Monday, July 4, 2011

लापता शब्द ....

चपन में कई बार अपनी ही परछाई देख डर जाती ....आज जब ज़िन्दगी की परछाइयाँ अँधेरे में खड़ी होती हैं ...तो फटे हुए कागचों पर अक्षर बिलख उठते हैं ....और कलम बाँझ हो जाती है ....सच है ये वक़्त बड़ा ही नामुराद होता है ....जब हम उसका साथ मांगते हैं ...तब वह हमसे भागने लगता है ...और जब थक जाता है ज़िन्दगी की दौड़ से .... तो लौट कर सामने आ खड़ा होता है ...पर तब न उसे कुछ मिल पाता है न हमें ....और ज़िन्दगी खत्म हो जाती है .....आज अस्पताल में बैठी यूँ ही ज़िन्दगी के कुछ पन्ने पलटती रही ......

अस्पताल से .....

रा फिर उतरी है
करवटों में .....
वार्ड की ठंडक
बाहरी तापमान की
भट्ठी से लड़ती है .....
ज़िन्दगी की धड़कने
जर्जर देह में लड़खड़ाती हैं
साँसें रह-रह कर मौत से लड़ती हैं
और दर्द .....
मेरी आँखों में उतर कर
बीस साल पुराने पन्ने
पलटने लगता है .......
जब सूरज ....
तीखे शब्दों के साथ उतरता
हवाएं खौफ़ से सहम जातीं
बादल चुपके से हथेली पे
बूंदें लिए उतर आते ...
चाँद थाली में पड़ी
सूखी रोटियाँ छुपा लेता ....
मैं घबराकर दुपट्टे की इक कतरन फाड़
बादल की आँखों पे पट्टी बाँध देती
और दुआ के लिए हाथ उठा देती ....
कई बरस मेरी दुआएं
खाली हाथ लौटती रहीं ....
वक़्त बदलता रहा और उम्र की
दहलीजें भी
मैं ख़ामोशी के अक्षर चुनती
और वक़्त के पेड़ पर बाँध देती
मन्नतें जिस्म के हर कतरे से
अक्षर गढ़ती  ...
नज्में कागचों पर उतर
सूली पर चढती रहीं ...

आज ख़ामोशी ने अक्षर तोड़े हैं
और मैं झड़े हुए पत्तों से
अपने हिस्से के अक्षर चुनती
सोच रही हूँ शायद
स्वर्ग और नर्क यहीं है .....


(2)


तस्वीरें .....

र की दरारों पर
मैंने टाँक दी है कुछ तस्वीरें
देखने वाले अक्सर मुझे
कला की शौकीन
समझ लेते हैं .....!!


()

लापता शब्द .....

लापता हैं शब्द
कई दिनों से ...
ठीक उसी वक़्त से जब
दूर कहीं रौशनियों का नगर
नज़र आने लगा था ....
ख़ामोशी अपने कंधे पर
लिए जा रही थी
मेरे शब्द ......!!

()

कैक्टस .....

धीरे-धीरे ....
मैं बहुत दूर निकल आई थी
वहाँ .....
जहाँ.....
बुत बने पड़े थे पत्थर ....
जब मैं पहली बार यहाँ आई थी
तब ये बुत नहीं थे ...
कुछ नीली सी रौशनियाँ झाँकती थी
इनकी आँखों में ....
मोहब्बत थिरकती थी इनके ज़िस्म में
उठती साँसों में ज़िन्दगी हँसती थी
उसी हँसी में मैंने देखा था
रात को सुब्ह में
सुब्ह को रात में
इक पल में ही बदलते हुए ...
हाँ .....
तब इनके बीच
ये कैक्टस नहीं था ......!!

()

तुम्हारे शब्द ...

ह.....
तुम ही तो थी
जिसकी तलाश थी मुझे
जन्मों-जन्मांतरों से ....
ये तुम्हारे ही कहे शब्द थे
जो आज कन्धा देने खड़े हैं
सूली पर चढ़ी ...
मोहब्बत को .....!!

()

ख़त .....

बीच मैंने
तुम्हें कई ख़त लिखे
कुछ पूरे सफ़्हों के ...
कुछ अधूरे ....
और कुछ अनकहे भी ....
हाँ ; ये और बात है कि
उनमें शब्द नहीं थे ...
प्रेम ,शब्दों का मोहताज
कभी रहा ही नहीं .....!!

()

यादें .....


ह फिर आया था
बादलों की छाती चीर
सावन की कश्ती पे सवार
उसकी आँखों में मोहब्बत की तलाश थी
उस रात यादें बहुत देर तक
पैरों के तलवों से
काँटे निकालती रहीं .....!!

()

कशमकश .....

ज़िन्दगी ....
नज़्म सी तड़पी है
किसी लाश के पास का कोई पत्ता
थर्राकर कांपा है ....
मरे हुए साजों ने फिर
सुर छेड़ा है .....
आज की रात आग
पत्थर उबालेगी .....!!

(१०)

दर्द ....

रात ....
जब ज़ख्मों ने छाती पीटी
कुछ अक्षर चाँद से गिरे थे
मैंने वो सारे अक्षर
कोख में बो दिए ...
आज नज़्म ने ....
दर्द को ज़न्म दिया है .... !!



Sunday, May 29, 2011

न जाने खुदा कब लिबास उतार दे .....

काफी अर्सा दूर रही आपसे...कुछ संपादिका की जिम्मेदारी कुछ पारिवारिक जिम्मेदारियों में उलझी रही ....इस बीच अस्पताल में ज़िन्दगी और मौत के हिसाब-किताब में मिट्टी डोलते देखी ...ज़िन्दगी को भला कोई खरीद पाया है .....?...मौत उसे कब शिकस्त दे दे पता नहीं ...डर गई हूँ ...ज़िन्दगी और मौत से ज्यादा मुहब्बत से .....इसलिए तो दाँत भींचे बैठी हूँ ...जाने खुदा कब लिबास उतार दे .....


()

मुहब्बत के पत्ते .....

रसों ....
आग की चिंगारियों में
जलाया है ज़िस्म
अब .....
झुलस जाते हैं पत्ते भी
मेरे छूने भर से .....
अय हवाओ ...!
ये मुहब्बत के पत्ते
मेरे आँगन में मत
फेंका कर ....!!


()

झू .....

झू .....
कुछ यूँ टँगा रहता है
लोगों की जुबाँ पर
के हर रोज़ उतारती हूँ
ज़िस्म के ....
टुकड़ों के साथ ......!!


()

इक और दर्द.....

पूरी कायनात का दर्द
जैसे सिमट गया था
धरती
में ...
और धरती ......
कल ही दफ़्न हुई थी
मेरे सीने में ....
पियूष की एक बूंद
लब तक आकर ठहर गई
और मैं देखती रही उसे
बूंद से पत्थर होते हुए ......!!


()

भईया .....

मरे में जलती
लाल-हरी बत्ती की तरह
तुम्हारी साँसें भी ...
जलती-बुझती सी
इस सलाईन की लगी बोतल से
पल-पल ज़िन्दगी मांगती हैं
तुम्हारी जर्द आँखों में
आज मैंने बचपन देखा है .....!!

(अस्पताल से - जर्द हुए भाई के लिए )


()

मौत .....

....
उतरती रही
आँखों से देह तक
देह से हड्डियों तक
हड्डियों से साँसों तक
दर्द की करवटों में
ओह पापा ....!
मुझे मुआफ करना
मैंने मौत से आँखें चुराई हैं .....!!

( कैंसर से जूझते पिता -ससुर के लिए )

Sunday, April 24, 2011

तवायफ़ की इक रात ....

तवायफ़ की इक रात ....


मैं फिर .....
अनुवाद हो गई थी
उसी तरह , जिस तरह
तुम उतार कर फेंक गए थे मुझे
अन्दर बहुत कुछ तिड़का था
ग़ुम गए थे सारे हर्फ़ ....


रात मुट्ठी में
राज़ लिए बैठी रही ...
जो तुम मेरी देह की
समीक्षा करते वक़्त
एक-एक कर खोलते रहे थे
हवा दर्द की आवाजें निगलती ...
जर्द, स्याह, सफ़ेद रंग आग चाटते
कई गुनाह मेरी आहों में
चुपचाप दफ़्न होते रहे ......


बस ये .....
बिस्तर पर पड़ा जनेऊ
खिलखिला कर हँसता रहा
जो तुमने मुझे छूने से पहले
उतार कर रख दिया था
सिरहाने तले ......!!

Thursday, April 7, 2011

दर्द की मुस्कुराहटें ......

समां ने कुछ दर्द के टुकड़े काट कर फिर उछालें हैं ...सालों से हथेली पे ठहरी हुई बूंद ठहाके लगा हँस पड़ी है ...नज्में अपने कटे बाजू देख तड़प उठीं हैं ....खुदा भी बड़ा बेरहम है ..हाथ पकड़ कर खींचता है और फिर धकेल देता है दूसरी तरफ .... दर्द धीमें- धीमें मुस्कुराने लगा है अपनी जीत पर ........
ओ बी ओ परिवार ने इस बार 'दोस्ती' शब्द दिया था नज्मों के लिए ....ये नज्में वहीँ से उपजी हैं .....


()

ये सिहरन सी ...
क्यों है अंगों में ?
ये कौन रख गया है
ज़िस्म पर बर्फ के टुकड़े ?
ये नमी कैसी है आँखों में ..?
के मेरा दोस्त भी आज ....

इश्क़ की नज़्म उतार
सजदे में खड़ा है .....!!

(२)

ब चाँद ने भी

मुँह फेर लिया है ...

वह नहीं आता अब मेरी खिड़की पर

बस रात चुपचाप रख जाती है

एक टुकडा दर्द का ......!!

(3)

क्या लिखूँ ....?

शब्द भी मुँह मोड़ने लगे हैं

कुछ दिनों में ये अंगुलियाँ भी

कलम का साथ छोड़ देंगी ....

नामुराद दर्द ......

अब हड्डियों में उतर आया है .....!!

(४)

दीवारें तो ...
खामोश थीं बरसों से
फासले भी तक्सीम किये बैठे थे
अय ज़िस्म..... !
अब इसमें तेरा दर्द भी शुमार हो गया
दोस्त .....

अब छोड़ दे तन्हाँ मुझे ......!!

(५)

ह सारे ख़त

जो तूने मुहब्बत में लिखे थे

हाथों में काँपने लगे हैं ....

मैं हथेली में तीलियाँ लिए बैठी हूँ

इससे पहले कि दर्द बेनकाब हो जाये

लगा दूँ आग इनमें ......!!

(६)

लो....

मैंने उतार दी है नज़्म

तेरे नाम की इन आँखों से

टांक दिए हैं सारे गीत मोहब्बत के

अंधेरों की कब्र में ...

आ इस अजनबी रात के सीने पर

गैर सा कोई गीत लिख दें ......!!

(७ )

मजोर हुई काया

अकड़ी हुई अंगुलियाँ ....

नकारे हुए हाथ ....

अब अपनी ही लिखी तहरीरों पर

लगाते हैं ठहाके ....

और दर्द है के कपड़े उतारे बैठा है ......!!

(८)

हैरां न होना
ग़र मैं न लौटूँ ....
सामने की कब्र में ...
जश्न भी है और मुशायरा भी
अँधेरे, नज्मों से भरे पड़े हैं
अय दोस्त.... !
आ अब उतार दे मुझे इस

कब्र में .....!!


Monday, March 28, 2011

ख़ामोशी चीरते सवाल ......

अभी होली से पहले के ज़ख्म भरे नहीं थे कि नामुराद सी कोई शुबह: पैगाम लिए आई ...कि फेस बुक की किसी मोहतरमा ने आपकी होली वाली ग़ज़ल की कुछ पंक्तियाँ अपने नाम से प्रकाशित की हैं ....हमने आपत्ति जताई तो 'मोहतरमा' कहती हैं कि ''क्या आप मेहमानों को बताते हैं कि आप किस होटल से खाना लेकर आये हैं ....'' अब इन्हें कौन बताये कि मोहतरमा आप खाना कीमत चुका कर लाती हैं कि चुरा कर ...खैर अरविन्द त्रिपाठी जी का भला हो जिन्होंने इसे साहित्य की चोरी मानते हुए उस पोस्ट को ही हटवा दिया ... मैं इस बात से भी हैरान थी कि पहले भी नज़्म चोरी करने वाली 'मोहतरमा' ही थी और अब भी ...
एक गुज़ारिश आप सब से भी .... कि इस तरह की चोरी को जहाँ भी देखें पुरजोर विरोध करें ....

और अब फिर रहट की टूटती रस्सी का अंतर्नाद है ...कै
दी नज्में आँखों की नमी से सवाल करती हैं ....मिट्टी अपने हाथ खोलती है ....मेरे सामने बस में एक स्त्री ... इतने गर्म मौसम में भी हाथों में काले दस्ताने ... पैरों में काले मोज़े ... ज़िस्म को ऊपर से नीचे तक काले बुर्के से ढके बैठी ॥मुझे फिर वही सवाल पूछने पर मजबूर करती है .....



बस में सफ़र के दौरान मोबाईल से खींची तस्वीर


ख़ामोशी चीरते सवाल ......


त्थरों के फफोले
विडम्बनाओं की ज़मीं
उठाकर चल पड़े हैं .....
बिलकुल वैसे ही जैसे
तुम बाँध देते हो हवाओं को
और एक जलती लकीर खीँच देते हो
उसके ज़िस्म पर ....

नामुराद......
सिल पर पड़ी
ये तिजारत की धूप भी ......
अपनी देह से साँस लेने की
अनुमति मांगती है .....

एक ज़िन्दगीहीन
कारखाने की ख्राशज़दा साँसें
जिसकी चिमनी में ज़ख्मों का
धुआँ अटका पड़ा है .....

हवा तड़प उठी है
तुम्हारे शब्दों की तीलियों से ...
हर एक फब्ती ज़श्न मनाती है
अपनी जीत पर .....

मेरे सामने की मेज से
कोई नज़्म फड़फड़ा कर गिरी है
तुम्हारे पैरों तले ...
अपने लफ़्ज़ों की पैरवी करने ..

सुनो.....
तुम्हारे पास कैंची हो तो
काट देना इसके पर
फिर ये फड़फड़ाएगी नहीं
ज़िन्दगी की तलाश में .....

न जाने क्यों...
फिजां में उठता ये धुआँ
मुझे
तस्कीन दे रहा है .....
मौसम के बदलने की ...

ये तुम्हारे चेहरे पर
प्यास के निशान क्यों उभर आये हैं ....?
सकपकाए से तुम्हारे शब्द
इतने विचलित क्यों हैं ......?
मैं नहीं तोडूंगी तुम्हारे एक्वेरियम की दीवारें
तुम्हें खुद मुझे बुर्के से आज़ाद करना होगा ...

इन विडम्बनाओं के पुल के नीचे
थका हुआ पानी अब .....
ख़ामोशी चीरना चाहता है .......!!


Friday, March 18, 2011

रोज पव्वा पी लिया तो पीलिया हो जायेगा.....

होली हो और हुडदंग न हो ...तो होली का मज़ा नहीं रहता ...पिछले दिनों OBO परिवार ने जम कर होली खेली ....मिसरा था हुल्लड़ मुरादाबादी का .....
रोज पव्वा पी लिया तो पीलिया हो जायेगा
2122 2122 2122 212
फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन फाइलुन
बह्र थी सबकी जानी पहचानी -बहरे रमल मुसमन महजूफ

सबने जम कर मज़े लिए .....वीनस जी तो अभी तक पेट पकडे बैठे हैं ....
इस तरही मुशायरे में OBO परिवार के सदस्य तिलक जी , वीनस जी , शेष धर तिवारी जी , गणेश जी बागी, योगराज प्रभाकर जी , डॉ संजय दानी जी , धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी , प्रीतम तिवारी जी , अरुण कुमार पांडे जी , वीरेंद्र जैन जी , राजेश शर्मा जी , दिगम्बर नासवा जी , कमल वर्मा जी , अम्बरीश श्रीवास्तव , मुमताज़ जी , डॉ नूतन जी आदि ने शिरकत की ....

चूँकि हम भी इस OBO परिवार के सदस्य हैं तो हमने भी कुछ कहने की कोशिश की ....
लीजिये पेश हैं इस मिसरे पर कुछ अशआर......हाँ मक्ते का शे'र आद. योगराज जी से मांग कर लिया है ये उन्हीं का लिखा हुआ है .....


छर्र... रर रर हुर्र...ररर, हो हा हा हो जायेगा
हर गली का आशिक आज कांहा हो जायेगा


उड़ा दिलों की दुश्मनियाँ तू फिजां में रंगों संग
लग जा गले सभी के, दूर गिला हो जायेगा


नजरें न मिला, लगाने गुलाल के बहाने यूँ
कुछ और ठहर गईं जो ,लवरिया हो जाएगा


पी नजरों से मेरी , छोड़ ये दारू का नशा
रोज़ पव्वा पी लिया तो पीलिया हो जाएगा


चाँद उतरा सजा रंगों की थाली , आसमां में
आज फ़लक भी देख लाल,पीला हो जायेगा


कैसा खेल कुदरत का जापान में आज हुआ
इन्हीं रंगों में वो कहीं , गुमशुदा हो जायेगा


छोड़ अब धर्म के झगड़े प्रेम दिलों में रंग ले
क्या जाने कब कौन कहाँ फ़ना हो जायेगा


'हीर' से जो रंग बरसेंगे फ़लक पे हर तरफ,
ये जगत पूरे का पूरा राँझा सा हो जाएगा !


(ग़ज़ल बह्र से बाहर हो तो गुरुजन इस्लाह करें )

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इनका भी मज़ा लें ......

रंग का त्‍यौहार है छेड़ें न क्‍यूँकर लड़कियॉं
मुँह अगर काला हुआ तो क्‍या नया हो जायेगा। (तिलक राज़ जी)

हसीना अपनी जुल्फों को ज़रा महफूज़ रख
विग अगर सर से उड़ा तो बलवला हो जायेगा( राना प्रताप जी )

मत परेशां हो अगर गुझिया में कीड़ा गिर गया,

तल के निकलेगा तो वो भी कुरकुरा हो जाएगा |..(वीनस जी )

नालियों में ही पियक्कड क्यों गिरा, जब पी लिया
"शेष" गर ये राज खुल जाए तो क्या हो जाएगा . (शेष धर तिवारी )

रोज पव्वा पी लिया तो पीलिया हो जायेगा,

जान से जायेगा पर सबका भला हो जायेगा( गणेश जी बागी )


मुँह रजाई में छुपा कर बीड़ियाँ चूसा ना कर,
वर्ना लंका दहन सा कोई हादसा हो जाएगा ! ( योगराज प्रभाकर )


भांग, शादी की मिठाई में डालो लड़कियों,
वरना वर का बाप दुल्हा बन खड़ा हो जायेगा। ( डॉ संजय दानी )


छोड़ दे तू राह जाती लड़कियों को घूरना,
वर्ना धरमिंदर से प्रेम चोपड़ा हो जाएगा !(
धर्मेन्द्र कुमार सिंह ,)


/हाथ पीले आँख पीली गुर्दा बड़ा हो जायेगा ,

रोज़ पव्वा पी लिया तो पीलिया हो जायेगा ( वीरेंद्र जैन )


लौंडिया के बाप से जब सामना हो जाएगा !
जोश तेरे इश्क का पल में हवा हो जाएगा !( योगराज प्रभाकर )