जख़्म अपनी बात को यू ही कहते है। बहुत ही उम्दा नज़्म है।
नज्मों ने
मुस्कुरा के
मेरे हाथों से
पट्टी छीन ली
और कहा ...
तो फिर इन्हें
खुला रख
तेरी हर टीस पे
मेरे हर्फ़ बोलते हैं

बेहतरीन।

अभिषेक'शफक़' said...

behad khoobsurat nazm hai .. "meri har tees nazm ban panno pe sisak uthti hai" lajawaab kahayal hai ..

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत ही खूबसूरत रचना. आप्का बात कहने का अंदाज ही निराला है. बहुत लाजवाब.

रामराम.

"अर्श" said...

मेरी हर टीस
नज़्म बन
पन्नों पे
सिसक उठती है.....!!

इस तरहसे शब्दों से खेलने की कला अगर किसी को आता तो सिर्फ हरकीरत जी है ... बहोत ही खूब लिखा है आपने... बधाई आपको..

अर्श

mehek said...

मेरी हर टीस
नज़्म बन
पन्नों पे
सिसक उठती है.....!!
waah bahut khub

SWAPN said...

wah, " ab main zakhmon ko...............jaati hai."

behtareen bhavabhivyakti.

विनय said...

बहुत अच्छी नज़्म है!

---
तख़लीक़-ए-नज़र

रश्मि प्रभा said...

नज्मों ने
मुस्कुरा के
मेरे हाथों से
पट्टी छीन ली
और कहा ...
तो फिर इन्हें
खुला रख
तेरी हर टीस पे
मेरे हर्फ़ बोलते हैं.....
...........sach hai ek-ek harf me jaan hai

vijaymaudgill said...

अब मैं
ज़ख्मों को
खुला रखती हूँ
और...
मेरी हर टीस
नज़्म बन
पन्नों पे
सिसक उठती है.....!!

आपकी लेखनी मुझे कीलती है। सच कह रहा हूं। आपको पढ़ने के बाद पता नहीं क्या मेरे पास शब्द नहीं है। बस इतना कहूंगा कि मैं आपका मुरीद हो गया हूं। हरकीरत जी मुझे लगता है शायद आप पंजाबी हैं। बताइगा ज़रूर।

डॉ .अनुराग said...

अब मैं
ज़ख्मों को
खुला रखती हूँ
और...
मेरी हर टीस
नज़्म बन
पन्नों पे
सिसक उठती है.....!!





लगता है पिछली बात का असर अब भी है...इस तरह कि बाते यकीनन दिल दुखाती है पर उनसे अपने लेखन में निराशा न आने दे.....आप से हमें ढेरो नज्मे सुननी है ....

रंजना [रंजू भाटिया] said...

अब मैं
ज़ख्मों को
खुला रखती हूँ
और...
मेरी हर टीस
नज़्म बन
पन्नों पे
सिसक उठती है.....!!

अच्छी लगी यह पंक्तियाँ ...

रंजना said...

वाह !!सचमुच दर्द साकार हो गए शब्दों में....
अति भावपूर्ण मर्मस्पर्शी रचना..

Dr.Bhawna said...

अब मैं
ज़ख्मों को
खुला रखती हूँ
और...
मेरी हर टीस
नज़्म बन
पन्नों पे
सिसक उठती है.....!!

bahut sundar bahut-2 badhai...

अमिताभ श्रीवास्तव said...

अब मैं
ज़ख्मों को
खुला रखती हूँ
और...
मेरी हर टीस
नज़्म बन
पन्नों पे
सिसक उठती है.....!!

rachna ki sabse behtreen panktiya he..kya kahu.....bahut khoobsoorat andaaz

creativekona said...

अब मैं
ज़ख्मों को
खुला रखती हूँ
और...
मेरी हर टीस
नज़्म बन
पन्नों पे
सिसक उठती है.....!!
हरकीरत जी ,
जख्मों को खुला रखना ही उनके हित में अच्छा होता है .जख्म जल्दी भरते हैं ....
बहुत अच्छी रचना .
हेमंत कुमार

दर्पण साह 'दर्शन' said...

dhanyvaad mufils ji, manu ji,

maine kaha tha na ki main gulzaar ka fan hoon...

..."harkarit ji" meri nayi gulzaar banne ke liye badhai...

zayada kuch nahi kahoonga apke lekhan ke baare main...
..chota muh badi baat !!

"main nimi mera murshad uncha"

neera said...

क्या कहूँ? दर्द को इतने सारे रूप, शब्द, अहसास, नज़्म आज तक शायद किसी और ने नहीं दिए होंगे... लगता है जितना बांटती हो उतना बढ़ता है...

अल्पना वर्मा said...

अब मैं
ज़ख्मों को
खुला रखती हूँ
और...
मेरी हर टीस
नज़्म बन
पन्नों पे
सिसक उठती है.....!!
कितना दर्द छुपा है इन पंक्तियों में..जैसे की दर्द की हद्द पार हो गयी हो!
बहुत ही कसक भरी नज़्म है,[और क्यों न हो...हर रचनाकार के लिए उस की हर कृति उसके बच्चे की तरह उसे अज़ीज़ होती है.उस के इस तरह से छीन लिए जाने से मन दुखी तो होगा.नज़्म के यूँ चोरी हो जाने पर ,आप कितना भी कहें अब रंज नहीं 'मगर एक कसक तो रहेगी कुछ और दिनों तक.]

गर्दूं-गाफिल said...

शाबाश ;
ये हुई न बात हरकीरत वाली ,
हरि के राखे जग चाले उस हरि की कीर्ति कौन मिटाए
दिल में तडप लेखनी सुर्सुती नज्म रोज उतर आए
जिन्दा लोग किसी कांटे केलिए अपने सफर नहीं रोकते हैं

shyam kori 'uday' said...

... बेहद खूबसूरत।

जितेन्द़ भगत said...

दर्द को मानों जुबा मि‍ल गई इस नज्‍म में।

Baadal102 said...

wah harkirat ji dard or jhakmo ka bahut aacha ahsaas karya hai aap ne.

Dr. Tripat said...

अब मैं
ज़ख्मों को
खुला रखती हूँ
और...
मेरी हर टीस
नज़्म बन
पन्नों पे
सिसक उठती है.....!!

bahut sunder...dil ko chu gaya har lafzz..

साहिल said...

अब मैं
ज़ख्मों को
खुला रखती हूँ
और...
मेरी हर टीस
नज़्म बन
पन्नों पे
सिसक उठती है.....!!

bahut khoob

परमजीत बाली said...

अच्छी रचना है।

प्रदीप मानोरिया said...

बहुत कम शब्द बहुत गहरी बात लाज़बाब शब्दों की इतनी किफायत काबिले तारीफ़ है वाह वाह सलाम आपको
मेरी ब्लॉग जगत से लम्बी अनुपस्तिथि के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ

मुकेश कुमार तिवारी said...

हरकीरत जी,

नज्मों को एक नई उपमा दी है आज आपने, कितनी भली सी उपमा है टीस / नज्म / टांका / जख्म.

सब जैसे अपनेआप कह जाते हैं वो जो आप कहना चाहती है.

मुकेश कुमार तिवारी

manu said...

हरकीरत जी,
नज़्म बाद में पढेंगे,,,,,
या कही भी पढ़ लेंगे,,,,,आपकी नज़्म पढने के लिए अब आपके ब्लॉग पर ही आना जरूरी कोई ना है,,,:::::::::::::::)))))))))))))))))))))))))))))))))))))))))

पर आपका ब्लॉग काफी निखर गया है,,,,,,,भगवान् बुरी नजर से बचाए,,,
आपको तो खार कुछ ज्यादा ही रास आ गए हैं,,,,,
मैं तो पहले उन्हें दुआ दे दूं,,,,

wo chori fir se mubaarak ho aapko,,,

गौतम राजरिशी said...

लीजिये मनु जी के पीछे-पीछे हम भी चले आये
ब्लौग का नया रंग-रूप अच्छा है..
और उस चोरी को जाने दीजिये...भड़ास पर कथित सफाई महज एक बकवास है...

नीरज गोस्वामी said...

कमाल की रचना है...आप छोटी मोटी चोरी की घटना से परेशां न हुआ करिए...जिनके पास अपना कुछ नहीं होता वो ही दूसरों की चीज चुराते हैं....लेकिन ऐसे लोग जल्द ही गायब भी हो जाते हैं...आप लिखती रहिये...बिना परेशां हुए...
नीरज

pritigupta said...

Tannka chdaa aur lagaa dii aag bhool jaane kii. Mat booliye hum saath hai ek nahi 100 munauar sultaanaa bhi nahii ban sakti Hrikrat Haqeer

Udan Tashtari said...

एक टीस भीतर कहीं..अद्भुत!! बहुत सुन्दर रचना बन पड़ी है. बधाई आपको.

मुनव्वर सुल्ताना said...

एक तरफ़ आपने चाहा कि मैं आपके ब्लाग पर आकर माफ़ी मांगू और जब मैंने माफ़ी मांग ली तो आप उसे अपने प्रिय टिप्पणीकारों के सामने जाहिर नहीं करना चाहती हैं क्या बात है अपराधी बनाए रखना चाहती हैं तो मैंने तो सहर्ष स्वीकार कर ही लिया है लेकिन पूरी ईमानदारी के साथ आपके द्वारा मेरी डिलीट करी हुई टिप्पणी को लेकर भड़ास पर प्रकाशित करूंगी। एक ओर आपके बड़प्पन का छद्मवेश आप लोगों के सामने रख रही हैं दूसरी तरफ़ मुझे अपराधी बनाए रखना भी चाहती हैं,आपका स्वागत हैसबसे ईमानदार,लोकतांत्रिक मंच भड़ास पर आ जाइएगा शीघ्र ही एक पोस्ट के रूप में इस बात को लिखने वाली हूं लिखते ही आपको सूचित करूंगी

SUNIL KUMAR SONU said...

khula hi rakhna dard ko
ki use bhi hava chahiye.
hariyali kise bhata nahi
najro ko har-har chahiye

Dr. Kuldeep Singh Deep said...

ਦਰਦ ਦਾਦ ਬਣਦੇ ਨੇ
ਦਿਲ ਦੀ ਆਵਾਜ਼ ਬਣਦੇ ਨੇ
ਕਦੇ ਇਹ ਨਗਮਾ ਬਣਦੇ ਨੇ
ਕਦੇ ਇਹ ਸਾਜ਼ ਬਣਦੇ ਨੇ
ਕਦੇ ਦਰਿਆਵਾਂ ਪਤਾਲਾਂ ਤੋਂ
ਡੂੰਘਾ ਇਹ ਰਾਜ਼ ਬਣਦੇ ਨੇ
ਕਦੇ ਮਨ 'ਚ ਆਏ ਤਾਂ ਦੋਸਤ ਵੀ ਬਣਨ
ਪਰ ਅਕਸਰ ਦੁਸ਼ਮਣ ਇਹ ਨਾਮੁਰਾਦ ਬਣਦੇ ਨੇ
ਇਹ ਡੰਗ ਮਾਰਨ ਕਿੰਨੇ ਵੀ
ਮਿੱਠੀ ਜਿਹੀ ਯਾਦ ਬਣਦੇ ਨੇ
ਡਾ. ਕੁਲਦੀਪ ਸਿੰਘ ਦੀਪ

Dr. Kuldeep Singh Deep said...

ਦਰਦ ਦਾਦ ਬਣਦੇ ਨੇ
ਦਿਲ ਦੀ ਆਵਾਜ਼ ਬਣਦੇ ਨੇ
ਕਦੇ ਇਹ ਨਗਮਾ ਬਣਦੇ ਨੇ
ਕਦੇ ਇਹ ਸਾਜ਼ ਬਣਦੇ ਨੇ
ਕਦੇ ਦਰਿਆਵਾਂ ਪਤਾਲਾਂ ਤੋਂ
ਡੂੰਘਾ ਇਹ ਰਾਜ਼ ਬਣਦੇ ਨੇ
ਕਦੇ ਮਨ 'ਚ ਆਏ ਤਾਂ ਦੋਸਤ ਵੀ ਬਣਨ
ਪਰ ਅਕਸਰ ਦੁਸ਼ਮਣ ਇਹ ਨਾਮੁਰਾਦ ਬਣਦੇ ਨੇ
ਇਹ ਡੰਗ ਮਾਰਨ ਕਿੰਨੇ ਵੀ
ਮਿੱਠੀ ਜਿਹੀ ਯਾਦ ਬਣਦੇ ਨੇ
ਡਾ. ਕੁਲਦੀਪ ਸਿੰਘ ਦੀਪ

Rajat Narula said...

बहुत उत्तम रचना है !